जनांदोलन का कड़वा सच

Posted on March 24, 2012 in Hindi, Society

राहुल यादुका:

जब दिल्ली में अन्ना जी का अनशन था..वहाँ हमने युवा शक्ति को पहली बार देखा था|बहुत से लोगों ने उस आंदोलन से प्रेरणा ली| सोचा की लगता है अब भारत जग गया है और अब भ्रष्टाचार की खैर नहीं|लेकिन जीवन इतना आसान नहीं है… सब चाहते हैं की आंदोलन हो…सब चाहते हैं की व्यवस्था सुधरे…पर कोई भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना नहीं चाहता…

जब आंदोलन बड़े स्तर पर होते हैं तो वहाँ मीडिया होती है,पूरे देश की नज़र होती है|

लेकिन…

जब कोई युवा राजनीति की सारी जटिलताओं को भूलकर अपनी पहलकदमी से कुछ नया करना चाहता है तो समाज के तमाम “वरिष्ठ“ लोग उसे अपने अनुभव का ज्ञान बाँटने चले आते हैं..

और फिर…

फिर शुरू होता है वही सिलसिला…

“अभी नया खून है…समाज ऐसे नहीं चलता,तुम बच्चे नहीं समझते हो राजनीति…” और यहीं दब जाते हैं सारे सपने..कुछ करने के..”नादान परिंदे” अपने घोंसले में लौट आते हैं…

यह आंदोलन जो उस लड़के के मन में ही कुचल दिया गया… आज के युवा को आंदोलित करता जा रहा है… वह छटपटा कर सोचता है की आखिर कैसी राजनीति है हमारे देश की जो हम समझ नहीं सकते|क्या हमे भी इस राजनीति को समझने के लिए ६० साल का होना होगा…जब की हमारा शरीर हमे ढोने में भी सक्षम नहीं रह जाएगा…

छोटे स्तरों पर आवाज़ बुरी तरह दबा दी जाती है…बर्बरता से लाठी चार्ज की जाती है…जनसमूह में से कुछ लड़कों को महज़ खानापूर्ति के लिए जेल में बंद कर दिया जाता है…

अगले दिन अखबार में खबर आती है… “आंदोलन समाप्त ,पुलिस ने किया शान्ति बहाल”, पर जिस लड़के को जेल में बंद कर दिया गया उसका क्या हुआ ये कोई नहीं सोचता…

छोटे शहरों में ये काफी आम बात है… वहाँ न कोई मीडिया होती है और न ही जनसमूह…

अगर इस तरह हमारे आवाज़ को दबाया जाता रहा… तो हम व्यापक स्तर पर जनांदोलन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

Youth Ki Awaaz

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Garima Rani

हमारे देश में पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, उसके लिए युवा ने आवाज उठाई | पर कुछ ही समय के बाद ये आवाज धीमी होने लगी | इसका एक कारन ये भी था कि कोई एक इन्सान अकेले आन्दोलन कर रहा है और उसका साथ कोई भी नही दे रहा तो एक न एक दिन उसका अताम्बल का गिरना तोह निश्चित ही है | अब वो इन सब चीजों से इतना परेशान हो गया है कि उसका अब उन चीजो के बारे में सोचना मुमकिन ही न हो पा रहा हो |

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