संसद: तब और अब

Posted on March 29, 2012 in Politics at Play

राहुल यादुका:

“द हिंदू” से पता चला की उडीसा में माओवादियों ने बीजू जनता दल के एक विधायक का अपहरण कर लिया और उनके एवज में अपनी तीन मांगे रखीं| सरकार इस मसले पर विचार कर रही है| विपक्ष की प्रतिक्रिया से इस लेख की प्रेरणा मिली|

दोस्तों,भारतीय संसदीय व्यवस्था में विपक्ष ही अहम भूमिका होती है| उसका काम सिर्फ सत्ताधारी पार्टी की टांग खींचना नहीं होता| एक समय था जब पंडित जवाहरलाल नेहरु के समय में डॉ.राममनोहर लोहिया जैसे सशक्त और वरिष्ठ नेता विपक्ष में हुआ करते थे| पंडित नेहरु जानबूझकर उन्हें राज्य सभा से मनोनीत किया करते थे ताकि एक मज़बूत विपक्ष की स्थापना हो सके| विपक्ष समय-समय पर पार्टी की निंदा करता था और साथ ही साथ अच्छी नीतियो की प्रशंसा भी करता था|इससे सरकार की निरंकुशता पर रोक भी लगा रहता था और वहीँ सरकार को क्रियान्वयन में सहयोग भी मिलता था|

लेकिन परिवर्तन के इस दौर में संसदीय प्रणाली भी अछूती नहीं रह गयी| आज जो संसद का स्वरुप हम देखते हैं वह एक विकृत रूप है| आज विपक्षी पार्टियां सत्ताधारी दल के अवगुण निकलने में सारी उर्जा खपाती है| अन्ना जी के आंदोलन की निंदा करने वाले सांसद जो संसद की गरिमा की बात करते हैं और देश के लिए कुछ सोचने वालों को राजनीतिशास्त्र का पाठ पढाते हैं, वही सांसद आए दिन संसद में माइक्रोफोन तोड़ देते हैं, पर्चे फाड़ देते हैं और अन्य अनैतिक आचरण करते हैं| संसद को मंदिर कहने वाले नेता हाँथ में चप्पल उठा कर बातें करते पाए जाते हैं|

आज राजनैतिक दलों की सामाजिक चेतना उनके राजनैतिक हितों के सामने तुच्छ हो गयी हैं|छोटी से छोटी बात पर विपक्षी दल सरकार से इस्तीफे की मांग करते हैं| इससे स्पष्ट दीखता है की हर पार्टी सिर्फ और सिर्फ सत्ता में आना चाहती है| और जब यही पार्टी सत्ता में आती है तो फिर ऐसे ही मुद्दों पर उससे इस्तीफे की मांग की जाती है| कुल मिला कर आज भारतीय राजनीति पक्ष और विपक्ष के बीच के द्वंद्व-युद्ध का नाम बन गया है और संविधान और नैतिकता को दरकिनार कर दिया गया है|

देख कर बहुत गुस्सा आता है| झुंझलाहट भी होती है| मैंने कोई राजनीतिशास्त्र नहीं पढ़ा,पर अपने देश की सर्वोच्च संस्था का सम्मान करना मैं जानता हूँ| मेरे पास अनुभव नहीं है और अगर ऐसे नेताओं को अनुभवी कहते हैं तो मैं खुश हूँ की मैं अनुभवहीन हूँ|

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