LAST DAY: Let’s Get Justice Verma To Really Hear Us Out By Doing This

Posted on January 4, 2013 in Society

Thousands took their anger and outrage to the streets after a 23-year-old student was gang-raped in a moving bus on the night of December 16 in Delhi. The whole nation reels under the shock of the details of this gruesome crime, and mourns a braveheart. But we also stand resolute to make sure that this doesn’t repeat itself. As a first step we want laws ensuring safety for women to be scrutinized and amended. The following 15 points would be sent as suggestions from the general public to the Justice Verma Committee that has been set up to look into possible amendments to the criminal law to ensure speedier justice and enhanced punishment in cases of aggravated sexual assault.

Let’s keep the pressure going.

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Nitesh Kumar

सबसे पहली बात ये कि हमारा ध्यान अपराध रोकने से अधिक अपराध को पनपने से रोकने पर होना चाहिए.

महिलाओं के खिलाफ अपराधिक घटनाओं की रोकथाम के लिए मैं मुख्यतः निम्नलिखित बातो पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा.

१. किसी भी प्रकार के एफ. आई. आर. अथवा शिकायत दर्ज कराने के लिए पोलीस स्टेशन के नज़दीक एक बिलकूल हीं अलग ब्लॉक का निर्माण होना चाहिए जहाँ

शिकायत-दर्ज कर्ता, एक महिला एवं पुरुष ( महिलाओं के केस मे महिला शिकायत-दर्ज कर्ता आवश्यक तौर पे ) हो, जिसकी नियुक्ति अलग से होनी चाहिए, वो एक कुशल

मनोविग्यान शास्त्री के साथ साथ एक समाज-शास्त्री एवं नियम-क़ानून जानने वाला प्रशिक्षित व्यक्ति हो. ये ब्लॉक आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण ( कंप्यूटर, इंटरनेट आदि)

सुसज्जित परिसर हो जो शिकायत-कर्ता/ पीड़ित को एक विश्वस्निय आभास दे. अच्च्छा हो क़ि इसके साथ या पास एक अस्पताल भी हो.

२. २१ वी सदी मे मनुष्य की यौन दृष्टि से परिपक्वता की औसत उम्र घटकर १२ से १५ के बीच हो गयी है. अतः बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में अपराधी के लिए बालिग

या नाबालिग का भेद मिटाने की आवश्यकता है. आज यौन-अपराध १५ से २० साल के युवाओं के बीच सबसे ज़्यादा है. ऐसे मे १८ साल से कम उम्र के लोगों के लिए क़ानून

मे रियायत उनमे इतने प्रारम्भ से हीं अपराधिक प्रवृति को बढ़ावा देते है. जो बड़े होते होते एक आदत,शौक,दुस्साहस अथवा पेशा मे तब्दील हो जाता है.वैसे भी अपराध रोकने

में क़ानून के भय का असर , बड़े उम्र के लोगों के बजाय कम उम्र के लोगों मे ज़्यादा होता है क्योंकि वे क़ानूनी पेचिदगियों को पार करने मे अपने को कम सक्षम महसूस

करते हैं.

३. उम्र संबंधी दावों के सत्यापन के लिए दसवी या बारहवी वर्ग के सर्टिफिकेट का नही बल्कि वैग्यानिक उपायों का प्रयोग करना चाहिए. बलात्कार जैसे संगीन अपराध में

त्वरीत कोर्ट की बहुत आवश्यकता है एवं एफ. आई. आर. के वक्त वीडियो रेकॉर्डिंग भी बहुत महत्वपूर्ण है.

४. एक पुरुष के किसी भी अंग( गुप्ताँग, हाथ,उंगली आदि) का महिला के बिना सहमति के उसके गुप्तांग अथवा गुदा मे ज़रा भी प्रवेश या पुरुष के गुप्ताँग का महिला के

मुख मे प्रवेश भी, पूरी तरह बलात्कार की श्रेणी मे शामिल होना चाहिए.

५. बलात्कार साबित होने पर बिना किसी रियायत के कोर्ट को उम्र-क़ैद की सज़ा सुनिश्चित करनी चाहिए, उम्र क़ैद के साथ-साथ समय समय पर उसे शारीरिक तौर पर दंडित

भी किया जाए. मैं मृत्युदंड को तर्कसंगत नही मानता. पर, फिर भी बलात्कार साबित हो जाने पर यह निर्णय करने का अधिकार पीड़ित को दिया जा सकता है कि अपराधी

को मृत्युदंड दिया जाय या फिर उम्र क़ैद.

और भी बहुत सारी बातें है जो सामाजिक एवं व्यक्तिगत तौर पर समझने एवं बदलने की आवश्यकता है. पर क़ानूनी सुधार के लिए मुझे अभी उपर बताई गयी बातें अत्यंत

ही आवश्यक लगती है. सबसे ज़्यादा ज़रूरी है प्रशासनिक एवं पोलीस विभागों मे लेंगिक अनुपात समान करने की एवं इस बात को समझने की -क़ि हर व्यक्ति उसी समाज

का हिस्सा है जिसमें अपराध को पनपने देने की सारी सामग्रियाँ एवं सुविधाएं अब भी उपलब्ध है. क़ानून विकृत पेड़ तो काट सकता है पर विकृत बीज का उन्मूलन तो समाज

के द्वारा हीं संभव है.

एक सशक्त क़ानून बने, ऐसी कामना के साथ
आपका धन्यवाद !

नीतेश कुमार

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