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BHU student protest

अज्ञातकृत:

BHU student protestएक ओर जहाँ हमारे प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी डिजिटल इंडिया की बात करते हुए देश के गाँव-गाँव मे वाई-फाई लगाने की बात कर रहे हैं और साथ ही वाराणसी के घाटो का भी वाई-फाई-करण हो रहा है। वहीं उनके संसदीय क्षेत्र के इतने बड़े केंद्रीय विश्विद्यालय, “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय” के छात्र इंटरनेट, लाइब्रेरी और अन्य पढ़ाई की मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। वर्तमान समय में उच्च स्तरीय शिक्षा के लिए इंटरनेट की उपलब्धता को नकारा नही जा सकता।

मामला साइबर लाइब्रेरी का है जो पहले २४ घंटे खुलती थी, लेकिन नए कुलपति के आने के बाद, इसे मात्र १५ घंटों के लिए खोला जाने लगा (सुबह ८ से रात्रि ११ बजे तक) । आपको बता दें की बी.एच.यू. के ६० प्रतिशत से अधिक छात्र विश्वविद्यालय के बाहर रहते है जहां बिजली की उपलब्धता एक बड़ी समस्या है। बाहरी छात्रों के इस समस्या के समाधान के लिए साइबर लाइब्रेरी खोली गई थी, जिसमे छात्र वातानुकूलित स्थान पर इंटरनेट व कंप्यूटर की सुविधा के साथ अपना पठन-पाठन का कार्य कर सकें। परीक्षा के दिनो में इसकी जरुरत और बढ़ जाती है।

कुलपति महोदय का सम्बधित मामले में कहना है कि, जब वे पढ़ा करते थे तो यह सब सुविधाएं नहीं थी। उनके क्लासरूम वातानुकूलित नहीं थे ना ही कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध थी, फिर भी वे पढ़े। उन्होंने आगे जोड़ते हुए यह भी कहा कि स्नातक के छात्रों को लाइब्रेरी की क्या जरूरत हैं, और पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कुछ और पढ़ने की क्या जरुरत है? उन्होंने आंदोलन करने पर छात्रों को विश्वविद्यालय से बाहर करने की भी चेतावनी दी।

यहाँ तक कि साइबर लाइब्रेरी की उपलब्धता २४ घंटे करवाने के लिए गाँधीवादी तरीके से रात में कैंपस में पढाई कर अपने हक़ की आवाज़ उठा रहे छात्रों में से २ छात्रों, शांतनु सिंह गौर (सोशल साइंस द्वितीय वर्ष) और विकास सिंह (पोलिटिकल साइंस शोध छात्र) को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया। विश्वविद्यालय द्वारा लाठी, डंडे के दम पर लाइब्रेरी से जबरदस्ती निकाले जाने के कारण छात्र, स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ अपना विरोध दर्ज़ करा रहे थे।
अनवरत १७ दिनों से स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने को विवश बी.एच.यू. के विद्यार्थी, विश्वविद्यालय प्रशासन के उदासीन तथा तानाशाहीपूर्ण रवैये के कारण निराश और हताश होकर १८-मई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में बैठने को मज़बूर हुए।

भूख हड़ताल के आठवें दिन से बी.एच.यू. प्रशासन के लोग, आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए अनशनरत विद्यार्थियों के घर पर फ़ोन कर परिवारजनों को डरा धमका रहे हैं। छात्रों को निष्काषित करने, करियर बर्बाद करने, जेल भिजवाने, उठा लेने आदि की धमकियां दी जा रही हैं। एक छात्र अमरदीप सिंह के ऊपर पारिवारिक दबाव बनाने में यह सफल भी रहे हैं। आंदोलन स्थल पर पानी, शौचालय, बिजली आदि की मूलभूत सुविधाएं बंद कर प्रशासन ने मानवीयता की सारी हदों को तोड़ दिया है। इसी क्रम में २३-मई को ९ आंदोलनरत छात्रों को निलंबित भी कर दिया गया।

यहाँ तक कि बी.एच.यू. प्रशासन ने अपने कतिपय चाटुकार छात्रों का इस्तेमाल कर आंदोलन को हिंसक करने की भी नाकाम कोशिशें की। आंदोलनरत छात्रों में से दो छात्र अविनाश ओझा और दीपक सिंह की तबियत ख़राब होने पर इन्हे इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया है ।

बी.एच.यू. प्रशासन नें, अभी तक किसी भी वार्ता के लिए हामी नहीं भरी है।

वर्तमान स्थिति: शिक्षा के मौलिक अधिकार को लेकर जब छात्रों को भूख हड़ताल करनी पड़े तो समझ लीजिए कि उनकी सही भूख जाग उठी है। यह जठराग्नि नही है जो तुरंत ख़तम हो जाए, यह तो दावानल की तरह और भड़केगा और फिर सभी अवांछित तत्वों को जलाकर खाक कर देगा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों का आंदोलन अपने नये आयाम की तलाश में लगातार प्रयासरत है। सभी आठ हड़ताली छात्रों ने अपना अनशन तोड़ दिया है। वजह उनका बिगड़ता हुआ स्वास्थ्य था। अभी वो देशभर के ज्वलंत छात्र नेताओं से संपर्क साध रहे हैं।

यूथ की आवाज़ से बात करते हुए एक अंशनकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पे कहा कि, “हम प्रशासन को तीन दिन की मोहलत दे रहे हैं, ताकी प्रशासन अपना बर्खास्तगी आदेश वापस ले, अन्यथा इसके बाद हम विरोध के और भी जोरदार तरीकों से उनका सामना करेंगे।”

आंदोलनकारी छात्र पूरे देश भर के छात्र नेताओं को सोमवार को बी.एच.यू. आने का आह्वान कर चुके हैं। इस बीच यूनिवर्सिटी प्रशासन की, इस एकता को भंग करने की पूरी कोशिशें जारी हैं। अब प्रश्न यह है कि, छात्रों के इस मौलिक अधिकार के साथ हो रहे खिलवाड़ के लिए कौन जिम्मेदार है।

क्रम अनुसार घटना:

• दिनांक ०२/०५/२०१६ को छात्र प्रतिनिधिमंडल, ५०० से अधिक छात्रों द्वारा हस्ताक्षर किये गए पत्र को लेकर कुलपति महोदय से मिले। कुलपति महोदय ने छात्रों से बिना कोई बातचीत किये विश्वविद्यालय से निकाल बाहर करने की धमकी दी, साथ ही यह भी कहा कि लाइब्रेरी स्नातक के छात्रों के लिए नहीं है।

कुलपति महोदय के बातचीत का लहजा एक गुरु-शिष्य की बातचीत से कोसों दूर था, साथ ही उन्होंने स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने की भी सलाह दी।

• ०२/०५/२०१६ से रात को छात्रों ने स्ट्रीट लाइट के नीचे पढाई करना शुरू किया। छात्रों को सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारपीट कर भगाया गया।

• ०६/०५/२०१६ को छात्रों नें डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स को लाइब्रेरी खोलने के संबंध में पत्र दिया। छात्र रोज रात को लाइब्रेरी के मैदान में अथवा स्ट्रीट लाइट के नीचे पढाई कर रहे थे, परन्तु रात को प्रॉक्टोरियल बोर्ड द्वारा छात्रों को बेवजह परेशान किया गया और छात्रों के आईकार्ड छीने गए एवं उनके साथ मार-पीट की गयी।

• ०९/०५/२०१६ को दो छात्रों के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया

• दिनांक १०/०५/२०१६ को प्रधानमंत्री कार्यालय के स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठ कर पढ़ाई की

• दिनांक १६/०५/२०१६ को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, एमएचआरडी, इत्यादि मंत्रालयों को इस सम्बन्ध में सूचना दी गयी।

• अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के सम्बन्ध में मूक प्रशासन को देखकर छात्र १८/०५/२०१६ से भूख हड़ताल पर बैठने को बाध्य हुए।

• दिनांक २३/०५/२०१६ को ९ आंदोलनरत छात्रों को निलंबित कर दिया गया।

छात्रों की माँगे:-

१) – बीएचयू साइबर लाइब्रेरी को पुनः २४ घंटे खोला जाये।

२) – छात्रों से ग्रीष्मावकाश में छात्रावास ना खाली कराया जाये।

३) – परिसर में २४ घंटे एक कैंटीन खुले।

४) – रात में छात्राओं को उनके छात्रावासों से लाइब्रेरी तक ले जाने के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतेज़ाम के साथ बसों के संचालन की व्यवस्था कि जाए।

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ambedkar university collage

अनूप:

पिछला एक-डेढ़ साल देश भर की छात्र राजनीति के लिए उथल-पुथल का समय रहा है। एक के बाद एक विश्वविद्यालयों में मचते हुए कोहराम, कड़ी दर कड़ी जुड़ते हुए, एक लम्बी श्रृंखला बनाते गए। वर्तमान में देखने पर पिछले एक-डेढ़ साल का समय छात्र आंदोलनों के लगातार आगे बढ़ते जाने और गहन होते जाने का समय दिखता है। इन तमाम आंदोलनों की पृष्ठभूमि को देखें तो यह पायेंगे कि यह सभी छात्र संघर्ष, अपने-अपने परिसरों के सवालों-समस्याओं से जूझते हुए और उन्हीं को संदर्भित करते हुए अपने आंदोलनों की रुपरेखा तैयार करते गए। फिर वो चाहे दक्षिणपंथी वाईस चांसलर की नियुक्ति से उपजा ऍफ़.टी.आई.आई. का लम्बा संघर्ष रहा हो, या महिला उत्पीड़न पर यूनिवर्सिटी प्रशासन को चुनौती देता जादवपुर यूनिवर्सिटी का आन्दोलन। ऐसे कितने ही आन्दोलन अपने-अपने परिसरों की रूपगत विशिष्टता के अनुसार बनते-बदलते रहे हैं। दिल्ली के कॉलेज ऑफ़ आर्ट में चला छात्र संघर्ष इसी कड़ी में स्थानीय समस्या और सवाल के इर्द-गिर्द जमा होती राजनीतिक चेतना का ही स्पष्ट उदाहरण है। इन तमाम स्थानीय सवालों-समस्याओं और आंदोलनों की गति से उर्जावान दिल्ली की छात्र राजनीति की दिशा भी तय होती रही है। साथ ही दिल्ली की छात्र राजनीति में नए केंद्र भी उभरे, जो दिल्ली की प्रगतिशील छात्र और युवा राजनीति के विभिन्न केन्द्रों और कार्यकर्ताओं को करीब भी लेकर आए। अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की आंतरिक राजनीति और बाहरी छात्र संघर्षों में यूनिवर्सिटी छात्रों की मौजूदगी को इसी रुपरेखा द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

जैसा कि ऊपर बताने की कोशिश की गयी है, कि अलग-अलग छात्र संघर्षों में स्थानीय सवालों-समस्याओं की अहम भूमिका रही है। लेकिन दिल्ली से शुरू हुआ ओक्युपाई यू.जी.सी. आन्दोलन एम-फिल और पी.एच.डी. की छात्रवृत्ति को बंद करने के मुद्दे से उपजा ऐसा आन्दोलन बना जिसने तमाम स्थानीय सवालों-समस्याओं को एक मंच पर एकत्रित किया। विभिन्न स्थानीय समस्याओं-सवालों को एक केंद्र प्रदान करता यह आन्दोलन, विभिन्न यूनिवर्सिटी छात्रों के बीच संवाद का भी माध्यम बना। ओक्युपाई यू.जी.सी. आन्दोलन समय के लम्बे अन्तराल में फैला ऐसा आन्दोलन बनकर उभरा जिसने कैंपस के भीतर के कई छात्रों (संगठन से जुड़े और साथ ही साथ स्वतंत्र छात्र) को एक साथ समूहगत किया और साथ ही विभिन्न परिसरों के छात्रों को भी एक-दुसरे को जानने-समझने का अवसर दिया। इस प्रकार इस आन्दोलन ने विभिन्न स्थानीय विशिष्टताओं की समानताओं को समझने का अवसर ज़रूर दिया।

अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति के लिए भी यह पहला अवसर था कि यूनिवर्सिटी परिसर से बाहर राजनीतिक अभिव्यक्ति द्वारा खुद को संगठित और बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जा सके। जैसे कि ऊपर मैंने ज़िक्र किया ही है, कि देश भर में हुए विभिन्न छात्र संघर्ष जहाँ एक ओर स्थानीय सवालों-समस्याओं द्वारा गतिमान और संगठित हुए। वहीं इनके इर्द-गिर्द बनने वाली राजनीतिक चेतना के सामान्यीकरण की प्रक्रिया को समझने में पुराने प्रगतिशील राजनीतिक स्वरूप सफल नहीं हो पाए, और उन सामान्यीकरणों का क्रियान्वयन भी ना हो सका। इसीलिए इस बात को भी समझा जाना चाहिए कि छात्र राजनीति में नए राजनीतिक प्रयोग हमेशा ही वामपंथी और प्रगतिशील छात्र राजनीति के पुराने स्वरूपों के प्रति उदासीन क्यों है? क्यों आज दलित राजनीति या वामपंथी राजनीति की स्वतंत्र समझ रखने वाले छात्र, प्रगतिशील राजनीति के क्षेत्र के भीतर ही पुरानी राजनीतिक संरचनाओं से संतुष्ट तो हैं ही नहीं, बल्कि उनके कटु आलोचक हैं? या तो छात्र समुदाय राजनीति से सम्पूर्ण रूप से कटा हुआ है या उसका विरोधी है, या फिर वह एक नयी संरचना के उत्थान के लिए प्रयासरत दिखता है। अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में हुए राजनीतिक कार्यक्रमों को इसी रूप में समझा जा सकता है।

अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली, एक युवा यूनिवर्सिटी है, जिसने अभी अपने 10 साल भी पूरे नहीं किये हैं। २००७ में दिल्ली सरकार द्वारा विशेषकर मानविकी के गहन और गम्भीर अध्ययन के उद्देश्य के लिए बनाई गयी इस यूनिवर्सिटी ने छोटे अंतराल में ही अपना व्यापक उत्थान किया है। मसलन, ७ स्नातक पाठ्यक्रम, २१ परास्नातक पाठ्यक्रम और १३ शोध पाठ्यक्रमों के साथ यूनिवर्सिटी में छात्रों की संख्या कोई १८५० के आस-पास है। ऐसे अपेक्षाकृत छोटे लेकिन अकादमिक विभिन्नता से परिपूर्ण इस परिसर में राजनीति चुनौतीपूर्ण कार्य है। वह भी ऐसे सन्दर्भ में जब यूनिवर्सिटी छात्रों में उच्च मध्यम वर्गों और उच्च वर्गों-वर्णों के छात्रों की अच्छी-खासी संख्या है। दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी में छात्रों के मुद्दे प्राथमिकताओं की दृष्टि से इतने अधिक अलग-अलग रहें हैं, कि उन मुद्दों को एकताबद्ध करके राजनीतिक दिशा को समझ और तलाश पाना पिछले ४ वर्षों में लगभग हो ही ना सका था। मसलन कुछेक छात्रों के लिए फीस-वृद्धि का मुद्दा ज़रूरी रहा तो वहीं कई उच्च वर्गीय छात्रों का यह भी कहना रहा कि जब फीस इतनी अधिक ली जा रही है तो उसके अनुसार सुविधाएं दी जाएं। कुछ अल्पसंख्यक छात्रों के लिए अकादमिक अध्ययन में अंग्रेजी की कड़ी अनिवार्यता मुद्दा रही, तो इसके ही विरोध में कुछ छात्र हिंदी भाषा में लिखने के संघर्ष को हिंदीवाद से जोड़ते हुए दिखे और कुछ मामलों में इस ज़रूरत को अव्यवहारिक भी बताया गया। यूनिवर्सिटी में कुछ छात्र यदि डीटीसी बस पास की उपलब्धता की लड़ाई को लड़ रहे थे, तो वहीं कुछ छात्र इस से अलग प्रशासन से यूनिवर्सिटी क्षेत्र में कार पार्किंग की बहस में उलझे थे।

इन व्यापकताओं और विरोधों के बीच, यूनिवर्सिटी की फोरम पॉलिटिक्स ने ४ साल के समय में अलग-अलग मुद्दों को समझा, उठाया और कुछ हल भी खोजे। यहाँ दुसरे परिसरों की अराजनीतिक संस्कृति से उलट, अम्बेडकर यूनिवर्सिटी को अलग ले कर आना जरुरी है। जैसे यहाँ सक्रिय राजनीति में कार्यरत छात्र, संगठनात्मक राजनीति से न जुड़ कर, विभिन्न विचारों और सवालों को एक मंच के रूप प्रस्तुत करते रहे हैं। (अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में हालिया दौर तक किसी भी संगठन की औपचारिक इकाई नहीं है)। इसे किसी भी तरह से अराजनीतिक तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता। पिछले ४ सालों में बने मंचों को अगर याद करें, तो इसमें सबसे पुराना मंच, ‘स्टूडेंट फोरम’ रहा है। इसके अलावा भी कई मंच रहे, जैसे, प्रोग्रेसिव एंड डेमोक्रेटिक स्टूडेंट कम्युनिटी ऑफ़ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी डेल्ही, नार्थ-ईस्ट फोरम, और छात्रों-शिक्षकों का सामूहिक फोरम, एल.जी.बी.टी. क्वीर कलेक्टिव, और हालिया दौर में बना दलित-बहुजन-आदिवासी कलेक्टिव। ओक्युपाई यू.जी.सी. आन्दोलन एक ऐसे अवसर के रूप में अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की राजीनीति से जुड़ा, कि व्यापक और विभिन्न मुद्दों को एक एकताबद्ध सूत्र प्राप्त हुआ, जिसने राजनीतिक रूप से सक्रिय छात्रों को एकत्रित किया। लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर ज़िक्र किया कि इन स्थानीय सवालों को चाहे, आक्युपाई यू.जी.सी. के तात्कालिक मुद्दे ने एक कॉमन ग्राउंड दिया हो, लेकिन यूनिवर्सिटीयों के बीच के वर्गीकरणों और यूनिवर्सिटी में छात्रों के मध्य के वर्गीकरणों की समझ को भी इस आन्दोलन ने सामने रखा। बहरहाल, इन वर्गीकरणों को समझने में ना जे.एन.यू.एस.यू. के नेताओं की कोई दिलचस्पी रही, ना ही संगठित वामपंथी दलों ने, इसमें कुछ रचनात्मक हस्तक्षेप ही किया। और इसीलिए अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की राजनितिक समझ में यह शंका और गहराने लगी कि क्या आन्दोलन जे.एन.यू. केन्द्रित तो नहीं हो रहा?

ऐसे राजनीतिक सवाल मेरे मन में भी निरंतर उठते रहे कि राजनीतिक चेतना का सामान्यीकरण जो इतने लम्बे समय बाद अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की राजनीति में देखने को मिला है, क्या इसकी रूप-रेखा और जटिलता को समझने को संगठनात्मक वामपंथी ताकतें तैयार हैं? क्या ओक्युपाई यू.जी.सी. आन्दोलन किसी व्यापक विमर्शगत सामान्यीकरण (ब्रॉडर डिस्कर्सिव जनरलाइजेशन) का छात्र राजनीति में क्रियान्वन कर सका? अभी अम्बेडकर यूनिवर्सिटी के भीतरी राजनीतिक विमर्श और बहसें इन सवालों से टकराने में लगी ही थी कि हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र नेता, रोहिथ वेमुला ने, यूनिवर्सिटी प्रशासन के जातिवादी-ब्राह्मणवादी रवैये से आजिज़ आकर अपनी जान दे दी। रोहिथ की ‘संस्थागत हत्या’ ने देश की छात्र राजनीति को ओक्युपाई यू.जी.सी. के संघर्ष से व्यापक बनाते हुए जातिवादी-ब्राह्मणवादी तन्त्र के खिलाफ छात्र आन्दोलन को और मज़बूत बनाया। रोहिथ का खुद का अपना मुद्दा भी कई महीनों से उसकी फ़ेलोशिप का रुकना भी था, इसीलिए इन सवालों का आपस में जुड़ना तय था। इस आन्दोलन ने ओक्युपाई यू.जी.सी. के बाद अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की आन्तरिक राजनीति में एक नयी लहर पैदा की। जिसमे एक ओर पुराने छात्र कार्यकर्ता, नयी समझदारी के साथ आन्दोलन में उतरे वहीं, कई नए छात्र भी इस संघर्ष में गोलबंद हुए। इस पूरी प्रक्रिया में अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की राजनीति में एक नयी और प्रगतिशील घटना यह हुई कि पूरे देश में अम्बेडकरवादी संगठनों के उभार की श्रृंखला में अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में भी ‘दलित-बहुजन-आदिवासी कलेक्टिव (डी.बी.ए.सी.)’ नाम के एक फोरम का प्रयोग सामने आया।

‘डी.बी.ए.सी.’ की राजनीति का अच्छा पक्ष यह रहा कि दलित और पिछड़े छात्रों ने निरंतर एक साथ बैठना शुरू किया और इसी क्रम में यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि ‘अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर’ में हर वर्ष किसी सवर्ण को ही बुलाया जा रहा है। प्रख्यात इतिहासकार प्रो. रोमिला थापर को अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर में बुलाये जाने पर कलेक्टिव (डी.बी.ए.सी.) ने कुछ ऐसे तथ्यों और सवालों को सामने रखा जिन पर बात तो लम्बे दौर से की जा रही थी, लेकिन कुछ किया नहीं जा सका था। बाबा साहेब के नाम से विकासशील एक यूनिवर्सिटी, जो कि वाईस चांसलर की सहमति सहित, (दलित शोधार्थी रोहिथ वेमुला की संस्थागत हत्या पर आधिकारिक तौर पर निंदा व्यक्त करे) अगर अपने ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण वार्षिक कार्यक्रम, ‘अम्बेडकर स्मृति व्याख्यान’, में लगभग हर वर्ष किसी उच्च जातीय अकादमिक या विद्वान को आमंत्रित करती दिखे, तो उसके सिद्धांत और व्यवहार में बड़ा अंतर दिखाई देता है। प्रो. थापर को बुलाये जाने का यह आमन्त्रण और इस आमन्त्रण पर वाईस चांसलर को लिखे अपने पत्र द्वारा डी.बी.ए.सी., यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच कुछ हद तक इस बात का सामान्यीकरण करने में सफल हो पायी। इस तथ्य और व्याख्यानमाला में लगातार सवर्णों को बुलाये जाने के इस जातिवादी-ब्राह्मणवादी अभ्यास के खिलाफ कड़े शब्दों में आपत्ति जताते हुए, वाईस चांसलर को लिखे पत्र द्वारा यूनिवर्सिटी में एक विमर्श ज़रूर खड़ा हुआ। दुर्भाग्य की बात यह रही कि हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय की घटना पर निंदा व्यक्त करने वाले कुलपति महोदय ने, अपने ही परिसर के दलित-आदिवासी छात्रों के इस सवाल का जवाब देने की जरूरत ना समझी। मुलाक़ात तो दूर की बात रही, छात्रों के ख़त का जवाब ख़त द्वारा देना कुलपति महोदय ने मुनासिब न समझा।

इसी तरह का एक प्रकरण तब सामने आया था जब अपनी लिबरल पहचान की लालसा में यूनिवर्सिटी ने एन.ए.ए.सी. (नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन कॉउन्सिल) के आने के दौरान भी बाबा साहेब के विचारों के विरुद्ध आचरण दिखाया था। मुझे याद आता है कि कुछ तीन साल पहले, कार्ल मार्क्स के एक कथन को कुछ साथियों ने ग्राफिटी के रूप में दीवार पर लिखा था। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कुछ ही दिनों में उसी सम्बन्धित स्थान में, जहाँ कि ग्राफिटी थी, दिवालीनुमा रंग-रोगन करा कर, मार्क्स के कथन के हर चिन्ह को वहां से मिटा दिया था। विडम्बना यह रही कि 2014 में एन.ए.ए.सी. के आने पर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने ‘सजावट’ के नाम पर छात्रों को दीवारें सजाने के लिए प्रेरित किया। और न सिर्फ प्रेरित बल्कि इसके लिए रंग-पेंट आदि का सामान भी यूनिवर्सिटी द्वारा ही मुहैया कराया गया। इसी दौरान इसी रंग-रोगन सजावटी और कृत्रिम लिबरल पहचान को गढ़ने की प्रक्रिया के दौरान, कुछ छात्रों ने वैक्लिपिक सेक्सुअल आकांक्षा के चित्र को दीवार में चित्रित किया, जिसे रातों-रात वाईस चांसलर और डीन ऑफ़ स्टूडेंट सर्विसेज की निगरानी में नैतिक-अनैतिक की बहस के निष्कर्ष के तौर पर तहस-नहस कर दिया गया। यूनिवर्सिटी की दीवारों पर बाकी चित्र तो अपना लिबरल गीत गाते दिखाई पड़ते रहे, (आज तक इस महान ऐतिहासिक कांड के साक्ष्य यूनिवर्सिटी परिसर में दिखते हैं) लेकिन एक सूनी दीवार पितृसत्ता की निगरानी में सुलगती रही। आगे चलकर आंबेडकर यूनिवर्सिटी में यह जगह म्युसियम ऑफ़ डिजायर के नाम से कुछ वक्त तक अवश्य जानी गयी। इसी प्रकरण पर स्कूल ऑफ़ कल्चरल एंड क्रिएटिव एक्सप्रेशन के तत्कालीन डीन ने अपने आधिकारिक पद से इस्तीफा भी दिया, जिसे तुरंत ही स्वीकार भी कर लिया गया। इसी तरह पिछले वर्ष ओक्युपाई यूजीसी के समय दीवारों पर महंगी फीस, फण्ड कटौती और कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों से संबंधित ग्राफिटी को भी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने महामहिम राज्यपाल के यूनिवर्सिटी दौरे के बहाने से हटवा दिया।

सवाल यह है कि इस जातिवादी-ब्राह्मणवादी और असवरवादी प्रशासनिक अभ्यासों द्वारा यूनिवर्सिटी किस तरह के उदारवाद की बात करना चाहती है? बहरहाल इस प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जातिवादी-ब्राह्मणवादी अभ्यास को प्रश्नांकित करते हुए डी.बी.ए.सी. ने एक अम्बेडकर चेयर की बात भी उठाई, जिसके तहत परिसर में अम्बेडकर चिंतन पर विचार-विमर्श हो सके। इसी बीच साथ ही साथ स्टूडेंट फोरम के कुछ साथियों द्वारा निकाले जा रहे अखबार ‘ए.यू.डी. अखबार’, में कई छात्रों ने पहले से कार्यरत स्टूडेंट फोरम की कार्य-प्रणाली पर आलोचनाएँ प्रकट करते हुए, कई ऐसे मुद्दों पर ध्यान दिलाया जिस ओर ध्यान नहीं गया था एक ओर जहाँ इस अखबार की रिपोर्ट, स्टूडेंट फोरम की राजनीति की ब्राह्मणवादी-पुरुषवादी आलोचना करती है। तो वहीं दूसरी ओर, छात्रों की मनोवैज्ञानिक थकान और अवसाद, अकादमिक भाषा और एक ख़ास तरह के अकादमिक लेखन की प्रत्याशा का दबाव और भाषाई संकटों के विभिन्न रूपों को भी सामने लेकर आती हैं। इसी गहमा-गहमी में इस बात पर ध्यान गया कि बाहरी राजनीति के साथ सामंजस्य बनाने की हड़बड़ी में क्या छात्र-राजनीति भीतरी मुद्दों को विस्थापित तो नहीं कर रही? क्या बाहर के राजनीतिक परिवर्तन के अनुरूप चलने की ज़रूरत में, छात्र राजनीति कुछ सवालों-समस्याओं को अलग तो नहीं कर रही? इसका कारण चाहे कुछ भी हो, (रणनीतिक या कुछ भी), मगर क्या यह एक वर्चस्ववादी रुख तो नहीं?

इस तरह “अम्बेडकर यूनिवर्सिटी डेल्ही न्यूज़लैटर” से उपजी आलोचनाओं ने यह विमर्श छात्र राजनीति और ‘स्टूडेंट फोरम’ की राजनीति के इर्द-गिर्द पैदा किया, कि क्या हम उसी संरचना को ही पुन:उत्पादित तो नहीं कर रहे जिससे कि हमारा मतभेद है? बहरहाल, इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच छात्र-संघ चुनावों की भी सूचनाएं प्राप्त हुई, जिसकी सुगबुगाहट पिछले ६-८ महीनों से थी। ‘डी.बी.ए.सी.’ के उत्थान ने यहाँ एक और मदद यह की, कि चुनाव पर होने वाले विमर्श में यह मुद्दा शुरू से ही केंद्र में रहा कि चुनाव के भीतर आरक्षण का एक निश्चित प्रावधान हो। ६ अप्रैल को हुई लम्बी मीटिंग की ज़ोरदार बहस इसी विमर्श के इर्द-गिर्द हुई। इस में सहमति से यह बात समझी गयी कि ना सिर्फ जातिगत बल्कि तमाम शोषित अस्मिताओं के लिए आरक्षण की अनिवार्य ज़रूरत है। लेकिन समस्या यह रही कि आरक्षण को लागू करने का कोई वैकल्पिक मॉडल अपने शोधगत निष्कर्षों के साथ मौजूद नहीं था। और दूसरी तरफ बात यह भी थी कि चुनाव जिस प्राविधि से हो रहे थे, उसमे हर एक पाठ्यक्रम से एक छात्र प्रतिनिधि को चुने जाने की प्रणाली थी। और पाठ्यक्रमों में आरक्षण को लागू कर सकना तर्कसंगत तो ना था, और नैतिक रूप से गलत भी था।

बहस के दौरान इस बात पर कुछ सहमति बनी कि पहली स्टूडेंट कॉउंसिल और संविधान समिति में, ४०+X की संरचना को क्रियान्वित किया जाए, जिसमे ४० सदस्य पाठ्यक्रमों से हों, और X, जिन्हें कि खोजना है, आरक्षित हों। इस सहमति के बावजूद भी, ‘डी.बी.ए.सी.’ और कई स्वतंत्र छात्रों का यह मानना रहा कि बिना आरक्षण के चुनावों को नहीं होने देना चाहिए। जबकि छात्रों का एक समूह चुनाव में जाना चाहता था। इन्ही सब गहमा-गहमी के बीच, एक ओर जहाँ ‘डी.बी.ए.सी.’ और कुछ छात्रों ने इलेक्शन के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाये, तो वहीं दूसरी ओर, ‘स्टूडेंट फोरम’ के छात्रों के एक समूह ने दलित-पिछड़े और महिला राजनितिक छात्र कार्यकर्ताओं के बीच इलेक्शन के अपने विचारों के साथ विमर्श स्थापित किया। अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, चुनाव के दिन ‘डी.बी.ए.सी.’ और कुछ छात्रों ने चुनाव मुख्यालय के बाहर जब धरना किया, तो उनके धरना करने के अधिकार का चुनाव लड़ रहे छात्रों ने भी समर्थन किया। राजनितिक मतभेदों के बीच भी छात्र-एकता का यह तथ्य इस बात से भी समझ आता है कि धरने पर बैठे छात्रों की शिकायत करने के लिए कई चुनाव लड़ रहे साथियों को कहा भी गया। अंतत: इन सभी गहमा-गहमी के बीच चुनाव सम्पन्न हुए, और चुनी हुई कॉउंसिल का जातीय और जेंडर आधार (पर्याप्त तो नहीं पर) काफी बेहतर रहा।

अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति के इस विमर्श को यदि समझें तो इसका मकसद उस संरचना को बार-बार विखंडित करने का प्रयास करना है, जो समरूप राजनीति की बुनियाद रखती है। जिसके माध्यम से सभी वर्गीकरण अपने रूपात्मक तरीके से छात्र राजनीति में सामने आ पाए। आरक्षण, दरअसल उन तमाम हाशिये की अस्मिताओं-आवाज़ों तक पहुँचने की कोशिश है, जो केंद्र के विरोधी युग्मों के खेल में अदृश्य या अनुसुनी रह जाती हैं। इसलिए अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की वर्तमान राजनीति की कोशिश केंद्र को बार-बार विकेन्द्रित करने की है। इसीलिए यहाँ इस बात पर एक सहमति बनती दिख रही है कि न सिर्फ निम्न जातीय बल्कि महिलाओं, वैकल्पिक सेक्सुअल समूहों, धार्मिक अल्पसंख्यक, क्षेत्रीय अल्पसंख्यक (मसलन तनाव ग्रस्त क्षेत्रों के छात्र), भाषाई अल्पसंख्यक और निम्न वर्गीय छात्रों की मौजूदगी को आरक्षित किया जाए। और इसी प्रयास की पूर्ति के लिए ‘अम्बेडकर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट कॉउंसिल’ ने अपनी पहली ही कॉउंसिल मीटिंग में इस प्रस्ताव को पास किया कि जब तक X श्रेणी के छात्र चुन कर कॉउंसिल के भीतर नहीं आते तब तक संविधान सभा बनी नहीं मानी जायेगी। संविधान का एक शब्द नहीं लिखा जाएगा। और इसी प्रक्रिया के अनुरूप कॉउंसिल और यूनिवर्सिटी के कुछ अन्य छात्र फ़िलहाल इन गर्मी की छुट्टियों में आरक्षित तबके की रिसर्च एक्टिविटी में कार्यरत हैं। इसी सवाल की सम्भावना की तलाश के लिए कि, क्या पुरानी संरचनाओं का अतिक्रमण करते हुए किसी नयी छात्र राजनीति की संरचना तक जाया जा सकता है?

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डॉ. पूजा त्रिपाठी:

sairatसैराट के बारे में बहुत सुना, बहुत पढ़ा पर फिल्म के ख़त्म होने पर मैं निराश थी। मैं तो गयी थी “आखिर में जीत प्यार की ही होती है”, देखने और ये क्या फिल्म ने तो वही दिखा दिया जो इस देश के गाँव- खेड़ों, हुक्का-पानी वाली पंचायतों, वैवाहिकी वाले कॉलम और फेसबुक वाले शहरों में होता है।

एक बच्चा रो रहा है, उसके पैर खून से सने हैं और वह, निशान हम पर क्यूँ छोड़ कर जाता है? ऐसा क्या है उस बच्चे के रोने में जो हमें परेशान कर रहा है? क्यूँ हम शादी का कार्ड उठाकर सबसे पहले सरनेम देखते हैं और मुस्कुराते हुये कहते हैं, “इंटर कास्ट है”

अर्ची और पर्शिया की खून से लथपथ लाशें पड़ी हैं, कुछ देर पहले आये अपनों ने आशीर्वाद दे दिया है। पर उसमें ऐसा क्या है जो हमे परेशान कर रहा है? बिहार की राजधानी में डॉक्टरों के साथ बैठी हूँ, सिवान के कलेक्टर की बात चल रही है, चर्चा यह है कि वह यू.पी. का यादव है कि बिहार का। इतने में एक सज्जन जो खुद को सबसे बड़ा जानकार मानते हैं, वो घोषणा कर देते हैं कि बैकवर्ड वर्ग के लोगों को आसानी से सफलता मिल जाती है, और यहीं एक “संघर्ष से जन्मी सफलता” को हम फॉरवर्ड और बैकवर्ड के खांचों में डाल देते हैं। पर सैराट में ऐसा क्या है जो तुम्हें परेशान कर रहा है?

दलित लड़का है, पाटिल लड़की है। माँ बाप को लगता है लड़का पढ़ेगा लिखेगा तो हमें एक अच्छा जीवन देगा। लड़की के पिता उसे प्यार से बड़ा करते हैं। लड़की बुलेट चलाती है, हिम्मती है, किसी से डरती नहीं है, पर उसे ऐसा क्यूँ लगा कि इस आज़ादी की कोई लिमिट नहीं है। किसने कहा कि आज़ादी तुम्हारा हक है, प्यार करने की आज़ादी, सपने देखने की आज़ादी, अपना कल देखने की आज़ादी, ये कब मान लिया तुमने कि तुम्हें हर तरह की आज़ादी मिल गयी है। पर सैराट में ऐसा नया क्या है जो तुम्हें परेशान करता है?

दलित कविता पढ़ाते हुये टीचर को पाटिल लड़का इसीलिये थप्पड़ मार देता है, क्यूंकि उसने पूछ लिया कि तुम कौन हो? सीनियर पाटिल टीचर को घर बुलाता है ताकि उसे कभी दूसरा थप्पड़ ना पड़ जाये। पिता को कुछ गलत नहीं लगता, बेटे का नाम ही प्रिंस है। रॉकी यादव भी हो सकता था। महाराष्ट्र की कहानी है इसीलिए पाटिल है। पर सैराट में ऐसा क्या है जो तुम्हें बुरा लगता है?

अर्ची और पर्शिया पकड़े जाते हैं, लड़के के परिवार को गाँव से बाहर निकाल दिया जाता हैं, बहुत मार खाते हैं। किसी दलित की हिम्मत कैसे हुई पाटिल की लड़की से प्यार करने की। इसी देश में एक दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है यह लिखकर कि उसकी सबसे बड़ी गलती जन्म लेना था। पर सैराट में ऐसा क्या है जो तुम्हें परेशान करता है?

वे पकड़े जाते हैं, दलित परिवार पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, और वही पागल लड़की जिसने आज़ादी को सच समझ लिया था लड़ पड़ती है पिता से, पुलिस से, समाज से। उसे लगता है बहुत आसान है सदियों से पड़ी हुई बेड़ियों को तोडना। जहाँ चार चमाट मार कर घर की इज्ज़त बचा ली जाती है ,और अगर उसने इज्ज़त को ख़ाक में डाल ही दिया तो ख़त्म ही कर दो उसे। इसी देश के किसी कोने में, किसी शहर में सबक सिखाने का यह तरीका बिना जातिगत भेदभाव के हर दिन इस्तेमाल किया जा रहा है। शिष्ट भाषा में हम इसे “ऑनर किल्लिंग” कह देते हैं, पर यह तो हर गली मोहल्लों में हो रहा है। इज्ज़त बच जाती है, नाम ख़त्म हो जाते हैं, और फिल्म की तरह, एक कहानी भी। पर सैराट में ऐसा क्या है जो तुम्हें परेशान करता है?

और अंत में एक बात और- मैंने सैराट मराठी में देखी, मुझे मराठी नहीं आती फिर भी मुझे यह फिल्म झकझोर गयी। पता है क्यूँ- सैराट में ऐसा कुछ नया है ही नहीं जो तुम्हें परेशान करेगा। बस एक चेहरा है, जो घूरता है तुम्हारी आँखों में बेधड़क, बिना पलक झपकाये और वो आँखें परेशान करती हैं, फिल्म नहीं।

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प्रज्वला हेगड़े यूथ की आवाज़ के लिए:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

उत्तर प्रदेश में युवा आई.ए.एस. अफसरों की एक नयी पीढ़ी उभर कर सामने आई है, जो बदलाव के लिए स्मार्टफोन जैसी तकनीक का उपयोग अपने रोजमर्रा के प्रशासनिक काम और जनता तक पहुँचने के लिए कर रही है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के द्वारा पिछले वर्ष शुरू किये गए उनके प्रिय ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान के बाद, नयी तकनीक को विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल करने की पहल करने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। यह अभियान सभी सरकारी सेवाओं की डिजिटल उपलब्धता, उनकी ग्रामीण इलाकों में पहुँच पर केंद्रित है, साथ ही सार्वजनिक स्थलों पर आम जनता के लिए इंटरनेट की सुविधा के इंतज़ाम के द्वारा देश के ‘डिजिटल सशक्तिकरण’ पर जोर देता है।

पिछले वर्ष अक्टूबर माह तक, भारत में ६८.३ लाख नए मोबाइल उपभोक्ता और जुड़ गए, इस प्रकार भारत में मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या कुल एक अरब से ऊपर पहुँच चुकी है।

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया) के अनुसार २०१५ के आरम्भ से अब तक कुल ६ करोड़ नए मोबाइल उपभोक्ता जुड़े है, अर्थात ६० लाख प्रति माह की औसत दर से मोबाइल उपभोक्ता बढ़ रहे हैं।

मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियां, किफायती हैंडसेट बनाने पर अधिक ध्यान दे रही हैं, जिस कारण इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल/स्मार्टफोन के दाम काफी घट चुके हैं।

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की, ‘मोबाइल इंटरनेट इन इंडिया २०१५’ नामक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण इलाकों में मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या में करीब ९३% की बढ़ोतरी हुई है। दिसंबर २०१४ से दिसंबर २०१५ के बीच इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या में ८.७ करोड़ लोग और जुड़े हैं।

सफाई का स्मार्ट तरीका:

kickass iasबंगलुरु की सिलिकॉन वैली में ए.एम.डी. और नेट एप्प्स जैसी कंपनियों में ७ वर्ष से भी अधिक समय तक काम कर चुके, २००९ बैच के आई.ए.एस. अफसर, विजय करन आनंद, कुछ उन चुनिंदा अफसरों में से हैं, जो तकनीक का इस्तेमाल अपने रोज के काम में कर रहे हैं।

शाहजहांपुर में कार्यरत आनंद ने चूड़ियों के निर्माण के लिए प्रसिद्द फ़िरोज़ाबाद में, अपने जिला मजिस्ट्रेट के कार्यकाल के दौरान एक मोबाइल एप्प विकसित किया। जिसका प्रयोग, जिले में सफाई, शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) को सुधारने के लिए किया जा रहा है।

आनंद एक चार्टेड अकाउंटेंट, प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो मानते हैं कि तकनीक के प्रयोग से लोगों के जीवन स्तर को उठाया जा सकता है।

अगस्त २०१४ में उन्होंने ‘क्लीन एंड ग्रीन फ़िरोज़ाबाद’ नामक अभियान की शुरुवात की, जो कि प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत अभियान से काफी पहले की बात है। यह एक ऐसा मॉडल है जो सफाई के लिए सफाई कर्मचारी की जिम्मेदारी को तय करता है।

आनन्द बताते हैं कि, “हमारे यहाँ पर एक कंट्रोल रूम है, और कचरे के निस्तारण के लिए बनाए गए सिस्टम में १३१९ चेकपॉइंट निर्धारित किये गए हैं, जहाँ कचरा उठाने, सड़कों की सफाई, और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई पर नजर रखी जाती है। यह प्रणाली जी.पी.एस. (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) की सहायता से नगर निगम के कचरा ढोने वाले वाहनों पर भी नजर रखती है।”

गूगल प्ले स्टोर पर इस एप्प का विवरण “फॉर कनेक्टिंग दि रेसिडेंट्स ऑफ़ फ़िरोज़ाबाद टू दि नगर निगम एंड सीकिंग सिटीजन पार्टिसिपेशन इन कीपिंग फ़िरोज़ाबाद क्लीन अंडर ‘क्लीन, ग्रीन एंड हेल्थी यू पी’ प्रोग्राम” के रूप में आता है।

तकनीक का उपयोग प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने में सहायक होता है। यह जनता को कचरे के ढेर, जल आपूर्ति, और सड़कों पर रौशनी, लावारिस वाहनों, और आवारा जानवरों जैसे मुद्दों को फोटोग्राफ के द्वारा सामने लाने में सहायता करती है।

इस एप्प की सफलता के मुख्य कारक विभिन्न लोगों के लिए तय की गयी जिम्मेदारी, और शिकायतों पर होने वाली त्वरित कारवाही हैं।

इस एप्प के आने के २ वर्ष बाद आनंद बताते है कि, “शुरू में तकनीक के प्रयोग को लेकर निगम के कर्मचारी सहज नहीं थे, किन्तु जैसे ही इसकी सरलता उनके समझ में आई, सभी ने इसे ख़ुशी-ख़ुशी अपनाया, और आज नतीजे काफी उत्साहजनक हैं।”

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“सुपरवाइजर हमें शहर के १८०० जिओ लोकेशन पॉइंट्स से रोजाना सफाई की जानकारी देते हैं। कंट्रोल रूम में रियल टाइम में ये जानकारी अपडेट होती है और म्युनिसिपल कमिशनर के कार्यालय मे लगी स्क्रीन पर दिखाई देती है।”
सैनिटेशन इंस्पेक्टर, सुपरवाइजर के काम पर नजर रखते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में सफाई कर्मचारियों के दैनिक कार्य को निर्धारित करते हैं।

महेश कुमार जो कि एक सैनिटेशन इंस्पेक्टर हैं, कहते हैं, ” इस एप्प को इस्तेमाल करना काफी आसान है, और हमारे सारे सुपरवाइजरों को इसके लिए ट्रेनिंग भी दी गयी है, जिसमे २ से ३ दिन का समय लगता है।” हर १५ सुपरवाइजर के ऊपर एक सैनिटेशन इंस्पेक्टर होता है जो किसी दिन सुपरवाइजर के छुट्टी पर होने कि स्थिति में उसके काम को भी देखता है।

२८ वर्षीय सुपरवाइजर मजीद खान बताते हैं, ” इस एप्प का सबसे बड़ा फायदा हमारे काम में पारदर्शिता लाने में मिला। हम लोग सुबह ७ बजे से दोपहर २ बजे तक काम करते हैं, इस एप्प के आने से पहले २ बजे के बाद कोई भी सड़कों पर कचरा फैला देता था और इसकी शिकायत हमारे काम ना करने के रूप में की जाती थी। लेकिन अब हमारे काम का सुबूत एप्प पर रियल टाइम में डाली गयी फोटो से मिल जाता है, जिस पर समय भी दिखता है।”

आनंद कहते हैं कि एप्प के आने के बाद से सुपरवाइजर, इंस्पेक्टर और सफाई कर्मचारियों के व्यवहार में काफी सकारात्मक परिवर्तन आया है। साथ ही इस प्रणाली की मदद से निगम के कचरा ढोने वाले वाहनों पर प्रतिदिन खर्च होने वाले डीजल की मात्रा भी, कम हुए फेरों के कारण २००० लीटर प्रति दिन से ८०० लीटर प्रति दिन तक घट गयी है।

आनंद कहते हैं कि, ” वैसे तो फ़िरोज़ाबाद में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है, ऐसे में लोगों का इस तकनीक को अपनाना काफी उत्साह बढ़ाने वाला है।” इस लेख को लिखे जाने के समय तक गूगल प्ले से करीब १००० लोग इस एप्प को डाउनलोड कर चुके थे।”

शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक का प्रयोग:

शहर में सफाई की स्थिति को बेहतर करने के अलावा, आनंद शिक्षा के क्षेत्र में भी तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं। उनके द्वारा शुरू किया गया ‘शिक्षाग्रह अभियान’ तकनीक के इस्तेमाल से शिक्षकों की जिम्मेदारी तय करता है और विद्यार्थियों के प्रदर्शन पर नजर रखता है।

आनंद ने मई २०१५ में पहली से आठवीं कक्षा के बीच के छात्रों पर एक आधारभूत अध्ययन किया। इसमें विद्यार्थियों को उनके अंकों के आधार पर ऐ, बी, सी, और डी, चार श्रेणियों में बांटा गया। उनके अंकों को क्लाउड कंप्यूटिंग पर आधारित एक प्लेटफार्म पर अपलोड किया गया जिसे आनंद एक “मजबूत रिपोर्टिंग प्रणाली” मानते हैं।

वो कहते हैं, “हमने शिक्षकों को नियमित रूप से तिमाही परीक्षा करवाने के निर्देश दिए और विद्यार्थियों का प्रदर्शन ना सुधरने की स्थिति में उचित कारवाही करने की बात कही जो पदावनति, वेतन में होने वाली वृद्धि पर रोक, या निलम्बन हो सकता है।” यह तय करने के लिए कि इस प्रणाली में कोई छेड़-छाड या गड़बड़ी ना हो, एक स्वतंत्र निरीक्षक की उपस्थिति में विद्यार्थियों के अंक अपलोड किये जाते हैं।

अध्यापकों के शिक्षण, नित्य डायरी लिखने, कक्षा में अनुशासन बनाए रखने पर व्यापक प्रशिक्षण देने के बाद, अगस्त २०१५ में विद्यार्थियों के नतीजों की पहली समीक्षा की गयी। इन नतीजों को रियल टाइम में इस प्रणाली में डाला गया ताकि विद्यार्थियों के प्रदर्शन में सुधार हुआ है या नहीं, यह देखा जा सके।

आनंद आगे बताते है कि, “नतीजे काफी उत्साहजनक थे, और इस तकनीक को बाद में उच्चतर माध्यमिक (इंटरमीडिएट) विद्यालयों में भी प्रयोग किया गया।”

आनंद कहते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) या पी.डी.एस. में होने वाले भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा गरीब तबका प्रभावित होता है।

इंडियन कॉउन्सिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनोमिक रिलेशन्स की जनवरी २०१५ में आई एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान प्रणाली दोषपूर्ण है, जिससे खाद्यान्न का एक बड़ा हिस्सा (४०% से ५०%) खुले बाजारों में चला जाता है।

इस समस्या पर काम करते हुए आनंद ने सितम्बर २०१५ में ई-राशन सेवा प्रोजेक्ट की शुरुवात की, जिसका लक्ष्य खाद्यान्न वितरण को स्वचालित बनाना और सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों का लेखा-जोखा रखना था। यह योजना आधार नंबर और उँगलियों के निशान के द्वारा फ़र्ज़ी लाभार्थियों की पहचान कर उन्हें अलग करने पर भी केंद्रित है।

यह प्रणाली लाभार्थियों को बीजक (इनवॉइस) देने के साथ-साथ रियल टाइम में उनकी जानकारी को भी अपडेट करती है। पंजीकृत लाभार्थियों को एसएमएस द्वारा राशन विक्रेता के पास राशन की उपलब्धता और दरों की जानकारी भी भेजी जाती है। वहीं राशन विक्रेताओं को एक टेबलेट कंप्यूटर के द्वारा, वितरण, भण्डारण, खातों की जानकारी और अन्य जरुरी जानकारियां मिल जाती हैं।

आनंद दावा करते हैं कि इस प्रणाली से आपूर्ति श्रृंखला और खुदरा वितरण की खामियों को दूर किया जा सकता है।

एक एप्प जो बच्चों के विकास पर नज़र रखता है:

३२ वर्षीय आई.ए.एस. अधिकारी सुहास एल.वाय. कर्नाटक राज्य के शिमोगा से हैं। २००७ में आई.ए.एस. में

सुहास एल.वाय.
सुहास एल.वाय.

चुने जाने से पूर्व एन.आई.टी. सूरतकल से पढ़े सुहास बंगलुरु में एस.ए.पी. लैब्स में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे।

आज़मगढ़ के कलेक्टर सुहास को किताबें बहुत पसंद है और तकनीक में उनकी काफी रूचि है। वो अपने क्षेत्र में कुपोषण, जो कि उत्तर प्रदेश की प्रमुख समस्याओं में से एक है, से लड़ने के लिए तकनीक का उपयोग कर रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में ५ वर्ष से कम आयु के बच्चों में ३६% कुपोषण के शिकार हैं। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा ४०% है, जो कि राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है।

२०१५ में सुहास के कार्यभार संभालने के समय उत्तर प्रदेश में कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए ‘स्टेट न्युट्रिशन मिशन (राज्य पोषण अभियान)’ पहले से ही चलाया जा रहा था। इसी अभियान को आधार बनाकर सुहास ‘वेट एट ए ग्लांस’ नाम के एक एप्प को सामने लेकर आये।

सुहास बताते हैं कि, “इस एप्प के द्वारा कोई भी आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर नजर रख सकता है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन) के मानकों के आधार पर कोई बच्चा कुपोषित है या नहीं, ये भी पता लगा सकता है।”

इस एप्प के आने से पहले आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं को बच्चों के निरिक्षण के लिए एक लम्बी प्रक्रिया को अपनाना पड़ता था, जिसमे एक १०० पृष्ठों के विकास चार्ट द्वारा पोषण के स्तर का पता लगाया जाता था।

आई.सी.डी.एस. (इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवेलपमेंट सर्विसेज) के एक अधिकारी सेराज अहमद, विकास चार्ट के एक छोटे प्रारूप को लेकर आये। मार्च २०१५ में, इसे डिजिटली एक एप्प में बदला गया और ‘कुपोषण का दर्पण’ नाम दिया गया।

हालांकि अभी तक इस एप्प को ५०० से कुछ अधिक लोगों ने ही डाउनलोड किया है, लेकिन सुहास का मानना है कि इसे और लोग भी इस्तेमाल करना शुरू करेंगे।

सुहास कहते हैं कि, ” इस एप्प को इस्तेमाल करना बेहद आसान है, आपको करना केवल यह है कि, इसमें बच्चे के लिंग और आयु की जानकारी डाल दें और यह आपको विभिन्न आयु वर्गों के आधार पर टीकाकरण और उचित आहार की जानकारी दे देगा।”

एक बार डाउनलोड करने के बाद इस एप्प को चलने के लिए इंटरनेट की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। यह हिंदी भाषा में भी उपलब्द्ध है। इस एप्प की सफलता से उत्साहित आई.सी.डी.एस. ने आज़मगढ़ के सभी ५५८८ आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं को स्मार्टफोन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा है।

आज़मगढ़ के पलहनी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के प्रमुख डॉ. रवि पांडे का मानना है कि इस तरह की तकनीक, जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। जहां एक तरफ सुहास आज़मगढ़ में कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए प्रयासरत हैं, वहीँ उनकी पत्नी ऋतु भी ‘प्रेगनेंसी का दर्पण’ नामक एप्प को सामने लेकर आई हैं, जो गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर नज़र रखने में सहायक है।

एक कदम, गर्भवती महिलाओं के लिए:

आज़मगढ़ के निवासी सतीश कुमार कहते हैं, ” कई बार जागरूकता की कमी की वजह से गर्भावस्था के दौरान कुछ मत्वपूर्ण फैसलों को लेने में चूक हो जाती है, ऐसे में ‘प्रेगनेंसी का दर्पण’ जैसा साधारण और सरल एप्प काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।”

ऋतु कहती हैं, ” ‘प्रेगनेंसी का दर्पण’ दूर दराज के इलाकों की महिलाओं, जिन्हे डॉक्टर के पास ना जा पाने जैसी कई सामाजिक बंदिशों का भी सामना करना पड़ता है, को एक मनोवैज्ञानिक सहारा भी देता है। यह एप्प उन्हें एक ऐसी सूची उपलब्ध कराता है, जिससे वो भ्रूण के विकास, ऐसे मेडिकल टेस्ट जो आनुवांशिक दोष से बचाने में सहायक हैं, जरुरी आहार, क्षेत्रीय स्तर पर उनके विकल्प, और प्रसव के लक्षण जैसी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकें।”

आज़मगढ़ के लालगंज इलाके में एक क्लिनिक चलाने वाले डॉ. अभिषेक पांडे बताते हैं कि, ” पढ़ने लिखने की साधारण जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस एप्प का प्रयोग कर सकता है। यह एप्प गर्भावस्था की चरणबद्ध जानकारी प्रदान करता है। यह हर चरण के आरम्भ होने की जानकारी देता हैं और डॉक्टर को संपर्क करने का समय भी बतलाता है।”

यह एप्प मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है और २-३ भाषाओँ में उपलब्ध है। यह आस-पास के क्षेत्रों के डॉक्टरों की जानकारी भी देता है, और इस एप्प के धारक को गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में डॉक्टर के शुल्क में भी छूट मिलती है।

इस प्रकार की पहल को अभी से सफल कहा जाना शायद जल्दबाज़ी हो, लेकिन ये पहल सही दिशा में जाती दिखती है। केवल समय ही बताएगा कि डिजिटल भारत, एक सशक्त भारत भी होगा या नहीं।

Read the English article here.

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दीपेश कराडे:

vipul_singhमेरी जिंदगी रमता जोगी बहता पानी जैसी है, जहाँ दिल करता है उस शहर की ओर निकल जाता हूँ। वहाँ की समस्या से रूबरू होकर नुक्कड़ नाटक लिखता हूँ, फिर उनका मंचन करता हूँ ।” यह कहना है भोपाल के विपुल सिंह का, जो अब तक ११ राज्यों में ६८१ नुक्कड़ नाटक कर चुके हैं । इस जूनून के चलते उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी। शुरु में घरवालों नें बहुत विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए। इनके नुक्कड़ नाटकों का यह अभियान दिल्ली यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। फेसबुक पर इन्हे १२००० से ज्यादा लोग देख चुके हैं।

जब चोरों ने दिखाया रास्ता

एक बेहद रोचक किस्से के बारे में बताते हुए विपुल कहते हैं कि, “एक बार मैं उत्तर प्रदेश के कठेराव गांव में नुक्कड़ के लिए गांव के रास्ते पर मोबाइल की लाइट के सहारे जा रहा था। तभी पांच लोगों ने आकर मुझे घेर लिया। मोबाइल, पर्स, घड़ी सब छीन लिए। जब बैग लेने लगे, तब मैंने कहा कि मेरी डायरी मुझे दे दो या उसमें से नंबर नोट कर लेने दो। तब उन्होंने कहा कि ठीक है, कर लो। उनके मोबाइल की टार्च की रोशनी में मैने जरूरी नंबर कागज पर नोट किए। फिर उन्होंने पूछा, क्या करते हो? मैने बताया कि घूम-घूमकर लोगों की समस्याओं को नुक्कड़ के माध्यम से सामने लाता हूँ। अभी कठेराव जा रहा हूँ। मेरे काले कपड़े और चुन्नी से मैं नुक्कड़ खेलूंगा, बस वो मुझे दे दो। तब वे बोले, वो तो हमारा ही गांव है, वहां पानी की बहुत समस्या है। वहाँ शर्मा जी से मिल लेना वो तुम्हारी मदद करेंगे। उसके बाद उन्होंने मुझे गाड़ी से गांव तक छोड़ा, खाना खिलाया और नुक्कड़ खेलने में सहायता भी की।” 

देशभर घूमना चाहता हूँ

पूरा देश घूमने कि अपनी इच्छा कि बात करते हुए विपुल कहते हैं, “अभी तक ट्रक, बैलगाड़ी, रेलगाड़ी और पैदल सफर कर ११ राज्य नाप चुका हूँ। गांव में, स्टेशन पर, मंदिर में, बस स्टैंड पर रात गुजराता हूँ। कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण, बाल विवाह, पानी, स्वच्छता और कई मुद्दों पर काम करना चाहता हूँ। पिता अध्यापक हैं, माँ लेखक और जुड़वा भाई मर्चेंट नेवी में। पढ़ने लिखने का माहौल घर में मिला, मेरे सफर में किताबें साथ होती हैं। थियेटर में पीयूष मिश्रा मेरे आदर्श हैं। मै रंगमंच के जरिए देश और दुनिया में अपने इस अभियान को जारी रखूँगा।

घूमने, लिखने और थिएटर में कुछ कर दिखाने की इच्छा से प्रेरित भोपाल के इस युवक के वीडियो को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

Varun Dhawan and Alia Bhatt in Mumbai Metro on 10.06.14

अमोल रंजन:

Varun Dhawan and Alia Bhatt in Mumbai Metro on 10.06.14
वरुन धवन और आलिया भट्ट, मुम्बई मेट्रो में

११ मई को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट में प्रकाशित खबर के अनुसार पेरिस से २५ मील दूर, एक चलती ट्रेन के आगे कूदकर एक १९ वर्षीया लड़की ने अपनी जान दे दी। ये एक हादसा और खबर तो है ही, पर इस खबर ने लोगों का ध्यान इसलिए भी खींचा क्यूंकि वो अपनी आत्महत्या का सीधा प्रसारण इन्टरनेट प्लेटफार्म ‘पेरिस्कोप’ से कर रही थी। इसका आँखों देखा हाल देखने वाले लोगों ने इसकी पुष्टि की, फिर इसका एडिट किया हुआ विडियो इन्टरनेट पर वायरल भी हुआ।

अमेरिका के ओहायो शहर में कुछ स्कूल के दोस्तों में से एक युवक ने एक लड़की का रेप किया और उनके ही एक साथी ने अपने मोबाइल से विडियो बनाया और उसको दुनिया के लिए लाइव भी कर दिया। यह लाइव कवरेज दुनिया में कोई भी इन्टरनेट से जुड़ा व्यक्ति देख सकता था, मैं भी और आप भी। मेलवौकी शहर में ही कुछ युवकों ने खुद का सेक्स करते हुए एक विडियो बनाया और उसे फेसबुक पर प्रसारित किया।

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित बीड जिले के एक गाँव में ४० वर्षीया सत्याभाना कुएं के अंदर घुसकर पानी निकालने की प्रक्रिया में फिसल कर मर गयी, वो दिन दूर नहीं जब ऐसी घटनाओं का भी सीधा प्रसारण संभव हो जायेगा। लेकिन मौत के सीधे प्रसारण की भीड़ में ये विडियो उस समय कितना ट्रेंडिंग होगा, वो किसी पार्टी के हैश टैग कार्यकर्ताओं के उस दिन की प्रमुखताओं पर निर्भर होगा।

डिजिटल इंडिया अभियान में लगने जा रहे ४.५ लाख करोड़ पैसे इस तरह की घटनाओं को सच जरूर बना देंगी। तब किसी ओ.वी. वैन की जरूरत नहीं पड़ेगी। आजकल विज्ञापन में आने वाले एयरटेल की फोर-जी स्पीड और फेसबुक लाइव काफी होगा। जिनके भी हाथों में स्मार्ट फ़ोन होगा वो सभी रिपोर्टर होंगे और ब्रॉडकास्टर भी। न्यूज़ कंपनिया ऐसे स्थानीय लोगों को रिक्रूट कर लेंगी जो इसमें ज्यादा एक्टिव होंगे और उनके हिसाब से काम करने को तैयार होंगे। इन्टरनेट पर कंटेंट की बाढ़ में ज्यादा से ज्यादा स्मार्ट सर्च इंजनों के एप्प के बीच प्रतिस्पर्धा होगी।

सोचिये स्मार्ट सिटी अभियान के तहत शहर के सारे सी सी टीवी कैमरों को भी सोशल मीडिया लाइव से जोड़ दिया जाये तो क्या होगा। पुलिस के अलावा आम जनता भी शहर की निगरानी रखने लगेगी कि किस कोने में क्या हो रहा है; तब वो सिर्फ सी सी ( टीवी नहीं ) कैमरा कहलायेगा और उस पर साइड में विज्ञापन भी आयेंगे। कोई भी ऑनलाइन अकाउंट खोलने के लिए आधार कार्ड जरूरी होगा, ताकि जब कोई अपराध करे तो उसकी पहचान होते ही उसके सारे सोशल मीडिया अकाउंट को हैक कर उसके सारे संपर्क तोड़ दिए जाएँ। लेकिन तब सिस्टम को हैक करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी, जिसके ना करने से आप कभी व्यवस्था को चुनौती दे ही नहीं पाएंगे। आगे शायद हॉलीवुड फिल्म ट्रूमैन शो और हंगर गेम्स की तरह रियलिटी टीवी लाइव तो दिखेगा ही पर वो एक लाइव विडियो गेम भी होगा; जिसमें लोगों को खेलने और उसको देखने दोनों की इजाज़त होगी। दरअसल पूरी दुनिया धीरे धीरे बहुत सारे लाइव विडियो गेम्स में बंटेगी और वो आपकी असल जिंदगी का हिस्सा होंगी।

लाइव प्रसारण हमारे जिंदगी का नया हिस्सा नहीं है, वास्तविकता में आकर पढने पर पता चलता है कि टीवी आने के शुरूआती दिनों में रिकार्डेड कार्यक्रम से ज्यादा लाइव टीवी ही होता था। क्योंकि तब तक रिकॉर्ड करने के सस्ते माध्यम जैसे विडियो टेप जैसी चीज़ नहीं आई थी, जो श्रीमान गूगल बताते हैं कि १९५७ में आया। फिर रिकार्डेड प्रोग्रामों की ही संख्या बढ़ी क्योंकि उसको अपने हिसाब से स्क्रिप्ट और एडिट करने का समय मिल जाता था। आँखों देखा ताज़ा हाल लेने के लिए ही लाइव जाने की जरूरत पड़ी और टीवी के किसी कोने में LIVE लिख कर आने लगा, जैसे कोई समारोह, खेल या दुर्घटना स्थल से ताज़ा जानकारी।

समय के साथ टेक्नोलॉजी में बदलाव आया और आज सिर्फ एक मोबाइल फ़ोन और इन्टरनेट कनेक्शन से लोग पूरी दुनिया से जुड़ सकते हैं। यह लोगों के बीच एक इंटिमेसी और सॉलिडेरिटी का माध्यम भी बनी है। ऑनलाइन समुदाय भी आज एक सच्चाई है, बिज़नेस, राजनीति, मनोरंजन और संचार को इसने नए आयाम दिए हैं। लोग रियल टाइम में सारी चीज़ें डॉक्यूमेंट कर रहे हैं और शेयर भी। पर इनफार्मेशन के उपभोग के दौर में, ब्रेकिंग कब ट्रेंडिंग बन जाता है पता नहीं चलता है। चीज़ों को करने की तेज़ी बढ़ी है, और ऐसा करना अब लोगों की जरूरत बनती जा रही है। प्रचारकों को अपने उत्पाद बेचने की नयी जगह मिली, जिससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स फल-फूल रहा है। वे भी चाहते हैं की लोग ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन जुड़े रहें, ताकि टारगेट उपभोक्ता मिल सके।

ये लिखते लिखते अभी पता चला कि कैलिफ़ोर्निया के हॉस्पिटल से एक बच्चे के जन्म का फेसबुक लाइव से सीधा प्रसारण हुआ और इसको करीब दो लाख लोगों ने देखा। पहले लोग निजी तौर पर लोगों से विडियो पर बात करते थे, पर खुद को सोशल मीडिया पर लाइव ब्रॉडकास्ट कर देना एक नए दौर की शुरुआत जैसा लग रहा है। बच्चे के जन्म को लोगों ने बड़े चाव से देखा पर किसी की आत्महत्या, हत्या, रेप और हिंसा को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित करना उसका खतरनाक और अचंभित कर देने वाला आयाम है। हालाँकि सोशल मीडिया कम्पनीज की तरफ से कमेंट आया है, कि वे ऐसी चीज़ों को रिपोर्ट करने के बाद आगे ब्लाक कर देंगे, लेकिन रियल टाइम ये करना कितना आसान होगा पता नहीं। इन्टरनेट और डिजिटल दुनिया एक अलग ही अनुभव प्रस्तुत कर रही है। मीडिया और जिंदगी दोनों एक दुसरे में ऐसे घुस गए हैं, कि दोनों एक दुसरे के पूरक नज़र आ रहे हैं। आज मीडिया में लोग पैदा हो रहे हैं और मीडिया में ही मर रहे हैं। मीडिया और टेक्नोलॉजी का ये नया वातावरण काफी कल्पनाओं और सवालों को पैदा कर रहा है; वो सवाल और कल्पनाएँ क्या क्या हैं इन पर सोचने की आवश्यकता है। फिलहाल इन्टरनेट की स्पीड सोचने की स्पीड को चुनौती दे रही है, और टेक्नोलॉजी हम पर हावी होती दिख रही है। इस पूरे मीडिया अनुभव में सही सवालों को सोचना और पूछना एक चुनौती का विषय बन चुका है।

यह फोटो दिव्या त्रिवेदी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गयी है

मैत्रेयी बरुआ:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

यह फोटो दिव्या त्रिवेदी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गयी है
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अगर रोहित वेमुला का एक दलित के रूप में उसके जीवन के संघर्ष को बयान करने वाला मर्मभेदी आखिरी पत्र सामने नहीं आता, तो उसकी मृत्यु को भी किसी आत्महत्या की आम घटना की तरह भुला दिया जाता। उसके आखिरी पत्र में लिखी बातों ने ना केवल देश भर में विशाल विरोध प्रदर्शनों की शुरुवात की, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया जगत में उच्च शिक्षण संस्थानों में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव पर बहसों की एक नयी श्रंखला को शुरू कर दिया।

पत्रकारिता की दुनिया के ऐसे परिदृश्य में जहाँ विभिन्न तबकों की भागीदारी को लेकर बहुत अधिक प्रयास नहीं किये गए हैं, एक लोकप्रिय पत्रिका में अभी हाल ही में आया एक विज्ञापन, सही दिशा में उठाया गया एक कदम लगता है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में जहाँ पत्रकारों को लेने की प्रक्रिया बेहद अनौपचारिक है और बहुत कम प्रकाशक और टेलीविजन चैनल, पत्रकारों के लिए विज्ञप्ति निकालते हैं। ऐसे में कथित पत्रिका का “केवल दलित या आदिवासी पत्रकार” के लिए आया विज्ञापन विरले ही देखने को मिलता है।

समाचार जगत में दलितों/आदिवासियों की भागीदारी पर विश्वसनीय जानकारी का अभाव है, वहीं विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़ा बेहद कम है। मीडिया आलोचकों का कहना है कि जाति, साम्प्रदायिकता और भेद-भाव जैसे विषयों पर आने वाली ख़बरों में कमी का कारण दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तबके के लोगों की समाचार जगत में सीमित भागीदारी है।

लेखक और ‘डीएनए‘ तथा ‘दी न्यू इंडियन एक्सप्रेस‘ के पूर्व मुख्य संपादक आदित्य सिन्हा के अनुसार, “वर्तमान समय में शुरुवाती स्तर पर लिए जाने वाले पत्रकारों का चयन विभिन्न मीडिया स्कूलों से किया जाता है। दलितों/आदिवासियों की विषम आर्थिक परिस्थितियों की वजह से उनके लिए इन संस्थानों के भारी भरकम खर्चे उठाना संभव नहीं है। इस कारण बहुत कम दलित/आदिवासी युवा इस तरह के शिक्षण संस्थानों में पहुँचकर पत्रकार बन पाते हैं।

मीडिया के सशक्तिकरण और स्वतंत्रता से सम्बंधित विषयों पर शोध करने वाली संस्था ‘दी हूट‘ की संपादक सेवंती निनन का कहना है कि उन्हें इस बात पर कोई शक नहीं है कि मीडिया के क्षेत्र में दलितों/आदिवासियों की संख्या बेहद सीमित है, लेकिन अब स्थितियां सुधर रही हैं। निनन आगे कहती हैं कि “दी एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म (ACJ) में दलित पत्रकारों के लिए स्कॉलरशिप हैं। वहां से निकला एक दलित छात्र ‘दी हिन्दू’ में राज्य स्तर का संवाददाता है। उनके पास अन्य राज्यों (तमिलनाडु से बाहर) से भी आवेदन आये हैं, और जल्द ही वहां से और दलित छात्र निकलकर आएंगे। दी इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन (IIMC) में भी ऐसे ही छात्रों के लिए कुछ सीटें आरक्षित हैं। लेकिन दलित और आदिवासी युवाओं का रुझान पत्रकारिता की बजाय शिक्षा और अन्य सरकारी संस्थानों में उनके लिए आयोजित आरक्षण की तरफ ज्यादा है। पत्रकारिता का क्षेत्र उन्हें एक सुरक्षित भविष्य का विकल्प नहीं देता।

२०१४ में काफिला में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार “दी एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म- एक गैर फायदेमंद शिक्षण संस्थान में आरक्षित सीटें नहीं हैं, लेकिन २०१३-१४ में यहाँ पिछले वर्ष की तरह ४ दलित/आदिवासी छात्रों को स्कॉलरशिप दी गयी। अगर स्कॉलरशिप को छोड़ दिया जाए तो दी एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म में दलित/आदिवासी छात्रों की संख्या बेहद कम है- तीनो वर्षों के छात्रों में कुल मिलाकर मात्र १.५ प्रतिशत।” इसमें यह भी कहा गया है कि “इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ जर्नलिज्म एंड न्यू मीडिया, ज़ेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ़ कम्युनिकेशन, टाइम्स स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म और सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन में दलित/आदिवासी छात्रों के लिए किसी भी प्रकार की आरक्षित सीटों या स्कॉलरशिप का प्रावधान नहीं है।”

दलित इंडियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (DICCI) के परामर्शदाता और दलित लेखक चन्द्रभान प्रसाद के अनुसार “हमारे मीडिया जगत में बहुलवादी और उदारवादी प्रवृत्ति का अभाव है। अधिकांश पत्रकार और संपादक ऊँची जातियों और संपन्न परिवारों से आते हैं।”
उनका ये भी कहना है कि, “दलित/आदिवासी पत्रकारों की कमी, साफ़ तौर पर पिछड़े तबके से सम्बंधित ख़बरों को मीडिया द्वारा दी जाने वाली प्राथमिकता की कमी की ओर इशारा करती है।”

लेख के आरम्भ में वर्णित पत्रिका का विज्ञापन भी इस कमी की तरफ ही संकेत करता है।

वहीं जब इस पत्रिका के कार्यकारी संपादक से जब इस विज्ञप्ति के बाद की प्रतिक्रिया को जानने के लिए ईमेल भेजा गया तो उसका कोई जवाब नहीं मिल पाया।

प्रेस कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया (PCI) समेत किसी भी सक्षम एजेंसी द्वारा दलितों/आदिवासियों की समाचार जगत में सटीक संख्या या भागीदारी को लेकर आज तक किसी भी प्रकार का सर्वे नहीं किया गया है। और यह बेहद साफ़ है कि मीडिया की मुख्य धारा में इन सामाजिक वर्गों से बेहद कम लोग शामिल हैं।

प्रायः ‘योग्यता’ की कमी और दलित/आदिवासी ‘रुझान’ सरकारी संस्थानों में अधिक होने को पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछड़े वर्ग के लोगों की कमी के मुख्य कारणों के रूप में बताया जाता है।

हालत अब भी बदलें नहीं हैं: कर्नाटक की स्थिति:

कर्नाटक राज्य में दलित/आदिवासियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर शोध करने वाले संस्थान डॉ. अम्बेडकर रिसर्च इंस्टिट्यूट के संचालक, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और कर्नाटक सरकार के प्रशाशनिक अधिकारी बाला गुरुमूर्ति का कहना है कि, दलितों और आदिवासियों से जुड़े मुद्दों को तब तक प्रमुखता नहीं दी जाती तक कि इनकी प्रवृत्ति हिंसक ना हो, जैसे कि बलात्कार, हत्या या आत्महत्या से जड़े मुद्दे।

डॉ. अम्बेडकर रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना कर्नाटक सरकार द्वारा १९९४ में की गयी थी। इस संस्थान का संचालन सामाजिक कल्याण विभाग के निर्देशों के अनुसार किया जाता है। इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य कर्नाटक राज्य में दलितों/आदिवासियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर अध्ययन करना है।

गुरुमूर्ति, बहुत कम पत्रकारों के, दलित/आदिवासी और अन्य उपेक्षित तबकों को लेकर संवेदनशीलता होने की बात पर जोर डालते हुए कहते हैं कि “सामाजिक बहिष्कार का क्या? एक दलित को कई अपमानजनक स्थितियों और संघर्ष से गुजरना पड़ता है। टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली कितनी बहसों में इन विषयों पर चर्चा की जाती है।

करीब दो दशक पहले दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार बी.एन. उनियाल ने एक विदेशी संवाददाता के कहने पर दिल्ली में एक दलित पत्रकार को खोजने का प्रयास किया, क्यूंकि वह संवाददाता बहुजन समाज पार्टी और पत्रकारों के बीच हुए विवाद पर एक “दलित” पत्रकार से चर्चा करना चाहता था। श्री उनियाल एक भी दलित पत्रकार नहीं खोज पाये, इस निराशाजनक खोज का नतीजा नवंबर १६, १९९६ को पायनियर में छपे उनके अग्रणी लेखइन सर्च ऑफ़ अ दलित जर्नलिस्ट” के रूप में सामने आया।

१७ वर्ष बाद, २०१३ में, दिल्ली के एक अन्य पत्रकार और लेखक एजाज़ अशरफ नें अपने एक लेख में पूरे देश में मात्र २१ दलित पत्रकारों के होने की बात कही।

कर्नाटक में केवल तीन दलित पत्रकार:

आज श्री उनियाल की दलित पत्रकार की असफल खोज के २० वर्ष के बाद, इस रपोर्ट के लेखक कर्नाटक राज्य में केवल ३ दलित पत्रकार ही तलाश पाये। इनमे से दो, कन्नड़ समाचार पत्र और एक, अंग्रेजी समाचार पत्र में कार्यरत हैं।

उन्होंने अपनी जाति के बारे में बताते हुए समाचार जगत में दलित पत्रकार के साथ होने वाले भेदभाव की बात कही। अपने भविष्य को लेकर आशंकित, इनमे से दो ने नाम बताने पर असमर्थता जताई, केवल एक पत्रकार ही अपने नाम के खुलासे को लेकर सहज दिखे।

लोकप्रिय कन्नड़ दैनिक प्रजावनी में कार्यरत के.एस. गणेश कहते हैं कि, “हम लोगों कि संख्या बेहद कम है, मैं मेरे अलावा, कोलार जिले में दलित समुदाय से आने वाले केवल एक ही पत्रकार को जानता हूँ।

गणेश पत्रकारिता के क्षेत्र में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को स्वीकार करते हुए कहा कि, “यह काफी जाना-माना रहस्य है। अगर हम इसके बारे में बात करें तो इसे हमारे खिलाफ लिया जाता है और हम पर पत्रकार जगत को जाति के आधार पर बांटने के आरोप लगाए जाते हैं।

उन्होंने आगे कहा “अपने यहाँ रिक्तियां ना होने कि बात को अमूमन एक बहाने के रूप में प्रयोग किया जाता है। मेरे अखबार के कोलार संस्करण में नियमित रूप से प्रकाशित होने वाले दलित और पिछले समुदाय से जुड़े मुद्दों को, बंगलुरु के संस्करण में प्रकाशित नहीं किया जाता।

अन्य दो पत्रकार जो अपने नाम के खुलासे को लेकर सहज नहीं थे, उनमे से एक वरिष्ठ पत्रकार जो कि एक प्रख्यात अंग्रेजी दैनिक में १० वर्ष से भी अधिक समय से कार्यरत हैं, के अनुसार, “अगर मैं पत्रकार जगत में दलित/आदिवासी पत्रकारों को लेकर गहरी पैठ बनाए पूर्वाग्रह की खुल कर बात करूँ तो इस क्षेत्र में मेरा भविष्य असुरक्षित हो जाएगा।

वो आगे कहते हैं, “इस तरह के कई प्रकरण सामने आये हैं जब मीडिया कंपनियों में एक हर तरह से योग्य दलित पत्रकार की जगह, वरिष्ठ सम्पादकों के प्रभुत्व के कारण, उनके रिश्तेदारों को दे दी जाती है।

एक कन्नड़ दैनिक में कार्यरत दूसरे दलित पत्रकार ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि, ” ऊँची जाति के लोगों का कहना ये होता है कि दलित पत्रकारों में योग्यता की कमी है, और उनकी भाषा पर पकड़ भी कमजोर है।”

क्या हम भुलावे में जी रहे हैं:

बहुत अधिक, उच्च जाति के पत्रकार, मीडिया में जातिगत भेदभाव की बात स्वीकार नहीं करते। कोलकाता से एक ब्राह्मण महिला पत्रकार कहती हैं, “हम पत्रकारों की कोई जाति या कोई धर्म नहीं होता, जाति को मीडिया से बाहर रखिये।” वो आगे कहती हैं, “मैं जाति व्यवस्था को नहीं मानती और ना ही इसका अनुसरण करती हूँ। ऐसा किसने कहा है कि एक ब्राह्मण दलितों के बारे में नहीं लिख सकता। एक पत्रकार होने के लिए आपको संवेदनशीलता से अधिक किसी और गुण की जरुरत नहीं है।”

हालाँकि कुछ ऊँची जाति के पत्रकार, दलितों और उपेक्षित वर्ग के पत्रकारों के साथ होने वाले भेदभाव की बात को स्वीकार करते हैं। लेकिन वो इसके लिए मीडिया कंपनियों के मालिकों और सम्पादकों, जो इस फासले को कम करने में अक्षम रहे हैं को दोषी मानते हैं।

कोलकाता से एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार समीर कार पुरकायस्थ कहते हैं, ” जाति की राजनीती के अस्तित्व पर बात करना आसान नहीं है। बहुत कम संपादक और मीडिया कंपनी मालिक, जाति जैसे मुदों पर चर्चा को प्रोत्साहित करते हैं।”

इस स्थिति को कैसे बदला जाए:

चन्द्रभान प्रसाद कहते हैं कि, “अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ न्यूज़पेपर एडिटर्स (asne.org) की तर्ज पर भारत में भी न्यूज़रूम एम्प्लॉयमेंट डाइवर्सिटी सर्वे की तरह का एक सर्वे कराया जा सकता है। भारतीय दलितों की स्थिति अमेरिका के अश्वेत नागरिकों की तरह है। अमेरिकी प्रेस ने अश्वेत पत्रकारों की संख्या को बढाकर स्थिति को सुधारा है। अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ न्यूज़पेपर एडिटर्स का सर्वे इस बात की पुष्टि करता है।

१९७८ से अमेरिकी पत्रकारिता और समाचार जगत में विविधता को बढ़ाना, ऐ.एस.एन.इ. का प्रमुख लक्ष्य है। ऐ.एस.एन.इ. की वेबसाइट का कहना है कि वे समाचार और पत्रकारिता के क्षेत्र की संस्थाओं को विभिन्न समुदाय के लोगों को सम्मिलित करने के लिए प्रेरित कर रहें हैं ताकि समाज के अलग-अलग तबकों से ख़बरें सबके सामने आ सकें।

दलित/आदिवासी पत्रकारों का एक प्रमुख आरोप वेतन की अपारदर्शिता का भी है। हैदराबाद के दी न्यू इंडियन एक्सप्रेस के दलित लिपिक नागराजू कोप्पुला की कैंसर के कारण हुई मृत्यु के बाद उनके मित्रों ने इस समाचार पत्र पर जाति के आधार पर भेदभाव के कारण कम वेतन देने के आरोप लगाए।

nagaraju koppulaलेकिन उनकी बातों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी गयी, क्यूंकि किसी सशक्त संस्था ने भी इस मामले में कोई रूचि नहीं दिखाई। नागराजू के नियोक्ता की मुआवजे की मांग और राष्ट्रीय मानवाधिकार कमीशन के हस्तक्षेप के बावजूद भी कुछ ख़ास नहीं हो पाया।

लेकिन कई अन्य लोगो का कुछ और ही मानना है। पुरकायस्थ कहते हैं कि, “जाति या लिंग से अलग यह किसी भी पत्रकार के लिए सामान है। सामान पद पर कार्यरत पत्रकारों के वेतन का आधार उनका कार्यक्षेत्र निर्धारित करता है। अंग्रेजी पत्रकार उनके समानांतर पत्रकारों से अधिक ही वेतन प्राप्त करते हैं। पत्रकारों कि चयन प्रक्रिया की ही तरह उनके वेतन पर भी खुलकर चर्चाएं नहीं होती। ऐसे में दलित पत्रकारों के साथ वेतन को लेकर जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को लेकर कुछ कहना मुश्किल है।

वहीँ निनन का कहना है कि इस विषय पर सार्वजनिक तौर पर अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

श्री उनियाल अपने लेख ” इन सर्च ऑफ़ ए दलित जर्नलिस्ट” के, मीडिया कंपनियों के मालिकों और सम्पादकों को इस विषय की गम्भीरता और पत्रकारिता तथा समाचार जगत में ब्राह्मणवादी सोच के प्रभुत्व को ना समझा पाने को लेकर बहुत निराश थे।

आज दो दशकों बाद भी हालात कुछ ख़ास नहीं बदले हैं: आज भी समाचार जगत और पत्रकारिता के क्षेत्र में दलित और आदिवासी पत्रकारों की भागीदारी बेहद सीमित है

Read the English article here.

About the author: Maitreyee Boruah is a Bangalore-based freelance journalist and a senior member of 101Reporters.com, a pan-India network of grassroots reporters. Her reporting reflects issues of society at large and human rights in particular.

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Kashmiri Shiite Muslims shout religious slogans as they take part in a protest against the ongoing conflict in Iraq, at Narbal, north of Srinagar June 20, 2014. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: CIVIL UNREST POLITICS TPX IMAGES OF THE DAY) - RTR3UTLR

अभिमन्यु:

Kashmiri Shiite Muslims shout religious slogans as they take part in a protest against the ongoing conflict in Iraq, at Narbal, north of Srinagar June 20, 2014. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: CIVIL UNREST POLITICS TPX IMAGES OF THE DAY) - RTR3UTLR

हमारे देश में छात्रों और युवाओं की सामाजिक व राजनीतिक भागीदारी सिर्फ़ आज़ादी की लड़ाई तक ही सीमित नही थी। समय-समय पर उन्होने अपनी समुचित भूमिका का निर्वहन भी किया है। देश में आज़ादी के बाद गठित होने वाली पहली गैर कॉंग्रेसी सरकार के गठन में भी इनकी समग्र भागीदारी थी। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल का सफल विरोध पूरे देश में हुआ जिसमे युवाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस सिलसिले मैं जब जय प्रकाश नारायण पहली बार पटना आये थे, तब उन्होनें वहाँ के छात्रों को संबोधित करते हुए ऐतिहासिक गाँधी मैदान से “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया। इस आंदोलन ने अन्य पिछड़ी जातियों को सामाजिक बराबरी की लड़ाई का एक अचूक हथियार दिया। फलस्वरूप लालू, नीतीश, रामविलास जैसे कई अन्य नेताओं ने बिहार में अपनी पहचान बनाई और सामाजिक उत्थान व गैर बराबरी के खिलाफ लड़ाई को आने वाले दिनो में जारी रखा है।

युवाओं एवम छात्रों की सक्रियता से हमारा लोकतंत्र सफलता के साथ अपने नये रूप में सामने आया। इसके विरोध के बीज का प्रॅस्फुटन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश से (१९७१ में हुए आम चुनाव में कथित धाँधली का आरोप राज नारायण ने लगाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुक़दमा दायर किया) हुआ जब इंदिरा गाँधी के नापाक मंसूबे को न्यायपालिका ने चिन्हित कर दंडित किया।

१९७८ में मंडल आयोग का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने किया था। १९८० में इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी। बी पी मंडल जो इस आयोग के एकमात्र सदस्य थे, ने २७% गैर पिछड़ा वर्ग के लिए सभी सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सिफारिश की थी। इससे पूरे देश में राजनीतिक उथल-पुथल मच गयी थी। चारों ओर इसको लेकर इसके पक्ष और विपक्ष में विरोध प्रदर्शन का दौर चल रहा था। एक बार फिर देश के विश्वविद्यालयों से छात्रों और युवाओं की आवाज़ सड़क से संसद तक गूँज रही थी। इस आरक्षण के आंदोलन को ९० के दशक में देश भर के विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा प्रमुखता से चलाया गया। हालाँकि शुरू से ही इसे सवर्ण मानसिकता वाले ब्राह्माणवादी छात्रों के जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा। इस आरक्षण के कदम से उनकी सामाजिक सत्ता के नियंत्रण के खिसक जाने का ख़तरा उत्पन्न हो गया था। साथ ही हज़ारों साल की इस दासता के व्यसन के भी नेस्तनाबूद होने की पहल हो चुकी थी। अतः ये काफ़ी हिंसक हो गये और अपनी प्रभुसत्ता को बचाए रखने के लिए इन्होनें भ्रामक तिकड़म का प्रयोग भी यथासंभव किया। हालाँकि १९९० से २००० के मध्य तक यह कुछ खास मौकों और जगहों पर ही सक्रिय रह पाया, मगर छात्रों और युवाओं की राजनीतिक सक्रियता कभी कम नही हुई। हाँ यह थोड़ा मद्धम ज़रूर था।

हमारे देश की आबादी का लगभग ६५ प्रतिशत हिस्सा युवाओं का है। इनकी मतदान प्रक्रिया में तत्पर एवं त्वरित हिस्सेदारी ने चुनावी प्रक्रिया को काफ़ी मजबूती प्रदान की। ना सिर्फ़ हिन्दी पट्टी के क्षेत्र बल्कि पूर्वोत्तर के राज्य असम में भी अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में एक व्यापक छात्र आंदोलन हुआ था। १९७९ में शुरू हुए राज्यव्यापी छात्र आंदोलन का मुख्य आधार सीमापार बांग्लादेश से हो रहे कथित घुसपैठ का था। अखिल असम छात्र संघ के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन ने आख़िरकार केंद्र की उस वक़्त मौजूदा राजीव गाँधी की सरकार के साथ ऐतिहासिक असम समझौता किया। इसके फलस्वरूप १९८५ में हुए विधान सभा चुनाव में प्रफुल्ल कुमार महन्त के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। प्रफुल्ल कुमार महन्त इस छात्र आंदोलन के नेता थे।

लिंगदोह समिति का गठन- छात्रों को राजनीति से दूर करने का सरकारी प्रयास

२००६ में केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने जस्टिस जेम्स माइकल लिंगदोह के नेतृत्व में इसका गठन किया था। इसके गठन के पीछे सरकार ने छात्र राजनीति के आपराधिकरण को ज़िम्मेवार ठहराया था। सरकार का कहना था कि छात्र राजनीति के नाम पर अपराधी लोग विश्वविद्यालय की छवि खराब कर रहे हैं, और उन्होने इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इस अपराधीकरण को दूर करने के लिए इस समिति ने जो अपने सुझाओं की रिपोर्ट सौंपी वो दरअसल छात्रों को राजनीति से दूर करने का प्रयास मात्र जान पड़ रहा था और कुछ नही।

इस पूरे दौर में जे एन यू के छात्रों ने देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया और इसको लेकर वो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष भी गये और अपना पक्ष जोरदार तरीके से रखा। हालाँकि इसमे उन्हे सफलता नही मिली मगर पूरे देश का युवा छात्र अब खुल कर इस मुद्दे पर अपनी बात रख रहा था। परिणामस्वरूप २००७ से २०१० तक यहाँ कोई छात्रसंघ का चुनाव भी नही हो सका। बहरहाल अब पुर देश में लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुकूल ही छात्रसंघ चुनाव संपन्न हो रहे हैं।

लिंगदोह लागू होने के बाद- छात्र राजनीति का बदलता स्वरूप

लिंगदोह समिति के क्रियान्वयन और अनुमोदन से छात्रों के समक्ष एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया। पहले जो छात्र राजनीति को अपना कर्मक्षेत्र बनाना चाहते थे वो अब वैसा कर पाने में सक्षम नही रह गये। नियमानुसार उनके छात्र जीवन के राजनीतिक कॅरियर की समय सीमा अब सीमित हो चुकी थी, जिसे वो ना चाहते हुए भी मानने के लिए बाध्य हैं।

खैर इसके लागू होने से सरकार की असल मंशा का पता अब साफ तौर पर चल चुका था। छात्र राजनीति को आपराधिकरण से मुक्त करने के नाम पे जिस तरह से उन्हें सुनियोजित तरीके से राजनीति से ही दूर करने की साजिश हो रही थी,का अब पर्दाफाश हो चुका था।

विगत वर्षों में हुए भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान के छात्रों का आंदोलन हो या हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुए तथाकथित दलित शोधार्थी छात्र रोहित वेमूला द्वारा किए गये आत्महत्या से उपजा आक्रोश हो अथवा जे एन यू में इस साल ९ फ़रवरी की तथाकथित राष्ट्रविरोधी नारेबाज़ी से उपजे विवाद के फलस्वरूप हुए विरोध प्रदर्शन, इन सबसे एक बात तो साफ होती है कि हमारे देश का युवा छात्र राजनीतिक रूप से सजग व उद्वेलित है।

जून २०१४ में भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान के छात्रों ने गजेन्द्र चौहान को इसके निर्देशक बनाए जाने पे अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया था। पहली बार पूर्ण बहुमत वाली दक्षिणपंथी विचारधारा की सत्तारूढ़ केंद्र सरकार को छात्रों के इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा था। यह सिर्फ़ नियुक्ति का ही विरोध नही था बल्कि एक खास किस्म के दक्षिणपंथ की राजनीति का राजनीतिक विरोध भी था।

इसी कड़ी में अगला प्रतिरोध का स्वर हैदराबाद विश्वविद्यालय से उठा जब वहाँ के एक दलित शोध छात्र रोहित वेमूला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब वहाँ के छात्रों ने इसका जबरदस्त विरोध करते हुए आंदोलन शुरू किया एवं इस घटना की निष्पक्ष जाँच की माँग की तो जो तथ्य सामने आए वो बहुत ही चौंकाने वाले थे। रोहित ने आत्महत्या नही की थी, उसकी तथाकथित सांस्थानिक हत्या हुई थी और इसके लपेटे में विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री तक की संलिप्तता पाई गयी थी।

हालाँकि अभी जे एन यू प्रक्रम में एक और बात सामने आई है। जहाँ जे एन यू को एक ओर मार्क्सवादियों का गढ़ माना जाता रहा है और वहाँ के छात्र सिर्फ़ हिन्दुस्तान के आंतरिक मुद्दे पे ही नही वरण पूरी दुनिया के शोषित वंचित तथा दबे कुचले लोगों के साथ अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं, उनको वहीं के अंबेडकेरवादी छात्र संगठन के विरोध का जोरदार सामना करना पड़ रहा है। ९ फ़रवरी की घटना के उपरांत तीन छात्रों के ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चला। सभी को तिहाड़ जेल भेजा गया। अभी फिलहाल तीनो ६ महीने की जमानत पे बाहर हैं। मगर इस घटना की विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा हुए जाँच में तकरीबन २० छात्रों को दोषी ठहराया गया और उन्हें जुर्माने के साथ निलंबन जैसी सज़ा भी सुनाई गयी। इसके विरोध में वहाँ के छात्र संघ ने आमरण अनशन भी किया।

जहाँ तक मेरा मानना है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के आंदोलन और जे एन यू के आंदोलन में शुरुआती दौर में एक समानता उपजती दिख रही थी। मगर यह सूरतेहाल जल्द ही पलट गया। अंबेडकरवादी छात्र संगठन ने मार्क्सवादी विचारधारा के आंतरिक जाति व्यवस्था के ब्राह्माणवादी चरित्र तथा व्यावहारिक जातिगत आचरण पे भी खुलकर हल्ला बोल दिया है।
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“यह सही है कि खुद आंबेडकर ने ही कहा था कि वे कम्युनिस्टों के खिलाफ हैं। हालांकि आरएसएस को यह अच्छे से पता होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा था क्यूँकि उन्होंने देखा कि वे उसी [आरएसएस] के कुल-खानदान से हैं- वे कम्युनिस्ट ब्राह्मण लड़कों का एक गिरोह थे जो मार्क्सवादी उसूलों की रटंत लगाते थे लेकिन जातियों की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए ब्राह्मणवादी चरित्र दिखाते फिरते थे “-हतत्प://हाशिया.ब्लॉगस्पोट.इन/2015/07/ब्लॉग-पोस्ट_10.हटम्ल – बड़े बड़े झूठ: आनंद तेलतुंबड़े )

फिलहाल दोनो ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। यह एक नया अध्याय है इस देश की छात्र राजनीति का, जिसकी शुरुआत जे एन यू से हो चुकी है। अब देखना यह होगा कि सामाजिक संघर्षों की यह लड़ाई किस मोड़ पे क्या रुख़ अख्तियार करेगी।

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ज्ञान प्रकाश:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

rat raceआज से एक साल पहले अगर कोई ये कहता कि केवल १६००० रुपये प्रति माह की आमदनी में मैं आराम से रह सकता हूँ तो उस वक़्त मुझे उस पर बड़ी हँसी आई होती। लेकिन पहाड़ों पर ऐसे लोगों के साथ रहकर, जो इच्छाओं की अंधी दौड़ में किसी भी तरह से हिस्सा नहीं लेना चाहते, मैंने यह जाना कि कितने कम साधनों में भी सन्तोषपूर्वक रहा जा सकता है।

इसकी शुरुवात तब हुई जब मैं एक कंपनी के सी.एस.आर. (कॉर्पोरेट शोसियल रिस्पांसिबिलिटी) में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर काम कर रहा था। पहले एक साल तक मेरा काम कोलकाता के पास के १० गाँवों के १०० किसानों को जैविक कृषि के तरीकों को अपनाने के लिए राजी करना था। मेरे इस अनुभव ने सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करने की इच्छा को और मजबूत किया। हालाँकि इस क्षेत्र में पहले ना तो मुझे कोई अनुभव था और ना ही मेरी पढाई की ऐसी कोई पृष्ठभूमि थी। मेरी पढ़ाई कंप्यूटर साइंस में बी.आई.टी. मिसरा से हुई, फिर आई.टी. (इन्फॉर्मेशन टेकनोलोजी) के क्षेत्र की ५०० प्रतिष्ठित कंपनियों में से एक में काम किया, और फिर आई.आई.टी. खड़गपुर से एम.बी.ऐ. करने के बाद एक साल फिर मैंने एक निजी कंपनी में काम किया।

इसी बीच मुझे १३ महीने की एस.बी.आई. यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप के बारे में पता चला, मैंने इस फ़ेलोशिप के लिए आवेदन किया और मेरा चयन भी हो गया। अब मैं नैनीताल से २ घंटे की दूरी पर स्थित रीठा नाम के गाँव में १२ सामुदायिक केंद्रों के एक संगठन के साथ काम कर रहा हूँ।

यह संगठन अच्छी गुणवत्ता और कम कीमत के पशु चारे का उत्पादन करने वाले एक व्यापारिक संस्थान को खड़ा करने के लिए प्रयासरत है। लेकिन सात सालों के बाद भी उत्पाद कि गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं है और समय के साथ इसके दाम भी बढ़ रहे हैं। इस प्रकार यह संस्थान लाभ अर्जित करने के बजाय घाटे में चल रहा है। मेरी भूमिका व्यापारिक नीतियों पर नए सिरे से काम कर यहाँ इस स्थिति को पूर्णतया बदलने की है, ताकि उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाई जा सके, दाम कम हों, संगठन के लिए मुनाफा अर्जित किया जा सके और साथ ही ग्राहक तथा उत्पादक के बीच आपूर्ति को बेहतर बनाया जा सके।

कर्मचारी नहीं एक मालिक की सोच:

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पशु चारा उत्पादन इकाई या सी.ऍफ़.यू. (कैटल फीड यूनिट) में काम करने के शुरुवाती दिनों में लोगों की नकारात्मक सोच सबसे बड़ी परेशानी थी। सभी को लगभग ये यकीन हो चला था कि इस इकाई से मुनाफा अर्जित नहीं किया जा सकता। मैं वहां के माहौल में प्रेरणा की कमी को महसूस कर सकता था। मैंने ये भी देखा कि लोग कुछ इस तरीके से काम करने के आदी हो गए थे जो प्रभावी नहीं था। वहां के लोगों को सकारात्मक रूप से प्रेरित किये जाने की ख़ास जरुरत थी, साथ ही यह भी ध्यान रखना था कि इस प्रक्रिया में कोई अपमानित ना महसूस करे।

मैं ये भी चाहता था कि वो एक कर्मचारी की तरह नहीं बल्कि मालिक की तरह सोचें, जो शुरुवात में उनके लिए काफी मुश्किल था। छोटी-छोटी चीजें जैसे जूट के थैलों को कचरे में फेंक दिया जाए या उन्हें बेच दिया जाए, मैं इस प्रकार के निर्णयों में उनकी किसी और पर निर्भरता को समाप्त करना चाहता था।

कुछ और छोटी-छोटी किन्तु महत्वपूर्ण चीजें थी जिनका जिक्र करना जरुरी है; संगठन और पशु चारा उत्पादन इकाई से जुड़े लोगों और कर्मचारियों को लगा कि पशु चारा बनाने की विधि को बदलने की जरुरत है। उन्हें ये भी लगा कि कच्चे माल को मिलाने के लिए औज़ारों का इस्तेमाल कार्यक्षमता को बढ़ा सकता है। और समय के साथ मैंने यह देखा कि कैसे उनका नकारात्मक रुख, सकारात्मकता और आशापूर्ण नजरिये में बदल गया।

भले ही इस पशु चारा उत्पादन इकाई के भविष्य के बारे में कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन पिछली तिमाही में जो इकाई नुकसान में चल रही थी, अभी वह एक मुनाफा कमाने वाली इकाई में परिवर्तित हो गयी है।

पैसा ही सब कुछ नहीं है:

rat race 2मेरे अनुभवों ने बदलाव के मौकों के अलावा मुझे हमारी व्यवस्था के बारे में सोचने और आत्मविश्लेषण के लिए विवश किया है। एक पल के लिए मैं सोचता हूँ कि लोग इतने कम साधनों और पैसे में कैसे खुश रह सकते हैं? जब मैं हमारी कठोर शहरी दुनिया के भौतिकतावादी मूल्यों को देखता हूँ तो यह व्यवस्था मुझे हैरान कर देती है।

यहाँ पैसे की महत्ता को झुठलाया तो नहीं जा सकता, लेकिन यहाँ लोग सौहार्दपूर्वक प्रकृति के साथ रह रहे हैं, जहाँ चारों और साफ़ हवा और हरियाली मौजूद है। यहाँ के लोग चाहते हैं तो बस बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, और समय पर बरसात। एक और बात यह कि यहाँ पर संसाधन तो हैं लेकिन उनके बेहतर उपयोग के लिए तकनीक और जानकारी का आभाव है। और यहीं मुझे मेरी भूमिका दिखाई देती है। मेरी आशा और प्रयास हैं कि मैं मेरे कौशल और ज्ञान का प्रयोग से यहाँ के लोगों को उनके संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकूँ।

मैंने जो एक और चीज सीखी है वो यह है कि १३ महीने एक छोटा समय है, लेकिन एक छोटी सी शुरुवात भी महत्वपूर्ण है। हमें बस करना यह है कि एक चीज तय कर लें, और फिर अपनी सारी कोशिशें उसमे लगा दें।

और हाँ, ये भी प्रयास हों कि इस तरह के संस्थान लम्बे समय के लिए आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकें।

Read the English article here.

A competitor watches a performance from backstage during the Miss Wheelchair India beauty pageant in Mumbai November 26, 2014. Seven women from across India participated in the country's second wheelchair beauty pageant, which aims to open doors for the wheelchair-bound in modelling, film and television, according to organisers. REUTERS/Danish Siddiqui (INDIA - Tags: SOCIETY) - RTR4FQ6S

मेरृल डिनिज:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

A competitor watches a performance from backstage during the Miss Wheelchair India beauty pageant in Mumbai November 26, 2014. Seven women from across India participated in the country's second wheelchair beauty pageant, which aims to open doors for the wheelchair-bound in modelling, film and television, according to organisers. REUTERS/Danish Siddiqui (INDIA - Tags: SOCIETY) - RTR4FQ6S
REUTERS/Danish Siddiqui

बी.बी.सी. में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एक चाय विक्रेता के.ऍम. यादव ने, कई सौ ग्रामीणों को महत्वपूर्ण सरकारी जानकारी उपलब्ध करा के अपने आप में एक छोटी सी उपलब्धि हासिल की है। इन जानकारियों के फलस्वरूप ग्रामीण, अपने अधिकारों और हितों को लेकर जागरूक हुए हैं। के. ऍम. यादव ने यह सफलता आर.टी.आई. ( राइट टू इन्फॉर्मेशन यानि कि जानकारी का अधिकार) एक्ट के द्वारा हासिल की, जिसे “अशक्त के अस्त्र” रूप में भी देखा जाता है।

आर.टी.आई. एक्ट को एक सफलता के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसकी अपनी सीमायें हैं जो इसके प्रयोग को पढ़-लिख सकने में सक्षम लोगों तक ही सीमित करती हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में निरक्षर लोगों की संख्या अट्ठाइस करोड़ सत्तर लाख है। यह संपूर्ण विश्व की आबादी का ३७ प्रतिशत है, और विश्व के किसी भी देश में निरक्षर लोगों की सबसे बड़ी संख्या है। इस प्रकार बिना किसी उपयुक्त हेल्पलाइन या सहायता केंद्रों के भारत जैसे विशाल जनसांख्यिक परिवेश में जनहित के लिए आर.टी.आई. एक्ट के प्रयोग की उम्मीदें बेहद क्षीण हैं।

हमारे देश के संविधान के अनुसार हम सभी को बराबरी का दर्जा हासिल हैं, लेकिन असल में जनता को मिलने वाली सेवाएं और सुविधाएं युवा, सक्षम और एक विशेष वर्ग से ताल्लुक रखने वाले पुरुषों के लिए अनुकूलित हैं। यदि आपकी अंग्रेजी भाषा पर पकड़ अच्छी है तो इन सुविधाओं और सेवाओं को पाने की आपकी सम्भावनाएं और अधिक हो जाती हैं।लेकिन शेष जनता का क्या? आंकड़े इसे साफ़ तौर पर दिखाते हैं।

भारत में वरिष्ठ नागरिकों कि संख्या  १० करोड़ से भी ज्यादा हैं, इनमे से अधिकांश चुनावों के दौरान उपयुक्त परिवहन के आभाव में पोलिंग बूथ तक पहुँच भी नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में उनसे मताधिकार के उपयोग की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

यदि एक किशोरी उसके चलने में अक्षमता के कारण स्कूल नहीं जा पा रही है, तो हम उसके शिक्षित होने की कैसे उम्मीद कर सकते हैं? २०११ में हुई जनगणना के अनुसार १५ से ५९ वर्ष के लोगों में विकलांगों की संख्या १.३४ करोड़ थी, इनमे से ९९ लाख लोग या तो काम नहीं कर रहे हैं या फिर उनकी कार्य क्षमता सीमित है, ऐसा इन लोगों के हमारे शिक्षा तंत्र से बाहर होने के कारण हो रहा है।

एक और ख़ास बात, कई मौकों पर किसी नवजात की माँ से बच्चे को स्तनपान के लिए शौचालय में ले जाने की उम्मीद की जाती है, ऐसे में कैसे हम उससे सार्वजनिक स्थानों पर जाने की अपेक्षा कर सकते हैं? मुझे संदेह है, कि आप कभी भी शौचायल में जाकर आपका आहार लेना पसंद करेंगे!

हम एक विविधताओं से भरी दुनिया में रह रहे हैं, फिर भी हमारी जनसँख्या का सबसे बड़ा हिस्सा परिवहन, शिक्षा, सुरक्षित कार्य स्थल, शौचालय आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। हमें स्वीकार करना होगा कि अप्राप्यता की अलग-अलग रूपों में हमारी प्रणाली और हमारी सोच में गहरी पैठ है, और यदि हम बदलाव लाना चाहते तो, बुनियादी सुविधाओं की पहुँच को किसी एहसान की तरह नहीं बल्कि एक मानव अधिकार के रूप में देखना होगा, हमें सुविधाओं और सेवाओं से वंचित इस विशाल वर्ग को साथ में लेकर आना होगा।

इन्ही कारणों से यूथ की आवाज़,  सीबीएम इंडिया, जो कि एक अक्षमता और विकास पर काम करने वाली प्रमुख संस्था है, के साथ मिलकर बुनियादी सेवाओं और सुविधाओं की उपलब्धता के विभिन्न पहलुओं पर संवाद बनाने का प्रयास कर रहा है। आने वाले २ महीनों में हम कानून और अनुपलब्धता के वित्तीय पहलुओं पर भी बात करेंगे। और सबसे अधिक प्रमुखता से इस बारे में बात की जाएगी कि, विश्व में उपलब्धता को कैसे बढ़ाया जाए, जो हमें हमारे लक्ष्य #Access4All के और करीब ले जाता है। आखिर बिना सेवाओं और सुविधाओं की आम पहुँच के समानता की बात नहीं की जा सकती।

Read the English article here.

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अभिलाष आनंद:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

bhu1बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति श्री लालजी सिंह ने जब विश्वविद्यालय परिसर में रात को स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बारे में सुना, तो उन्होंने कारणों का पता लगाने का प्रयास किया। उन्हें विद्यार्थियों ने बताया कि विश्वविद्यालय परिसर के बाहर रहने और लगातार बिजली की कटौती की वजह से उन्हें पढाई में काफी दिक्कतें आ रही हैं, जिसके कारण वे स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने को विवश हैं। पूर्व कुलपति के सही कारणों को जानने का यह प्रयास, ३-मार्च २०१३ में विश्वविद्यालय परिसर को २५० कम्प्यूटरों के साथ हफ्ते के सातों दिन और चौबीसों घंटे खुली रहने वाली साइबर लाइब्रेरी पर जाकर रुक गया। ३-जुलाई २०१४ को इस लाइब्रेरी में कम्प्यूटरों की संख्या ४५५ हो चुकी थी जो शायद इस लाइब्रेरी को एशिया की सबसे बड़ी साइबर लाइब्रेरी बनता है।

लाइब्रेरी को बंद किये जाने के कारण:

नवंबर २०१४ को विद्यार्थियों की स्टूडेंट-यूनियन की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद लाइब्रेरी को बंद कर दिया गया। नए कुलपति श्री जी. सी. त्रिपाठी ने कार्यभार सँभालने के बाद लाइब्रेरी को दिन में १२ घंटों के लिए ( प्रातः ८ बजे से रात्रि ८ बजे तक) खोलने का आदेश दिया। कुछ विरोध प्रदर्शनों के बाद लाइब्रेरी के बंद होने का समय रात्रि ११ बजे तक बढ़ा दिया गया और यही समय सीमा अभी तक लागू है।

क्यों विद्यार्थी नयी समय सीमाओं से नाखुश हैं:

लाइब्रेरी की समय सीमाओं के विरोध की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इस सिलसिले में पिछले वर्ष अक्टूबर और नवंबर में विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। अंतर केवल यह है कि इस बार विद्यार्थियों ने विरोध के लिए लाइब्रेरी बंद होने के बाद लाइब्रेरी परिसर के बाहर स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने और हस्ताक्षर अभियान जैसे शांतिपूर्ण तरीकों को अपनाया है। आज इस विरोध प्रदर्शन का सोलहवां दिन है। इस बीच विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए सुरक्षा अधिकारियों की सहमति बनाए रखना बेहद मुश्किल रहा, और प्रॉक्टर महोदय से तक़रीबन हर दिन बात करनी पड़ी। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के शोध पर आधारित विषयों के लिए अधिक संसाधन जुटाने को लेकर १२ मई को विश्वविद्यालय की सौंवी वर्षगाँठ पर दिए गए भाषण के बाद, विद्यार्थियों की मांगे और उनके विरोध प्रदर्शन और अधिक प्रासंगिक लगते हैं।

क्या कहना है विश्वविद्यालय प्रशाशन का:

एक तरफ जहाँ प्रशाशन, प्रॉक्टर और अन्य अधिकारियों का समर्थन करते हुए विद्यार्थियों को विरोध प्रदर्शन बंद करने के लिए समझाने के प्रयास कर रहा है। वहीँ प्रदर्शनकारियों के पास वीडियो के रूप में इस तरह के सबूत मौजूद हैं जिनमें विद्यार्थियों पर हुए बल प्रयोग को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। विश्वविद्यालय प्रशाशन नें दो छात्रों को विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है। इन दोनों छात्रों पर “स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने और हस्ताक्षर अभियान जैसे कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर” विश्वविद्यालय के वातावरण को खराब करने के आरोप लगाए गए हैं।

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एक आर.टी.आई. के द्वारा प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को ७६० करोड़ रूपए का वार्षिक अनुदान मिलता है। एक विद्यार्थी के रूप में मैंने यह सीखा है कि, दिन-रात के अथक परिश्रम के बाद इस विश्वविद्यालय कि स्थापना करने वाले महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों, जिनमें छात्रों के हितों की रक्षा मुख्य रूप से आती है, से दूर जाना सही नहीं है। (विश्वविद्यालय के अनुदान से सम्बंधित आर.टी.आई. डालने वाला छात्र, उन दो छात्रों में से एक है जिसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है)।

आज विश्वविद्यालय कि स्थापना के १०० वर्ष के बाद छात्र-हितों कि स्थिति ऐसी नहीं है कि उस पर विश्वविद्यालय प्रशाषन गर्व कर सके। ऐसे में छात्रों की लाइब्रेरी को चौबीसों घंटे खुले रखने कि मांग, चाहे वो एक ही छात्र के लिए क्यों ना हो, पूर्णतया सही है।

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By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Bundelkhand is known  for being severely affected by the drought, struggling for water is an old story in the region. This story shows just how hard life gets for villages in the area, especially the women, who face endless challenges due to the severe water shortage.


khabarगीता
की उम्र अठारह साल है। आज गीता दो-तीन दिन बाद वापस हैंडपंप की कतार में खड़ी है। पिछले कुछ दिनों से गीता तेज कमर दर्द के कारण उठ भी नहीं पा रही थी। लेकिन लगता है उसकी तबियत थोड़ी ठीक हुई, इसलिए वह पानी भरने अपने गांव के हैंडपंप पर पहुंच गयी है। दिखने में गीता छोटी सी है, चेहरा थका हुआ है, बुखार के कारण इस भीषण गर्मी में भी उसने कमीज के ऊपर जैकेट पहनी है। दो दिन बिस्तर पर लेटने के बाद भी गीता की ऊर्जा उसे पानी भरने के लिए लाइन तक खिंच लायी है।

बीएससी की छात्रा होते हुए, गीता का सपना है कि वह डॉक्टर बने।. लेकिन उसके सूखाग्रस्त गांव में पानी की किल्लत के कारण पिछले साल वह मात्र 70 दिन कॉलेज जा पायी है और इस साल शायद उससे भी कम। गीता अब ज्यादा से ज्यादा समय, सुबह से लेकर शाम तक, अपने घर से 5 हजार कदम दूर लगे हैंडपंप पर बिताती है। उसके परिवार में 15 लोग हैं, जिनमे से उनकी मां, भाभी और वह पानी लेके आने का काम करती हैं। वह बारी-बारी घर से बर्तन समेट कर लाती है और हर चक्कर में 30 लीटर पानी से भरे बर्तनों का बोझ उठाती है। यह कहानी सिर्फ गीता की नहीं है, बल्कि उसके मोहल्ले की हर लड़की, हर महिला की है।
गीता महोबा जिले के जैतपुर ब्लॉक के अजनर गांव की रहने वाली है। अजनर, जिसकी आबादी लगभग 11 हजार है, एक बड़ा ग्राम पंचायत वाला गांव माना जाता है। इस गांव में कुल 85 हैंडपंप हैं, लेकिन चालू हालत में दस से कम हैंडपंप है।

जैतपुर ब्लॉक में पानी की समस्या इतनी गहरी है कि कुछ साल पहले ही इसे डार्क जोन घोषित कर दिया गया था। हाल ही में महोबा जिले को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की तू-तू-मैं-मैं हुई थी। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अलोक रंजन, खेती के विशेषांक और मीडिया द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, महोबा जिला बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों में इस गांव की हालत सबसे बद्तर है। इसके बावजूद ,केंद्र सरकार द्वारा भेजी गयी पानी की ट्रेन को यूपी सरकार ने लेने से मना कर दिया।khabar1

अखिलेश यादव और नरेन्द्र मोदी की बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री का कहना था कि सूखे के प्रबंध में “नारी शक्ति” की भागीदारी बढ़नी चाहिए. लेकिन प्रधानमंत्री जी से यह सवाल पूछना चाहिए कि आज बुंदेलखंड के हर जिले, ब्लॉक और गाँव में सूखे के कमर-तोड़ बोझ को सबसे ज्यादा कौन उठा रहा है? क्या वह नहीं जानते कि सूखे की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर ही पड़ी है!

विशेष रिपोर्ट
अप्रैल का एक गर्म दिन और लू के थपेड़े चेहरे को जला रहे थे उस वक्त खबर लहरिया अपने दौरे के लिए अजनर गांव पहुंचा। गांव के 28 मोहल्लों में, फिलहाल तीन टैंकरों का पानी ऊपरी बस्तियों में पहुंचया जा रहा है। जो प्रधान के घर के इर्द-गिर्द बसी हुई हैं।
जैतपुर ब्लॉक के बीडीओ का कहना है कि ब्लॉक में ऐसे कुछ इलाके हैं जहां सूखे और पानी की स्थायी समस्या है, जैसे शागुनिया, महुआ बांध और मुढ़ारी गांव। ब्लॉक में पानी की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने सात गांवों में टैंकर की व्यवस्था की है। जिनमे से एक अजनर ग्राम पंचायत भी है।

जरा सोचिये-
khabar2औसत रूप में हर परिवार में 4-6 लोगों की संख्या है, जिन्हें कम-से-कम 400 लीटर पानी प्रति दिन की जरुरत हैं। गाय, भैंस जैसे बड़े जानवर दिन में दो बार कुल 120 लीटर पानी पीते हैं। जबकि बकरी जैसे छोटे जानवर 30 लीटर पी जाते हैं। इस पर मिथिला का कहती हैं कि हर दिन वह सिर्फ 3 कैन पानी भर पाती हैं, यानी 90-135 लीटर। इतने पानी में मिथिला क्या कर पाएगी?

अगर श्रीराम मोहल्ला की बात करें तो, इस मोहल्ले में लगभग 100 परिवार बसे हुए है। जिनमें सवर्ण जाति के राजपूत, तिवारी, कुमार और पंडित अधिक हैं। मोहल्ले में रहने वाली रामसरी बताती है कि उनके यहां का हैंडपंप सूख चुका है। फिर भी यदि एक दो घंटे मेहनत करो तो एक बाल्टी पानी निकलता है। टैंकर श्रीराम मोहल्ला होते हुए निकलता जरूर है, लेकिन सिर्फ 15 मिनट रुकता है। “लोग दस मिनट में टैंकर खाली कर देते हैं। कभी हमारा नंबर आता है और कभी नहीं”।

अब जरा एक नजर अजनर के पुरुषों पर भी डालते हैं कि इस सूखे में वह क्या कर रहें हैं? हर मोहल्ले में, पुरुषों की मंडली चौपाल पर बैठी मिलेगी या जुआ खेलते हुए देखी जा सकती है। युवा लड़के नए-नए कपड़े पहन कर, हाथ में मोबाइल लिए घूमते-फिरते नजर आयेंगे। लेकिन औरतें खेत में, रसोई, हैंडपंप या टैंकर के पास पानी भरती मिलेंगी। इस सूखे में पूरे परिवार की जरूरतों को सिर्फ और सिर्फ यह महिलाएं ही पूरा कर रही हैं।
अजनर की लगभग तीन चौथाई आबादी को टैंकर का पानी नसीब नहीं हो रहा है। जिनमें से अधिकतर आबादी दलित लोगों की है। इस बारे में रोशनी ने भी हमें जानकारी दी। उसका घर हैंडपंप से 5 हजार कदम दूर हैं। गांव के छोर पर दो हैंडपंप लगे है, जिन्हें मीठी नल के नाम से जाना जाता है। हैंडपंप के आस-पास सैंकड़ो मधुमखियां मंडराती रहती हैं। शायद इसी कारण नल का नाम मीठी नल पड़ा है।

इस मीठी नल से गांव की आधी आबादी अपनी प्यास बुझाती है। हर रोज रोशनी अपनी साइकिल पर 3-4 पानी की कैन लेकर हैंडपंप की कतार में खड़ी रहती हैं। हर चक्कर में 30 लीटर पानी लेकर वह दिन के तीन चक्कर काटती हैं।

मीठी नल पर दिन भर महिलाओं की कतार लगी रहती हैं। पानी के मुद्दे को लेकर पूरे-पूरे दिन, हैंडपंप पर, घरों में और चौपाल पर चर्चा, विवाद, मुठभेड़ होते रहते हैं।
गांव के रामोतार का कहना है कि पानी पर ही नहीं बल्कि जाति पर भी विवाद होता रहता है। “अगर दलित जाति का व्यक्ति सवर्ण जाति के व्यक्ति के पीछे कतार में खड़े हैं और पानी की अत्यधिक आवश्यकता होती है तो लाइन तोड़ने नहीं देते हैं।”

  • जैतपुर ब्लॉक में कुल हैंडपंप है 2949, जिनमे से 110 रिबोर की सूची में हैं, 206 खराब हो चुके हैं इनमें से 105 पूरी तरह से सूख चुके हैं।
    भूजल स्तर 140 फीट तक गिर चुका है।
  • कुल 154 तालाब है, जिनमे से 95 तालाब एक हेक्टेयर से कम हैं और 59 एक हेक्टेयर से बड़े हैं। 154 तालाबों में 143 सूखे पड़े हुए है!
  • जैतपुर ब्लॉक के 63 ग्राम पंचायतों के लिए सिर्फ 29 हैंडपंप मैकेनिक को परिक्षण दिया गया है!
  • अजनर ग्राम पंचायत
  • आबादी है 11 हजार
  • कुल हैंडपंप है 85, जिनमे से लगभग दस हैंडपंप काम कर रहे हैं।
  • नियमित कुएं 16 हैं, लेकिन सारे सूख चुके हैं।
  • अजनर के चार तालाब पिछले दो महीनो से सूखे पड़े हुए हैं।
  • 2006-07 की अजनर पेयजल योजना के अंतर्गत 4 पंप, 9 राइजिंग प्लांट और एक टंकी बनायी गई थी, जिनमे से सिर्फ 40 प्रतिशत पानी पंप हो रहा है।

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प्रधान के प्रतिनिधि सुरेन्द्र कुमार तिवारी का कहना है कि पानी की कमी उनके जीवन के हर पहलु में दिखने लगी हैं। लोग हफ्ते में एक बार नहाने लगे हैं, हफ्ते में एक बार कपड़े धो रहे हैं, साबुन का उपयोग
कम ही करते हैं और खाने में भी पानी कम इस्तेमाल कर रहे हैं। पीने के पानी की जरुरत को छोड़कर, बाकी सब कामों में तंगी कर रहे हैं। इतना ही नहीं सुरेन्द्र कुमार कहते हैं कि जनवरी से लेकर अब तक लगभग 200 से ऊपर मवेशियों की मृत्यु हो गई है।

आज गीता, रोशनी और उनकी सहेलियां रानी, प्रियंका और कई लड़कियां कॉलेज नहीं जा पा रही हैं। उनके परिवारों की सभी महिलाएं पानी भर के लाने में लगी रहती हैं।
गांव में बिमारी का शिकार भी महिला बन रही हैं और सूखे का भार भी उठा रही हैं।

रिपोर्टर – प्रियंका कोटमराजू और श्यामकली

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विकाश कुमार:

kisan2किसान बेहाल है तथा कृषि संकटकालीन अवस्था से गुजर रही है। इसके बावजूद राष्ट्रीय पटल पर बहसों का दौर जारी है। इस विषय ने संसदीय राजनीति और कृषि विकास की राजनीति को आंदोलित किया है। इन सब के बीच किसानों की माली हालत को लेकर कृषि वैज्ञानिकों, विश्लेषकों तथा राजनेता पक्ष-प्रतिपक्ष के बीच खूब घमासान तथा उठा-पटक चल रही है और भारतीय कृषि के जीर्णोद्धार के कार्यक्रम हेतू उपाय सुझाए जा रहे हैं। हालाँकि यह माहौल अभी बहसों तक ही सीमित है, इसका धरातल पर आना अभी बाकी है। इस सब के बीच उन मुद्दों पर सहमति बनाना जरुरी हैं, जो किसानों तथा कृषि के भविष्य को संवार सकें।

यहाँ पर हम पहला बिंदु ओलावृष्टि तथा बेमौसम बारिश के चलते फसलों को होने वाले नुकसान का लेते हैं, जिसने पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के किसानो को कहीं का नहीं छोड़ा है। सवाल उठता है कि आखिर फसल खराब हुई कैसे? इसका उत्तर हम जलवायु परिवर्तन और अपनी कृषि-व्यवस्था में खोज सकते हैं। कई ऐसे मौके आए जब तापमान में हुई अचानक बढ़ोतरी ने फसल को समय से पहले पकने पर मजबूर कर दिया और इसके चलते उत्पादन में कमी आई। इस बार फसल पकी नहीं कि ओलावृष्टि तथा बेमौसम बारिश ने अपना कहर ढा दिया। फलस्वरूप फसलें अधिक खराब हुईं लेकिन इस सब के पीछे एक और कारण हमारा प्रबंधन तथा तकनीक की कमी भी रहा। हमने विदेशों से आधुनिक यंत्र तो आयातित किये परन्तु कृषि के आधुनिकीकरण का सही प्रयोग तथा कृषि ज्ञान व साथ ही मौसमी कुचक्र का सही प्रबंधन करना भूल गए।

तत्पश्चात हम कृषि से सम्बंधित आर्थिक नुकसान, आर्थिक मुआवजे, सब्सिडी और साथ ही किसान की आमदनी से जुड़े हुए मुद्दे की बात करते हैं। इस बार भारतीय किसान की फसल नष्ट हुई तो केंद्र सरकार ने मुआवजे की राशि ५० प्रतिशत से घटाकर ३३ प्रतिशत तक कर दी। कृषि सब्सिडी की बात पहले भी उठती रही है, कि किसानों को फसलों पर सब्सिडी दी जाए। चीन, अमेरिका तथा कई अन्य पश्चिमी देश तो अपने देश के किसानों को ८० से ९० प्रतिशत तक की सब्सिडी मुहैया कराने जैसे सामाजिक सुरक्षा के कदम उठाते आएं हैं, लेकिन भारत इस मामले में अभी बहुत पीछे है। हमारा देश अभी डब्लू.टी.ओ. के अंतराष्ट्रीय मानकों के बीच ही फँसा है, जिसकी वजह से पश्चिमी देश नही चाहते कि भारत अपने किसानों को अधिक सब्सिडी मुहैया कराये। और जब सब्सिडी का ये हाल है तो सरकार किसानों की आमदनी क्या तय कर पाएगी? बहुत से विश्लेषकों तथा कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों की आमदनी पर प्रमुखता से जोर दिया है। लेकिन सरकार किसानों की आमदनी पर ध्यान देने के बजायअधिक कृषि ऋण देने और किसानो के पिछले कर्जों को माफ करने में लगी हुई है। आज किसानों को ऋण की नही, आमदनी की जरुरत हैं। एन.एस.एस.ओ. (नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाईजेशन) २०१४ का एक आंकड़ा कहता है कि खेती-बाड़ी के कार्य में लगे एक किसान परिवार को प्रत्येक महीने केवल ३०७८/- रुपए की ही आमदनी होती है। कम आमदनी की वजह से मजबूर किसानों को अपने आर्थिक गुजारे हेतू अन्य विकल्पों की तलाश करनी पड़ती है। रोजगार के अन्य विकल्प मिलने पर वह खेती छोड़ने को तैयार भी है, जो कि एक चिंताजनक स्थिति है।

तीसरा बिंदु भूमि-अधिग्रहण से जुड़ा है। हाल ही में संसद में दो बार अध्यादेश द्वारा इस संशोधित भू-अधिग्रहण बिल को रखा गया| इससे पहले २०१३ में निजी प्रोजेक्ट हेतू भू-अधिग्रहण के लिए संबंधित ग्रामसभा से ८० प्रतिशत तथा पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के लिए ७० प्रतिशत लोगों की सहमति आवश्यक थी। लेकिन राजग सरकार के इस प्रस्तावित बिल में, संप्रग सरकार के पूर्व अनुमोदित बिल के उलट, भू-अधिग्रहण की सहमति को बिलकुल दरकिनार कर दिया गया है। आज इस पर देश का किसान नाराज है। ऐसे में एक किसान अपनी जिस भूमि पर खेती करता आया था, सरकार अगर उसकी जमीन को ऐसे ही ले लेगी तो कृषि का क्या होगा? तथा किसान जो खेती करके कमाता था, वह कमाई भी उससे छिन जाएगी। उसके हाथ आएगा तो बस मुआवजा, जो पता नहीं उसके घर केआंगन में कब तक पहुँच पायेगा। इसका उत्तरदायित्व किसका होगा, इसमें सटीकता नही आ पायी है| जब तक ये बातें साफ़ होंगी तब तक कई किसानों के हाथ से उनकी खेती योग्य जमीन जा चुकी होगी।

आज भारत में कृषि को बाजारवाद तथा उदारीकरण के इस दौर में नये सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है, कई सुधारात्मक तरीके अपनाए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए किसानों को फिर से अपनी फसलों में विविधता को लाना होगा। सरकार को भी इस हेतू नीतियों के निर्माण में आगे आना होगा ताकि विविधतापूर्ण खेती-बाड़ी के साथ-साथ पशुपालन को भी बढ़ावा दिया जा सके। साथ ही किसानों द्वारा फसल चक्र के प्रयोग से खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने पर जोर दिया जाए। कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में लाया जाए। कृषि की भलाई के लिए व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए ताकि जिन किसानों को गेहूं, मक्का, आलू तथा धान की खेती लाभकर नही लगती वो किसान दलहन, तिलहन और मसालों की खेती कर सकें। साथ ही एक अन्य विचार जिसकी आज बड़ी प्रासंगिकता बन रही है, वह है एक सशक्त कृषि आयोग का गठन, जो किसानों तथा कृषि सुधार हेतू नीतियों का निर्माण करे, उनके क्रियान्वन तथा कृषि पर नवाचार को अपनाते हुए सुधारों को गति प्रदानकरे।

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अमोल रंजन:

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उस दिन कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली के साकेत सिनेमा में एक मराठी फिल्म “सैराट” देखने गया। हालाँकि पिछले काफी दिनों से फिल्में देखने के कई अन्य विकल्प होने के कारण सिनेमा हॉल जाना हो नहीं पा रहा था। फिर सोशियल मीडिया पर कुछ लोग इस फिल्म की ऐसी तारीफ़ कर रहे थे, कि जब एक दोस्त ने फिल्म देखने के लिए पूछा तो मुँह से हाँ ही निकला।

फिल्म के पहले शॉट को देखने से लगा जैसे मैं शोलापुर जिले के करमाला गाँव में अपने बचपन के मोहल्ले में पहुँच गया हूँ। टेनिस की गेंद से खेला जाने वाला क्रिकेट टूर्नामेंट, लाउडस्पीकर पर मजाकिया कमेंटरी, आखरी ओवर में चौक्के-छक्के मार कर मैच जीतना। किसी नेता जी के द्वारा पुरस्कार वितरण और उनका भाषण, किसी लड़के का किसी लड़की पर दिल आना और फिर लड़की का उस लड़के पर दिल आना (माफ़ कीजियेगा मैं यहाँ अपने नज़रिए से देख रहा हूँ)। पर जैसे-जैसे फिल्म में यह सब हो रहा था, कुछ चीज़ें ऐसी भी हो रही थी जो मैंने ना तो अपने मोहल्ले और गाँव में देखी थी और ना ही ज्यादा सिनेमा में। यहाँ आर्चि (लड़की) ही परश्या (लड़के) को घूरे जा रही थी और परश्या शर्म से उसको मना किये जा रहा था। लड़की जब-जब फिल्म के किसी फ्रेम में रॉयल एनफील्ड या ट्रैक्टर चला के आ-जा रही थी, सिनेमा हॉल में बैठी जनता चौंके जा रही थी। इस फिल्म में आर्चि उच्च जाति और सम्पन्न परिवार से है जिसके पास राजनितिक ताकत भी है और परश्या निम्न जाति के गरीब परिवार से है। पर जब फिल्म में आर्चि पुलिस थाने में परश्या के बचाव के लिए संघर्ष करती है तो वो ना सिर्फ अपने परिवार, परश्या और अधिकारियों को आश्चर्यचकित करती है बल्कि सिनेमा में चित्रित समाज में प्यार के लिए संघर्ष को नए आयाम देने लगती है।

मध्यांतर के बाद आर्चि और परश्या के संघर्ष का पड़ाव हैदराबाद शहर बन जाता है जहाँ कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा होता है, लेकिन जीवन जीने के संघर्ष में उन्हें दौड़ कर कई सीमायें लांघनी होती हैं। आर्चि जो इससे पहले तक अपना जीवन पूरी सुविधाओं के साथ जी रही थी, अब वह खुद को किसी मलबे के ढेर पर बिखरी हजारों झुग्गियों में से एक में पाती है। वह उसके पास से होकर जाने वाले नालों में बहकर आने वाली शहर की सच्चाइयों को अपनी साँसों में बसाने के लिए संघर्ष करती है। परश्या का भोलापन भी धीरे-धीरे शहर की आपधापी में छिपने लगता है, एक सीक्वेंस में परश्या आर्चि को गुस्से में आकर थप्पड़ मार देता है, मर्दानगी और पित्रसत्ता उसके आर्चि के लिए प्यार के ऊपर हावी होती दिखती है। परश्या को अपनी गलती का अहसास होने तक, आर्चि उससे दूर चली जाती है। फिल्म के निर्देशक नागराज मंजुले, जो फिल्म के शुरूआती क्षणों में नज़र भी आते हैं, सिनेमा को अपने साहसी चरम पर ले जाते हैं। वो आर्चि और परश्या के प्यार के सपनों और संभावनाओं में भी ले कर जाते हैं और हमारे सामाजिक व्यवस्था की गहरी विषमताओं और इसकी गहराईयों में भी।

१७० मिनट की यह फिल्म अगर एक प्रेम यात्रा है, तो इसका अंत आर्चि और परश्या के जीवन की सच्चाई है। जाति व्यवस्था और लिंग भेद से ग्रसित हमारा समाज कब आपको हलक से पकड़ के पटक देता है आपको पता नहीं चलता। यह हमारी सांसों में घुला हुआ है, “सैराट” फिल्म के कथानक के हर मोड़ पर यह देखने को मिलता है और अंत तक आपकी बुद्धि और कल्पनाओं के साथ खेलता रहता है।
फिल्म को देखने के बाद जब हम लोग निकले तो सभी भावुक थे। सभी अपनी-अपनी भावनाएं व्यक्त करने की कोशिश करने के बाद अपने-अपने रास्ते को चले गए। मैं भी इस फिल्म के सफ़र के बाद अपने खुद के सफ़र में झाँकने को मजबूर हो गया। मेरा सफर ना सिर्फ मेरी अपनी कहानी थी, बल्कि कई और लोगों की कहानियाँ भी थी जिन्हे मैंने कभी आत्मसात किया था। ना जाने कितनों की कहानी इस फिल्म के ४० मिनट तक, कितनों की ६० मिनट तक, कितनों की ९०-१२०, तो कितनों की कहानी इस फिल्म से भी आगे तक जाती है। सभी के अपने मोड़ हैं, और अपने-अपने अंजाम भी। उन सब कहानियों की समानताएं और भिन्नताएं जोड़ता ऑटो लेकर मैं घर वापस पहुँचा। पर फिल्म की डरावनी सच्चाई गयी नही थी। वो लगातार पूछे जा रही थी, कि क्या आर्चि और परश्या का प्यार संभव था? क्या उनका प्यार संभव है? सोते-सोते लगा जैसे इस फिल्म की ताकत शायद यही थी कि ये लगातार सवाल पूछे जा रही थी।

book cover- essays by manto

कबीर शर्मा:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

सआदत हसन मंटो केवल एक सर्वकालिक महान लेखक ही नही बल्कि समाज को चुनौती देने वाले एक क्रांतिकारी भी थे। वो अपने लेखन के ज़रिये लगातार ऐसी सच्चाइयों को सामने लाते रहे जिसका साहस कोई और नही कर पाया। उन्होंने समाज को लगातार आइना दिखाने का काम किया, जो ज्यादातर लोगों को रास नही आया। उनका लेखन हमेशा समय और काल से परे सटीक और प्रभावशाली बना रहेगा जो उनकी नियति भी थी।

Saadat_Hasan_Manto_photographआकार पटेल के द्वारा उर्दू से अंग्रेजी में अनुवादित और सम्पादित निबंध संकलन “व्हाई आई राइट: एसेज बाय सआदत हसन मंटो (Why I Write: Essays By Saadat Hasan Manto)”, उनकी लेखन पर पकड़, और शैलियों के अलग-अलग रंगों जैसे व्यंग, कटाक्ष, आक्रामकता सभी को सफलता से एक साथ पिरोता है। इस संग्रह के सभी निबन्धों में से दो का पहली बार अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। आकार पटेल ने बेहद सूझ-बूझ और सुनियोजित तरीके के साथ निबन्धों का चुनाव किया है, जो मंटो के लेखन के अलग-अलग पहलुओं को सामने लेकर आता है और प्रत्येक निबंध पर दी गयी टिप्पणियां उत्कृष्ठ सन्दर्भ प्रदान करती हैं।

संग्रह के निबन्धों के साथ आगे बढ़ने पर ये समझा जा सकता है कि, व्यवस्था से मंटो के संघर्ष ने उन्हें और उनके लेखन को किस तरह से आहिस्ते-आहिस्ते बदल दिया। विभाजन और उसके बाद भड़की हिंसा ने, मंटो और उनके लेखन की शरारत और जिंदादिली को गूढ़ता में बदल दिया। लेकिन उनका वो तीखापन हमेशा उनके साथ रहा जो अंतिम समय में लिखी गयी लघुकथाओं में विषादपूर्ण व्यंग और कटाक्ष के रूप में सामने आया।

यह संग्रह युवा मंटो की उन हल्की और विनोदपूर्ण रचनाओं से शुरू होता है, जो एक हद तक निजी कही जा सकती है। ये रचनाएं १९३० के दशक के उस बम्बई शहर की झलकियां देती हैं, जब मंटो प्रेस और फ़िल्मी दुनिया में कार्यरत थे। कैसे वो पैसे बचाने के लिए दफ्तर में ही सो जाया करते थे, कैसे उनकी माँ ने सभी संभावनाओं के उलट उनके लिए एक वधु खोज निकाली थी, कैसे फिल्मी दुनिया के उस वक़्त के बड़े नाम उनकी शादी में शरीक हुए, जबकि बमुश्किल उन्हें उस वक़्त कोई जानता था और किस तरह उनकी पत्नी की वित्तीय चिंताओं ने उन्हें और अधिक लिखने के लिए मजबूर किया।

मंटो उस दौर के ज्वलंत मुद्दों का जैसा हास्यपूर्ण दृश्य बुनते हैं वह उनके लेखन को और प्रभावशाली और अविस्मरणीय बना देता है। ऐसे ही दो वाकयों में जिनमें वो हथियारों की होड़ की खिल्ली उड़ाते हैं, और उर्दू-हिंदी की चर्चा करते हैं, को पढ़ते वक़्त मैं मेट्रो ट्रेन में सफर करने के बावजूद भी खुद को हंसने से रोक नहीं पाया।

जिन मुद्दों में हास्य की गुंजाइश नहीं थी उन पर मंटो ने साफगोई और ईमानदारी से लिखा, बम्बई के हिन्दू-मुस्लिम दंगों पर उनके लेख इसका ख़ास उदाहरण है। दंगाइयों की भीड़ में फंसे और उस से बच जाने वाले लोगों पर लिखी कहानियां, जिंदगी और मौत की कश्मकश में जीत और हार की कहानियां, कुछ कहानियां इंसानियत और कुछ उसके क़त्ल की, और इन सबके बाद भी चलती रहने वाली जिंदगियों की कहानियां मंटो के लेखन की गम्भीरता का प्रमाण देती हैं। अपने लेखों में, उस दौर में हिंसा के लिए जिम्मेदार नेताओं को मंटो ने मुखरता के साथ आड़े-हाथों लिया है।

भारत-पाकिस्तान विभाजन के तुरंत बाद मंटो को बम्बई छोड़ कर पाकिस्तान जाना पड़ा। लेकिन उनके मन में बसने वाले शहर और देश को वो कभी छोड़ नहीं पाये।

बंटवारे के बाद लाहौर की सड़कों और गलियों में आये ऊपरी बदलावों से मंटो का मन बेहद दुखी था। लगातार हो रही हिंसा से पीड़ित लोगों को लगता था कि शायद देश के बंटवारे के बाद इस हिंसा का दौर ख़त्म होगा। लेकिन मंटो ने उसी वक़्त लोगों को आने वाले लम्बे “बर्बरता के दौर” को लेकर चेताया था। उन्होंने कहा था कि अगर हिंसा की मानसिकता से संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक तरीके से ना निपटा गया तो “बर्बरता का यह दौर” बेहद करीब है।

“ऊपर वाले का शुक्र मनाइए कि ना अब हमें शायर मिलते हैं, और ना ही संगीतकार”, खुले विचारों पर सरकार के नकारात्मक रुख पर उनका यह एक सटीक कटाक्ष था। तब उनकी कही गयी ये बातें, आज के समय में भी कितनी सही हैं, यह ज्यादा सोची जाने वाली बात नहीं है।

मंटो पर कई बार अश्लील लेखन के आरोप लगाए गए और उन्हें क़ानूनी कारवाही का भी सामना करना पड़ा। इसी तरह के एक मुक़दमे की बात करते हुए मंटो कहते हैं, उम्मीद है कि इस तरह के “अजीब” कोर्ट में किसी और को ना जाना पड़े। इस तरह के किस्सों में कहीं ना कहीं मंटो के लेखन में वही पुराना हास्य वापस आता दिखता है। वो पुलिस के साथ मजाक करते हैं, वो मुकदमों के दौरान यात्रा से होने वाली तकलीफों की शिकायत भी करते हैं और शराब मुहैय्या कराने का शुक्रिया भी अदा करते दिखते हैं।

नैतिकता के तथाकथित ठेकेदार हमेशा मंटो के पीछे पड़े रहे। “ओ उपरवाले इसे इस दुनिया से उठा लो, ये इस दुनिया के लायक नहीं है। ये तुम्हारी खुशबू को नकार चुका है। जब उजाला सामने होता है तो ये चेहरा फेर कर अँधेरे कोनों की तलाश में चला जाता है। इसे मिठास नहीं कड़वाहट में स्वाद मिलता है। ये गंदगी से सरोबार है। जब हम रोते हैं तो ये खुशियां मनाता है, जब हम खुश होते हैं तो ये मातम करता है। हे ईश्वर ये तुम्हे भुलाकर शैतान की इबादत करता है।”, मंटो अपने एक निबंध “दी बैकग्राउंड (the background)” में कुछ इसी तरह से अपने विरोधियों को दुआ करते हुए देखते हैं।

सवाल करने और सवाल सुनने की अनिच्छुक दुनिया के लिए मंटो कुछ ज्यादा ही सच्चे थे। उन्हें ये यकीन दिलाने की पूरी कोशिश की गयी, कि आप जो भी कर रहे हैं उसे भूल जाएँ। दुनिया से तालमेल ना बिठा पाने वाले मंटो ने खुद को शराब के नशे में डुबा दिया और केवल ४२ साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा।

उनके निबंध एक बेहद प्रतिभाशाली, विनोदी, रचनात्मक, आशावान और भीतर से आहत इंसान की झलक दिखलाते हैं। वो एक ऐसे मानस की झलक देते हैं जिसने हमें झिंझोड़ने के लिए लिखा, हमे सदा अंतरमन के सतत क्षय को याद रखने को मजबूर किया।

Read the English article here.

gaya protest 1

प्रशांत झा:

gaya protest 1
सुरेन्द्र वर्मा द्वारा फेसबुक पर पोस्ट

जुर्म- सत्ता/रसूख के अहंकार पर चोट
सज़ा- मौत
स्थान- सत्ता तक पहुँचती इस मुल्क की कोई भी सड़क

अगर बात ऐसी घटनाओं की फ्रिक्वेंसी की करें, तो शायद ये देश हाई रिस्क ज़ोन में आता है। चाहे वो सत्ता किसी भी स्तर की हो।
बिहार के गया में जो हुआ वो सत्ता की सनक का एक क्रूर अध्याय है, जिसका प्रमाण मानव इतिहास के हर दौर में मिलता रहा है। हाँ तरीका ज़रूर बदला है। लेकिन एक सवाल जो बेहद ही उत्सुकता से जवाब तलाशता है, वो ये है कि क्या सत्ता का पारिवारिकरण ज़्यादा खतरनाक है या हमारे जीवन का अति पारिवारिकरण? यकीन मानिए अगर एक युवक को पारिवारिक अहंकार का सरंक्षण ना मिला होता, तो शायद आदित्य की गाड़ी के पहिय्ये बेरोक अपनी रफ़्तार से घर तक पहुँचते। अक्सर इस मुल्क में सत्ता में दखल या प्रभुत्व रखने वाले इंसान का पूरा परिवार सर्वेसर्वा के ओहदे से खुद को नवाज़ देता है, और फिर जन्म लेता है ताउम्र ना टूटने वाला सत्ता का घमंड।

लेकिन इस सत्ता संक्रामक प्रवृति को समाज में स्वीकृति कैसे मिली?
क्या वैसे ही जैसे इस देश में एक फ़िल्म स्टार की अगली पीढ़ी जन्म से ही सेलिब्रिटी होती है?
या जैसे किसी राजनितिक पार्टी में बपौती मौन सच्चाई के रूप में स्वीकार कर ली जाती है?
या वैसे ही जैसे अमूमन सभी शहरों में बाबुओं के बच्चों का लाल/पीली बत्ती वाली गाड़ी में घूमना एक आम दिनचर्या है?
या वैसे हीं जैसे पुलिसिया कार्रवाई लंबी गाड़ियों से उतरते रसूख के सामने कई बार दम तोड़ देती है?
क्या हमने सत्ता, रसूख और इससे पैदा हुए घमंड के पारिवारिकरण को सामाजिक स्वीकृति दे दी है?

दरअसल हमारे देश में इंडिविजुअल लिविंग यानी की व्यक्तिगत जीवन की परंपरा शुरू ही नहीं हो पाई। हम समाज में परिवार के महत्व, परिवार पर निर्भरता और इंडिविजुअलिटी यानी स्वाबलंबन में फर्क शायद हीं कभी सिखा पाते हैं। इस घटना के बाद भी पक्ष-विपक्ष हुआ, कानून अपना काम करेगा और दोषी को सज़ा भी मिलेगी, लेकिन क्या अब ज़रूरत इन बातों पर चर्चा करने की नहीं है कि आखिर एक इंसान का कमाया रसूख उसके पूरे परिवार की जागीर कैसे बन जाता है? मसलन क्यों किसी के माँ या बाप की कमाई शौहरत/रसूख/सत्ता उसके बच्चों की वसीयत बन जाती है?

वक़्त है की हम अपनी अगली नस्ल को ये समझा सकें कि जब पहचान अपनी होती है तो आँखें ऊँची होती हैं, बेशक साधन परिवार से मिला हो। वरना खैरात में मिली चीज़ों की या तो क़द्र नहीं होती या फिर जन्म लेता है अँधा अहंकार। यकीन ना हो तो बस ‘MLA’s Son‘ किसी भी सर्च इंजन में डालिये और नतीजे आपको हमारी सामाजिक विफलता का प्रमाण देंगे; और हाँ एक बार सर्च ज़रूर करियेगा, आप लंबी लिस्ट देख कर समझ जाएंगे की मैंने यहाँ अलग-अलग घटनाओं का ज़िक्र क्यों नहीं किया।

Young_Baiga_tribal_women,_India

अरुणिमा सिंह:

Translated from english to hindi by Sidharth Bhatt.

Young_Baiga_women,_India_tribalअभी हाल ही में “फर्स्टपोस्ट” पर एक लेख पढ़ा, जो विकास की अवधारणा और उसे लेकर प्रचलित सोच की संकीर्णता का बहुत अच्छा उदाहरण है। इस लेख में दिए गए तर्क के अनुसार, किसी आदिवासी के मूलनिवासी होने के बाद भी उसका वहां की ज़मीन पर कोई अधिकार नहीं होता, इस प्रकार के तर्क वैश्विक स्तर पर विकास की परिभाषा को दर्शाते हैं, जहाँ विभिन्न संस्थान, सरकारें और पूंजीपति साथ मिलकर उन संसाधनों का चिंताजनक गति से दोहन कर रहे हैं, जिन पर असल हक़ उस क्षेत्र विशेष के मूलनिवासियों यानि की आदिवासियों का है। प्राकृतिक संसाधनों के इस अंधाधुंध दोहन के दौर में आदिवासियों को क्या मिलता है? पुनर्वास और मुआवजे के वायदे जो कभी भी सही तरीके से पूरे नहीं किये जाते। इन आधे अधूरे वायदों की कीमत उन्हें अपने घर, अपने आहार, अपनी संस्कृति और जीवनशैली को खोकर चुकानी पड़ती है, और मैं ऐसे संसार की कल्पना नहीं कर सकती जहाँ यह नीतिगत हो, या जहाँ इस तरह की सोच को प्रोत्साहित किया जाता हो।

मैं एक बात साफ़ और सीधे शब्दों में कहना चाहती हूँ, उन्हें यानि कि आदिवासियों को एक विशेष कानून की जरुरत है, जिससे ऊपर उल्लेख किया गया लेख बिलकुल भी सहमति नहीं दिखलाता। हम जब भी आदिवासियों के अधिकारों की बात करें तो हमें उनकी जीवनशैली और संसाधनों को ज़हन में रखना होगा। वो भले ही किसी अभ्यारण्य के संरक्षित प्राणी ना हों, लेकिन वो हमारे समकक्ष हैं, और उनकी ये बराबरी हम में से किसी को भी उन्हें उनके मूलस्थान से विस्थापित करने का अधिकार नहीं देती। लेकिन दुर्भाग्यवश ये भारत में हो रहा है

सरकार ना केवल आदिवासियों के संसाधनों पर कब्ज़ा कर रही है, बल्कि वन अधिकार कानून के द्वारा आदिवासियों को दिए गए अधिकारों का भी हनन कर रही है। यदि तथ्यों की बात करें तो यह लेख वन अधिकार कानून को दरकिनार किये जाने के प्रयासों को भली-भाँति दर्शाता है।

इन सभी प्रयासों के पीछे कहीं ना कहीं सियासी हुक्मरानों का नीतिसंगत होने का भाव तो है ही और साथ में ये भी दिखाने की कोशिश है कि ये सब जनकल्याण और विकास के लिए किया जा रहा है। जानकारी के आभाव में इस मुद्दे को लेकर अधिकतर लोगों का रुख काफी उदासीन है। मूलनिवासियों की जरूरतें अधिकांश लोगों की सोच में प्राथमिकता पर तो छोडिए, वो कहीं दूर-दूर तक भी नहीं हैं। इस तबके के लिए मूलनिवासी एक “पिछड़े” समुदाय से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं जिन्हे “विकास” कि सख्त जरुरत है, और इस तथाकथित विकास के लिए उन्हें उनकी जीवनशैली छोड़ने पर विवश करने और उनकी जड़ो से काटने से अच्छा और क्या हो सकता है! हममें से ज्यादातर लोग श्रेष्ठता की उसी विचारधारा में जकड़े हुए हैं, जो ब्रिटिश राज में आदिवासी समुदायों को नियंत्रण में रखने और उन्हें “सभ्य” बनाने के विचार को जन्म देने के लिए जिम्मेदार थी।

यहाँ मैं अपना तर्क कुछ अलग तरीके से रखना चाहूंगी, वाराणसी जैसे कुछ शहर सबसे पुराने शहरों में से हैं, जहाँ शहर, घर और कई अन्य इमारतें समय के साथ कई बार बनाई गयी और उनमे परिवर्तन भी किये गए। आज के समय में ये शहर एक संकरी गलियों कि भूलभुलैया बन चुका है, जहां सड़कों कि हालत शायद इससे ज्यादा खस्ताहाल कभी नहीं रही होगी। इस तरह के शहरों को पहले से मौजूद पुरानी इमारतों, संकरी गलियों और जर्जर हो चुके घरों को गिराए बिना और विकसित करना लगभग असम्भव है। क्या कभी कोई सरकार इस तरह से एक शहर को गिराकर उसे नए सिरे से बसाने की बात सोच भी सकती है? क्या नेताओं को इस तरह के विकास के पक्ष में नारे लगते हुए और वहां के लोगों के पुनर्वास की बातें करते हुए कभी देखा गया है? क्या वाराणसी के लोग कभी भी अपने घरों को विकास के नाम पर आसानी से छोड़ने को तैयार होंगे?

नहीं, वो कभी भी इसके लिए तैयार नहीं होंगे। और इसका कारण केवल अपने घरों और ज़मीनो को खोना नहीं, बल्कि सरकार के मुआवजा देने की नीति की विश्वशनीयता पर लगा सवालिया निशान भी है।
ये समस्या और ज्यादा गम्भीर हो जाती है, क्यूँकि अनेक आदिवासी समुदाय अब भी प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्वक रह रहे हैं, और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उस पर निर्भर हैं। वो शहरी जीवनशैली के हिसाब से नहीं ढले हैं। उनसे ये सब छीन लेना एक तरह से उनकी पहचान छीन लेना है।

अनेक आदिवासी क्षेत्रों में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, और सरकार बलप्रयोग (पुलिस, प्रशाषन और कानून) के द्वारा इन प्रदर्शनों और अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों का दमन कर रही है। इस तरह के प्रदर्शनों पर रिपोर्टिंग करना सरकारी रवैये की वजह से काफी मुश्किल हो चला है, सरकारी तंत्र इन मुद्दों को मुख्यधारा के लोगों तक पहुँचने और खबरों में आने से रोकने के लिए बड़ी सजगता से काम कर रहा है।

पिछले कई दशकों से अनेक राजनितिक दलों के लचर प्रशाषन और आदिवासी समुदायों के बीच चल रहे इस सतत संघर्ष में आदिवासियों को या तो भुला दिया गया है या फिर उद्योगपतियों के द्वारा उनके संसाधनों का मात्र दोहन किया जा रहा है, जो भारत के कई राज्यों में माओवाद के उभरने के मुख्य कारणों में से एक है, नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र केवल बढ़ ही रहा है और सरकार के इस समस्या से निपटने के तरीकों की वजह से स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे मूलनिवासी समुदायों पर नजर रखने वाली संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के डायरेक्टर स्टेफेन कोरी के अनुसार “औद्योगिक समुदाय, आदिवासी समुदायों के साथ नरसंहार की सीमाओं तक हिंसा का प्रयोग करते हैं, नस्लवाद और दासप्रथा का प्रयोग करते हैं ताकि विकास और सभ्यता के नाम पर वो उनकी प्राकृतिक सम्पदा, उनकी ज़मीनो को हथिया सके, और अपने संस्थानों के लिए श्रमिकों का इंतजाम कर सकें।”

“खोज” के समय की शुरुआत से ही आदिवासी क्षेत्र और आदिवासी, आक्रामक उपनिवेशीकरण का शिकार होते आएं हैं, उन्हें आदिम और पिछड़ा हुआ दिखाकर आक्रान्ता उनको क्रूर और नियोजित तरीके से विलुप्त करने को सही साबित करते आये हैं, और ये आज भी जारी है।

भारत में भी आदिवासियों के परिपेक्ष में स्टेफेन कोरी की बात सत्य है। विकास और प्रगति के नाम पर उनकी ज़मीने, जंगल, और जीवनशैली उनसे छीनी जा रही है, पर सवाल ये है कि कौन निर्धारित करेगा कि बड़े स्तर पर जनकल्याण के लिए क्या जरुरी है?

अगर हम उनकी ज़मीने, उनका जीवन जीने का तरीका छीन कर उन्हें इसके बदले में केवल खनन के बाद बची बंजर ज़मीनो या अधिकांश परियोजनाओं के बाद के दोषपूर्ण पुनर्वास के अलावा कुछ नहीं दे रहे हैं, तो हम अपने पूर्ववर्ती औपनिवेशिक स्वामियों से किस तरह से अलग हैं? इन लोगों को उनके घरों से खदेडने के लिए, उनकी प्राकृतिक सम्पदा को हथियाने के लिए हम कानूनों में फेरबदल करने को तैयार हैं, तरह-तरह की सफाइयां देने को तैयार हैं और जरुरत हो तो बल और दमनकारी नीतियों का इस्तेमाल करने को भी तैयार हैं।

हमें विकास और प्रगति जैसे शब्दों का एक बार फिर से आंकलन करने की जरुरत है, और ये भी सोचने की जरुरत है कि वैश्विक स्तर पर विभिन्न समुदाय के लोग इसे किस तरह से देखते हैं।

Read the English article here.

Jawaharlal Nehru University (JNU) student Kanhaiya Kumar addresses students inside the university campus after being released on bail from a Delhi prison in New Delhi, India, March 3, 2016. REUTERS/Anindito Mukherjee - RTS966K

संजीव चंदन:

Jawaharlal Nehru University (JNU) student Kanhaiya Kumar addresses students inside the university campus after being released on bail from a Delhi prison in New Delhi, India, March 3, 2016. REUTERS/Anindito Mukherjee - RTS966K
Kanhaiya Kumar. Credit: Reuters/Anindito Mukherjee.

कन्हैया ने लालू प्रसाद का पैर छुआ​।​ यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग ढंग से नागवार गुज़रा।​ पाँव छूने से कुछ लोगों के संस्कारी मन को चोट लगी – मन, जो लालू जी से नफरत करता है​।​ इस लिहाज़ से मुझे अच्छा लगा कि कन्हैया ने लालू जी का पैर छुआ।​ लालू जी इस सम्मान के योग्य हैं।​

अपनी बात कहने के पहले मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने कुछ आम्बेडकरवादी मित्रों के द्वारा कन्हैया को शुरू में ही भूमिहार कहे जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज की थी, और कहा था कि कन्हैया का सचेत स्वागत होना चाहिए।​ कई लोगों से फोन पर इस सन्दर्भ में बात भी की, खासकर उनसे जो कन्हैया के खिलाफ लिख रहे थे​।

कन्हैया हमारा है, हमारे प्रतिरोध में शामिल है, इसलिए संवाद तो होने ही चाहिए, निजी और सार्वजनिक भी।​ कुछ दिन पहले जे. एन. यू. में संभाजी भगत के गीत रिलीज के बाद मैंने कन्हैया से कहा भी था कि, “आपसे बात करनी है.” विनम्र कन्हैया ने मेरा इशारा समझाते हुए कहा भी कि जरूर करते हैं, लेकिन तब समय नहीं था।​ मुझे भी लौटना था – बात फिर कभी पर चली गई।​ हालांकि कन्हैया के संगठन के दूसरे नेताओं से मेरी इस बीच बात हुई भी।

इस बीच पटना की सभा में एक विरोधी की पिटाई कर दी गई।​ कन्हैया ने उसका विरोध किया, लोगों को ऐसा करने से मना किया।​ हालांकि कई लोग पटियाला हाउस और पटना की पिटाई में फर्क करना चाहते हैं, मुझे फर्क इस लिए नहीं दिखता कि पुलिस के संरक्षण से आश्वस्त लोगों ने पटियाला हाउस कोर्ट में हमला किया और पटना में भी इसी संरक्षण के प्रति आश्वस्त लोगों ने काला झंडा दिखाने वाले किसी शख्स को पीटा।​ उसे बाहर भी किया जा सकता था।​ लोकतंत्र में काले झंडे दिखाना खुद कन्हैया के मित्रों का भी हथियार रहा है।​ विरोध भले ही गलत हो, लेकिन विरोध का हक़ तो पिटने वाले को था ही।​ इधर ‘संघियों’ को इस पिटाई के बाद लोकतंत्र की या अभिव्यक्ति की आजादी की याद आ रही है, यह भी कम मजेदार नहीं है।

चिंता के विषय सिर्फ इस तरह की आकस्मिकतायें नहीं है।​ सवाल दूसरे भी हैं।​ कन्हैया आकस्मिक तौर पर जिस नायकत्व को हासिल कर चुका है, जिसे मोदी सरकार के अति आत्मविश्वास और मीडिया के नायक-खलनायक गढ़ने की ख्वाहिशों ने उसे उपहार में दिया है, उसका मतलब क्या है? क्या इस नायकत्व का मतलब यह है कि वह मोदी विरोधियों के मंचों पर विरोध के भाषण करते रहे़? डिबेटर को सुनने का एक आनन्द होता है, जरूरत भी है, लोग मोदी की अतिवाचालता से ऊब गए हैं, उन्हें कन्हैया का भाषण अच्छा भी लग सकता है, लेकिन क्या समय ने उसे इसी भूमिका के लिए चुना है, पिछले दिनों?

क्या यह ठीक नहीं होता कि कन्हैया पिछले कई महीनों में देश भर के विद्यार्थियों के बीच पनपे असंतोष को संबोधित करता, उनके मुद्दों पर उन्हें संगठित करता।​ अबतक के भाषणों से एक सवाल यह भी बनता है कि उसके संगठन और पार्टी के रणनीतिकार आखिर तय क्या कर रहे हैं – एक ओर जय भीम-लाल सलाम का नारा और दूसरी ओर हर मंच पर कन्हैया।​ क्या उसके संगठन को एक दलित विद्यार्थी को कन्हैया के साथ ही संगठन और मुद्दों को खड़े करने की जिम्मेवारी नहीं देनी चाहिए थी? इन दिनों उसके संगठन से लेकर बाहर तक विद्यार्थियों के आन्दोलन से ऐसे कई लोग सामने आये भी हैं – लेकिन हम सब एक नायक की पूजा के अभ्यस्त हैं।​ इसीलिए कन्हैया की पालकी को ढोने वाले विचित्र उन्माद से भरे हैं – ध्यान रहे दलित – बहुजन युवा अब ऐसी किसी पालकी को ढोने के पहले सवाल करेंगे, हाँ जिसकी पालकी है, उसकी जाति भी जानना चाहेंगे…।​

Lalu

जीतेन्द्र कुमार:

आदरणीय लालूजी,

Laluआदरणीय इसलिए कि आप हमारे बुजुर्ग हैं लेकिन चरण स्पर्श नहीं। चरण स्पर्श तो आपकी समाजवादी परम्परा में भी नहीं रहा है, ऊपर से अपने बुजुर्गों को भी मैं ‘जय भीम’ से ही संबोधित करता रहा हूँ। इसलिए क्षमा चाहूँगा कि अधिकतम आदर व सम्मान दिल में किसी के लिए होने पर भी चरण स्पर्श नहीं कर सकता। अगर यह लोकनीति है तो ऐसी कई ब्राह्मणवादी लोकनीतियों को ख़ारिज करने की अनुशंषा आप खुद उन दिनों कर चुके हैं जब आपने ‘भूरा बाल’ साफ़ करने को कहा था।

पत्र के ज़रिये ही सही पर यह मेरी आपसे निजी नहीं बल्कि एक राजनितिक मुलाक़ात है। और जब देश में फासीवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो रखी हो जिसमे मेरे विश्वविद्यालय समेत सभी लोकतांत्रिक संस्थानों पर गम्भीर हमले हो रहे हों, तब इन फ़ासीवादियों को शिकस्त देने की लड़ाई में आपके सहयोग पर आपको आदर देना अपेक्षित है। 90 के दशक में मैंने खुद अपने स्कूल में साजन फ़िल्म के गाने की तर्ज़ पर “देखा है पहली बार.. बाभन के आगे गोबार” जैसे गाने गाये हैं। आडवाणी के रथ को रोकने का मतलब तब समझ आया जब थोड़े बड़े हुए। लेकिन तब तक थोड़ा बड़ा होना ही समस्या बन चूका था। एक तरफ केंद्र में फासीवादी, वैमंस्यकारी बीजेपी की सरकार देख चुके थे तो दूसरी तरफ गुंडों और बाहुबलियों के दम पर चल रही आपकी सरकार ने बिहार में सामंतो से गठजोड़ कर लिया था। लक्ष्मणपुर बाथे से लेकर बथानी टोला तक के पीड़ित दलितों को आपकी सरकार न्याय न दिला सकी। आपके बाद सत्ता में आये नितीश कुमार ने आते ही उस अमीरदास आयोग को भंग कर दिया जिसके भरोसे बिहार के सामंतवादी ताकतों को सजा दिलवाई जा सकती थी। अभी के आपके सहयोगी यही नितीश कुमार थे जिनके कार्यकाल में आरएसएस निष्कटंक अपने पाँव फैलाता रहा और समाज में धर्म और जाति की जहरीली पौध विकसित करता रहा।

नरेंद्र मोदी के रूप में देश के लोकतंत्र पर हुआ यह हमला नया नहीं है। सफल हमले की शुरुआत तो तभी हो गयी थी जब पहली बार भाजपा ने देश में सरकार बना ली थी। उसी दौर में हुए 2002 के गुजरात दंगो को नहीं भुलाया जा सकता।
लेकिन जनता ने उस सांप्रदायिक सरकार को सत्ता से बाहर किया और विकल्प में कांग्रेस और वामपंथ की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को भारत का भविष्य सौंपा। वही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन जो आज फिर से फासीवाद के खिलाफ़ एकजुट होते नजर आ रहे हैं। एक बार तो इस एकजुटता पर सवाल खड़े करने में डर सा लग रहा है। लेकिन क्या यह एकजुटता प्रोडक्टिव है? अल्पमत की एक फासीवादी सरकार की नीतियों की वजह से ही वही फासीवादी सरकार आज पूरे बहुमत में है। देश भर में दलितों आदिवासियों का शोषण उस दौर में भी हुआ। उसी दौर में विनायक सेन समेत पूरे कुडनकुलम के ग्रामीणों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया। नंदीग्राम में भी किसानों पर गोलियां इन्ही पार्टियों की सरकार ने चलवाई जो आज फासीवाद के खिलाफ़ लामबंद हो रहे हैं। बिहार में सवर्णों का आतंक इसी फासीवाद के खिलाफ एकजुट हो रहे पुरोधाओं के शासनकाल में फैला।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हमेशा ही लोकतांत्रिक मूल्यों पर हो रहे हमले के खिलाफ़ रहे हैं। आज जब इसी विश्वविद्यालय पर प्रत्यक्ष रूप से हमले हो रहे हैं तो इसके खिलाफ एकजुटता की बात हो रही है। लेकिन एकजुटता किनके साथ! वह जो धर्मनिरपेक्ष तो हैं लेकिन जातिवादी हैं? उनके साथ जो सामंती तत्वों के खिलाफ़ खड़े होने का दावा करते हैं लेकिन असल में बाहुबलियों को संरक्षण देते हैं? उनके साथ जो बात तो समाजवाद की करते हैं लेकिन असल में पूंजीपतियों की नीतियों को लागू करते हैं? उनके साथ जो रोहित वेमुला के संघर्षों को भुलाना तो चाहते हैं लेकिन जेएनयू में एडमिशन के वक़्त लिए गए साक्षात्कार के नंबर कम करने के खिलाफ हैं? सालों से जेएनयू में ऐसे साक्षात्कारों में दलितों और पिछड़ों को 30 में से 0 या 1 नंबर दिए जा रहे पर तथाकथित प्रगतिशील फासीवादी विरोधी खेमा चुप है।

माफ़ कीजियेगा ऐसी एकजुटता से मुझे आपत्ति है। ऐसी एकजुटता थोड़े समय के लिए फासीवाद को रोक भले सकती है लेकिन उसे और मजबूत करने के लिए। जैसा कि 2014 में हुआ। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दस साल ही नरेंद्र मोदी के राष्ट्रिय पटल पर पादुर्भाव का कारक है।

‌ ऐसी एकता जिससे भविष्य का खतरा बढ़ जाय, मुझे मान्य नहीं है। इस मोदी के बाद कांग्रेस और उसके बाद उससे भी बड़ा मोदी आगे आये, ऐसी एकता बेकार है। यह सत्ता का बंदरबांट करने के लिए बनाई जा रही एकता है। क्या हम फिर से 2004 की स्थिति में किसी तरह वापस लौटना चाहेंगे जिसमे बीजेपी तो सत्ता से बाहर हो लेकिन गरीबों व मजलूमों पर धर्म के बजाय आर्थिक नीतियों का दमन चलता रहे? या हम एक ऐसी एकता का खाका तैयार करें जो दमन व शोषण के भी खिलाफ हो, फासीवाद के साथ साथ। हम फासीवाद के खिलाफ़ जेएनयू में आवाज उठाते रहें और महिलाओं को यहाँ के एडमिसन में मिलने वाली छूट बंद हो जाय। देश भर में घूम रोहित वेमुला के लिए न्याय की मांग करें लेकिन अपने ही विश्वविद्यालय में ओबीसी रिजर्वेशन कम कर दिया जाय।

इस तरह की फ़र्ज़ी लड़ाई और फ़र्ज़ी एकता का मैं विरोध करता हूँ। फासीवाद अगर देश से भागेगा तो केवल नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने से नहीं, बल्कि जब सभी शोषितों को उनका अधिकार मिलेगा। इसमें छोटी से छोटी लड़ाइयां शामिल हैं।

हमारे विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष अभी आपसे मिलने और पटना में रोहित वेमुला के साथ हुए भेदभावपूर्ण अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने गए हैं। लेकिन वहीँ उनके जिला बेगुसराय में ही दो भूमिहीन दलित मजदूरों की हत्या वहां के सामंतो ने कर दी है जिसके कातिलों को आपकी सरकार बचा रही है। अगर उनके कातिलों को बचाकर भी आप जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष से गर्मजोशी से मिल रहे हैं तो आपको याद दिला दूँ कि यहीं के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर भी थे। वो छात्रसंघ अध्यक्ष जिसने जेएनयू में ओबीसी छात्रों की असल में लड़ाई लड़ी थी और आपसे मुस्कुराकर मिलने नहीं बल्कि आपके बाहुबली एमएलए के विरोध में सीवान की सडकों पर उतरा था और सीने पर गोली खाई थी। जिसकी बहादुर माँ जीवनपर्यंत आपके विरोध में खड़ी रही। वही चंद्रशेखर जिसके लिए कभी जेएनयू के छात्रों ने जब बिहार निवास का घेराव किया तब आपके गुंडे साले साधू यादव ने गोलियां चलाई थी। ये जेएनयू आज भी चंदू का जेएनयू है। बेगुसराय के दलितों को न्याय दिलाये बिना रोहित वेमुला के समर्थन में खड़े होना लफ्फाजी है। धार्मिक उन्माद के खिलाफ लेकिन जाति उत्पीड़न के समर्थन में खड़े लोगों की एकता फासीवाद के खिलाफ एकता नहीं बल्कि लफ्फाजी है। और जेएनयू के ढेरों छात्र इन लफ्फाजिओं में नहीं फंसने वाले। चाहे आप हमारे छात्र अध्यक्ष को कितना ही वीवीआईपी ट्रीटमेंट क्यों न दें।

आपके ही राज्य का एक छात्र

जीतेन्द्र कुमार
116, झेलम
जेएनयू, नई दिल्ली 67

ambedkar video

संजीव चंदन:

आज 14 अप्रैल, 2016 को देश बाबा साहेब डा. आंबेडकर की 125 वीं जयन्ती मना रहा है। डा. बाबा साहेब आंबेडकर इस देश को सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक बनाना चाहते थे। संविधान निर्माता डा. आंबेडकर दलितों -वंचितों -स्त्रियों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए राज्य को नैतिक रूप से जिम्मेवार बनाने के लिए प्रयासरत रहे। यही कारण है कि हिन्दू स्त्रियों को अधिकार दिलवाने के लिए अपने हिन्दू कोड बिल के प्रति वे गंभीर थे और उन्होंने इस बिल को पारित करवाने में तत्कालीन नेहरू सरकार की विफलता के बाद क़ानून मंत्री के रूप में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। डा. आंबेडकर 1936 में ही बच्चा पैदा करने के निर्णय पर स्त्रियों के अधिकार के लिए परिवार नियोजन का प्रस्ताव लेकर आये थे और श्रमिक स्त्रियों के लिए मातृत्व -अवकाश की व्यवस्था भी पहली बार उन्होंने ही दिलवाई थी।

आंबेडकर आधुनिक भारत के आदि स्त्रीवादियों में से एक हैं। स्त्रीकाल ने अपने यू ट्यूब चैनल के लिए चर्चित स्त्री बुद्धिजीवियों और स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं से स्त्रीवाद के लिए डा.आंबेडकर के मायने पर बातचीत की। परिचर्चा में शामिल स्त्रीवादियों ने डा. आंबेडकर के द्वारा स्त्रियों के लिए किये गये कार्यों की न सिर्फ चर्चा की, वरन यह भी चिह्नित किया कि किस तरह भारत में स्त्री -आन्दोलन ने उनके योगदानों को नजरअंदाज किया है। वे स्पष्ट करती हैं कि डा. आंबेडकर सच्चे अर्थों में स्त्रीवादी थे।

पूरी बातचीत डा. आंबेडकर के द्वारा स्त्रियों के हित में कानूनी-संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था को चिह्नित करती है और मनु स्मृति दहन के द्वारा स्त्रियों को धार्मिक अनुकूलता से मुक्ति के उनके प्रयास को भी रेखांकित करती है। शिंगनापुर शनि मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को मनु स्मृति दहन के बरक्स देखने की कोशिश की गई है कि क्या यह सच्चे अर्थों में स्त्रीमुक्ति का प्रयास है।

पूरी परिचर्चा कई ऐतिहासिक सवाल खड़े करती है , मसलन: स्त्रीवादी आन्दोलनों ने डा. आंबेडकर के साथ-साथ महात्मा फुले -सावित्रीबाई फुले की उपेक्षा क्यों की ? क्या इस उपेक्षा के पीछे कोई सैद्धान्तिकी थे या स्त्रीवादी आन्दोलनों के नेतृत्व की खुद की जाति-अवस्थिति (पोजिशन)।

आदि परिचर्चा में भाग लिया रजनी तिलक, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर, रजत रानी मीनू और भाषा सिंह ने .बातचीत के सूत्रधार मुन्नी भारती और संजीव चंदन। पूरी बातचीत सुनने -देखने के लिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें।

rohith vemula kanhaiya kumar

सुरेश जोगेश:

rohith vemula kanhaiya kumarजहाँ आजकल अगड़ी जातियों की लड़ाई आरक्षण जैसे संवेधानिक अधिकारों से है वहीँ पिछड़ी जातियां आजादी के 68 साल बाद अब भी गरिमा के साथ जिन्दगी जीने के अधिकार को लेकर लड़ रही हैं, मुझे इसलिए लिखना पड़ता है।

मुझे इसलिए भी लिखना पड़ता है कि सिस्टम से जो फायदा कन्हैया व ‘निर्भया’ को मिलता है वो रोहित वेमुला व सोनी सोरी को नहीं मिल पाता।

24 घंटे से ज्यादा समय तक हुक्का-पानी बंद करने का वाईस चांसलर अप्पा राव द्वारा खाफ जैसा फैसला लिया जाता और दिल्ली के मीडिया दफ्तरों में बैठे लोग इससे अनभिज्ञ रहते हैं, मुझे इसलिए भी लिखना पड़ेगा। FTII से लेकर JNU तक, छात्र आन्दोलन/प्रदर्शन हर जगह होते आये हैं लेकिन ऐसा कहीं नहीं होता कि आपका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाय और आप 12 दिन तक खुले में उठें-बैठें, खाएं-पियें, नहायें-धोएं। और अब हुक्का-पानी बंद कर देना। क्या ऐसे फरमानों के पीछे जातिवादी मानसिकता काम नहीं करती?

कन्हैया की लड़ाई इन्हीं जातिवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद से हैं तो मैं भी उसका समर्थक हूँ। मैं उसकी इन सब बातों से इत्तेफाक रखता हूँ। लेकिन रोहित वेमुला की लड़ाई भी अगर इसी व्यवस्था से होती है तो उसका नाम भी मीडिया पहली बार अपनी जुबान पर तब लाता है जब न्याय की उम्मीद में 12 दिन खुले में रहकर वो अपनी जान दे देता है। बिना किसी जांच के उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। मीडिया तब भी चुप था, मीडिया आज भी चुप ही रहेगा।
कैंपस में खाना-पानी से लेकर बिजली, इन्टरनेट यहाँ तक तक कि एटीएम कार्ड ठप्प कर दिए जाते हैं। रही सही कसर फिर पुलिस पूरी करती है विरोध कर रहे छात्र-छात्रों को बड़ी बेरहमी से पीटकर(यौन उत्पीडन का भी आरोप है)। जो खाना-पानी बाहर से मंगवाया जाता है उसे भी गेट पर रोक दिया जाता है। इसी बीच कैंपस में खाना बनाने की कोशिश कर रहे छात्र-छात्राओं के साथ पुलिस द्वारा मारपीट की जाती है, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस की इस क्रूर कार्यवाही का शिकार हुए छात्रों में से एक “उदय भानु” अब भी अस्पताल में हैं, गंभीर हालात में ICU मे हैं। उनके अनुसार उन्हें पुलिस द्वारा वैन में बंद करके मारा गया। मारपीट को उनके घाव चीख-चीखकर बयां करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम की शिकार हुए छात्रों द्वारा टुकड़ों में वीडियोग्राफी कर इन्टनेट पर डाली जाती है, सोशल मीडिया के माध्यम से भी बात आमजन तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है व मदद की गुहार की जाती ह। यह शर्म की बात ही है कि इस सब के दौरान राष्ट्रिय मीडिया के कानों तले जूं भी नहीं रेंगती।

एप्पल और अमेरिकी जांच एजेंसी FBI की लड़ाई चल रही है एक आतंकवादी के iPhone को अनलॉक(खोलने) को लेकर। एप्पल इसे खोलने से मना कर रही है। उसका तर्क है कि हम ग्राहकों के साथ साथ छलावा नहीं कर सकते। वो हमारे लिए सर्वोपरी हैं। दूसरी तरफ यह देखिये कि यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद की SBI ब्रांच से जारी हुए उन छात्रों के ATM कार्ड बंद कर दिए जाते हैं वो भी उस स्थिति में जब उनका खाना-पानी, बिजली-इन्टरनेट सब बंद है। आप इन दोनों कंपनियों को चलाने वालों की भी मानसिकता देखिये।

यहाँ से यह साफ़ नजर आता है कि छात्रों के प्रदर्शन/आंदलन को दबाने के लिए सबने एकजुट होकर काम किया। मीडिया ने भी इसमें बखूबी साथ दिया, लोकतंत्र का चौथा हिसा होते हुए भी।

क्रिकेट मैच की तरह पल-पल की खबर, यहाँ तक कि लाइव विडियो सोशल मीडिया पर डाली जाती है। देश का समस्त पीड़ित-प्रताड़ित इसे पढता व देखता है। अगर कोई इस दौरान पिक्चर से बाहर होता है तो वो है मीडिया।
अगर मीडिया की मजबूरी को समझने की कोशिश की जाय तो वो क्या हो सकती है?
क्या उसे डर था उसके साथ पुनः मारपीट होने का? मुझे ऐसा नहीं लगता।

अगर उसे डर था भी तो उसे जातिवाद के मुद्दे पर पीछे नहीं हटना चाहिए था जैसे वो राष्ट्रवाद के मुद्दे पर नहीं हटा। देश के तमाम बड़े चैनलों के पत्रकार लाइव कवरेज/इंटरव्यू के लिए स्टूडियो छोड़ प्रदर्शन में के साथ-साथ कोर्ट तक जाते हैं।

मैं इस बार भी वही उम्मीद कर रहा था। मुझे जैसे ही इसके बारे में आधी-अधूरी जानकारी प्राप्त हुई। मैंने पूरी खबर व कवरेज के लिए मीडिया को खंगाला। इस उम्मीद में कि मीडिया के लिए इस वक़्त सबसे बड़ा मुद्दा यही होगा शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस का आक्रमण व लोकतंत्र की हत्या। हर अख़बार से लेकर लाइव डिबेट व प्राइम टाइम शो तक खंगाले और फिर न मिलने पर सोशल मीडिया पर। यह अनुभव मुझे हैरान-परेशान कर देने वाला था। मुझे इसलिए भी लिखने पड़ा।

खैर, घटना को अब कुछ दिन होने के बाद मीडिया के कुछ चैनलों ने अपनी शाख बचाने के लिए जहमत उठायी है एक-एक, दो-दो आर्टिकल लिखने की। इस अमानवीय घटनाक्रम पर मानवाधिकार संघठनों ने सवाल उठाये हैं। एक मानवाधिकार संघठन ने वाईस चांसलर को नोटिस भी थमाया है। वहीँ मानवाधिकार संघठन “एमनेस्टी इंटरनेशनल” ने भी पुलिस की शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर क्रूर कारवाही की निंदा है व गिरफ्तार किये 2 प्रोफेसर और 25 से ज्यादा छात्रों को शीघ्र रिहा करने की मांग की है साथ ही पुलिस के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के लिए निष्पक्ष जांच की मांग की है। बुधवार(22 मार्च) को गिरफ्तार किये गए इन लोगों 24 घंटे में न्यायलय के लिए समक्ष पेश तक नहीं किया गया जो कि कानून द्वारा अनिवार्य है। इन्हें न्यायलय के समक्ष पेश होने के लिए सोमवार तक का इंतजार करना होगा।

इस अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति के लिए “राष्ट्रिय मानवाधिकार संघठन”(NHRC) ने तेलंगाना सरकार व “मानव विकास संसाधन मंत्रालय”(MHRD) को नोटिस भेजा है तो “एशियन ह्यूमन राईट कमीशन” ने भी इसकी कड़ी निंदा की है इसे तानाशाही बताया है।

जो कुछ भी हो, यह सब संभव हुआ एक साझी सोच से जिसमे जातिवाद साफ़-साफ़ झलकता है। यह मैं ही नहीं “एमनेस्टी इंटरनेशनल” की यह रिपोर्ट भी कहती है। यूएन एक्सपर्ट (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के गठन को पेश करने के दौरान) की नयी रिपोर्ट के अनुसार जाति व्यवस्था काफी लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का काम कर रही है।

child in school

To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighborhoods.

पूजा:

child in schoolस्कूल में रोज़ जैसा ही सामान्य दिन था, क्लासों से गूँजता हुआ और कानों में दाखिल होता बच्चों का वही शोर जो समझ से बाहर था। सब कुछ न कुछ अपनी बाते लिए बैठे थे। वहीँ कुछ क्लासों में सन्नाटा भी था।

इस समय हमारी क्लास बच्चों से भरी हुई थी। सामने की तरफ शांति की मूरत हमारी शोभा मैडम जी बैठी थी। शोभा मैड़म एक चालीस-पैंतालिस साल की बेहद शांत और अनुशासन पसंद टीचर हैं। चेहरा गोल, सांवला और झुर्रियों से ढका है और उनकी मोटी-मोटी आँखें हम पर नज़र रखने के कारण दिनोंदिन और मोटी होती जा रही हैं।

वे हमेशा की तरह आज भी क्लास में बैठी हुई कुछ काम कर रही थी। बच्चों की फुसफुसाहट से ज़रा-सा शोर क्या हो गया, उनकी शांति भंग हो जाती। वे चिल्लाती हुई कहने लगी, “मैं इतनी छोटी भी नहीं हूँ कि तुम लोगों को दिखाई ही न दूँ।” उनकी इतनी-सी बात से ही सब सहम गए। उन्होने अपनी सबसे मनपसंद लड़की, छाया जो कि क्लास में उनकी एजेंट की तरह काम करती है, को अपने पास बुलाया और सबकी कॉपी जमा करने को कहा। जिनके पास अभी कॉपी थी उन्होंने कॉपी जमा कर दी।

सबके पास से आज कॉपी नहीं मिली, इसलिए अकड़ के साथ हमसे कहने लगी, “दो दिन बाद मैं तुम सब की कॉपी चेक करूंगी और जिसका काम पूरा नहीं हुआ उसके नंबर भी काट लूँगी।”

उनके बोले गए ये शब्द हम बच्चों के दिल-ओ-दिमाग पर गहरा असर छोड़ गए। उनके ये सामान्य से लगने वाले शब्द हमारी मस्ती भरी ज़िंदगी से हमें निकाल कर उस कामगार कि ज़िंदगी जीने को मजबूर कर देतें हैं जो अपना पिछला पड़ा हुआ काम पूरा करने के लिए बेलगाम ओवर-टाइम करने लगता है। हमें कुछ दिनों का ही नहीं बल्कि महीनों का बाकी पड़ा काम पूरा करना था।

उस दिन सारा इतिहास अपनी बेपरवाही कि शक्ल में वापस याद आ गया। जब हम स्कूल से छूट कर घर आते ही बस्ते को इस तरह पटक देते थे जैसे वह सदियों से हमारे कंधों पर बोझ की तरह लदा पड़ा हो। घरवालों का बार-बार कहना कि क्या स्कूल में टीचर कोई काम नही देती, तो उन्हें तसल्ली देने के लिये यह कहने मे कोई हर्ज़ नही होता कि हमने तो अपना सारा काम स्कूल में ही निपटा लिया है, आपको चेक करना हो तो कर लो। हमें यह बात पता थी कि हमारी कॉपी पर लिखी हुई तारीख के अलावा वे कुछ और नहीं समझ पायेंगे और सबूत के बतौर हमारी लिखावट तो वहां मौजूद थी ही।

लेकिन अपने इस इतिहास को याद करने के बाद हमें अपने आप पर गुस्सा और शर्म दोनों आ रहा था और साथ-साथ उन छाया जैसों से जलन भी होती, जो अपना सारा काम पूरा कर टीचर की नज़रों में वाहवाही बटोरती रहती है।

देखते ही देखते हमारे अड़तालीस घंटों की डेड लाइन में से सिर्फ तीस-बतीस घंटे ही बच रह थे। इस सोच-सोच में ही हमारे स्कूल की छुट्टी भी हो गयी। फिर वही घर जाना और बस्ता फेंक कर स्कूल के सारे गिले-शिकवे भुला कर बाहर गली में अपने दोस्तों के पास खेलने निकल आना।

खेल ही खेल में अपने स्कूल के काम की टेंशन वापस याद आई तो जल्दी से खेल बीच में ही छोड़ घर की तरफ दौड़ पड़ी और कॉपी के पन्नों को इधर से उधर पलटने लगी। जिस वक्त मैं पन्नो को भरने में उलझी थी तो घर के बाकि लोग टेलिविजन देखकर मेरा मन ललचा रहे थे।

नज़रों के सामने पड़ी कॉपी में शोभा मैडम की ही शक्ल नज़र आती। महीनों का बचा काम इतनी जल्दी बिना किसी मदद के कर पाना मुश्किल था इसलिए कुर्सी पर बैठे हुये किसी सोच में डूबी थी और अपने शातिर दिमाग में मैडम की डांट से बचने की कोई तरकीब लड़ा रही थी। फिर अचानक से उठी और अपनी कॉपी के पिछले पन्नो को बड़े गौर से देखने लगी। कई पन्नो पर शोभा मैडम के बिलकुल एक समान हस्ताक्षर थे। मैं उसी हस्ताक्षर पर बार-बार पेंसिल दोहरा रही थी।

बच्चों को साइन करने का बड़ा शौक होता है। लेकिन टीचर के साइन को गौर से देखना दिमाग में अजीब सी हलचल पैदा कर रहा था। अगले दिन उटपटांग सी किसी चाल को बुनकर बड़ी ही चहल-पहल के साथ अपनी सहेलियों के ग्रुप के पास आकर खड़ी हो गई और मौका मिलते ही नीलम को बताया। नीलम ने फिर सहेलियों को संबोधित किया, “मेरे पास शोभा मैडम कि डांट से बचने की लिए एक रामबाण उपाय है।” सभी हैरत के साथ पूछने लगे, “बता न यार क्या बात है?”

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“तो सुनो मेरी तरकीब। मैं सोच रही हूँ कि क्यों ना हम अपना आधा-अधूरा काम करके कॉपी को खुद से चेक करके मैडम को दिखा दें कि हमारी कॉपी तो आपने पहले ही चेक कर दी थी…। लेकिन यह बात सिर्फ हमारे बीच ही रहनी चाहिए और मैडम की छाया को तो बिलकुल भी पता नहीं चलनी चाहिए।”
सभी मेरे चेहरे को देख ही रहे थे कि क्लास में टीचर दाखिल हुई और इतनी ही बात पर महफिल को तोड़ते हुये सभी अपनी-अपनी जगह बैठ गए।

इस तरकीब को सुनकर सब ठहाके मार कर हंस रहे थे। बस फिर क्या था, नीलम भड़क उठी और कहने लगी, “अपना सारा काम ईमानदारी से पूरा तो करो, मैं भी देखती हूँ तुम को कितने मार्क्स मिलते हैं।” शोभा मैडम भी क्लास में आ चुकी थी। उनके गुस्से से भरे चेहरे को देखने पर पता चला कि मैडम के अल्टिमेटम के सिर्फ चौबीस घंटे ही रह गए हैं। फिर समझ आया कि टीचर के प्रकोप से सिर्फ वही तरकीब हमें बचा सकती है। अब तो हम इंतज़ार कर रहे थे कि कब मैडम जाएँ और हम उस तरकीब पर अमल करें। टीचर के जाते ही सभी मेरे डेस्क के पास ऐसे जुट गए जैसे गुड़ के पास मक्खियाँ क्योंकि यह आइडिया भले ही मेरे पास था लेकिन टीचर कि जगह हस्ताक्षर करने कि हिम्मत तो सिर्फ नीलम में थी।

हमें अब अपना काम जल्दी करना था। हमारा काम बड़े ज़ोरों-शोरों से चल पड़ा और आखिरकार शोभा मैडम के आने से पहले ही खत्म भी हो गया। सभी के कहने पर नीलम ने सबसे पहले खुद ही की कॉपी मैडम के फर्जी हस्ताक्षर कर मैडम को दिखाने ले गयी। जब मैडम को दिखाने के लिए कॉपी टेबल पर रखी तो मैडम कभी कॉपी को देखती तो कभी नीलम को, नीलम भी कभी कॉपी को देखती फिर मैडम को और अपनी निगाहें नीचे झुका लेती। अचानक मैडम ने कहा “और बताएं कितने मार्क्स देंगी आप अपने ही कॉपी को, शोभा मैडम नंबर दो?” और कुर्सी से उठ एक थप्पड़ जड़ दिया और कहने लगी, “कल अपने साथ अपने पैरेंट्स को भी ले आना, ज़रा उन्हें भी तो पता चले कि उनकी बेटी कितनी तरक्की पर चल रही है।”

इतना सुनते ही सब हंसने लगे। नीलम ने जब देखा कि उसकी बेइज्जती पर दोस्त सब ही हंस रहे हैं तो उसे गुस्सा आ गया। उसने हम सहेलियों को देखते हुए कहा, “हँस क्या रही हो? तुमने भी तो अपनी कॉपी मुझसे ही चेक करवाई है।” यह सुनकर मैडम उनके पास गई और उनके पीछे भी पड़ गई।

उस दिन हम सब को एक साथ दो मुहावरों का मतलब और उनका असल ज़िंदगी मे उपयोग भी पता चला-

पहला- जिसका काम उसी को साजे, दूजा करे तो ठेंगा बाजे…
(यह हम सब पर सूट होता था)

दूसरा- हम तो मरेंगे सनम, तुमको भी ले के डूबेंगे…
(यह नीलम पर फिट बैठता है)

पूजा का जन्म 1996 दिल्ली में हुआ। ये अभी बी॰ए सेकंड इयर मे पढ़ती है । दक्षिणपुरी में रहती हैं। अंकुर के मोहल्ला मीडिया लेब पिछले एक साल से जुड़ी है इन्हे लेब सुनने सुनाने माहोल मे मे अपनी रचनाओ को सुनने और दूसरों की रचनाओ सुन कर उस पर संवाद करना पसंद है। इनकी दोस्ती किताबों से जल्दी होती है।

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