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सुरेश जोगेश:

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एक घटना जिसने मुझे आज उतना ही झकझोर करके रख दिया जितना दिसम्बर 2012 के “निर्भया काण्ड” ने किया था। बस एक चीज जो मुझे अतिरिक्त लगती है वो है उसका दलित होना और एक चीज जो मुझे गायब लगती है वो कड़ाके की ठण्ड में इंडिया गेट पर हाथ में मोमबतियां लिए देश भर के मुर्दों का इकठ्ठा होना। या फिर बजाय इसके मैं जिन्दा लाशों का कहूँगा।

उसे नया नाम देकर, उसके नाम से जाति हटाकर सब उस जघन्य घटना पर इंसानियत दिखाकर उसके लिए न्याय की मांग कर रहे थे। मैं सुबह 6 बजे आकर दिल्ली एयरपोर्ट के पास वाले बस स्टैंड पर उतरा था पर अपने काम से। जाड़े ने मेरी टांगों ने को इतना शून्य कर दिया था कि 5 मिनट के लिए खड़ा हो पाना मुश्किल हो रहा था पर उस दृश्य ने एक पल में यह सब भुलाकर दुसरे ही भारत में पहुंचा दिया था।

आज फिर एक कक्षा 4 की मासूम निर्भया के साथ बलात्कार हुआ है। ठण्ड भी पहले से जरा कम है पर इंडिया गेट है कि फिर भी सूना है। वो लाठियां खाती और इतनी ठण्ड में पानी की तेज बौछारें झेल रही भीड़ गायब है, वो मोमबतियां हाथ में लिए नारे लगाते जोशीले युवा गायब हैं।
न जाने किस जाति के रहे होंगे वो लोग, या फिर सब धर्म-सब जाति के लोग जो निर्भया के नाम से जाति छिपाने के कारण इकट्ठे हो पाए होंगे। जो कुछ भी इसके पीछे सोच रही होगी पर उसके लिए न वो निर्भया जिम्मेदार रही होगी ना ही यह। उनके साथ जब बलात्कार हुआ, जब उनके गुप्तांगों में सरिये और गन्ने ठूंसे गए तब वो दोनों शायद इस बारे में नहीं सोच रही होगी। दरअसल वो सोच तब हमारे दिमाग में पल रही होगी।

उसका दलित होना उसके पक्ष में नहीं गया या फिर उसके मां-बाप का मांग-मांगकर गुजार बसर करना।

स्कूल से आने के बाद गन्ने के खेत में पशुओं के लिए चारा चुनने गयी उस मासूम के साथ बलात्कार किया गया। फिर भी मन न भरने पर उसके नाजुक निजी अंगों में गन्ना ठूंस दिया गया। उफ्फ, कितना दर्दनाक और भयावह रहा होगा उस 10 साल की लड़की के लिए ये सब।

पिछला किस्सा देखता हूँ तो मीडिया का बड़ा योगदान रहा था तब। सारे मुद्दे भूलकर सिर्फ इस पर बात रखी गयी जिसका परिणाम भी हुआ। पर अब मीडिया भी गायब है। शायद मीडिया को उसका दलित होना गवारा नहीं। उनके समाचार पत्र, चैनल अछूत हो जाते होंगे शायद इसका कवरेज करते हुए. खैर, जो मसला रहा होगा, यह उनका अपना धंधा है, इसमें दखलंदाजी करने वाला मैं कौन होता हूँ।

उनकी वही जाने, क्या छापना है क्या नहीं यह उनका निर्णय होगा. कब कहना है कि भारत में जातिगत भेदभाव ख़त्म हो गया, कब नहीं. उस कार्यक्रम में मौजूद किस सख्श को दलित चिंतक बोलना है किसको मनुवादी चिन्तक/सवर्ण चिन्तक……नहीं। नहीं, ये नहीं हो सकता। मुझे जाने क्यूँ लग रहा कि इस दुसरे टैग से मेरा पाला पहली बार पड़ रहा है। खैर, फैसला फिर भी उनका ही होगा।

जिनके चैनल वही जानें, पर आप-हम को यह क्या हो गया?

कडाके की ठण्ड में पानी तेज की बोछारें और लाठियां झेलकर इंसानियत उस भीड़ को यह क्या हो गया? मोमबतियां हाथ में लिए नारे लगाते उन युवाओं को यह क्या हो गया?

देश का युवा और उनकी इंसानियत को शायद कुछ अलग चाहिए। जो बात आम है भला उसके लिए ये सब क्यूँ किया जाय। बोरिंग होती है, है न?

सवाल काफी हैं पर किसके पास जाया जाय जवाब के लिए? लाल किले का वो परिसर सूना है. वो मोमबतियां हाथ में लिए लाठियां, पानी की बौछारें झेलती वो भीड़ गायब है। अब वो सड़कें सूनी है।

या फिर मीडिया ने उस प्रवाह के साथ इस बात को उन तक पहुँचने ही नहीं दिया। उन्हें भी तो बोरियत होती होगी एक जैसी खबरे करते हुए, चूँकि उस वर्ग के लिए यह रोज की बात है जिस वर्ग से वो आती थी। समाचार पत्र, चैनलों को भी तो अछूत होने से बचाना पड़ता होगा। इसलिए कुछेक ने इसे चुटकी से छुआ है जैसे हम मरी छिपकली या ऐसी किसी अन्य गन्दी वस्तु को उठाकर साइड में रखते हैं या फेंक देते हैं।

उन जगहों पर ज्यादा ढूंढने पर हाथ में “Stop Caste Violence”(जातीय हिंसा बंद करो), “Rohith Vemula forever”, “Stop Institutional Discrimination”( संस्थानिक भेदभाव बंद करो) के बैनर लिए या डॉ आंबेडकर की प्रतिमायें लिए कुछ लोग नजर आते हैं।
सुनता हूँ कि रोहित की लडाई भी इसी सोच के खिलाफ थी। उसे अपना बलिदान देना पड़ा। जाने के बाद उसके साथ भी कुछ ऐसा होता दिखाई पड़ता है मुझे। चर्चा हर बार जाकर उसकी जाति पर रूकती दिख रही है, कुछ भी हो जाते-जाते वो एक क्रांति का बीज बो गया, पर शायद उसे जाति साफ़ बताके जाना चाहिए था या फिर सुसाइड नोट के साथ कास्ट सर्टिफिकेट ही छोड़ जाता।

लेकिन यह लिखते वक़्त पूरे रिसर्च के दौरान मैंने जितना खोजा उससे ज्यादा पाया।

कुछेक चैनलों ने “बलात्कार” के अलावा “दलित के साथ बलात्कार” नाम का अलग टॉपिक/टैग बना रखा है तो किसी ने इस नाम से अपनी वेबसाइट पर एक अलग पोटली. जहाँ इस तरह का कचरा डाल दिया जाता है।

फिर सोचता हूँ, तो क्या इनमें से एक भी निर्भया कहलाने के लायक नहीं थी? सब मिलकर एक निर्भया भी नहीं क्या?

Image source: Jon S/Flickr

रवि कुमार गुप्ता:

newspapers29 जनवरी 2005 को भारतीय पत्रकार सोसाईटी ने इस दिन को भारतीय अखबार दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया और 11 साल से हम इसे मनाते आ रहे हैं। लेकिन अफसोस कि अभी तक इस दिवस को अखबारों ने जगह नहीं दी और ना ही पूरी तरह से हम ही जान पाए हैं।

इसे हम इन्कार तो नहीं कह सकतें हैं पर नज़रअंदाज़ करने से कम भी नहीं आँक सकतें। अँग्रेजी नूतन वर्ष से लेकर वेलेंटाइन डे तक को हम अपने अखबारों में कई सप्ताह से पहले से जगह देते हैं लेकिन अखबार अपने ही देश में नाम के लिए मोहताज है या यूं कहें कि अपने ही घर में अजनबी हैं। हाँ! यह कङवा सच है। लेकिन इस विचारणीय एेतिहासिक दिवस पर समाचार पत्र के मुख्य योगदान पर बात करना जरूरी है क्योंकि सिर्फ शिकायत करने से हासिल कुछ नहीं होता है।

1780 में जब अंग्रेज़ जेम्स ऑगस्टस हिकी ने ‘बंगाल गैजेट्स’ नामक अखबार को पहली बार कलकत्ता में प्रकाशित कर हमें अखबार से अवगत कराया। हालांकि ऑगस्टस हिकी ने खबर से ज्यादा अफवाहों को स्थान दिया जिसके कारण उन्हें काफी दिक्कत व आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन जो राह उन्होंने दिखाई वह सराहनीय से भी सर्वोपरि है क्योंकि वहीं तो हमारे अखबारों के जनक हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए जिम्मेदार कदम उठाने की जरूरत होती हैं तभी तो आज हम लगभग 70 हजार अखबारों से घिरे हैं और सुबह की चाय से लेकर शाम के सोने तक अखबारी बने रहते हैं। आज के समय के समाचार पत्र को सूक्ष्म दुनिया ही कहना बेहतर होगा।

समय के साथ अखबार का बदलाव

‘हिक्की गैजेट्स’ पहला भारतीय अखबार सिर्फ अफवाहों से भरा हुआ था तो वहीं दूसरी ओर राजा राममोहन राय ने कुछ वर्षों बाद इसका उपयोग भारतीय कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा को खत्म करने के लिए किया और इसके बढ़ते सुप्रभाव के वजह से ही 1950 तक अखबारों की संख्या लगभग 200 तक पहुंच गई। आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी (यंग इंडिया), लाला लाजपत (केशरी व मराठा) राय इत्यादि क्रांतिकारियों ने भी समाचार पत्रों का भरपूर सहयोग लिया तो इस आधार पर अखबार के क्रांतिकारी अदा को भी नकारा नहीं जा सकता है।

इतना ही नहीं भारतीय संविधान के पिता भीम राव अम्बेडकर ने भी जात – पात व छुआछूत – भेदभाव को मिटाने के लिए समाचार पत्रों के सहारे आंदोलन किए। लेकिन जब देश आज़ाद हो गया तो अखबारों ने क्रांति का काम छोड़कर आर्थिक विकास में भी काफी अच्छी भूमिका अदा की। परन्तु हमारे आलोचकों ने कहना शुरू किया कि अखबार अब व्यवसाय का केंद्र बन गया है क्योंकि अब ज्यादा-से-ज्यादा विज्ञापन ही प्रकाशित हो रहें हैं। हाँ! यह बात सही है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अखबार को चलाने के लिए पैसे की जरूरत कल भी थी और आज भी है। कल तक के समाचार पत्र राजा-महाराजा के भरोसे थे और आज लोकतांत्रिक दौर में लोगों के भरोसे चल रहे हैं बल्कि कल की तुलना में आज के अख़बारों में ज्यादा से ज्यादा खबर – जानकारी है और सक्रियता हैं। दुसरी तरफ अखबारों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए खास योगदान दिया है जिसको साधारण तौर पर हम विज्ञापन के रूप में देखते हैं। यह बात तो हम भलीभांति जानते हैं कि पत्रकारिता में पत्रकारों व अन्य काम करने वाले लोगों को अर्थात अखबार को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत होती हैं जो कि विज्ञापन के माध्यम से मिलता है फिर भी ना जाने क्यों हम बेवजह ही अखबार को बाजारीकरण से जोड़ कर निंदा करते हैं जबकि दुसरा सच तो यह भी है कि विज्ञापन देने वाले भी हम ही लोग हैं।

अखबार का वास्तविक रूप

हजारों साल पहले जब चीन ने पेपर की खोज की तब जाकर के यह सपना साकार हुआ और आखिरकार हमनें पशुओं के चमङे, पत्थरों इत्यादि पर लिखना बंद कर कागज को अपनाया। जबकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे प्लूटो व अरस्तू जैसे दार्शनिकों के विचारों का यह प्रयास है। खैर दोनों ही बात काफी हद तक सही है लेकिन साधारण तौर पर हम कह सकतें हैं कि जैसे – जैसे मानव सभ्यता विकास की दिशा में आगे बढ़ने लगी और हम आधुनिक होने लगे हमने अपने जीवन को सुगम-सहज बनाने के लिए खोज किया और इन्हीं अविष्कारो में से एक अखबार भी है। हमारी अखबारी यात्रा लगभग आज से 400 साल पहले भारत में अखबार व्यापारीकरण के मकसद से ही कोलकाता में आया क्योंकि कोलकाता उस दौरान भी व्यापार का मुख्य केंद्र था और आज भी है। लेकिन धीरे-धीरे हम इसकी उपयोगिता को देखे व समझे तो इसका प्रयोग जनता को जागरूक करने के लिए या यूं कहें कि आजादी की लड़ाई में हथियार के रूप में इस्तेमाल किए और बात अगर आज के मिडिया काल या सूचना काल की करें तो देखेंगे कि केवल भारत में लगभग 70 हजार अखबार कम्पनियां हैं और यह संख्या बढती जा रही हैं।

जिस तरह से अखबार समय के साथ बदलता व बढ़ता जा रहा है तो हमें इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अखबार ने क्रांतिकारी अदा के साथ – साथ देश को सूचना व आर्थिक क्षेत्रों में विस्फोटक गति दी है जो कि अविस्मरणीय है। हम सब भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि इतनी मँहगाई के जमाने में भी अखबार ही एकमात्र हैं जो कि आसानी से व दो-चार रूपये में मिलता है और मनोरंजन के साथ-साथ समाचार और जानकारी विस्तृत रूप से देता है, जिसको हम अपने समय के अनुसार शांति से पढ़ कर संग्रह कर सकते हैं। सारे खबरों का खबर रखने वाला अखबार ही आज अपने दिवस में अपने ही पन्ने से गायब हैं पर पाठकों के दिल में जिंदा है और जिंदा रहेगा, बस यही शुभकामनाएं हैं “भारतीय अखबार दिवस” पर।

A woman adjusts her scarf as the sun sets over Kashmir's Dal Lake in Srinagar July 18, 2010. REUTERS/Danish Ismail  (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: ENVIRONMENT SOCIETY) - RTR2GIJ3

By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. As a Dalit woman and a single mother, Rajkumari overcame several obstacles when she won the Block Development Council elections from her village. Just when she thought that she would finally be able to live a respectable life, things took an ugly turn.

A woman adjusts her scarf as the sun sets over Kashmir's Dal Lake in Srinagar July 18, 2010. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: ENVIRONMENT SOCIETY) - RTR2GIJ3
REUTERS/Danish Ismail

मिर्ज़ापुर , पलड़ी, शिवगढ़: एक महीने पहले तक, राजकुमारी के लिए जि़ंदगी में सब कुछ ठीक था। उसने अभी अपने गांव शिवगढ़ मिर्ज़ापुर से ब्लॉक विकास परिषद (बीडीसी) का चुनाव जीता था। एक दलित औरत और एकल मां के रूप में वो अपने बेटे के इलाज और अपनी सोलह साल की लड़की की शिक्षा के लिए पैसे जुटा रही थी। राजकुमारी मज़दूरी करके अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थी।

23 दिसंबर की रात को उसकी जि़ंदगी में सब बदल गया। उसकी सोलह साल की बेटी गीता का शिवगढ़ के कुछ लोगों ने बलात्कार किया।

बेटी का गायब होना

इस सब की शुरुआत हुई बीडीसी चुनावों से। राजकुमारी ने बताया कि उसे उसके प्रतियोगियों में से एक श्याम बहेरिया ने बार बार धमकी दी। राजकुमारी के पिता रामधनी ने बताया, “वे मतगणना वाले दिन भी आए और बोले कि अगर मेरी बेटी जीती तो ऐसा कर देंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।”

23 दिसंबर को गीता अपनी नानी के साथ थी और मोबाइल पर गाने सुन रही थी। रात 11 बजे के करीब सब सोने चले गए। एक घंटे बाद रामधनी की आंख खुली और घर के अंदर गए। वे देख कर चैंक गए कि गीता वहां नहीं थी। घबराकर उन्होंने सब घरवालों को जगाया। घर के लोग और पड़ोसी उसे ढूंढने निकले।

कुछ समय बाद उन्होंने मोबाइल पर कॉल किया। मोबाइल बजने की आवाज़ पास के एक खेत से आ रही थी। जब वे मोबाइल तक पहुंचे तो उन्होंने पाया गीता बेहोश पड़ी थी। उसके कपडे़ फटे थे और शरीर पर खून के दाग थे। जब वो होश में आई तो गीता ने बताया कि दो आदमियों – पप्पू और बिंदु बहेरिया – ने उसे उठाया और नजदीक के खेत ले गए। उन्होंने उसका मुंह और हाथ बांध दिए और कपड़े फाड़ दिए। उन्होंने उसे नचाया और फिर उसका बलात्कार किया।

पुलिस का व्यवहार

अगले दिन राजकुमारी गीता को पलड़ी पुलिस थाना ले गई। पुलिस ने एफआईआर लिखने या उसकी चिकित्सीय जांच करवाने से मना कर दिया। राजकुमारी के अनुसार पुलिस ने गीता से अपमानजनक और असंवेदनशील सवाल पूछे। “क्या हुआ था और कैसे किया? क्या तुम्हें पीलिया हुआ है जो तुम एक शब्द भी नहीं बोल सकतीं?” थाने पर मौजूद दरोगा अखिलेश्वर ने कहा। वे सवाल पूछते हुए हंस रहे थे और कहा कि गीता को समझौता कर लेना चाहिए।

अगले दिन पप्पू और बिंदु के रिश्तेदार राजकुमारी के घर आए और कहा कि उसे थाने के बाहर ही समझौता कर लेना चाहिए। जब परिवार ने उनकी बात मानने से मना कर दिया तो वे फिर विनती करने के लिए आए। गीता कमरे से यह कह कर चली गई कि उसे नींद आ रही है। कुछ समय बाद उसकी नानी कमरे में गईं तो उसे पंखे से लटका पाया।

जब उप जि़लाअधिकारी राजकुमारी से मिलने गईं तो उन्होंने उससे बोला कि वो दिखाए कि कैसे उसकी बेटी ने अपने आप को फांसी लगाई थी।

आखिरकार दफा 376, 306, और 456 के तहत पलड़ी थाने में केस दर्ज हुआ है। पप्पू और बिंदु दोनों जेल में है। मगर राजकुमारी ने जीने की इच्छा छोड़ दी है।

Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

shani shingnapur mandir

पूजा त्रिपाठी

shani shingnapur mandirआज अखबार में खबर पढ़ी कि एक महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर में 26 जनवरी को उस सालों पुरानी परंपरा को तोड़ने की तैयारी कर रहा है जिसमें महिलओं का उस चबूतरे पर जाना वर्जित है जहां शनि पत्थर स्थापित है। पिछले साल नवंबर महीने में शिंगणापुर शनि मंदिर के चबूतरे पर एक महिला के प्रवेश पर काफी बवाल हुआ था, मंदिर के पुजारियों और गांव के लोगों ने मंदिर का शुद्धिकरण किया था। परंपरा का हवाला देते हुए कहा गया कि शनि मंदिर के चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

मुंबई के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के लिए कुछ नियम हैं। इस मंदिर में हाल ही में अनीता शेटे को मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया है और वह भी शनि मंदिर में महिलाओं के लिए बने नियमों को नहीं बदलना चाहतीं। अनीता का कहना है कि हम इस परंपरा को कायम रखना चाहते हैं। मंदिर की पवित्रता के लिए गांव के ज्यादातर लोगों की भी यही मान्यता है कि चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश न हो।

पढ़कर अच्छा लगा, याद आया इस मंदिर से जुड़ी एक ऐसी घटना जिसने मेरे बाल मन को विचलित कर दिया था, कुछ साल पहले मैं अपनी माँ की सहेलियों के साथ शनि शिंगणापुर और शिर्डी की यात्रा पर गयी थी। तो हुआ ये कि यह महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर पहुंचा, महिलाओं का शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ाना वर्जित होता है इसीलिए सभी लोग किसी प्रॉक्सी की तलाश में लग गये जो उनकी तरफ से शनि भगवान पर तेल चढ़ा दे।

जहाँ सब महिलायें व्यस्त हो गयी तो मैं घूमते, घूमते उस चबूतरे पर पहुँच गयी और चबूतरे के किनारे लगी रेलिंग पकड़ कर प्रतिमा पर हो रही पूजा देखने लगी इस बात से बिलकुल अनजान कि मैं कितना बड़ा “पाप” कर रही हूँ। थोड़े देर बाद एक पंडित का ध्यान रेलिंग को पकड़े इस छोटी सी लड़की पर गया। वो उसकी ओर बढ़े, हाथ से एक धक्का दिया और कहा, “माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या?” वो बच्ची थोड़े देर रोती रही, उसे समझ ही नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी। उसे कारण तो बता दिया उसकी माँ ने पर फिर भी उसे समझ नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी।

ऐसा नहीं है कि शनि शिंगणापुर ही ऐसा मंदिर है जहाँ इक्कीसवी शताब्दी में भी ऐसी रिग्रेसिव परम्परायें चल रही हैं। कई ऐसे पूजा स्थल हैं जो नारी सशक्तिकरण को चिढ़ाते हुए खड़े हैं – राजस्थान के पुष्कर शहर के कार्तिकेय मंदिर, मुंबई के वर्ली समुद्र तट पर हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह और केरल के तिरुअनंतपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर।

वे 400 महिलायें जिन्होंने इस मंदिर में जाने और सदियों से चल रही अंधी परम्पराओं को चुनौती देने का फैसला लिया है, जाइए : उस बच्ची के लिये, इस लेखक के लिये, सदियों से पीछे धकेली जा रही औरतों के लिए और उन स्त्रियों के लिये भी जाइये जो आपको धर्मं के नाम पर, परंपरा के नाम पर रोकने की कोशिश करेंगी ।

नयी शताब्दी के दौर में इसी देश में स्त्री ने कई पुरुष वर्चस्वी क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया है। विस्मय तब होता है जब धर्म के नाम पर वह मनुस्मृति के विधान धारण करने लगती है, वह हर उस नियम को स्वीकार करती है जो उसके लिए किसी और ने लिख छोड़े हैं , यह कुछ और नहीं रूढ़ परम्पराओं के प्रति उसकी भयजनित मान्यता दर्शाता है …विचित्र लेकिन सच।

“आओ मिलें

मिलकर तोड़े

हर उस ज़ंजीर को

जिसने कल पैर बांधे थे

आज गला जकड़ रहे हैं

देवी-देवी के ढोल ने हमें कर दिया है बहरा

श्रध्दा के शोकगीत से होती है उबकाई

परम्परायें जब उठाती हैं सर

तो कुचले जातें हैं कितने नारी विमर्श के स्वर

गन्दा समझ जिसे करते हो बाहर

गर उस खून का रंग लाल है

तो क्रांति का भी

मैं नकारती हूँ तुम्हारे हर उस भगवान को

जो माँ की कोख से नहीं जन्मा है।”

school stairs

To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighbourhoods.

कोमल यादव:

school stairsहाथों में थमी डायरी, धीरे-धीरे चलती कलम और सुर में सुर मिलाते-गूंजते गाने माहौल की शुरुआत कर चुके थे। हर एक की जुंबा से निकलता गाना डायरी के कोहरे पन्नों का हिस्सा बनता जा रहा था।

क्लास की थकावट और पसीनों की मार ने सभी की हालत को सुस्त कर दिया था पर हर आती मंडली अपनी इस सुस्त हालत में चुस्त होती जा रही थी। कोई दीवार से टेक लगाए, कोई मस्ती से पैर पसारे तो कुछ घुटनों तक सलवार चढ़ाए, सामने की खिड़की से आती हवा का लुत्फ उठाने में मस्त था।

ठंडी-ठंडी हवा जैसे-जैसे बदन को सहलाने लगी, वैसे-वैसे शायरी का भूत सबके सिर चढ़ने लगा था। ‘वो मेरी जान है दिल का अरमान है, वो जी नहीं सकते मेरे बिना!’ दीवार से टेक लगाए बैठी कुसुम ने टशन के साथ कहा। सभी जोर-जोर से ताली बजाते हुए उसकी ओर देखने लगे। वह शायरी के लिए सबके बीच मशहूर है। हर कोई कभी न कभी अपनी फरमाइश रख ही देता है। वह सबके बीच इतनी खास बन चुकी है कि हर पीरियड पर सजती महफिल दिन में एक बार जरुर उसकी शायरी का हिस्सेदार बनती है।

आज भी सीढ़ी के उपर से लेकर नीचे तक बैठी सभी टोलियों की निगाहें और कान दोनों ही उसके होने लगे थे। सबकी आपसी बातचीत कुछ पल के लिए थम गई थी। उसने तेज़-तेज़ चलती हवा के लुत्फ को और हसीन बनाते हुए कहा, ‘कौन कहता है हवा फ्री की होती है! कौन कहता है हवा फ्री की होती है, कभी दस रुपये वाला चिप्स का पैकेट खरीदकर देखो, उसमें सात रुपये की हवा और तीन रुपये की चिप्स होती है।’ सब तालियां बजाते ‘वाह-वाह’ कहने लगे। वाहवाही का मज़ा अभी सबने लूटा ही था कि ‘पी.टी. मैडम आ गई, पी.टी मैडम आ गई’ कहते हुए हड़बड़ी में भागती लड़कियाँ अपनी क्लासों की ओर बढ़ने लगीं। उनके खौफ से सीढ़ी पर सजी महफिल पलभर में अपनी क्लासों की ओर फुरर्र हो गई।

वह जगह कुछ पलों के लिए खामोश हो गई जहाँ अब कुछ नहीं सिर्फ़ खिड़की से आती दीवारों से टकराती हवा का साया था। उसके खालीपन में भी सरसराहट का एक अहसास था। ऐसा मालूम पड़ रहा था मानो हवाएँ आपस में बतिया रही हों, जिन्हें अक्सर अकेलेपन का मौक़ा मिलता नहीं पर आज पहली दफा वह सुबह के समय खाली थी।

पीटी मैम की वजह से सभी बच्चे अपनी क्लासों में कैद हो चुके थे। बार-बार दरवाजे से अंदर झांकती आँखें उन्हीं के जाने की राह ताक रही थी। हर क्लास का दरवाजा मिनट-मिनट पर खुलता रहा।

poverty in india

रवि कुमार गुप्ता:

poverty in indiaसमाज का वैसा भाग जो कि अपने आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम नहीं हैं और निर्धनता यह सिद्ध करती हैं की समाज का चौतरफा विकास अभी भी बाकी हैं, चाहे वो गरीबी की दर ३० % हो या २० % और भारत सरकार की राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार लगभग २२% लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे है। एक विकसित व खुशहाल समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है की वो आर्थिक व सामाजिक आधार पर पिछड़े लोगो को सार्वजनिक तौर पर सुविधाएँ उपलब्ध कराये।

सामाजिक सुरक्षा तो हर नागरिक के लिए जरूरी है लेकिन विशेषतः आवश्यक है वैसे जनमानस के लिए जो असमाजिक खतरों के दायरे में हैं और वो हैं हमारे समाज के ३० % गरीब नागरिक। सरकार इनकी सुरक्षा अथवा विकास के लिए आज़ादी के बाद से ही कार्यरत हैं क्यूँकि आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. अम्बेडकर के अनुसार – “एक कल्याणकारी समाज के गठन के लिए सबका विकास होना जरूरी हैं” तो फिर ३० % गरीबों को असामाजिक – सुरक्षा देना तो अति आवश्यक हैं और इस संदर्भ में कुछ पैनी व विश्लेषित बातें निम्नलिखित हैं :-

1. सामाजिक – समानता – “समाज में हर व्यक्ति का समान अधिकार हैं और जिस समाज में समानता नहीं हैं, उसका मूल रूप से विकास सम्भव नहीं हैं।” डॉ. अम्बेडकर का यह कथन अनुभविक स्तर से देखा जाये तो सही हैं क्यूंकि आज हम समानता के अधिकार के वजह से ही एक लोकतंत्रात्मक देश में हैं और लोकतंत्र में जन – जन की भागीदारी महत्वपूर्ण हैं। जॉन हॉब्स के सिद्धांत – “राज्य की उत्पति व सामाजिक समझौते का सिद्धांत यह कहता हैं कि सामाजिक तौर से राज्य का निर्माण हो और एक सफल राज्य के निर्माण के लिए यह चुनौती होती हैं की वो अपने नागरिकों को कैसे संतुष्ट रखेगा।” गरीबी के वजह से लोगो का आस्था व संतोष, सरकार के प्रति टूटता हैं, इसलिए लोकतंत्र यह कहता हैं की सबको सामाजिक तौर से समानता दी जानी चाहिए।

2. संविधान – सुरक्षा – लोकतंत्र को बचाने व अर्थकारी बनाने के लिए संविधान बनाया गया है। संविधान ही तो राष्ट्र की सुन्दरता को बढाती है। संविधान के द्वारा ही हम किसी राज्य या राष्ट्र को सुचारू व अनुशासित रूप से चलते हैं। संविधान हमें सामाजिक-सुरक्षा की गारण्टी भी देता हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्व भी सभी कॉम निर्वाह मजदूरी, प्रसूति सहायता इत्यादि प्रदान कराता हैं। संवैधानिक सुंदरता को बरकरार रखने के लिए गरीबो को सामाजिक – सुरक्षा देना जरूरी हैं क्यूंकि डॉ. प्रेम सिंह की किताब “उदारवाद की कट्टरता” यह कहती है कि समाज में समरसता बनाये रखने के लिए सामाजिक – सुरक्षा मुहैया करवाना सरकार का दायित्व हैं।

3. आर्थिक – विकास – किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए अर्थव्यवस्था का मजबूतीकरण अनिवार्य हैं। आर्थिक-विकास के लिए यह आवश्यक है कि गरीबी को मिटाया जाये क्यूँकि यह विकास कि सबसे बड़ी बाधा हैं। आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में सफल नहीं हो पता हैं, चाहें भोजन हो या शिक्षा। आर्थिक स्तर से विकास करने के लिए रोजगार का होना आवश्यक हैं और जबतक बेरोजगारी रहेगी, हम सामाजिक तौर से आर्थिक विकास नहीं कस पाएंगे और भारत सरकार ने इसको दूर करने करने के लिए ‘रोजगार गारंटी योजना’ को लागू कर के बेरोजगार ग्रामीणों को रोजगार देने में सफल रही हैं। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए यह भी जरूरी हैं की राष्ट्रीय आय को बढ़ाया जाये और राष्ट्रीय आय को बढ़ने के लिए हमें ३० % गरीबी की खाई को भरना होगा ताकि सकल घरेलू उत्पाद और सकल राष्ट्रीय उत्पाद को बढ़ावा मिले। सबका साथ ही हमारे विकास के मार्ग को मंजिल तक पंहुचा सकता हैं।

4. स्वस्थ्य व संगठित समाज निर्माण – जिस तरह कोई बीमारी मानव शरीर को कमजोर और खोखला बना देती हैं, ठीक उसी तरह से गरीबी भी समाज के लिए बीमारी की तरह ही हैं, जोम की विकास के राह में बाधा बनती हैं। गरीबी की वजह से आम लोग सही शिक्षा दवा – ईलाज, भोजन, आवास इत्यादि भौतिक जरूरतों को भलीभांति रूप से पूरा नहीं कर पति हैं। जिस समाज में भौतिक जरूरतों का अभाव रहेगा उस समाज का सर्वांगीण विकास तो कतई सम्भव नहीं हैं। भले ही हम युवा भारत का नारा लगा ले लेकिन वास्तव में तो हम, एक स्वस्थ्य व सुसंगठित समाज का निर्माण कभी कर नहीं सकते हैं। गरीबी यह साबित करती हैं की हम आज भी असामाजिक – तत्वों से ग्रसित हैं और जब से सरकार ने सरकारी योजनाओं जैसे की इंदिरा आवास योजना, राशन – वितरण, सर्व – शिक्षा अभियान, सरकारी अस्पताल व अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित योजना, जन – धन योजना, अटल पेंशन योजना इत्यादी योजनाओं को लागू किया और समाज में फलकारी परिवर्तन भी दिखे।

“सोने की चिड़ियाँ” कहा जाने वाला भारत के लिए गरीबी एक दाग के जैसा है और यह हमारे लिए चुनौती बन चूका हैं। आज भी हम सामाजिक तौर पर आज़ाद नहीं हैं क्यूंकि बेरोजगारी व भूख की जंजीरों ने हमारे पैरों को जकड कर रखा है। गरीबी यह बता रही है की हम आज भी मोहताज हैं रोटी, कपड़ा और माकन के लिए। गरीबी की गुलामी ने हमे असुरक्षा के दायरे में खड़ा कर रखा हैं, तभी तो आज हम सामाजिक सुरक्षा के लिए चिंतित हैं, लेकिन सच तो यह भी हैं की संघर्ष, मानव सभ्यता के साथ ही चला आ रहा हैं और हम सामाजिक-सुरक्षा के माध्यम से आज गरीबी की दर को ७३ % से घटा कर आज ३०% तक ला दिए हैं लेकिन सवाल तो यह भी उठता है की योजनाएं तो ४० – ५० वर्षों से चलाई जा रही हैं और हम आज भी गरीबी की गिरफ्त में हैं तो हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते है की इसके लिए हम खुद ही जिम्मेवार है क्यूंकि हमने अपने सामाजिक दायित्व को निः स्वार्थ भाव से निभाया नहीं हैं।

महात्मा गांधी का “न्यायसिता का सिद्धांत” यह कहता हैं की समाज के उच्चवर्गीय लोगों का यह दायित्व बनता हैं की वो पिछड़े – वर्ग को भी अपने साथ ले कर चले और गाँधीजी हृदय परिवर्तन की बात करते हैं तभी तो आज गैर – सरकारी संग़ठन भी समाज के उठान के लिए काम कर रहे हैं ताकि समाज में आर्थिक व सामाजिक तौर से समानता आये और हम भी विकसित देशों में शामिल हो जाये। गांधीजी की किताब “मेरे सपनों का भारत” में भी सामाजिक उत्थान के लिए गरीबों को सामाजिक स्तर से उठाने की बात की पुष्टि करते हैं। सचमुच में हमे फिर से भारत को “सपनों का भारत” बनाना हैं तो गरीबों की गिनती को शून्य करना होगा। लोकतंत्र यह कहता है की समाज में सबका समान अधिकार हैं और इस समानता की समरसता को बनाये रखने के लिए हमें जन – जन को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से मजबूत बनाना ही होगा।

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हरीश परिहार:

rajasthan high courtराष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति नाम के तथाकथित धार्मिक ग्रन्थ को पब्लिकली जलाया था। कारण: घ्रणित किताब मनुस्मृति दलितों व महिलाओं के मानव अधिकारों के विरोध में लिखी गयी थी। जाहिर तौर पर इस किताब में पाखंड है। जाति के आधार पर छुआछूत, ऊँच-नीच, असमानता का कारण मनुस्मृति ही है। सदियों से सोशल डीग्रेडेशन का मुख्य कारण मनुस्मृति है। मानव समाज में जाति के आधार पर भेदभाव को जन्म मनुस्मृति ने दिया था। चार वर्णों की व्यवस्था का भी उद्गम मनुस्मृति से होता है। वर्ण व्यवस्था ने मानव समाज में ऊँच-नीच को जन्म दिया। हिन्दू समाज में दलितों के मानव अधिकार मनुस्मृति की वजह से छीन लिए गये। इससे सम्बंधित तमाम प्रकार की बातें मनुस्मृति में लिखी हुयी है। आज के आधुनिक युग में भी हम तमाम प्रकार की ख़बरों से रूबरू होते हैं जिसमे यह पढ़ने या देखने को मिलता है कि फलांना जगह दलितों के घर जला दिए गये। फलांना जगह दलित लड़कियों के साथ उच्च जाति के असामाजिक तत्वों ने बलात्कार किया या फलांना जगह दलित महिला को नंगा कर घुमाया इत्यादि। (सन्दर्भ के तौर पर फरीदाबाद की घटना का जिक्र किया जा सकता है या फिर जोधपुर व बीकानेर में उच्च जाति के अध्यापक द्वारा दलित बच्चे को पीटा जाना आदि।)

इस प्रकार की तमाम प्रकार की दुखद ख़बरें हर रोज अख़बार, दूरदर्शन या फिर सोशल मीडिया पर देखने को मिलती है। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मनुस्मृति मानव समाज के लिए खतरा है। यह मानवीय मूल्यों को ठेस पहुंचाती है। मनुस्मृति को मनु नाम के काल्पनिक व्यक्ति ने लिखा था। काल्पनिक इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मनु को किसी ने देखा नहीं था और न ही इतिहास में मनु की शक्ल के बारे में कोई जानकारी मिलती है। मनुस्मृति की वजह से महिलाओं व दलितों के साथ अन्याय होता आ रहा है। भारत में महिलाओं के विरोध में कई प्रकार की रुढ़िवादी परम्पराएँ चलती आ रही हैं। मिसाल के लिए दहेज़ प्रथा हो या घुंघट प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या हो या बाल विवाह इत्यादि। या फिर कन्या-दान जैसा शब्द।

मनुस्मृति दहन का मकसद दलितों व महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अन्याय को खत्म करके समानता वाले समाज की स्थापना करना था। यानी कि छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, ऊँच-नीच, को ख़त्म करना तो था ही, इसके साथ-साथ चार वर्णों की व्यवस्था को भी ख़त्म करना था यानी कि ब्राह्मणवाद को ख़त्म करके समाजवाद, आम्बेडकरवाद स्थापित करना था। दलितों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए मनुस्मृति-दहन-दिवस मील का पत्थर साबित हुआ। बाबा साहेब आम्बेडकर ने उस दिन शाम को दिए भाषण में कहा था कि मनुस्मृति-दहन 1789 की “फ्रेंच-रेवोलुशन” के बराबर है। जाहिर है कि बाबा साहेब आम्बेडकर हिन्दू समाज में जात-पात के खिलाफ थे और सारा आम्बेडकरी साहित्य इस बात की पुष्टि करता है। इस प्रकार से मेरी राय के अनुसार मनुस्मृति मानवता के विरुद्ध है व उसका रचियता मनु अन्याय का प्रतीक है

28 जून, 1989 को राजस्थान हाई कोर्ट के नये परिसर में मनु की मूर्ति का इंस्टालेशन किया गया था। माना जाता है कि मूर्ति की डिमांड लोकप्रिय नहीं थी और स्पष्ट है कि कुछ ‘पाखंडी’ लोग ही इस प्रकार अन्याय का समर्थन कर सकते हैं। शुरुआत से लेकर कार्य पूर्ण तक इस काम को गोपनीय रूप से अंजाम दिया गया, इसलिए चलते काम के बीच इसका विरोध नहीं हो पाया। इसकी जानकारी केवल उन्ही लोगों को थी जो मूर्ति लगवाना चाहते थे। स्पष्ट है कि मनु अन्याय का प्रतीक है, इसके बावजूद भी कुछ पाखंडी एवं रुढ़िवादी लोगों की डिमांड का सम्मान करते हुए न्यायालय द्वारा मनु, जिसको किसी ने देखा भी नहीं होगा फिर भी उसकी मूर्ति या पुतला बनाकर राजस्थान उच्च न्यायलय में लगाया जाना अन्याय के पक्ष में जाकर फैसला देने के बराबर है।

ध्यान रहे कि संवैधानिक रूप से न्यायालय एक ऐसी संस्थान है जहाँ पर सामाजिक व आर्थिक न्याय की उम्मीद की जाती है। मूर्ति लगने के बाद कई दलित संगठनों व महिला संगठनों ने इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया। धरना प्रदर्शन को देखते हुए 27 जुलाई, 1989 पर राजस्थान हाई कोर्ट की एक पीठ ने 48 घंटे की समयावधि के अन्दर-अन्दर मूर्ति को हटाने का निर्देश दिया। इसे ध्यान में रखते हुए विश्व हिन्दू परिषद के आचार्य धर्मेन्द्र ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण के न्यायालय में एक रिट पेटीशन दाखिल कर दी और न्यायलय ने स्टे आर्डर लगाकर मूर्ति हटाने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनु की मूर्ति राजस्थान हाई कोर्ट में आज भी विद्धमान है।

मेरा प्रशन है कि ऐसा न्यायालय न्याय देता होगा कि केवल निर्णय?

भारतीय संविधान में मनुस्मृति से सम्बंधित कानून: राष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर व संविधान निर्माण समिति के द्वारा मनुस्मृति सम्बंध में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रावधान लाया गया जिसके अंतर्गत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में अगर 26 जनवरी 1950 के बाद अगर कोई पुरानी परम्परा या विधान जो मौलिक अधिकारों का हनन करे, जो किसी प्रकार की रूढी भी हो सकती है, तो इस प्रकार की परम्परा को अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जायेगा। इस प्रकार से मेरा मानना है कि मनु की मूर्ति का हाई कोर्ट में लगा होना एक प्रकार से संविधान की अवमानना है।

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सुमन त्रिभुवन:

अहमदनगर में भगतगली नाम का पुराना रेडिलाईट एरिया है । एक हफ्ते पहले मैं अपनी सहेलियों से मिलने और स्नेहालय के एक कार्यक्रम के बारे में बात करने के लिए भगतगली गई। तब सभी औरतें एक टि.व्ही. न्युज चॅनल देख रही थी। उसमें बार-बार तमिलनाडू और चेन्नई में आई बारिश और तबाही को दिखाया जा रहा था। मेरी सहेली दीपा उसे देखकर रो रही थी। बाकी सभी महिलाएँ भी उन दृश्यों से बहुत दुखी थी। मीना पाठक ने बात छेड़ी। उसने कहा, “हमें कुछ करना चहिए। चेन्नई के लोग बहुत बुरे हाल में दिख रहे है।”

इस पर कमल ने कहा, “सरकार को मदद करना चहिए। मदद करना सरकार का काम है। अपने देश के अमीर लोग अवश्य मदद करेंगे। हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है । हम बस ईश्वर से हालत सुधारने के लिए प्रार्थना करेंगे।”

इसर् बहस में गली की सारी औरतें शोमल हुई । हर कोई अपनी राय देने लगा। फिर हमने शेवगाँव फोन लगाया। वहाँ के रेडलाईट एरिया में काम करने वाली जया जोगदंड ने कहा कि वहाँ भी सभी औरते दो दिन से इस बरबादी के कारण दुखी है। सभी को लगता है कि कुछ करना चहिए। श्रीरामपुर में सुनिता उनवणे ने धनगरवस्ती रेडलाईट एरिया से बताया कि यहॉ की वैश्या महिलाँए कुछ चंदा जमा करने के काम में जुट गई हैं। कोपरगाँव में सुभाषनगर से संगीता शेलर ने बताया कि उसे महिलाओं ने 5 हजार रूपय दिए हैं। और तमिलनाडू भेजने के लिए कुछ रस्ता ढूंड रही है। यह सब सुनकर दीपा और मीना ने कहा, हमें भी कुछ करना चाहिए। सरकार या दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, या फिर क्या करेंगे, इसके बारे में हमें नहीं सोचना चाहिए। हमें क्या कर सकते है, यह हमे देखना चाहिए। तमिलनाडू के लोग हमारे अपने भारतवासी हैं, अगर हमारे अपने भाई-बहनों पर कोई संकट आजाए, तो क्या हम सरकार का या दुसरे लोगों का इंतजार करेंगे? मैंने इसपर कहा, प्रभु रामचंद्र के श्रीलंका तक सेतू बनाने के काम में गिलहरी नें जो काम किया वह हमें करना चाहिए। क्योंकि हम लोग अपने अधिकारों की लढ़ाई स्नेहालय के माध्यम से लड़ते हैं, फिर जब अपने देशवासियों पर संकट आती है, तो हमें अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन भी करना चाहिए।

मैंने याद दिलाया कि इस से पहले 1993 में मुम्बई के बाम्ब विस्फोट के समय, गुजरात और महाराष्ट्र के भुकंम्प में, कारगिल युध्द में, सुनामी के दौर में, ओरिसा के चक्रवात में, एच.आय.व्ही. एड्स पीडितों के लिए आत्महत्या करनो वाले किसानों के परिवारो के लिए, 2013 में महाराष्ट्र के सुखाग्रस्त इलाके के लिए हम वैश्याओं ने अपना योगदान दिया था। पिछले साल कश्मीर में आई बाढ़ और उत्तराखंड के महाप्रलय के समय भी हमने साथ दिया था। जब हम थोड़ा सा देश के लिए देते हैं, तो लगता है कि हमें खुद को भारतीय कहने का अधिकार सचमुच हैं। एसे समय में अगर हम कुछ नहीं करते, तो हम अपनी निगाहों में गिर जाते हैं। समाज की नजरों में हम अपनी मजदूरी के कारण गिरे हुए हैं, पर उसका हमें कोई इल्म नहीं है । लेकिन हम खुदकी नजर में कभी गिरना नहीं चाहते।

फिर हम नें फैसला किया कि 4 दिन हम एक वक्त खाना खाएंगें, कोई भी औरत नशा नहीं करेगी, और जितने पैसे बचते हैं, वह हम तमिलनाडू के पीडितों को देंगे। हमनें पूरे अहमदनगर जिले के सभीं रेडिलाईट एरिया में शाम तक फोन किए। सभीं का मन पहले से ही कुछ करने के लिेए बना था। स्नेहालय के प्रवीण मुत्याल सर को यह बात हमनें बताई। उन्होंने कहा कि फिलहाल पंतप्रधान सहायता निधी को पैसे देना बहतर रहेगा।

DSCN0865रेशमा ने कहा कि वह भी पैसे देगी, लेकिन हमनें कह कि एच.आय.व्ही के कारण उसकी हालत बहुत खराब है, वह अब धंदा भी नहीं करती, महिलाओं के लिए खाना बनाना और उनके बच्चे संभालना ही उसका काम हैं। उसकी आमदनी पेशा करने वाली दुसरी महिलाओं स कम है, इलिए उसका पैसा हम नहीं लेंगे। उसने कहा कि एक ना एक दिन उसे मरना ही है, वह कुछ अच्छा काम कर के मरना चाहती है। फिर मैंने कहा, चलेगा, लेकिन उसे दोनो वक्त खाना खाना चाहिए और हमारी तरह एक वक्त का खाना नहीं छाड़ना चाहिए। उसे यह भी स्वीकार नही था। उसने कहॉं कि वह खाना खा ही नहीं सकती जब इतने लोग बाढ़ की तबाही की वजह से भुखें हैं। फिर सब जगह यह मिशन शुरू हुआ।

3500 में से लगभग 2000 महिलाओं ने अपनी कमाई ईमानदारी से, प्यार और समर्पण भाव से तमिलनाडू के लिए दी। मुझे लगता है कि इस में सराहने लायक कुछ भी नहीं हैं। हमारे 1 लाख रूपय हमने जिलाधिकारी अनिल कवडे को दे दिये। अब सभी की इच्छा है कि और 4 लाख रूपय अगले 2 महीनों में इकट्ठा करके देंगे। स्नेहालय ने बताया कि गूंज नामक दिल्ली की संस्था इस काम में दिर्घकालीन कार्य करती हैं। उसे ही हम अपना सहयोग देंगे। कुछ महिलाओं की ईच्छा हैं कि प्रत्यक्ष रूप में चेन्नई जा कर लोंगों की सहायता करे। अवसर मिले तो यह भी होगा।

Ayodhya

By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Yugal Kishore Saran Shastri is a journalist who stays on the outskirts of the disputed Ramjanambhoomi site, Ayodhya. He is also the Mahant of the Saryu Kunj mandir but hasn’t performed a single pooja in 23 years. Watch him talk about the money behind religion, caste discrimination in the country, and Ayodhya as Ramjanambhoomi. 

Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

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आरती अग्रवाल: 

school gateस्कूल का मेन गेट नीले रंग से रंगा है। सुबह के छह बजे वह खुल कर सभी बच्चों के आने का इंतज़ार करने लगता है। हर बच्चा उससे होता हुआ स्कूल में दाख़िल हो जाता है।

चौकीदार सभी बच्चों को गेट से अन्दर करते हुए कह रहे हैं, “सभी अंदर जाओ, अपने बैग क्लास रूम में रख कर आओ, अभी कुछ देर मे घंटी बजने वाली है। जल्दी से सभी प्रेयर ग्राउंड में इकट्ठा हो जाओ, नहीं तो मैडम डाटेंगी।” वह अपनी कुर्सी से उठा और एक कदम आगे बढ़कर सिर झुका कर मैडम को नमस्ते बोला, सामने से आती हरे रंग की बुटेदार साड़ी पहने प्रिंसिपल ने सिर हिलाते हुए कहा, “बलराज टाईम हो गया है। घन्टी बजा दो।” वह सुनते ही ‘अच्छा जी, अच्छा जी’, कह उस तरफ दौड़ गया।

बच्चों का एक समूह दीवार के एक कोने से छुप-छुपकर, पता नहीं किसे देख कर भाग रहा है। कुछ लड़कियां समूह में खड़ी बातें कर रही हैं, “ये सुमन आज फिर नहीं आई, उसने तो लेट आने का रिकॉर्ड बना लिया है।” तभी काजल बोली, “ऐसे मत बोल, किसी की मजबूरी समझनी चाहिये, उसकी मम्मी बाहर काम करने जाती है। जब उसके पापा ठीक थे तब तो वह समय से पहले ही आ जाती थी।”

Picture 1463तभी प्रेयर की घन्टी बज उठी। काजल बोली, “आज तो हमें ही लेट वालों को पकड़ना है।” वह वहां से खिसक कर गेट के पास आ खड़ी हुई, स्कूल की घन्टी बज उठी। जिस-जिस को जहाँ भी सुनाई दे रही है, वह वहीं से दौडता हुआ, प्रेयर ग्राउंड में पहुचने की हड़बड़ी में है। स्टूडेंट सड़क से भाग कर मेन गेट तक पहुंचना चाह रहा है कि स्कूल का खुला हुआ गेट कहीं बन्द न हो जाए। जो लडकियां लेट वालों को पकड़ने के लिए खड़ी है, उनमें से एक ने गेट से झांकते हुए जोर से आवाज़ लगाई, जल्दी भागो प्रेयर शुरू होने वाली है।यह सुनते ही सड़क से आते हुए बच्चों ने दौड़ लगानी शुरू कर दी।

सभी भागते हुए गेट के अन्दर आकर अपनी-अपनी क्लास की लाईन में लग गए। तभी स्कुल के चौकीदार आए और गेट बन्द करने लगे। जो बच्चे कुछ दूर थे वे भी भाग कर गेट के अन्दर आ गए। तभी पी टी वाली मैडम ने सीटी बजाते हुए, इशारा से कह रही थी कि अब जो आएगा वह लाईन मे नहीं लगेगा।

उनका इशारा पाते ही गेट पर खड़ी लड़कियां में से एक बोली, ये तो बहुत बनती है, अभी तो टाईम है। तभी काजल चुटकी लेते हुए बोली, “देख निशा मैडम आ रही है इन्हें रोक लूँ।” तभी दीपा बोली, “इससे तो 50 रूपये फाइन लेंगे।” सभी हाथ उठा कर एक दूसरे को ताली देकर हंसने लगी। लेट वाली लाइन में खड़े सभी बच्चे भी दबे स्वर में बोले, “इन्हें भी तो हमारे साथ खड़ा होना चाहिये।” सभी ठहाका मार कर हंसने लगे।

तभी काजल बोली, “यार अच्छा हुआ कि हमारी ड्यूटी यहाँ लगी है, नहीं तो प्रार्थना में बोर हो जाते।” अभी उसकी बात खत्म भी नहीं हुई थी कि तभी मोटर साईकिल की आवाज ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक साथ सभी एक-दूसरे से बोल उठीं, तेरा बॉयफ्रेंड है, तुझसे मिलने आया है। सभी ठहाका मार कर हंसने लगती हैं।

उधर प्रार्थना में पीछे की लाइन वाले बच्चे एक दूसरे को नोच-नोच कर चुप खड़े हैं। आगे के बच्चे आँख बन्द कर ऊँचे स्वर मे प्रार्थना गाए जा रहे हैं। मैडम भी अपनी बातों में मशरूफ हैं। किसी का भी ध्यान प्रार्थना में नहीं है। जैसे ही प्रार्थना खत्म हुई और पूरा ग्राउंड ड्रम की आवाज से गूंज गया।

लेटकमर वाले बच्चे ड्रम के बजते ही नाचने वाले एक्शन करने लगे। तभी काजल बोली, “सुमन तुझे तो खूब अच्छा डांस आता है, तू डांस कर हम तेरा नाम मैडम को नहीं देंगे, कह देंगे कि तुम हमारे साथ ड्यूटी पर थी।” सुमन ने फटाक से कहा, “सच?” और दीपा ने कहा, “हाँ- हाँ।”

पास खडी और लड़कियों ने भी कहा, “अगर हम आपको डान्स करके दिखायेंगे तो क्या हमें भी छोड़ दोगे?” काजल ने हाथ को हवा में लहराते हुए कहा, “भई ये तो डांस देखने के बाद ही बता सकते हैं।” सुनते ही सभी ठहाका मार कर हंसने लगे। तभी सीटी की आवाज सुन सभी सीटी की तरफ देखने लगे और उनकी महफिल यहीं खत्म हो गई। सभी मुंह लटकाए मैडम की तरफ चल दिए। गेट बन्द हो चुका था और गेट से खुलते एक छोटे गेट पर ताला लग चुका था।

aarti-yuthआरती अग्रवाल, जन्म 1996 , ‘अंकुर- कलेक्टिव ‘की नियमित रियाज़कर्ता। उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी ‘ और ‘अकार ‘ मे प्रकाशित।

swachh bharat modi garabage in india

सलमान फहीम:

swacch bharat modiजब प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने हाथ में झाङू पकड़ा था तो मुझे लगा था कि शायद अब मेरे मुल्क की काया पलट होगी और हमारा ये देश सही मायनों में स्वच्छ होगा। पर मेरा ये सोचना उतना ही गलत था जितना की एक बबूल के पेड़ से साए की उम्मीद करना। तो आखिर क्या वजह है कि आज एक साल से भी ज्यादा दिन गुज़र गए “स्वच्छ भारत” के नारे को, पर अब भी हमारा ये देश गंदगी के दलदल में उतना ही धसा हुआ है जितना पहले था। सरकार और उसके नुमाइंदे तो कटघरे में खड़े होते ही हैं पर कहीं न कहीं दोष तो हमारा भी है, कहीं न कहीं दोष हमारा ही है।

बात अगर नारों की हो तो हमारे देश में भगवान की कृपा से इसकी कभी कोई कमी नहीं रही, हर नयी सरकार के अपने नारे होते हैं, होने भी चाहिए, पर सरकारों को यह समझना होगा कि आज के हिंदुस्तान और पहले के हिंदुस्तान में ज़मीन और आसमान का फर्क है। पहले नेताओं के नारों पर लोग दिल्ली से लेकर जेल तक जाने को राज़ी थे क्योंकि उन नारों में अपना निजी स्वार्थ कम और सच्चाई ज्यादा होती थी और तब के लोग अपने बारे में कम और देश के बारे में ज्यादा सोचते थे। आज के हिंदुस्तान में नारे परिहास का विषय हैं और बङ़े अफसोस के साथ कहना पङ़ रहा है कि “स्वच्छ भारत” का नारा भी मज़ाक बन कर रह गया है।

इस दौर में जहाँ हमारी देशभक्ति महज़ सिनेमाघरों में राष्ट्रगान पर खड़े होने तक सीमित है या पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन वाट्सेप या फेसबुक पर तिरंगे की फोटो लगाने तक, ये दर्शाता है कि हमारे पास भारत के लिए ही समय नहीं है, स्वच्छ भारत तो बङी दूर की कौड़ी है। सही मायनों में हमारा देश इस लिए भी साफ सुथरा नहीं क्योंकि किसी को देश की नहीं पङ़ी है। यहाँ आपको अपने घरों को चमकाने वाले करोड़ों मिलेंगे पर अपनी कालोनी या अपना मोहल्ला साफ सुथरा रखने वाले कम, और यही सोच “स्वच्छ भारत” के रास्ते का सबसे बङ़ा रोड़ा है। अपने घर में हम गंदगी करने से पहले दस बार सोचेंगे पर रास्ते पर वो केले का छिलका फेंकते वक्त हम एक बार भी नहीं सोचेंगे और ना सोचते हैं।

हम हिंदुस्तानियों को अल्लाह ने ना जाने किस मिट्टी से बनाया है, हम विदेशों में जाकर वहां की साफ सफाई देखकर इतने मंत्रमुग्ध हो जाते हैं कि वहां कचरा फेकने के लिए डस्टबिन ना भी हो तो हम अपनी जेब को डस्टबिन बनाने से गुरेज़ नहीं करते। वहीं अपने देश में कदम रखते ही हम में से कुछ गुटखे और पान की पीक से सड़क को इतना लाल कर देते हैं की काबिल से काबिल पेन्टर भी शर्मा जाये। आश्चर्य की बात ये है कि एक पढ़ा लिखा वर्ग इसमें संलिप्त है जिसको पता है कि उस पानी की बोतल या चिप्स के पैकेट की सही जगह डस्टबिन है ना की सड़क का किनारा। पर इसमें उनकी भी गलती नहीं क्योंकि ‘ये भारत है और यहाँ सब चलता है’, पर शायद उन्हें यह मालूम नहीं कि इसी “चलता है” ने आज हमारी मातृभूमि की ये दशा कर दी है कि इसकी सफाई के लिए सरकार को हमसे “स्वच्छ भारत टैक्स” वसूलना पड़ रहा है। यह बात और है कि इसका प्रभाव कम और दुष्प्रभाव होने की आशंका ज्यादा है।

मैं यह बात तजुर्बे से कह रहा हूँ क्योंकि गाहे-बगाहे मुझे ट्रेन में सफर करना पड़ जाता है और वहाँ मैंने देखा है कि कैसे लोग टिकट के साथ-साथ यह अधिकार भी पा जाते हैं कि वो मूँगफली का छिलका या तेल में सना कचौडियों वाला अखबार अपनी सीट के नीचे सरका दें। अगर आप ने साहस करके पूछ भी लिया तो जवाब ये मिलेगा, “पैसा दिये हैं, फोकट में थोड़ी ना बैठे हैं”। अब ज़रा अनुमान लगाइए कि “स्वच्छ भारत” टैक्स देने वाला गंदगी क्यों नहीं करेगा, आखिर उसने इसके पैसे दिए हैं।खैर, मैं आशा करता हूँ कि भारत के सवा सौ करोड़ लोग मुझे इस विषय पर गलत साबित करेंगे और सरकार भी इन पैसों का सही उपयोग करेगी।

garbageसरकारों की बात हो, पिछली या अब की, एक चीज़ बड़ी अजीब लगती है। हर सरकार भारत को स्वच्छ करने के इस मिशन को अपनी साख का सवाल समझती है ना की देश की साख का। इसलिए इसका प्रचार प्रसार तो ज्यादा होता है पर ज़मीनी हकीकत ऊँट के मू मे ज़ीरे जितनी भी नहीं होती है। मौजूदा सरकार स्वच्छ भारत को शौचालयों के निर्माण से जोड़ कर देखती है, मोदी सरकार का संकल्प है कि 2019 से पहले 12 करोड़ शौचालयों का निर्माण किया जाये, वो बात अलग है कि एक साल में यह आंकड़ा अभी लाखों तक ही पहुँचा है। शुरुआत में इस अभियान में तेजी दिखी, नेता-अभिनेता सबने हाथ में झाङू पकड़ा और फोटो भी खिचवायी पर धीरे-धीरे इसका बुखार उतर गया।जो शौचालय बने उनमें से कई आज धूल फाक रहे, कुछ में गोबर के उपले रखे जा रहे और कुछ बंद हो गये। कई शौचालयों में पानी की टंकी नहीं, जहां टंकी है वहाँ पानी का पाइप नहीं और जहाँ दोनो है वहाँ पानी ही नहीं। पर सरकार इन ही शौचालयों का श्रेय लेते नहीं थकती, न देश में और ना ही विदेशों में।

शौचालयों का निर्माण आवश्यक ही नहीं अतिआवश्यक है, खासकर उस देश के लिए जहाँ की 60 फीसद आबादी इससे अछूती है, पर केवल निर्माण ही काफी नहीं बल्कि उसकी समीक्षा भी ज़रूरी है और ज़रूरी है ये सुनिश्चित करना कि वह आम जनता के इस्तेमाल के लिये योग्य हो। उसके बाद अगर सरकार श्रेय ले तो ये उसका हक होगा पर उससे पहले ये वोट बटोरने का महज़ एक ज़रिया ही बन कर रह जायेगा। इसके साथ ही सरकार को “कचरा नियंत्रण” या “वेस्ट मैनेजमेंट” पर कोई ठोस काम करके दिखाना होगा, मैं उम्मीद करता हूँ कि प्रधानमंत्री जी अपने सिंगापुर दौरे से इस बिंदु पर अहम जानकारी लेकर आयेगें। आपको बताते चलू कि सिंगापुर का “वेस्ट मैनेजमेंट” दुनिया में अव्वल दर्जे का माना जाता है। “कचरा नियंत्रण” सुनने में जितना सरल लगता है असल में है उससे लाखों गुना जटिल और हमारे देश के लिये तो ये 125 करोड़ गुना मुश्किल है, पर कई दशकों बाद इस देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आई है और हमें एक ऐसा प्रधानमंत्री दिया है जो इन विषयों पर खुल के बोलता है, अब देखना यह होगा कि वह इस दिशा में काम कितना कर पाता है।

इसे दुर्भाग्य ही कहिये की आज़ादी के तकरीबन सात दशक बाद भी सफाई और स्वच्छता के लिए इस देश को किसी अभियान की ज़रूरत पड़ रही है जबकी होना तो कुछ और ही चाहिये था। दरअसल बात ये है कि इस देश में अधिकारों की बातें ज्यादा होती हैं, कर्तव्यों की बहुत कम।हमने इतने सालों में अपनी इस माँ को दिया ही क्या है सिवा गंदगी और कूड़े के, हमने इसके हर एक अंग को गंदा किया है। पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, हमने कुछ नहीं छोड़ा है, हमने इसको अपने घर की गंदगी से नवाज़ा है, अपनी गाड़ियों के धुएं से और अपनी फैक्ट्रियों के जहरीले पानी से।पर अब शायद वो वक्त आ गया है जब इस माँ को उसका अधिकार मिलना चाहिये, स्वच्छता का अधिकार, साफ सुथरा रहने का अधिकार।हमें इस देश के प्रति अपना कर्तव्य समझना होगा, हमें समझना होगा कि भारत तब ही स्वच्छ होगा जब हर भारतीय स्वच्छ होगा, जब उसकी सोच स्वच्छ होगी।आइये हम सब मिलकर भारत को स्वच्छ बनाये, ना सिर्फ अपने लिये बल्कि अपने आगे आने वाली नस्लों के लिये ताकि वो एक स्वस्थ भारत में साँस ले सके, एक स्वच्छ भारत में जी सके।

mumbai national anthem row

दिव्य प्रकाश दूबे:

मैं तमाशा पिक्चर के उसी शो में था जिसका वीडियो आज सुबह से ऑनलाइन चल रहा है जिसमें एक फ़ैमिली को लोगों ने नैशनल ऐन्थम के समय न खड़े होने की वजह से हॉल से निकाल दिया गया। कमाल की बात ये है कि ‘Times Of India’ की वेबसाइट को ये नहीं पता कि हॉल बैंगलुरु का है या मुम्बई का लेकिन फ़ैमिली ‘मुस्लिम’ थी ये पता है।

mumbai national anthem rowइस मुद्दे या ‘नॉन’ मुद्दे को समझने से पहले इधर-उधर की एक दो बातें जान लेना सही रहेगा।

मुंबई में फ़िल्म शुरू होने से पहले स्क्रीन पर लिखा आता है ‘please stand up for national anthem’ (कृपया राष्ट्र गान के लिए खड़े हो जाॅंए)। नैशनल ऐन्थम खड़े न होने पर कोई legal implication (कानूनी निहितार्थ) नहीं है। हालाँकि ये बात घ्यान में रखना चाहिए कि जब भी नैशनल ऐन्थम बजे तो आप उसको तिरस्कार करने वाली कोई बात न करें।

ख़ैर ये बात सच है कि वो फ़ैमिली नैशनल ऐन्थम पर बैठी रही थी। जैसे ही नैशनल ऐन्थम ख़त्म हुई तुरंत गंजे वाले अंकल ने गरियाते हुए कहा, “Fucking, you have to stand for it” (तुम्हे खड़ा होना चहिए था)। अंकल ने जब यही लाइन कई बार अलग अलग ‘टोन’ में रिपीट करके कही तो भीड़ इकट्ठा होने लगी। उस फ़ैमिली ने बोला, ‘खड़े नहीं हुए इसका ये मतलब नहीं कि respect (आदर) नहीं करते।’

इस पर अंकल ने कहा, ‘रिस्पेक्ट कैसे नहीं देगा तू, fucking, you have to stand for it (तुम्हे खड़ा होना चहिए था) मेरी फ़ैमिली के बहुत सारे लोगों ने इसके लिए जान दी है।’

भीड़ में से एक बंदा बोला ‘बॉस मेरा पैर टूटा हुआ था फिर भी मैं खड़ा होता था।’

भीड़ में कई सारे लोग अलग-अलग टोन में कुछ-कुछ बोलने लगे। धीरे-धीरे शोर और भीड़ बढ़ते गए। PVR के कर्मचारी आ गए और स्क्रीन पर चल रहे ट्रेलर को रोक दिया गया। उन्होने आकर उस फ़ैमिली को वहाँ से बाहर निकलने को कहा। फ़ैमिली के बाहर जाते ही आधे हॉल ने ताली बजायी। तमाशा फ़िल्म शुरू होने से पहले अच्छा ख़ासा तमाशा हो चुका था। फ़िल्म का माहौल सेट हो चुका था।

मैं ये जानता हूँ कि उस फ़ैमिली को खड़े होना चाहिए था out of respect (सम्मान की खातिर), आख़िर केवल 52 सेकंड के लिए खड़े होने के लिए ऐसे भी क्या नख़रे। दूसरी तरफ़ ये देशभक्ति उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है कि कोई आदमी फ़ैमिली के साथ है और आप उसको फ़्री फ़्लो में गालियाँ देना शुरू कर दो और हॉल से बाहर निकाल दो ।

हिंदुस्तान में देशभक्ति की औक़ात अगर बस इतनी है कि पिक्चर हॉल में जो खड़ा हो गया वो देशभक्त हो जाएगा तो सनम ऐसी देशभक्ति हमें ले डूबेगी एक दिन।

जब वो फ़ैमिली हॉल से निकली थी तब वो केवल फ़ैमिली थी। मीडिया में आते ही वो ‘मुस्लिम’ हो गयी। हाल में उनसे लड़ने वाले लोग ‘केवल हिन्दू’ नहीं थे लेकिन मीडिया में वो सारे लोग हिन्दू हो गए।

भीड़ में अल्पसंख्या में होना अगर ख़तरनाक है तो बहुसंख्या में होना ज़्यादा ख़तरनाक। उस दिन की असली कहानी तो ये ही थी। बात ये है कि हम तक कहानी पहुँचने में कितने तड़के लग चुके होते हैं ये कोई नहीं जनता। सच तड़का लगने के बाद, केवल सच लगता है पर होता नहीं।

Office_Building_Under_Construction

विक्रम प्रताप सिंह सचान:

Office_Building_Under_Constructionअपना एक आशियाना बनाना, उसे दुनिया की हर खूबसूरती बख्श देना हर इनसान का सपना होता है। अमूमन घर का सपना पूरा करने के लिये बुजुर्ग लोग अपने जीवन की समूची कमायी और नौजवान हो सकने वाली अनुमानित कमायी लगा देते है। कर्जदार होने और किश्ते चुकाने का सिलसिला चल पड़ता है। किन्तु बावजूद इसके घर कब मिलेगा? मिलेगा भी या नहीं? सौदे की शर्तो के आधार पर ही मिलेगा या नहीं? ये सवाल हमेशा जहन को कचोटते रहने वाले होते है। अन्यथा ऐसे लोगो की कमी नहीं जिनकी आँखें पोज़ेशन के इंतज़ार में पथरायी जाती है, जो घर का किराया और खरीदे घर की किश्ते दोनों भर रहे है। जो बिल्डर से कानूनी लड़ाई में उलझे अपनी किस्मत को कोस रहे है। एनसीआर, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई , पुणे, चण्डीगढ़ में लाखों लोग इस दर्द के पीड़ित है। किन्तु इनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं। जिन संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती वो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

क्या आपको मुम्बई का कैम्पा-कोला कमपाउण्ड याद है? बिल्डिंग पर चलता सरकारी बुलडोजर याद है? घर बचाने की जद्दोजहद करते लोग याद है? पूरे मामले में गलती किसकी थी? बिल्डर की और नियामक संस्थाओं की? पर सजा मिली घर के खरीददार को। देश में कोका-कोला की तर्ज कमपाउण्ड पर ही आज भी कारोबार चल रहा है। हाँ तरीके थोड़े बदल गये है।

बीते दशक में जमीने सोने के भाव बिकी शायद यही कारण था घर बनाना, बेचना एक कारोबार में बदल गया। व्यावसायिकता ने जोर पकड़ा और साथ ही साथ घर की कीमतों ने। कारोबार में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों ने पाँव जमाये। रफ्ता-रफ्ता बाजार बड़ा होता चला गया। हालत यहाँ तक आ गयी की बिना किसी तरह निर्माण हुये भी घरों की खरीद फरोख्त होने लगी। घर इन्वेस्टमेंट के इंस्ट्रुमेंट के तौर पर उभरा। घर बनने की खबर से बन कर मिल जाने तक की बीच में कई बार खरीद फरोख्त होती और अनन्तः जरूरतमन्द तक पहुँचते-पहुँचते दाम आसमान छूने लगे। इस सब के बावजूद सरकार ना कोई नियामक सँस्था ला सकी, ना ही किसी अन्य तरीके से ग्राहकों का दर्द काम कर सकी।

घर की खोज में निकले एक ग्राहक के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ होती है:

1. प्री-लॉन्च जैसे कांसेप्ट का दोहन, बिना किसी कानूनी इजाजत के लोगो से पैसा वसूल करना और प्रॉपर्टी की ट्रेडिंग को बढ़ावा देना।

2. बिल्डर और प्रमोटर्स के बारे में कोई वित्तीय जानकारी ना उपलब्ध होना। इस कारण से एक स्वस्थ वित्तीय कम्पनी की जानकारी कर पाना मुश्किल होता है। यदि कम्पनी की वित्तीय जानकारी उपलब्ध भी हो तो उस प्रोजेक्ट विशेष की जानकारी नहीं होती।

3. बिल्डर द्वारा जिस जमीन पर निर्माण कार्य करने का प्रस्ताव है, उसके मालिकाना हक़ के बारे में जानकरी ना होना। जो दस्तावेज उपलब्ध कराये जाते है, उनकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में होती है। इस कार्य के लिये जो नियामक संस्थाये है उनसे जानकरी निकलवा पाना दुष्कर कार्य है। सो अधिकतर समझौते बिना पूरी जानकारी के हो जाते है।

4. ग्राहकों से पैसा लिया जाता है किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिये और बाद में अन्य प्रोजेक्टस में लगा दिया जाता है। बिल्डर्स द्वारा पोजेसन में देरी का मूलकारण भी यही होता है।

इन सब दुश्वारियों के उपरान्त घर का सौदा हो जाता है उसके बाद और समस्याएं ग्राहकों के सामने आती है। बिल्डर की तरफ से समय-समय कई अन्य तरीकों से वादाखिलाफी की जाती है।

ग्राहकों का इस तरह से शोषण किया जाता है:

1. समय पर पोज़ेशन न मिलना।
2. डील फाइनल होने के बाद फ्लैट का एरिया चेंज करना, उसके एवज में पैसे की मांग करना।
3. कन्स्ट्रक्शन क्वालिटी का घटिया होना, इसकी गुणवत्ता केवल और केवल बिल्डर की श्रद्धा पर निर्भर करती है। यदि आप कंस्ट्रक्शन क्वालिटी से संतुष्ट नहीं है तो मनमसोस कर रह जाने के अलावा कोई अन्य तरीका नहीं होता।
4. कई मामलात में किसी और की जमीन को अपना दिखा कर बेचा जाना।
5 . अथॉरिटी से बिना परमिशन के कंस्ट्रक्शन का कार्य शुरू होना।
6 . कुछ टावर बन जाने पर पजेशन देना , जबकि सोसाइटी रहने योग्य नहीं होती।
7 . बिल्डर का कानूनी कार्यवाही से न डरना।
8 . नंबर ऑफ़ फ्लोर्स में परिवर्तन पूरे के पूरे फ्लैट का ले-आउट चेंज करने के उद्देशय।
9. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के सहारे घर के दाम बढ़े हुए दिखाने का यत्न।
10. ब्लैक मनी को बढ़ावा देना।
11. एंड यूजर की जगह किसी एक ही व्यक्ति को ग्बहुत सारे फ्लैट उपलब्ध करना बाद में उन्ही फ्लैट्स को ऊँचे दामों पर बेचना।

चण्डीगढ़ के जीरकपुर में एक नामी गिरामी बिल्डर ने 1500 फ्लैट्स की बिल्डिंग का पोसेशन २ साल देर से दिया। ग्राहकों की पीड़ा तब और बढ़ गयी जब उन्हें ये पता लगा कि बिल्डर ने करीब आधे फ्लैट किसी दूसरी एजेन्सी को बेच दिये है। अब पोसेशन के लिये उस एजेन्सी से बात करनी पड़ी जो ना निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार है और ना ही विलम्ब की पेनल्टी देना चाहता है। कुछ लोगो ने जब विरोध दर्ज कराया तो ये कह कर जाने को कहा की जाओ मुकदमा लड़ लो।

दूसरी ओर हरियाणा के पंचकुला में भी बेहद नामी गिरामी बिल्डर के ऊपर वन विभाग ने मुकदमा कर दिया और ग्राहकों का पैसा सालों तक फँसा रहा। चण्डीगढ़ के IT पार्क में नामी बिल्डर ने ग्राहकों को प्लॉट्स बेचकर पैसा ले लिया किन्तु चण्डीगढ़ प्रशासन और बिल्डर के बीच कानूनी लड़ायी का खामियाजा लोगों ने करीब 8-9 साल तक भुगता। नोयडा के नवनिर्मित सेक्टर्स में 90 % फ्लैट्स का पोज़ेशन सालो से ज्यादा डिले हुआ है। कई ऐसे बिल्डर भी है जिन्होंने बिना रजिस्ट्री के ही लोगो को पोज़ेशन दे दिया। गैर कानूनी ढंग से लोग रह रहे है। ये बिना सरकारी नुमाईंदों की मिली भगत के सम्भव नहीं।

ज्ञात हो कि बिल्डर या इस तरह की एजेंसी के पास कानूनी लड़ाई के लिये स्थापित सिस्टम होता है, जबकि ग्राहक के लिये मुकदमा लड़ना एक दुस्वप्न की तरह है। जो अन्ततः ग्राहक को बिल्डर की शर्तो पर मानना होता होता है या फिर कानूनी लड़ाई की मानसिक और आरती प्रताड़ना झेलनी होती है।

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To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighbourhoods.

नंदनी:

पूरी गली में धूप बिखरी थी। कहीं–कहीं पर ही छाया थी, जिसका सहारा लेकर औरतें अपनी कहानियाँ बुनने में लगी थीं। बच्चे स्कूल की थकावट को दूर करने के लिए गली में दौड़ लगा रहे थे।

इतने में गली के कोने से एक अधेड़ उम्र की औरत भागते हुये आई और गली के एक बड़े से चबूतरे पर बैठी तीन–चार औरतों के बीच जा बैठी और बोली, “क्या तुमने सुना? पीछे वाली गली से दो बच्चे गायब हो चुके हैं।” उस औरत को कोई जानता तो नहीं था। लेकिन वह इस तरह से उनके बीच में बैठी कि जैसे सभी औरतों को जानती हो। वह फिर से बोली, “अरे वही समोसे वाले के पोते। वे बड़े दुखी हैं। मैं वहीं से आ रही हूँ।”

सभी सुन रही थी। सभी को उस औरत की बात ने अपने में समा लिया था। उन्ही औरतों के बीच में बैठी एक औरत ने चौंकते हुये कहा, “वही न जिनका कोने वाला मकान है?” वह हाँ में हाँ मिलते हुये बोली, “हाँ, हाँ वही।”

साथ वाली एक औरत ने अपने पल्लू को आगे की और खिसकाते हुये बोली, “उन पर क्या बीत रही होगी? उस माँ का क्या हाल हो रहा होगा?”

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बातें दो औरतों के बीच में हो रही थी मगर उसका असर सभी पर छाया हुआ था। तभी अंजली हड़बड़ी में उठी और जोरों से चिल्लाने लगी, “नन्नो, नन्नो! कहाँ गई, मेरी बच्ची?”

अंजली को यहाँ पर सभी जानते हैं। कई बच्चों की अकेली सहारा अंजली, उनका घर बच्चों से भरा रहता है। उनका घर अनजान बच्चो के लिए खेलने की किसी जगह से कम नहीं है।

साथ वाले घर से निकलती चार या पाँच साल की लड़की ने कहा, “मम्मी मैं तो अंदर थी, टीवी देख रही थी।” अंजली उस लड़की को अपनी गोद में बिठाती हुई बोली, “मेरी लाडो, घर से बाहर मत निकलियो, कोई तुझे उठा कर ले गया तो मैं क्या करूंगी?” वह बच्ची भौंचक-सी अपनी माँ को देखने लगी। अंजली ने उस लड़की को अपनी गोद में ही बैठा लिया। औरतों के बीच की बातें थोड़ी धीमी सी पड़ गई थी, लेकिन बंद नहीं हुई थी।

दूसरी औरत उस चुप बैठी अंजली से बोली, “तू घबरा क्यों रही है? कुछ नहीं होगा हमारे बच्चों को, देखते हैं कि कोई कैसे ले जाता है इन्हें।”

अंजली कुछ नहीं बोली, यहाँ पर सभी उसकी बेचैनी को जानती थीं। सब खामोश हो गईं। कुछ ही देर के बाद में धीरे–धीरे सब कुछ सिमटने लगा। औरतें अपने अपने घरों की ओर लौटने लगीं।

गली में एक ज़ोरदार आवाज़ हुई, सभी लोग एकदम से बाहर की ओर आ गए। एक बच्चा जोरों से रो रहा है और यहाँ–वहाँ छुपने की कोशिश कर रहा है। सभी उसकी बेचैनी को देख रहे थे। कोई भी उस बच्चे की ओर नहीं जा रहा था। वह लगातार रोये जा रहा था। रोते-रोते एक घर के चबूतरे पर जाकर लेट गया और कुछ देर के लिए शांत हो गया।

प्रेस वाले अंकल चिल्लाये, “अरे, ये किसका बच्चा है?”

सब्जी वाले भैया बोले, “पता नहीं, लगता है किसी और ही गली का है?”
एक औरत ने कहा, “अरे देख तो लो कहीं बेहोश तो नहीं हो गया।” दूसरी औरत ने बोला, “बेचारा, यह तो गरम भी है।”

गली के दादा जी बोले, “देख क्या रही हो, उठाओ इसे, यहाँ मेरी खाट पर ले आओ।” सभी उसे उठा कर खाट पर ले आये।

“लगता है कहीं और का है यह, यहाँ का तो नहीं लगता।”

“यह कहीं छुट तो नहीं गया, पिछली रात यहाँ पर एक बारात आई थी।”

“लग तो यही रहा है।”

“थोड़ी देर रुक जाओ, क्या पता कोई इसे ढूँढता हुआ आ जाए।” 

“हाँ, हाँ, ऐसे ही कर लो।”

वह बच्चा तो जैसे सो चुका था। सभी उसके जागने का इंतजार कर रहे थे और साथ ही उसे ढूँढने आने वालों का भी। लेकिन काफी देर हो चुकी थी। जब वह लड़का नहीं उठा तो उसके मुँह पर पानी का छिड़काव किया गया। वह नहीं उठा। सभी उसे नजदीक के डाक्टर के पास लेकर भागे।

औरतों के बीच में बातें होने लगीं। कोई कहती, “देखो, कोई किसी के बच्चे को उठा कर ले जाता है तो यहाँ किसी का बच्चा खो जाता है।”
“सही कह रही हो जीजी। दर्द तो दोनों ही सूरतों में होता है।”

“पता नहीं किस का बच्चा है?”

“मैं तो कहती हूँ कि पुलिस को दे दो।”

“अरे नहीं, वहाँ पर बेचारा और पागल हो जायगा।”

कुछ ही देर में आदमियों का जत्था बच्चे को लेकर वापस लौटा। साथ वे दोनों लड़के भी जो यह पता लगाने के लिए गए हुये थे कि किसका बच्चा है। किसी को कुछ भी नहीं मालूम पड़ा। समोसे वाले अंकल भी आए कि कहीं उनका ही पोता तो नहीं है। पर यह वह नहीं था। बच्चा सो रहा था। रात हो चुकी थी। बच्चा खाट पर ही सोया हुआ था। बातें धीमी हो चुकी थीं। फैसला हुआ कि बच्चे को ढूँढने वाले जब तक यहाँ नहीं आयेंगे, हम इसे कहीं नहीं भेजेंगे।

“पर इसे रखेगा कौन?” दादा जी ने कहा, “और कौन रखेगा? मैं रखूँगा, मेरे पास ही सो जायगा।”

‘कौन रखेगा, कौन रखेगा’ का नारा और परेशानी सभी में देखी जा सकती थी। इतने में अंजली गली के अंदर आती हुई दिखाई दी। सभी की आँखों में जैसे खुशी छलक आई थी। जैसे ही अंजली उनके करीब आई, तभी दादा जी ने कहा, “बेटा अपने घर में एक बिस्तर और कर दे। इसे देख, कौन आया है?”

अंजली उस बच्चे को देखती रही। छ: या सात साल का बच्चा नंगा सोया हुआ। वह कुछ नहीं बोली। वह उसे अपने घर ले जाने के लिए खड़ी हुई। गली के बीच खड़े लोगों के सिर आई कोई बड़ी परेशानी जैसे खत्म हो गयी थी।

आज दो साल हो चुके हैं मगर कोई भी उसे लेने नहीं आया। कई शादियाँ हुई, हादसे हुये, लेकिन अंजली के घर का शोर बढ़ता गया है कम नहीं हुआ।

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01नंदनी दसवीं कक्षा की छात्रा हैं। ये दक्षिणपुरी में रहती हैं। इनका जन्म सन 1999 में दिल्ली में हुआ। पिछले तीन सालों से अंकुर क्लब से जुड़ी हैं। इन्हे तरह – तरह के रियाज़ों को करना और उनसे उभरती कहानियों को अलग अलग संदर्भों में सुनाना बेहद पसंद है।

चित्र केवल वर्णन के लिए

अक्षय दूबे ‘साथी’:

वो ऐसे झूमते थे कि वहां मौजूद लोग भी थिरकने लगते थे, उनकी तान इतनी मीठी होती थी कि रोम-रोम में मिश्री घुल जाए। वे जब साज पर अपनी उंगलियाँ फेरते थे तब संगीत के साथ-साथ उदास दिलों में भी खुशियाँ चहक उठती थी। उनके बारे में कहा जाता है कि वे कभी गोंड राजा के दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे, उनका पूरा समुदाय खुशियों की तिजोरियां राजा के दरबार में न्योछावर किया करते थे। लेकिन इसके बदले उनको क्या मिला? कहा जाता है कि एक दिन राजा ने किसी कारणवश उन सबको दरबार से निकाल दिया। फिर वे सब घुमंतू हो गए, लेकिन गीत, संगीत, नाचने, झूमने से उनका वास्ता बरकरार रहा, आखिर वे करते भी क्या उनकी सारी पीढ़ियों की कुल जमा पूंजी यही तो थी, इसके अलावा वे कुछ भी नहीं जानते थे। नृत्य, गीत, संगीत यही उनका समर्पण, जीवन और आजीविका का ज़रिया था।

चित्र केवल वर्णन के लिए
चित्र केवल वर्णन के लिए

जब मैं अपने बचपने को खंगालता हूँ तो आज भी कुछ धुंधली सी तस्वीरें किसी मोंटाज़ की तरह आँखों के सामने गुज़रने लगती हैं। कभी मृदंग की थाप पर थिरकती हुई एक महिला दिखाई देती है, कभी उनके श्रृंगारिक गीतों के बोल कान में कुछ बुदबुदाने से लगते हैं, कभी गोदना(एक किस्म का टेंटू) गुदती एक बुढ़िया, कभी रीठा और सील-लोढ़ा बेचने के लिए गलियों में गीत अलापती उनकी टोलियाँ, तो कभी सारंगी या चिकारा बजाते उस बड़े बाबा के हाथों को निहार पाता हूँ जो शायद युगों-युगों से संगीत साधना में मग्न है।

यही सोचकर मैं किसी तरह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रहने वाले इन घुमंतुओं के डेरे में पहुँचता हूँ, एक झोपड़ी के सामने टंगे फटा हुआ ढोल मुझसे कुछ कहता है। मैं उसके समीप पहुँचता हूँ, तभी झोपड़ के अन्दर से आवाज़ आती है “कौन?” मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले पीछे से एक महिला की आवाज़ आती है “भैय्या साहेब आए हे..” दरअसल वे मुझे कोई सरकारी अफसर समझ रहे हैं जो वक़्त बेवक्त झिड़की देने आ टपकते हैं।

एक युवक के बाहर आते ही मैं उनको अपने बारे में बताता हूँ। जब मैं युवक से नाच-गान के बारे में पूछता हूँ तो वो फटे हुए ढोल की ओर देखते हुए ज़वाब देता है कि “बड़े-बुज़ुर्ग ये सब काम किया करते थे, अब कहाँ। तभी पीछे खड़ी महिला अपने दादी के बारे में ज़िक्र करती है और मैं बिना समय गंवाए उनके पास पहुँचता हूँ। दादी कहती है “अब कहाँ का नाचना-गाना बेटा….सब गया अब हम घूरे में रहते हैं, और कचरा इकठ्ठा करते हैं।” ये कहते हुए वो बूढ़ी दादी गाने लगती हैं।

“आज कहाँ डेरा बाबू काल कहाँ डेरा, नदिया के पार माँ बधिया के डेरा,तरी करे सांय-सांय रतिहा के बेरा”(आज हमारा डेरा कहाँ है, कल कहाँ होगा, नदी के किनारे डेरा होगा जहाँ रात सांय-सांय करती है) मेरे हिसाब से ये पंक्तियाँ उदासी की सर्वोत्कृष्ट पंक्तियों में से एक होगी.

गीत-संगीत तो केवल अब उनकी बूढ़ी आँखों और आवाज़ों में कैद है जो शायद कुछ सालों में दम तोड़ देगी। लेकिन मायूसी, तंगहाली और कूड़े के ढेर में रहने को विवश इन कलाकारों की वर्त्तमान पीढ़ियाँ अशिक्षा, मुफलिसी, बीमारियों से त्रस्त शासन के योजनाओं से दूर हाशिए पर हैं, कला का सरंक्षण तो छोड़िए, इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

वो बूढ़ी दादी सही बोलती है कि “नाचने गाने से अब ख़ुशी नहीं मिलती।” दर-दर की ठोकरे खाते वे ‘देवार’ जाति के लोग अब संगीत से अलग-थलग और मुख्यधारा से कोसो दूर कचरे के ढेर में जीने के लिए विवश हैं।

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विक्रम प्रताप सिंह सचान:

व्यक्तिगत या सार्वजनिक साधन से यात्रा करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह, शाम आप या आपका कोई प्रियजन शहर के यातायात का हिस्सा होते है। सुबह हर पारिवारिक व्यक्ति का सबसे प्राथमिक काम बच्चों को स्कूल या स्कूल बस तक ले जाना होता है। अक्सर देखने में आता है कि स्कूल बस में बच्चे को जरा भी असुविधा हो जाये तो माँ-बाप बस वाले के ऊपर, बस स्टाफ के ऊपर गुस्सा करते है।

बच्चे की सुविधा, सुरक्षा स्कूल में स्कूल बस में माँ बाप की चिंताओं का सबब होता है। यदि बस ड्राईवर स्कूल बस को गलत दिशा में गलत तरीके से, अधिक गति से चलाता है और ये आपकी नज़र में आ जाये तो बस ड्राईवर की शिकायत होती है। किन्तु ये बात खुद पर लागू हो सके ऐसे किसी ख्याल से दूर ही रहते है लोग।

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इन्ही में से अधिकाँश माँ बाप जब घर से दफ्तर के लिये निकलते है तो बहुत व्यस्त नज़र आते है। समय इतना कम कि एक हाथ में स्टीयरिंग और दूसरे में मोबाइल होता है। व्यस्तता इतनी की गाड़ी चलाते हुये और सड़क पार करते हुये उन्हें ये बात ध्यान नहीं रह जाती कि वो अपनी जान और साथ ही अपने ही जैसे किसी की जान खतरे में डाल रहे है। जाहिर है कि बात जल्दी गाड़ी चलाने और फ़ोन पर बात करने तक ही सीमित नहीं है। गाड़ी तेज़ चलाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, हाई बीम पर गाड़ी चलाना इतनी जल्दी कि 1-2 मिनट बचाने के लिये रेडलाइट क्रॉस करने से भी बाज नहीं आते। शायद ये ख्याल भी दिमाग के किसी कोने में नहीं आता कि जिस बच्चे की सुरक्षा के लिये वो खुद बस के ड्राईवर से लड़ जाते है, वही आदतें वो खुद जीते है। और यदि कोई यातायात नियमो का हवाला दे, तो दोष दूसरे के मत्थे मढ़ कर पल्ला झाड़ लेते है।

जब आप अपनी जान खतरे में डालते है तब साथ ही साथ आप अपने बच्चे का भविष्य भी खतरे में डालते है। यातायात के नियमो का पालन करना और करवाना केवल स्कूल बस, ऑटो चालक और ट्रैफिक पुलिस की ज़िम्मेदारी नहीं है । ये हम सबकी जिम्मेदारी है।

कई बार के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहूँ तो हर आदमी दूसरे से आगे निकल जाने की चेष्टा रखता है। सड़क पर चलने की अधिकतम रफ़्तार क्या है ये मुद्दा होता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसा मज़े, और दूसरों पर रौब जमाने के लिये भी करते है।

भारत में चण्डीगढ़ की यातायात व्यवस्था को अपेक्षाकृत अच्छा माना जाता है। चण्डीगढ़ के कई चौराहो पर स्पीकर लगे हुए है जो यात्रियों को ये बताते रहते है की “दुर्घटना से देर भली”, “कहीं कोई है जो आपका इंतज़ार कर रहा है”। ये बात बहुत सारे लोगो के कानो से बस होकर गुजर जाती है। किन्तु पैर जब गाड़ी के एक्सीलरेटर पर जाता है तो सब नियम कायदे कानून हवा हो जाते है। ये प्रवत्ति बेहद चिन्ताजनक है। ये जरूरी है कि सब नियमों का पालन करे और जो नहीं करता उसकी शिकायत करे। चण्डीगढ़ के अखबारो में ये खबर आम रहती है कि किसी ने ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले की तस्वीर खीचकर फेसबुक पर डाल दी और पुलिस ने उसका चालान कर दिया।

सरकारों को भी ये देखना चाहिये कि ट्रैफिक पुलिस को प्रॉपर ट्रेनिंग मुहैय्या करायी जाय। उन्हें पेशेवर तरीके से काम करने की हिदायत मिले। मैं आज तक कभी नहीं देख पाया कि पुलिस वाला प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ने का इशारा करता हो। चण्डीगढ़ में अक्सर ये पाया है कि पुलिस का बर्ताव ज्यादा पेशेवर है। यातायात कर्मी बाकायदा सीटी बजा कर चौराहे के बीच नियम के अनुसार सिग्नल देता है, खासकर जब ट्रैफिक का कण्ट्रोल किसी कारणवश मैन्युअल हो।

यातयात के नियम स्कूली बच्चों की शिक्षा का अंग होने चाहिये, पढ़ाई के शुरुआती दिनों से ही। एक बेहतर और सुरक्षित समाज के लिये ये बहुत जरूरी है कि अच्छी गणित और अच्छी विज्ञान के साथ-साथ अच्छी नागरिक शास्त्र भी पढ़ी जाए और हम सब अच्छे नागरिक बनें।

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 विक्रम प्रताप सिंह सचान

30 जुलाई को आतंकी याकूब मेमन को फाँसी दी गयी। एक आतँकी को विदा करने के लिये जबरदस्त भीड़ उमड़ी। समाचारपत्रो और न्यूज़ चैनल्स पर विदाई समारोह सजीव दिखाया गया। मनाही के बावजूद। ये ख्याल लाजिमी था कि एक आतँकी को विदाई देने का क्या मतलब? भीड़ में जो लोग जुटे क्या हासिल करना चाहते थे? उनकी मंशा या शंका क्या थी? इस बात का जवाब कभी ढंग से समझ नहीं आया। किन्तु तार्किक तौर, तथ्यों के आधार पर, ये मान लेने में कोई सँकोच नहीं था की लोग सम्विधान की अपेक्षा व्यक्ति विशेष और उसके द्वारा किये गये कार्यो को तरजीह दे रहे है। न्यूज़ चैनल्स छोटा शकील और उनके लोगों को लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे। एक भगोड़ा 1.2 अरब की सँख्या वाले लोकतन्त्र को धमकी दे रहा था। किन्तु बेशर्मी के साथ TRP के लिये सजीव प्रसारण था।

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उस शाम और उसके हफ्तों बाद तक समाचारपत्रो और न्यूज़ चैनल्स को बारीकी से खंगाला। पर आतँकी को महिमामण्डित करने वाले लोगों के विरोध में कोई बयान खोजे ना मिला। लगा मानों समूची मीडिया समूचे धर्मनिरपेक्ष बिरादरी, समूचे संवेदनशील लोग चुप्पी की चादर ओढ़े बैठे हो! लगा जैसे नंगा सच देखने के बाद भी लोग आँखें घुमाकर निकल जाना चाहते हो। ये तथ्य देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहे शायद इसके लिये पचा लिया गया। किन्तु जरा सोचिये, सच से आँखें फिरा लेने से, मौन हो जाने से क्या सच बदल गया। विरोध ना करना मूक समर्थन जैसा ही तो था। किन्तु जिस सहजता से आतँक के इस महिमामण्डन को स्वीकार किया गया वो चौकाने वाला था। यहाँ ये तथ्य गौरतलब है कि आतँकी याकूब को भारत की दण्ड सँहिता का पालन करते हुये फाँसी दी गयी। बचाव का हर मौका भी किन्तु अंततः सज़ा हुयी और मौत मिली। लोगो की भीड़ कमोवेश उस दण्ड का विरोध करती नज़र आई। ये दण्ड के साथ भारत कि न्याय व्यवस्था का विरोध था। भारतीय होने का विरोध था।

अब देखिये, २ महीने बाद दादरी में एक हादसा हुआ। गोकशी की अफवाह पर एक हत्या हुयी। यकीनन हत्या निन्दनीय और मानवाधिकारों का उल्लघंन करने वाली थी, शर्मनाक थी। किन्तु हत्या को हिन्दू-मुस्लिम का तमगा लगा कर प्रचारित किया गया। देश-व्यापी सुनियोजित साजिश करार दिया गया। अब देश की मीडिया, धर्मनिरपेक्ष बिरादरी, संवेदनशील लोग कुण्डली मार कर बैठे है दादरी में। समाचारपत्रों में न्यूज़ चैनल्स में सोशल मीडिया बस २ हफ्ते से एक खबर थी। नगर पन्ना, राष्ट्रीय पन्ना, और अन्तराष्ट्रीय पन्ना सब पढ़े पर सब जगह खबर घूम फिर कर एक ही थी, दादरी काण्ड, हर नेता से लेकर वायुसेना के मार्शल साहब भी बयान देने से नहीं चूके। सवाल लाजिमी है। जब खुले देशद्रोह का मूक समर्थन किया गया तो फिर यहाँ लाउडस्पीकर लेकर चिल्लाना क्या दोहरे मानदण्डों का प्रतीक नहीं है? क्या हमे ये नहीं चाहिये की एक राजनीतिक और पेशेगत रोटियाँ सेंकी जा रही है? दादरी से पहले एक हादसा बरेली में हुआ, एक दरोगा जी को कुछ पशु तस्करो को मार दिया। सरकारी ड्यूटी करते दरोगा की मौत का लोगो को इल्म तक ना हुआ और अब देखिये! सोचिये भी। सोचना और समझना जरूरी है।

एक बच्चे को किताबों में ये पढ़ाया जाता है की देश धर्मनिरपेक्ष है। यही बात उसके मन में तब तक रहती है जब तक वो खुद निर्णय लेना नहीं सीख जाता। जब बच्चा बड़ा होता है, खुद अच्छे बुरे की पहचान करने लगता है। तब साहित्य, दूरदर्शन, समाचारपत्र की खबरें, न्यूज़ चैनल्स जो केवल खबरें बताते है( व्यक्तिगत राय नहीं) उस से प्राप्त सामाजिक ज्ञान के आधार पर फैसला करता है। सो कुल मिलाकर बहुत समझदार हो जाने के बाद ये निर्णय लेना मुश्किल नहीं की वो किस पाले में रहना चाहता है। या ये कहना होगा कौन बेहतर है। कश्मीर में रोज चलती गोलियाँ, रोज मरते देश के सैनिक, पड़ोसी देश की साजिश से हलकान होने की खबरें, जगह-जगह होते विस्फोट साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय खबरें भी हर खबर कुछ सीखाती है। कुल मिलाकर आसपास होता घटनाक्रम ये सिखाता है क्या-क्या सही क्या गलत। वही सीख कर लोग आगे बढ़ते है। कुल मिलाकर जबरदस्ती का प्रचार कई बार बेहद नकारात्मक प्रभाव डालता है।​

volleyball india

By Khabar Lahariya

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: Editor’s Note: This article is part of the collaboration between Khabar Lahariya and Youth Ki Awaaz, where you the readers get to read stories from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Here, India’s volleyball players tell you why it is a popular sport in the country’s rural areas, despite sports like cricket or football grabbing media and public attention.

वौलीबौल को भले ही भारत में टी.वी पर ना दिखाया जाता हो, भले ही बच्चे बच्चे की ज़बान पर वौलीबौल खिलाडि़यों के नाम ना हों, देश के गांवों में इस अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेल ने अपनी खास जगह बना ली है। महोबा स्टेडियम के वरिष्ठ लिपिक और खेल की दुनिया से कई सालों से जुड़े बृजमोहन वर्मा कहते हैं, “अकसर क्रिकेट और फुटबौल जैसे खेलों में मैदान और सामान की ज़रूरत होती है, व्यवस्था करनी पड़ती है। वौलीबौल गांव में लोग आसानी से खेल सकते हैं – लोग दिनभर के काम के बाद साथ में आए, दो खम्भे गाड़े, एक बौल ली और मनोरंजन शुरू। यही कारण है कि छोटे – छोटे जिलों से भी इस खेल के इतने खिलाड़ी निकलते हैं।”

वौलीबौल की शुरुआत 1895 के आसपास अमेरिका में हुई। खेल के नियम बनते बदलते रहे। 1964 में इसे अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में मान्यता मिली। भारत में इस खेल को पहचान आज़ादी के बाद 1951 में मिलना शुरू हुई।

नूर मुहम्मद

जिला बांदा। बांदा के गोयरा मुगली गांव निवासी नूर मुहम्मद ने आठ साल की उम्र में वौलीबौल खेलना शुरू किया क्योंकि उनके दादाजी इस खेल के शौकीन थे। नूर ने 1994 में गोरखपुर में ट्रेनिंग की और 1998 में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में जीत भी हासिल की। वे हिमाचल प्रदेश, चण्डीगढ़ और कर्नाटका राज्यों में भी खेल चुके हैं।

उन्होंने बताया, “कई प्रतियोगिताओं में हमारी टीम में पर्याप्त लोग ना होने की वजह से हार का सामना करना पड़ा। तीन साल पहले घुटनों में तकलीफ के कारण मुझे खेलना बंद करना पड़ा। मैं मानता हूं कि इस खेल को ग्रामीण स्तर पर और बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए गांव में खेल समितियां बनाने की ज़रूरत है।” खुद इस खेल को प्रोत्साहन देने के लिए नूर बांदा के गांवों में वौलीबौल प्रतियोगिताओं का आयोजन कराते हैं।

जहां एक ओर नूर मुहम्मद वौलीबौल में और लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, बांदा के युवा कल्याण अधिकारी रामजियावन ने बताया कि जिले में वौलीबौल खेलना लड़कियों को भी पसंद है। पर उनके लिए छात्रावास ना होने के कारण अकसर उनके परिवार उन्हें ट्रेनिंग के लिए नहीं भेजते।

जिला महोबा। कबरई के बरीपुरा गांव के राजू का नाम महोबा में वौलीबौल से जुड़ा हर कोई जानता है। राजू मानते हैं कि वौलीबौल सबसे सस्ता खेल है जिसमें हर तरह का व्यायाम हो जाता है। “मैंने पहली बार हाईस्कूल में जिले स्तर पर महोबा डाक बंगला मैदान में सुकौरा के खिलाफ मैच खेला था। 1991 में राज्य स्तर पर कानपुर के खिलाफ खेला था जिसमें ट्राफी मिली थी। कई बार झांसी स्टेडियम ओर छतरपुर में भी मैच खेले। आज देखा जाए तो वौलीबौल बिल्कुल खतम होने की हालत में है। इसलिए स्कुलों में इस खेल की प्रतियोगिताओं का आयोजन करना बहुत ज़रूरी है।”

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light bulb electricity

By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of the collaboration between Khabar Lahariya and Youth Ki Awaaz, where you the readers get to read stories from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Meet the state’s enterprising youth who are finding innovative ways of generating their own electricity. 

जिला वाराणसी। “मैं बड़े होकर बड़े-बड़े बैट्री चार्जर बनाना चाहता हूं, ताकि हर घर में रोशनी हो सके।” काशी विद्यापीठ के गांव लोहता के सबुआ तालाब में रहने वाले बारह साल के अमन अली कुछ सामान दुकान से, और कुछ घर के कबाड़ से निकालकर बैट्री चार्जर बनाते हैं। इसे केवल दो घंटे चार्ज करके छह घंटे तक रोशनी पाई जा सकती है। इसे बनाने के लिए दो प्लास्टिक की प्लेटें या फिर कागज़ का डिब्बा, झालर वाले छोटे बल्ब, सेल या फिर बैट्री और बिजली की ज़रूरत होती है। कागज़ के डिब्बे में या फिर प्लेटों में छेद करके बल्ब लगा देते हैं, इन सभी के तार सोल्डर की मदद से बैट्री से जोड़ देते हैं। बस बनकर तैयार हो जाती है चार्जिंग वाली बैट्री।

जिला सीतामढ़ी। रीगा प्रखण्ड के गांव रमनगरा के संतोष कुमार, बब्लू कुमार एवं डुमरा प्रखण्ड के अम्धटा मुहल्ला के सूरज और सुगंधा सभी पुरानी बैट्री से बिजली बनाते हैं। इन लोगों ने बताया कि जली हुई बैट्री की ऊपर की परत हटाकर एक बर्तन में डाल देते हैं। उसमें पानी और नमक डालकर धूप में रखते हैं। छोटा सा बल्ब जोड़कर पूरी रात जलाते हैं। कोई खर्च नहीं है, और लाभ बहुत है। इससे केरोसीन तेल की भी बचत होती है।

जिला बांदा। ब्लाक तिंदवारी के गांव तारा के खजुरी मजरा के रहने वाले लवकुश, विनय और बब्बू ने बताया कि हम लोग गोबर और कोयले से बिजली बनाते हैं। न ज़्यादा मेहनत न ज़्यादा खर्च। महुआ ब्लाक के महुआ गांव के कक्षा नौ में पढ़ने वाले विपिन भी इसी तरह बिजली बनाकर रात में पढ़ाई करते हैं। एक कटोरी में गोबर और एक कटोरी में पिसा हुआ लकड़ी का कोयला घोल लेते हैं। एक छोटा बल्ब और तार की ज़रूरत होती है। तार का एक छोर सेल में और दूसरा बल्ब से बांध देते हैं। बस जल उठता है बल्ब।

जिला अम्बेडकरनगर। कटेहरी कस्बे के रोहित वर्मा मोबाइल की बैट्री को एक डिब्बे में सेट करके, छोटा वाला बल्ब लाकर तार जोड़कर एमरजेंसी लाइट की तरह इस्तेमाल करते हैं। एमरजेंसी लाइट से मोबाइल भी चार्ज कर सकते हैं। एक बार लाइट पूरी चार्ज होने के बाद पूरी रात जल सकती है।

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kalpana patowary

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KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of the collaboration between Khabar Lahariya and Youth Ki Awaaz, where you the readers get to read stories from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh, this is one about Kalpana Patowary, or, as many may know her, the Bhojpuri Queen, whose item songs are quite the rage, especially in U.P and Bihar.

सावन की एक शाम को बंगलोर शहर के सम्सा थिएटर में जमा लोग मदहोश होकर थिरक रहे थे। भोजपुरी रानी कल्पना पटोवरी अपनी मंडली के साथ मंच पर एक से बढ़कर एक पुरबिया धुनें सुना रही थीं। यह शाम उन लोगों के नाम थी तो यू पी और बिहार से हजारों किलोमीटर दूर बंगलोर में काम करने और रहने आए थे।

पुरबिया तान कार्यक्रम का आयोजन किया था मरा नाम की संस्था ने। मरा से जुड़ी एकता ने बताया कि हजारों मजदूर हर साल यू पी और बिहार से काम करने बंगलोर आते हैं। हमने इन मजदूरों तक पहुंचने के लिए कल्पना की धुनों और गानों का जरिया खोजा। हम चाहते थे कि यू पी, बिहार से आए ये लोग जानें कि ये शहर उनके बारे में भी सोचता है।

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खबर लहरिया की मुलाकात कल्पना से इसी पुरबिया तान कार्यक्रम में हुई। असम की कल्पना ठेठ यू पी, बिहार के गाने कैसे गाने लगी?

“सच बताऊं तो मुझे उस वक्त पता भी नहीं था कि मेरा भोजपुरी में गाया पहला गीत इतना मशहूर हो जाएगा और मैं भोजपुरी रानी बन जाऊंगी। मुझे पहली बार टी-सीरीज की तरफ से भोजपुरी में होली के गीत गाने का मौका मिला। कुछ महीनों बाद पता चला कि वह गाना मशहूर हो गया है। टी-सीरीज ने मेरे साथ एक और प्रोजेक्ट करने का एक नया करार मुझसे किया। बस यहीं से मैं बन गई भोजपुरी रानी।”

तन- मन में आग लगाने वाली भोजपुरी की रंगीन, रसीली फिल्मों तक कल्पना का सफर कैसा रहा? “हां, मैंने कई आइटम नंबर के गाने गए, ऐसे गाने गए जिनके शब्द अश्लील समझे जाते हैं। भोजपुरी गानों का यह हिस्सा है। मेरे कई गाने मशहूर हुए लेकिन ‘सइयां जी दिलवा मांगेले गमछा बिछाई के’ और ‘एगो चुम्मा लेले रजा जी’ ने तो धूम ही मचा दी। मैंने कई डाकुओं और बडे बड़े अपराधियों के सामने भी गाया है। भीड़ में गाने पर तो गोली चलना आम बात है। दबंगई! मैंने जब पंद्रह साल पहले गाना शुरू किया तो लोग पहले मुझे बुरी नजरों से देखते थे, मगर अब लोग मेरा बहुत सम्मान करते हैं। मैं लोकगीत, भजन और कजरी, सभी कुछ गाती हूं।

भोजपुरी में भिखारी ठाकुर मेरे पसंदीदा शख्स रहे। इनके कई लोकगीतों को मैंने गाया। इनका एक नाटक है बिदेसिया। इसमें एक लोकगीत है – प्यारी देश तनी देखे दा हमके – मुझे जाने दो प्यारी, देश देखने दो मुझे। विरह और बिछड़ने के कई गाने हैं भोजपुरी की दुनिया में क्यूंकि यहां से लोग हमेशा जाते हैं – दुनिया के हर कोने में। इनके जाने पर जो बिछड़ने का दर्द होता है, वो दर्द मैं अपने गानों के शब्दों और धुनों में लाती हूं।”

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By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of this new collaboration between Khabar Lahariya and Youth Ki Awaaz, you the readers will get to read stories from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. And the reporters of Khabar Lahariya are unique in the way they get these stories to you. Brought out entirely by a collective of rural women, Khabar Lahariya (KL) is the only local language newspaper produced currently in local languages – Bundeli, Awadhi and Bhojpuri. These women report, write, edit, take photographs and design the newspaper and come from some of the most backward districts in Uttar Pradesh. Winner of multiple awards, KL was awarded the Deutsche Welle Global Media Forum Award and Rajasthan Pattrika KC Kulish Award for Excellence in Reporting on Health, most recently.

बनारस। यह तो सभी जानते हैं कि बनारस गंगा के लिए, यहां के घाटों के लिए, यहां के मन्दिरों के लिए, यहां की साड़ी के लिए, और यहां के पान के लिए मशहूर है। लेकिन इन सबके अलावा बनारस की गलियां इस शहर को अलग बनाती हैं। बनारस की हर गली अपने आप में खास है चाहे वो खोया गली हो, कचैड़ी गली हो या लोहा गली।

शुरू करते हैं बनारस की गोला गली से। यह बनारस की ऐसी गली है जहां हर तरह की मेवा और दुनियाभर के मसाले मिलते हैं। ऐसा कोई भी मसाला नहीं होगा जो आपको यहां पर न मिले।

यहां पर मेवे की दुकान लगाए चैरासी साल के शिवशंकर बताते हैं कि सालों से यहां पर मेवे की दुकान लगा रहा हूं। इससे पहले मेरे पिताजी ये दुकान करते थे अब हम करते है। शायद जब से बनारस शुरू हुआ हैं तब से यहां पर ये दुकान लगती आयी है। पूरे बनारस के लोग यहां तक कि दूसरे जिलों के लोग भी यहां से सामान लेने आते हैं।

मसालों की दुकान लगाने वाले दीपू बताते हैं कि हम खुद नहीं जानते कि हम कब से ये दुकान लगा रहे हैं। इस दुकान में ही पले बढ़े हैं। यहां पर अन्य दुकानदार प्रभु, दीना, दया और अन्य लोग बताते है, कि यहां पर सामान थोड़ा सस्ता मिलता है और हम सामान भी अच्छा रखते हैं। सबसे बड़ी बात और दूसरी कोई ऐसी जगह भी नहीं है। हमारे यहां का सामान दूर-दूर तक मशहूर है।

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Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

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To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighborhoods.

काजल महतो:

कुछ महीनों पहले की बात है। सर्दियों के नवरात्रे चल रहे थे। वातावरण बिल्कुल शांत था। चिडि़यों की चीं-चीं और जगह-जगह से आती मोमबत्ती की खुशबू मन मोह रही थी। सभी नहा-धोकर पूजा-पाठ कर नवरात्रे की शुरूआत कर रहे थे। पता नहीं क्यों पर आज स्कूल जाने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था। मन तो सिर्फ़ यही बात दोहरा रहा था कि घर बैठ, पूजा पाठ कर और निकल जा कोई मंदिर घूमने, पर मम्मी ने सुबह ही सख़्त हिदायत दे दी थी कि घर का कोई भी बच्चा व्रत नहीं रखेगा। हर बच्चा स्कूल जाएगा। रही घूमने की बात तो नवरात्रे के नौवें दिन के लिए बचा रहने दो, इसके लिए बाद में सोचा जाएगा।

आखि़र मैं अनमने मन से तैयार होने चल दी। लगभग आधे घंटे बाद, करीब सात बजे मैं पूरी तरह तैयार हो चुकी थी, सिर्फ़ बाल बांधने बाकी थे। कंघी उठाई और चोटी करने लगी। चोटी बनाई ही थी कि अचानक गली में एक औरत के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। देखा तो लाल साड़ी और ब्लाउज में एक औरत, जिसके माथे पर बिंदी थी और आंखों में काजल लगा हुआ था। आंसूओं के कारण काजल और माथे का टीका फैलता जा रहा था। जितना हाथ को वह मुंह पर ‘हाय दैय्या, हाय दैय्या कहते हुए मारती वह और भी ज़्यादा फैल जाता। लोगों ने उसे बिठाया और पानी पिलाकर शांत करने की कोशिश की लेकिन वह औरत लगातार “हाय दैय्या, हाय दैय्या, ये क्या हो गया।” दोहरा रही थी।

एक महिला जो वहां से जा रही थी उसने पूछा, “ऐसा क्या हुआ, जो तुम बार-बार भगवान को दोष दे रही हो! ऐसा क्या कर दिया भगवान ने, ज़रा हमें भी तो बताओ?”

“हाय, टैंकर वाले ने मार दिया। हाय दैय्या टैंकर वाले ने मार दिया उस प्यारी सी बच्ची को! बेचारी छोटी सी बच्ची। सात-आठ साल की थी। मंदिर में दूध चढ़ाकर लौट रही थी। मुझसे कुछ ही दूरी पर थी। उसने सफेद वाली स्कूल की वर्दी पहनी थी। तभी वह टैंकर वाला आ गया। पूरा कुचल दिया उसने उस लड़की को!’ इतना कहते ही वह फिर से सुबकते हुए वही राग अलापने लगी कि ‘हाय दैय्या, ये तूने क्या कर दिया!”
लोगों ने पहले तो उसे शांत किया और फिर उससे पूछा कि आखिर यह हादसा कहां पर हुआ है! उसने बताया यहीं जी और एच ब्लाक के बारातघर के पास। यह सुनते ही सब थोड़ी देर पहले हुए उस हादसे को देखने के लिए चल पड़े। बड़ों के पीछे कुछ बच्चे भी थे। कुछ लोगों ने तो अपने बच्चों को डांट-डपट कर वापस घर भेज दिया और कुछ अपने बच्चों को लेकर आगे बढ़े। मैंने भी उत्सुकतावश सोचा कि मुझे भी चलकर देखनी चाहिए।

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मेरी नज़र एकदम घड़ी पर पड़ी, सात बज चुके थे। मैं तो इन सबके चक्कर में स्कूल भूल ही गई थी। मैंने जल्दी से चोटी को ऊपर की तरफ़ मोड़कर फूल बनाया और बस्ता उठाते हुए मम्मी को आवाज़ देते हुए कहा, “मम्मी मैं स्कूल जा रही हूं!”

“लंच बॉक्स ले लिया?”

“हां, मम्मी ले लिया,” कहते हुए घर से निकल पड़ी।

मम्मी गली में हुए शोरगुल से बेख़बर अपना काम निपटाने में लगी हुई थी। मैंने गली से बाहर कदम रखा ही था कि देखा कि जो सड़क सुबह एकदम शांत थी, वहां सुबह कुछ-कुछ दूरी पर फेन वाले, दूधवाले, अगरबत्ती वाले और कुछ लोग दिखाई देते थे, अचानक इस सड़क पर चहल-पहल बढ़ गई थी। जगह-जगह लोग झुंड बनाकर खड़े बातचीत कर रहे थे। सभी के चहरे इस बात को प्रमाणित कर रहे थे वहाँ कोई गप्प या चुहलबाजी नहीं कर रहे हैं बल्कि एक सीरियस मैटर पर बात चल रही है। हो न हो ये लोग उसी घटना की बातें कर रहे थे जिसके बारे में सुबह लाल साड़ी वाली महिला बता रही थी। जो बच्चे अपने माता-पिता के साथ उछलते-कूदते गए थे वे काफ़ी ज़्यादा डरे हुए थे। कुछ तो बुरी तरह उछल-उछल कर रो रहे थे। ये सब देख मेरी उत्सुकता उस डरावने मंजर को देखने के लिए और और भी ज़्यादा बढ़ गई। पता नहीं क्यों पर मेरे कदम अपने आप ही तेज़ी से बढ़ने लगे।

आखि़र मैं सड़क के मुहाने पर पहुंच ही गई। वहां जाकर देखा तो मुझसे कुछ दूरी पर बारातघर के सामने भीड़ लगी हुई थी। वहीं पास में टैंकर भी खड़ा था जिसकी हालत लोगों ने डंडे मार-मार कर काफी दयनीय बना दी थी। उसके सामने का टूटा हुआ कांच और बाकी हिस्सा देखने से ऐसा लग रहा था जैसे वह अब रो पड़ेगा। निर्जीव होते हुए भी वह बिल्कुल सजीव लग रहा था। मैं देखना चाहती थी कि आखि़र वह लड़की कौन है! मन में कई तरह के सवाल उमड़ रहे थे। मैंने सोचा पहले किसी से समय पूछ लूं, अगर समय होगा तो देख लूंगी नहीं तो सीधे स्कूल चली जाऊंगी। वहां तो हर छोटी से छोटी बात पता चल ही जाती है। वहीं से पता चल जाएगा कि वह लड़की कौन थी।

सामने एक अंकल मोबाइल पर बात कर रहे थे। मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गई और बात पूरी होने का इंतज़ार करने लगी कि कब अंकल की बात खत्म हो और कब वो फ़ोन रखे और मैं उनसे समय पूछूं। पर वे तो बात करते ही जा रहे थे। वे बराबर अपने हाथ को इधर-उधर करते हुए बात कर रहे थे तभी मेरी नज़र उनके हाथ पर पड़ी जो नीचे की तरफ़ लटका हुआ था। उन्होंने घड़ी पहनी हुई थी। मैंने समय देखने के लिए गर्दन झुकाई ही थी कि उन्होंने हाथ उठाया और अपने गाल खुजलाने लगे। अब तक मैं अंकल की इन हरकतों से तंग आ चुकी थी। अबकी बार जैसे ही उन्होंने अपना हाथ नीचे किया मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा और समय देखने लगी। वो अंकल, जो अब तक अपनी बातों में मस्त थे एकदम से हड़बड़ाए और दूसरे ही पल मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने समय देखा और उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दी। बदले में वे भी मुस्कुरा दिए। अभी स्कूल लगने में पूरे बीस मिनट बाकी थे।

मैं आराम से वो सब कुछ देख सकती थी जो मैं देखना चाहती थी। मैं भीड़ के पास बिल्कुल पास पहुंच गई पर अब समस्या यह थी कि अंदर कैसे जाऊं। मैं भीड़ के चारों तरफ़ घूम-घूम कर अंदर जाने का रास्ता ढूंढ़ने लगी। आखि़र एक आदमी जिसे उसकी पत्नी बुला रही थी, वह बाहर निकला। उसके निकलते मैं जबरदस्ती अंदर घुसी पर भीड़ बहुत ज़्यादा थी। मैं अंदर तक नहीं जा सकती थी। मैं वहीं खड़ी होकर औरतों की साड़ी के पल्लू को एक तरफ़ करके जितनी जगह बनाई उससे अंदर की तरफ़ झांकने लगी। मुझे सिर्फ़ थोड़ा ही दिखा पर जो दिखा सच में बहुत डरावना था। मैंने देखा उस लड़की का सूट पूरा लाल हो गया। कहीं से भी सफेद नहीं रह गया था। उसे जिस दुपट्टे से ढका था वो कहीं-कहीं से गुलाबी थी वरना ज़्यादातर हिस्सा उसका भी लाल ही था। मुझमें इससे ज़्यादा देखने की हिम्म्त नहीं थी। वहां मेरा दम घुटने लगा इसलिए मैं वहां से जितनी जल्दी हो सके निकलना चाहती थी।

तभी स्कूल की घंट बजी। मैं बाहर निकली और स्कूल की तरफ़ जाने लगी। जब मैं स्कूल पहुंची तो देखा वहां का माहौल बिल्कुल बदला हुआ था। सभी बच्चे डरे-सहमे हुए थे। कुछ तो रोने भी लगे और किसी को चक्कर आने शुरू हो गए थे। प्रार्थना का वक़्त बीता जा रहा था लेकिन स्कूल के प्रिंसीपल सर और कई अध्यापक स्कूल से अनुपस्थित थे। लगभग साढ़े आठ बजे के क़रीब जब वे वापस लौटे तब आनन-फ़ानन में प्रार्थना करवाई गई। प्रार्थना के बाद प्रिंसीपल सर ने हमें बताया कि ‘यहां जी और एच ब्लाक के पास जो बारातघर है उससे थोड़ा आगे एक टैंकर जो एच ब्लाक में पानी लेकर जा रहा था, उस समय वह पानी से पूरा भरा हुआ था। उस टैंकर ने एक लड़की जो हमारे स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसने नवरात्रे के व्रत रखे हुए थे। वह मंदिर से दूध चढ़ाकर वापस लौट रही थी, जिसे टैंकर वाले ने कुचल दिया। उस समय जिन्होंने इस हादसे को देखा उनमें से तो कुछ वहीं बेहोश हो गए और कुछ ने खुद को संभालते हुए टैंकर वाले को पकड़कर मोहल्लेवालों के साथ मिलकर इतना पीटा कि पता नहीं अब वह भी बचेगा या नहीं!’ इसी के साथ प्रिंसीपल बच्चों की लापरवाही पर लंबा भाषण देने लगे। उन्होंने कहा, ‘बच्चों पहली बात तो यह है कि तुम कभी भी सड़क के किनारे-किनारे नहीं चलते हो। मैं जब भी यहां आता हूं मुझे हर तरफ़ सिर्फ़ गाडि़यां ही दिखती हैं लेकिन जैसे ही मैं इस मोहल्ले में पहुंचता हूं तो हर तरफ़ बच्चे जानवरों जैसे घूमते दिखाई देते हैं, बल्कि जानवरों से भी बद्दतर। उनकी पीठ पर बस एक डंडा जमाओ तो वे किनारे या मैदान में जाकर खड़ा हो जाते हैं, वे भी समझ लेते है कि अगला बंदा हमसे क्या कहना चाहता है पर तुम, तुम तो एकदम निकम्मे कि़स्म के हो।’

सर ने इतना कहा ही था कि एक लड़की को चक्कर आ गए। आखि़र प्रिंसीपल सर ने भाषण खत्म कर दिया। सर एक एक लाइन को क्लास में भेजने लगे। अचानक बाहर से हल्ले की आवाज़ सुनाई दी। बहुत सारे माता-पिता अपने बच्चों को लेने आए हुए थे, जिन्हें देखकर बच्चों ने रोना शुरू कर दिया। सभी बस यही गुहार लगा रहे थे कि हमें घर जाना है। सर बच्चों के माता-पिता को समझाते हुए बोले कि इस तरह हो-हल्ला मचाने से कुछ नहीं होगा। हमारी बात मानो बच्चों को लेकर मत जाओ पर लोगों की तो यही इच्छा थी कि वे अपने बच्चों को घर ले जाना चाहते हैं। धीरे-धीरे पूरा स्कूल ख़ाली हो गया। स्कूल में सिर्फ़ कुछ बच्चे ही बचे थे। हर क्लास में सिर्फ़ पांच से दस बच्चे ही रह गए थे और जो बच्चे वहां थे वे भी काफी हद तक इस घटना से प्रभावित थे। मेरी समझ में नहीं आया जहां बड़े से बड़े आतंकी हमलों को ये बच्चे मिनटों में भूलकर खेलने निकल जाते थे, वहीं ये आज इस घटना, जो आतंकी हमलों से छोटी है पर इस तरह सिकुड़ कर कैसे बैठे हैं। रह-रह कर मन में यह सवाल आ रहा था और बार-बार मन ख़ुद इसका जवाब भी दे रहा था कि वो तो देश की सीमा पर होते हैं पर यह मोहल्ले में हुई एक बहुत बड़ी घटना है। बच्चों का यह व्यवहार शायद सर को भी समझ में आ गया था। ये सोचकर की पढ़ाये भी तो किसको इन पांच-छह बच्चों को, इसलिए उन्होंने स्कूल की छुट्टी कर दी।

रास्ते में मैंने देखा कि पुलिस उस जर्जर हो चुके टैंकर और लड़की के शव को ले जा चुकी थी। मोहल्ले में इस तरह का आतंक पहले कभी नहीं हुआ था। जहां देखो वहां बच्चों को यही हिदायत दी जा रही थी कि टैंकर पर कोई नहीं चढ़ेगा। कहीं-कहीं तो सर्वजल के कार्ड भी बनाए जा रहे थे ताकि घर के किसी बच्चे को टैंकर पर जाने की जरूरत ही न पड़े पर अभी ये अंत नहीं था, ये तो बस मुसीबत की शुरूआत थी।

किसी तरह वह दिन बीता। अगले दिन बहुत कम बच्चे स्कूल पहुंचे, जिनमें मैं भी शामिल थी। आज की पढ़ाई ठीक-ठाक ही थी। दो तीन पीरियड खाली गए। आज जब मैं दो बजे घर पहुंची तो घर में मुझे सब कुछ सामान्य लगा लेकिन जब मैं खाना खाकर उठी और पानी पीने के लिए वाटरकूलर की टोटी घुमाई तो उसमें पानी खत्म था। मैंने सोचा मम्मी ने पानी नहीं भरा होगा। मैं खाना खाकर बाहर खेलने लगी तो देखा सभी के घर के बाहर पानी के खाली बर्तन पड़े हुए थे। मैंने बगल में खड़ी रिंकी से पूछा, “क्या आज टैंकर नहीं आया?” वह बोली, “नहीं आया और आयेगा भी नहीं!”
“क्यों?”
“क्यों क्या, कल जिस टैंकर से एक्सीडेंट हुआ था वह एच ब्लाक का ही तो था। प्रधान अंकल बता रहे थे कि अब शायद कुछ हफ़्तो तक एच ब्लाक में टैंकर न आ पाए!”
“फिर तो पानी की बड़ी मुसीबत हो जाएगी?”
“सबने मज़बूरी के लिए सवर्जल का कार्ड बनवा लिया है, उस पानी को पी लेंगे और खाना, नहाने-धोने के लिए मोटर का पानी इस्तेमाल हो जाएगा।”

तभी गली में हल्ला हो गया कि चौक पर मछली मार्किट का टैंकर आया है। हमारी गली की सभी औरतें और लड़कियां छोटे-बड़े डिब्बे लेकर भागने लगी। मैंने सोचा चलो मैं भी एक डिब्बा भर लेती हूं। वहां जाकर देखा तो उस टैंकर पर बहुत ज़्यादा भीड़ जमा थी। भीड़ देखकर आगे जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। तभी रिंकी बोली, “चल न!” मैंने उसकी तरफ़ देखते ही पूछा, “पानी मिलेगा क्या?”

“क्यों नहीं मिलेगा? और अगर नहीं भी मिला तो क्या हरज है, सबकी तरह हम भी वापस लौट आयेंगे!”

हम आगे बढे। वहां पहुंचकर मैंने डिब्बा रिंकी के डिब्बों के साथ रखा। वहां पाइप पकड़े एक गुस्सैल कि़स्म की महिला खड़ी थी। वह पाइप को बार-बार इस तरह घूमा रही थी जैसे किसी के सिर पर ही दे मारेगी। पाइप जिस-जिस तरफ़ जा रहा था हम अपने बर्तन उसी तरफ़ सरकाते जा रहे थे। आखि़र हमारा पानी भर गया। हमारे सामने समस्या यह थी कि इन भारी भरकम डिब्बों को घर कैसे ले जाएं! हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। मन तो कर रहा था कि वहीं फूट-फूट कर रो पड़ें। अपनी इस जर्जर दशा पर मुझे अब याद आया कि इस समय हमारी शक्लें बिल्कुल वैसी ही लग रही थीं जैसी पिछली सुबह उस टैंकर की। आखि़र हमने तय किया कि हम एक-एक करके डिब्बे कुछ दूरी पर रखेंगे फिर वापस आकर डिब्बे ले जाएंगे।

मेरा पास एक वाटरकूलर था और उसकी तीन बड़ी-बड़ी बाल्टियां। सभी डिब्बे घर तक लाने में हमें लगभग आधा घंटा लगा। आखि़र हम घर पहुंचते तभी पता चला कि कल वाली लड़की का शव पोस्टमार्टम होकर आ गया है। मैंने फटाफट अपने गीले कपड़े बदले और रिंकी को लेकर उसी लड़की के घर की तरफ़ चल पड़ी जो कल हुए सड़क हादसे की भेंट चढ़ गई थी। आज भी वहां कल जितनी ही भीड़ थी। मैं एक घर जिसका ज़ीना बाहर की तरफ़ था, वहां चढ़कर उस लड़की को देखने के लिए चढ़ गई। पर फिर भी बदकिस्मती से मैं उस लड़की का चेहरा नहीं देख पाई। शाम होने को थी, मैं और रिंकी घर वापस लौट आए।

मैं बाहर बैठकर सोचने लगी अब क्या होगा! अगर टैंकर नहीं आया तो आज की तरह हमें रोज़ दूर-दूर जाकर पानी लाना पड़ेगा और सच में ऐसा ही हुआ। एच ब्लाक का टैंकर आना बंद हो गया था। हम लोग दूर-दूर पानी भरने जाते। कितनी अर्जियां लिखी गई तब जाकर दो पखवाड़े बाद एच ब्लाक में टैंकर आया। एक हफ्ते इतनी भीड़ रही कि कई लोगों को तो पानी बिल्कुल नहीं मिला। मुझे भी तीन-तीन दिन तक पानी नहीं मिला। आज भी दिल उस घटना को याद करता है तो सिहर उठता है। उस एक्सीडेंट वाली सड़क पर अब दो बड़े-बड़े ब्रेक बने हुए हैं। पता नहीं पर अब उस रास्ते पर जाने से डर सा लगता है।

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