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Jawaharlal Nehru University (JNU) student Kanhaiya Kumar addresses students inside the university campus after being released on bail from a Delhi prison in New Delhi, India, March 3, 2016. REUTERS/Anindito Mukherjee - RTS966K

संजीव चंदन:

Jawaharlal Nehru University (JNU) student Kanhaiya Kumar addresses students inside the university campus after being released on bail from a Delhi prison in New Delhi, India, March 3, 2016. REUTERS/Anindito Mukherjee - RTS966K
Kanhaiya Kumar. Credit: Reuters/Anindito Mukherjee.

कन्हैया ने लालू प्रसाद का पैर छुआ​।​ यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग ढंग से नागवार गुज़रा।​ पाँव छूने से कुछ लोगों के संस्कारी मन को चोट लगी – मन, जो लालू जी से नफरत करता है​।​ इस लिहाज़ से मुझे अच्छा लगा कि कन्हैया ने लालू जी का पैर छुआ।​ लालू जी इस सम्मान के योग्य हैं।​

अपनी बात कहने के पहले मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने कुछ आम्बेडकरवादी मित्रों के द्वारा कन्हैया को शुरू में ही भूमिहार कहे जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज की थी, और कहा था कि कन्हैया का सचेत स्वागत होना चाहिए।​ कई लोगों से फोन पर इस सन्दर्भ में बात भी की, खासकर उनसे जो कन्हैया के खिलाफ लिख रहे थे​।

कन्हैया हमारा है, हमारे प्रतिरोध में शामिल है, इसलिए संवाद तो होने ही चाहिए, निजी और सार्वजनिक भी।​ कुछ दिन पहले जे. एन. यू. में संभाजी भगत के गीत रिलीज के बाद मैंने कन्हैया से कहा भी था कि, “आपसे बात करनी है.” विनम्र कन्हैया ने मेरा इशारा समझाते हुए कहा भी कि जरूर करते हैं, लेकिन तब समय नहीं था।​ मुझे भी लौटना था – बात फिर कभी पर चली गई।​ हालांकि कन्हैया के संगठन के दूसरे नेताओं से मेरी इस बीच बात हुई भी।

इस बीच पटना की सभा में एक विरोधी की पिटाई कर दी गई।​ कन्हैया ने उसका विरोध किया, लोगों को ऐसा करने से मना किया।​ हालांकि कई लोग पटियाला हाउस और पटना की पिटाई में फर्क करना चाहते हैं, मुझे फर्क इस लिए नहीं दिखता कि पुलिस के संरक्षण से आश्वस्त लोगों ने पटियाला हाउस कोर्ट में हमला किया और पटना में भी इसी संरक्षण के प्रति आश्वस्त लोगों ने काला झंडा दिखाने वाले किसी शख्स को पीटा।​ उसे बाहर भी किया जा सकता था।​ लोकतंत्र में काले झंडे दिखाना खुद कन्हैया के मित्रों का भी हथियार रहा है।​ विरोध भले ही गलत हो, लेकिन विरोध का हक़ तो पिटने वाले को था ही।​ इधर ‘संघियों’ को इस पिटाई के बाद लोकतंत्र की या अभिव्यक्ति की आजादी की याद आ रही है, यह भी कम मजेदार नहीं है।

चिंता के विषय सिर्फ इस तरह की आकस्मिकतायें नहीं है।​ सवाल दूसरे भी हैं।​ कन्हैया आकस्मिक तौर पर जिस नायकत्व को हासिल कर चुका है, जिसे मोदी सरकार के अति आत्मविश्वास और मीडिया के नायक-खलनायक गढ़ने की ख्वाहिशों ने उसे उपहार में दिया है, उसका मतलब क्या है? क्या इस नायकत्व का मतलब यह है कि वह मोदी विरोधियों के मंचों पर विरोध के भाषण करते रहे़? डिबेटर को सुनने का एक आनन्द होता है, जरूरत भी है, लोग मोदी की अतिवाचालता से ऊब गए हैं, उन्हें कन्हैया का भाषण अच्छा भी लग सकता है, लेकिन क्या समय ने उसे इसी भूमिका के लिए चुना है, पिछले दिनों?

क्या यह ठीक नहीं होता कि कन्हैया पिछले कई महीनों में देश भर के विद्यार्थियों के बीच पनपे असंतोष को संबोधित करता, उनके मुद्दों पर उन्हें संगठित करता।​ अबतक के भाषणों से एक सवाल यह भी बनता है कि उसके संगठन और पार्टी के रणनीतिकार आखिर तय क्या कर रहे हैं – एक ओर जय भीम-लाल सलाम का नारा और दूसरी ओर हर मंच पर कन्हैया।​ क्या उसके संगठन को एक दलित विद्यार्थी को कन्हैया के साथ ही संगठन और मुद्दों को खड़े करने की जिम्मेवारी नहीं देनी चाहिए थी? इन दिनों उसके संगठन से लेकर बाहर तक विद्यार्थियों के आन्दोलन से ऐसे कई लोग सामने आये भी हैं – लेकिन हम सब एक नायक की पूजा के अभ्यस्त हैं।​ इसीलिए कन्हैया की पालकी को ढोने वाले विचित्र उन्माद से भरे हैं – ध्यान रहे दलित – बहुजन युवा अब ऐसी किसी पालकी को ढोने के पहले सवाल करेंगे, हाँ जिसकी पालकी है, उसकी जाति भी जानना चाहेंगे…।​

Lalu

जीतेन्द्र कुमार:

आदरणीय लालूजी,

Laluआदरणीय इसलिए कि आप हमारे बुजुर्ग हैं लेकिन चरण स्पर्श नहीं। चरण स्पर्श तो आपकी समाजवादी परम्परा में भी नहीं रहा है, ऊपर से अपने बुजुर्गों को भी मैं ‘जय भीम’ से ही संबोधित करता रहा हूँ। इसलिए क्षमा चाहूँगा कि अधिकतम आदर व सम्मान दिल में किसी के लिए होने पर भी चरण स्पर्श नहीं कर सकता। अगर यह लोकनीति है तो ऐसी कई ब्राह्मणवादी लोकनीतियों को ख़ारिज करने की अनुशंषा आप खुद उन दिनों कर चुके हैं जब आपने ‘भूरा बाल’ साफ़ करने को कहा था।

पत्र के ज़रिये ही सही पर यह मेरी आपसे निजी नहीं बल्कि एक राजनितिक मुलाक़ात है। और जब देश में फासीवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो रखी हो जिसमे मेरे विश्वविद्यालय समेत सभी लोकतांत्रिक संस्थानों पर गम्भीर हमले हो रहे हों, तब इन फ़ासीवादियों को शिकस्त देने की लड़ाई में आपके सहयोग पर आपको आदर देना अपेक्षित है। 90 के दशक में मैंने खुद अपने स्कूल में साजन फ़िल्म के गाने की तर्ज़ पर “देखा है पहली बार.. बाभन के आगे गोबार” जैसे गाने गाये हैं। आडवाणी के रथ को रोकने का मतलब तब समझ आया जब थोड़े बड़े हुए। लेकिन तब तक थोड़ा बड़ा होना ही समस्या बन चूका था। एक तरफ केंद्र में फासीवादी, वैमंस्यकारी बीजेपी की सरकार देख चुके थे तो दूसरी तरफ गुंडों और बाहुबलियों के दम पर चल रही आपकी सरकार ने बिहार में सामंतो से गठजोड़ कर लिया था। लक्ष्मणपुर बाथे से लेकर बथानी टोला तक के पीड़ित दलितों को आपकी सरकार न्याय न दिला सकी। आपके बाद सत्ता में आये नितीश कुमार ने आते ही उस अमीरदास आयोग को भंग कर दिया जिसके भरोसे बिहार के सामंतवादी ताकतों को सजा दिलवाई जा सकती थी। अभी के आपके सहयोगी यही नितीश कुमार थे जिनके कार्यकाल में आरएसएस निष्कटंक अपने पाँव फैलाता रहा और समाज में धर्म और जाति की जहरीली पौध विकसित करता रहा।

नरेंद्र मोदी के रूप में देश के लोकतंत्र पर हुआ यह हमला नया नहीं है। सफल हमले की शुरुआत तो तभी हो गयी थी जब पहली बार भाजपा ने देश में सरकार बना ली थी। उसी दौर में हुए 2002 के गुजरात दंगो को नहीं भुलाया जा सकता।
लेकिन जनता ने उस सांप्रदायिक सरकार को सत्ता से बाहर किया और विकल्प में कांग्रेस और वामपंथ की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को भारत का भविष्य सौंपा। वही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन जो आज फिर से फासीवाद के खिलाफ़ एकजुट होते नजर आ रहे हैं। एक बार तो इस एकजुटता पर सवाल खड़े करने में डर सा लग रहा है। लेकिन क्या यह एकजुटता प्रोडक्टिव है? अल्पमत की एक फासीवादी सरकार की नीतियों की वजह से ही वही फासीवादी सरकार आज पूरे बहुमत में है। देश भर में दलितों आदिवासियों का शोषण उस दौर में भी हुआ। उसी दौर में विनायक सेन समेत पूरे कुडनकुलम के ग्रामीणों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया। नंदीग्राम में भी किसानों पर गोलियां इन्ही पार्टियों की सरकार ने चलवाई जो आज फासीवाद के खिलाफ़ लामबंद हो रहे हैं। बिहार में सवर्णों का आतंक इसी फासीवाद के खिलाफ एकजुट हो रहे पुरोधाओं के शासनकाल में फैला।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हमेशा ही लोकतांत्रिक मूल्यों पर हो रहे हमले के खिलाफ़ रहे हैं। आज जब इसी विश्वविद्यालय पर प्रत्यक्ष रूप से हमले हो रहे हैं तो इसके खिलाफ एकजुटता की बात हो रही है। लेकिन एकजुटता किनके साथ! वह जो धर्मनिरपेक्ष तो हैं लेकिन जातिवादी हैं? उनके साथ जो सामंती तत्वों के खिलाफ़ खड़े होने का दावा करते हैं लेकिन असल में बाहुबलियों को संरक्षण देते हैं? उनके साथ जो बात तो समाजवाद की करते हैं लेकिन असल में पूंजीपतियों की नीतियों को लागू करते हैं? उनके साथ जो रोहित वेमुला के संघर्षों को भुलाना तो चाहते हैं लेकिन जेएनयू में एडमिशन के वक़्त लिए गए साक्षात्कार के नंबर कम करने के खिलाफ हैं? सालों से जेएनयू में ऐसे साक्षात्कारों में दलितों और पिछड़ों को 30 में से 0 या 1 नंबर दिए जा रहे पर तथाकथित प्रगतिशील फासीवादी विरोधी खेमा चुप है।

माफ़ कीजियेगा ऐसी एकजुटता से मुझे आपत्ति है। ऐसी एकजुटता थोड़े समय के लिए फासीवाद को रोक भले सकती है लेकिन उसे और मजबूत करने के लिए। जैसा कि 2014 में हुआ। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दस साल ही नरेंद्र मोदी के राष्ट्रिय पटल पर पादुर्भाव का कारक है।

‌ ऐसी एकता जिससे भविष्य का खतरा बढ़ जाय, मुझे मान्य नहीं है। इस मोदी के बाद कांग्रेस और उसके बाद उससे भी बड़ा मोदी आगे आये, ऐसी एकता बेकार है। यह सत्ता का बंदरबांट करने के लिए बनाई जा रही एकता है। क्या हम फिर से 2004 की स्थिति में किसी तरह वापस लौटना चाहेंगे जिसमे बीजेपी तो सत्ता से बाहर हो लेकिन गरीबों व मजलूमों पर धर्म के बजाय आर्थिक नीतियों का दमन चलता रहे? या हम एक ऐसी एकता का खाका तैयार करें जो दमन व शोषण के भी खिलाफ हो, फासीवाद के साथ साथ। हम फासीवाद के खिलाफ़ जेएनयू में आवाज उठाते रहें और महिलाओं को यहाँ के एडमिसन में मिलने वाली छूट बंद हो जाय। देश भर में घूम रोहित वेमुला के लिए न्याय की मांग करें लेकिन अपने ही विश्वविद्यालय में ओबीसी रिजर्वेशन कम कर दिया जाय।

इस तरह की फ़र्ज़ी लड़ाई और फ़र्ज़ी एकता का मैं विरोध करता हूँ। फासीवाद अगर देश से भागेगा तो केवल नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने से नहीं, बल्कि जब सभी शोषितों को उनका अधिकार मिलेगा। इसमें छोटी से छोटी लड़ाइयां शामिल हैं।

हमारे विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष अभी आपसे मिलने और पटना में रोहित वेमुला के साथ हुए भेदभावपूर्ण अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने गए हैं। लेकिन वहीँ उनके जिला बेगुसराय में ही दो भूमिहीन दलित मजदूरों की हत्या वहां के सामंतो ने कर दी है जिसके कातिलों को आपकी सरकार बचा रही है। अगर उनके कातिलों को बचाकर भी आप जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष से गर्मजोशी से मिल रहे हैं तो आपको याद दिला दूँ कि यहीं के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर भी थे। वो छात्रसंघ अध्यक्ष जिसने जेएनयू में ओबीसी छात्रों की असल में लड़ाई लड़ी थी और आपसे मुस्कुराकर मिलने नहीं बल्कि आपके बाहुबली एमएलए के विरोध में सीवान की सडकों पर उतरा था और सीने पर गोली खाई थी। जिसकी बहादुर माँ जीवनपर्यंत आपके विरोध में खड़ी रही। वही चंद्रशेखर जिसके लिए कभी जेएनयू के छात्रों ने जब बिहार निवास का घेराव किया तब आपके गुंडे साले साधू यादव ने गोलियां चलाई थी। ये जेएनयू आज भी चंदू का जेएनयू है। बेगुसराय के दलितों को न्याय दिलाये बिना रोहित वेमुला के समर्थन में खड़े होना लफ्फाजी है। धार्मिक उन्माद के खिलाफ लेकिन जाति उत्पीड़न के समर्थन में खड़े लोगों की एकता फासीवाद के खिलाफ एकता नहीं बल्कि लफ्फाजी है। और जेएनयू के ढेरों छात्र इन लफ्फाजिओं में नहीं फंसने वाले। चाहे आप हमारे छात्र अध्यक्ष को कितना ही वीवीआईपी ट्रीटमेंट क्यों न दें।

आपके ही राज्य का एक छात्र

जीतेन्द्र कुमार
116, झेलम
जेएनयू, नई दिल्ली 67

ambedkar video

संजीव चंदन:

आज 14 अप्रैल, 2016 को देश बाबा साहेब डा. आंबेडकर की 125 वीं जयन्ती मना रहा है। डा. बाबा साहेब आंबेडकर इस देश को सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक बनाना चाहते थे। संविधान निर्माता डा. आंबेडकर दलितों -वंचितों -स्त्रियों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए राज्य को नैतिक रूप से जिम्मेवार बनाने के लिए प्रयासरत रहे। यही कारण है कि हिन्दू स्त्रियों को अधिकार दिलवाने के लिए अपने हिन्दू कोड बिल के प्रति वे गंभीर थे और उन्होंने इस बिल को पारित करवाने में तत्कालीन नेहरू सरकार की विफलता के बाद क़ानून मंत्री के रूप में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। डा. आंबेडकर 1936 में ही बच्चा पैदा करने के निर्णय पर स्त्रियों के अधिकार के लिए परिवार नियोजन का प्रस्ताव लेकर आये थे और श्रमिक स्त्रियों के लिए मातृत्व -अवकाश की व्यवस्था भी पहली बार उन्होंने ही दिलवाई थी।

आंबेडकर आधुनिक भारत के आदि स्त्रीवादियों में से एक हैं। स्त्रीकाल ने अपने यू ट्यूब चैनल के लिए चर्चित स्त्री बुद्धिजीवियों और स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं से स्त्रीवाद के लिए डा.आंबेडकर के मायने पर बातचीत की। परिचर्चा में शामिल स्त्रीवादियों ने डा. आंबेडकर के द्वारा स्त्रियों के लिए किये गये कार्यों की न सिर्फ चर्चा की, वरन यह भी चिह्नित किया कि किस तरह भारत में स्त्री -आन्दोलन ने उनके योगदानों को नजरअंदाज किया है। वे स्पष्ट करती हैं कि डा. आंबेडकर सच्चे अर्थों में स्त्रीवादी थे।

पूरी बातचीत डा. आंबेडकर के द्वारा स्त्रियों के हित में कानूनी-संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था को चिह्नित करती है और मनु स्मृति दहन के द्वारा स्त्रियों को धार्मिक अनुकूलता से मुक्ति के उनके प्रयास को भी रेखांकित करती है। शिंगनापुर शनि मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को मनु स्मृति दहन के बरक्स देखने की कोशिश की गई है कि क्या यह सच्चे अर्थों में स्त्रीमुक्ति का प्रयास है।

पूरी परिचर्चा कई ऐतिहासिक सवाल खड़े करती है , मसलन: स्त्रीवादी आन्दोलनों ने डा. आंबेडकर के साथ-साथ महात्मा फुले -सावित्रीबाई फुले की उपेक्षा क्यों की ? क्या इस उपेक्षा के पीछे कोई सैद्धान्तिकी थे या स्त्रीवादी आन्दोलनों के नेतृत्व की खुद की जाति-अवस्थिति (पोजिशन)।

आदि परिचर्चा में भाग लिया रजनी तिलक, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर, रजत रानी मीनू और भाषा सिंह ने .बातचीत के सूत्रधार मुन्नी भारती और संजीव चंदन। पूरी बातचीत सुनने -देखने के लिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें।

rohith vemula kanhaiya kumar

सुरेश जोगेश:

rohith vemula kanhaiya kumarजहाँ आजकल अगड़ी जातियों की लड़ाई आरक्षण जैसे संवेधानिक अधिकारों से है वहीँ पिछड़ी जातियां आजादी के 68 साल बाद अब भी गरिमा के साथ जिन्दगी जीने के अधिकार को लेकर लड़ रही हैं, मुझे इसलिए लिखना पड़ता है।

मुझे इसलिए भी लिखना पड़ता है कि सिस्टम से जो फायदा कन्हैया व ‘निर्भया’ को मिलता है वो रोहित वेमुला व सोनी सोरी को नहीं मिल पाता।

24 घंटे से ज्यादा समय तक हुक्का-पानी बंद करने का वाईस चांसलर अप्पा राव द्वारा खाफ जैसा फैसला लिया जाता और दिल्ली के मीडिया दफ्तरों में बैठे लोग इससे अनभिज्ञ रहते हैं, मुझे इसलिए भी लिखना पड़ेगा। FTII से लेकर JNU तक, छात्र आन्दोलन/प्रदर्शन हर जगह होते आये हैं लेकिन ऐसा कहीं नहीं होता कि आपका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाय और आप 12 दिन तक खुले में उठें-बैठें, खाएं-पियें, नहायें-धोएं। और अब हुक्का-पानी बंद कर देना। क्या ऐसे फरमानों के पीछे जातिवादी मानसिकता काम नहीं करती?

कन्हैया की लड़ाई इन्हीं जातिवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद से हैं तो मैं भी उसका समर्थक हूँ। मैं उसकी इन सब बातों से इत्तेफाक रखता हूँ। लेकिन रोहित वेमुला की लड़ाई भी अगर इसी व्यवस्था से होती है तो उसका नाम भी मीडिया पहली बार अपनी जुबान पर तब लाता है जब न्याय की उम्मीद में 12 दिन खुले में रहकर वो अपनी जान दे देता है। बिना किसी जांच के उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। मीडिया तब भी चुप था, मीडिया आज भी चुप ही रहेगा।
कैंपस में खाना-पानी से लेकर बिजली, इन्टरनेट यहाँ तक तक कि एटीएम कार्ड ठप्प कर दिए जाते हैं। रही सही कसर फिर पुलिस पूरी करती है विरोध कर रहे छात्र-छात्रों को बड़ी बेरहमी से पीटकर(यौन उत्पीडन का भी आरोप है)। जो खाना-पानी बाहर से मंगवाया जाता है उसे भी गेट पर रोक दिया जाता है। इसी बीच कैंपस में खाना बनाने की कोशिश कर रहे छात्र-छात्राओं के साथ पुलिस द्वारा मारपीट की जाती है, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस की इस क्रूर कार्यवाही का शिकार हुए छात्रों में से एक “उदय भानु” अब भी अस्पताल में हैं, गंभीर हालात में ICU मे हैं। उनके अनुसार उन्हें पुलिस द्वारा वैन में बंद करके मारा गया। मारपीट को उनके घाव चीख-चीखकर बयां करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम की शिकार हुए छात्रों द्वारा टुकड़ों में वीडियोग्राफी कर इन्टनेट पर डाली जाती है, सोशल मीडिया के माध्यम से भी बात आमजन तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है व मदद की गुहार की जाती ह। यह शर्म की बात ही है कि इस सब के दौरान राष्ट्रिय मीडिया के कानों तले जूं भी नहीं रेंगती।

एप्पल और अमेरिकी जांच एजेंसी FBI की लड़ाई चल रही है एक आतंकवादी के iPhone को अनलॉक(खोलने) को लेकर। एप्पल इसे खोलने से मना कर रही है। उसका तर्क है कि हम ग्राहकों के साथ साथ छलावा नहीं कर सकते। वो हमारे लिए सर्वोपरी हैं। दूसरी तरफ यह देखिये कि यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद की SBI ब्रांच से जारी हुए उन छात्रों के ATM कार्ड बंद कर दिए जाते हैं वो भी उस स्थिति में जब उनका खाना-पानी, बिजली-इन्टरनेट सब बंद है। आप इन दोनों कंपनियों को चलाने वालों की भी मानसिकता देखिये।

यहाँ से यह साफ़ नजर आता है कि छात्रों के प्रदर्शन/आंदलन को दबाने के लिए सबने एकजुट होकर काम किया। मीडिया ने भी इसमें बखूबी साथ दिया, लोकतंत्र का चौथा हिसा होते हुए भी।

क्रिकेट मैच की तरह पल-पल की खबर, यहाँ तक कि लाइव विडियो सोशल मीडिया पर डाली जाती है। देश का समस्त पीड़ित-प्रताड़ित इसे पढता व देखता है। अगर कोई इस दौरान पिक्चर से बाहर होता है तो वो है मीडिया।
अगर मीडिया की मजबूरी को समझने की कोशिश की जाय तो वो क्या हो सकती है?
क्या उसे डर था उसके साथ पुनः मारपीट होने का? मुझे ऐसा नहीं लगता।

अगर उसे डर था भी तो उसे जातिवाद के मुद्दे पर पीछे नहीं हटना चाहिए था जैसे वो राष्ट्रवाद के मुद्दे पर नहीं हटा। देश के तमाम बड़े चैनलों के पत्रकार लाइव कवरेज/इंटरव्यू के लिए स्टूडियो छोड़ प्रदर्शन में के साथ-साथ कोर्ट तक जाते हैं।

मैं इस बार भी वही उम्मीद कर रहा था। मुझे जैसे ही इसके बारे में आधी-अधूरी जानकारी प्राप्त हुई। मैंने पूरी खबर व कवरेज के लिए मीडिया को खंगाला। इस उम्मीद में कि मीडिया के लिए इस वक़्त सबसे बड़ा मुद्दा यही होगा शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस का आक्रमण व लोकतंत्र की हत्या। हर अख़बार से लेकर लाइव डिबेट व प्राइम टाइम शो तक खंगाले और फिर न मिलने पर सोशल मीडिया पर। यह अनुभव मुझे हैरान-परेशान कर देने वाला था। मुझे इसलिए भी लिखने पड़ा।

खैर, घटना को अब कुछ दिन होने के बाद मीडिया के कुछ चैनलों ने अपनी शाख बचाने के लिए जहमत उठायी है एक-एक, दो-दो आर्टिकल लिखने की। इस अमानवीय घटनाक्रम पर मानवाधिकार संघठनों ने सवाल उठाये हैं। एक मानवाधिकार संघठन ने वाईस चांसलर को नोटिस भी थमाया है। वहीँ मानवाधिकार संघठन “एमनेस्टी इंटरनेशनल” ने भी पुलिस की शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर क्रूर कारवाही की निंदा है व गिरफ्तार किये 2 प्रोफेसर और 25 से ज्यादा छात्रों को शीघ्र रिहा करने की मांग की है साथ ही पुलिस के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के लिए निष्पक्ष जांच की मांग की है। बुधवार(22 मार्च) को गिरफ्तार किये गए इन लोगों 24 घंटे में न्यायलय के लिए समक्ष पेश तक नहीं किया गया जो कि कानून द्वारा अनिवार्य है। इन्हें न्यायलय के समक्ष पेश होने के लिए सोमवार तक का इंतजार करना होगा।

इस अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति के लिए “राष्ट्रिय मानवाधिकार संघठन”(NHRC) ने तेलंगाना सरकार व “मानव विकास संसाधन मंत्रालय”(MHRD) को नोटिस भेजा है तो “एशियन ह्यूमन राईट कमीशन” ने भी इसकी कड़ी निंदा की है इसे तानाशाही बताया है।

जो कुछ भी हो, यह सब संभव हुआ एक साझी सोच से जिसमे जातिवाद साफ़-साफ़ झलकता है। यह मैं ही नहीं “एमनेस्टी इंटरनेशनल” की यह रिपोर्ट भी कहती है। यूएन एक्सपर्ट (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के गठन को पेश करने के दौरान) की नयी रिपोर्ट के अनुसार जाति व्यवस्था काफी लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का काम कर रही है।

child in school

To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighborhoods.

पूजा:

child in schoolस्कूल में रोज़ जैसा ही सामान्य दिन था, क्लासों से गूँजता हुआ और कानों में दाखिल होता बच्चों का वही शोर जो समझ से बाहर था। सब कुछ न कुछ अपनी बाते लिए बैठे थे। वहीँ कुछ क्लासों में सन्नाटा भी था।

इस समय हमारी क्लास बच्चों से भरी हुई थी। सामने की तरफ शांति की मूरत हमारी शोभा मैडम जी बैठी थी। शोभा मैड़म एक चालीस-पैंतालिस साल की बेहद शांत और अनुशासन पसंद टीचर हैं। चेहरा गोल, सांवला और झुर्रियों से ढका है और उनकी मोटी-मोटी आँखें हम पर नज़र रखने के कारण दिनोंदिन और मोटी होती जा रही हैं।

वे हमेशा की तरह आज भी क्लास में बैठी हुई कुछ काम कर रही थी। बच्चों की फुसफुसाहट से ज़रा-सा शोर क्या हो गया, उनकी शांति भंग हो जाती। वे चिल्लाती हुई कहने लगी, “मैं इतनी छोटी भी नहीं हूँ कि तुम लोगों को दिखाई ही न दूँ।” उनकी इतनी-सी बात से ही सब सहम गए। उन्होने अपनी सबसे मनपसंद लड़की, छाया जो कि क्लास में उनकी एजेंट की तरह काम करती है, को अपने पास बुलाया और सबकी कॉपी जमा करने को कहा। जिनके पास अभी कॉपी थी उन्होंने कॉपी जमा कर दी।

सबके पास से आज कॉपी नहीं मिली, इसलिए अकड़ के साथ हमसे कहने लगी, “दो दिन बाद मैं तुम सब की कॉपी चेक करूंगी और जिसका काम पूरा नहीं हुआ उसके नंबर भी काट लूँगी।”

उनके बोले गए ये शब्द हम बच्चों के दिल-ओ-दिमाग पर गहरा असर छोड़ गए। उनके ये सामान्य से लगने वाले शब्द हमारी मस्ती भरी ज़िंदगी से हमें निकाल कर उस कामगार कि ज़िंदगी जीने को मजबूर कर देतें हैं जो अपना पिछला पड़ा हुआ काम पूरा करने के लिए बेलगाम ओवर-टाइम करने लगता है। हमें कुछ दिनों का ही नहीं बल्कि महीनों का बाकी पड़ा काम पूरा करना था।

उस दिन सारा इतिहास अपनी बेपरवाही कि शक्ल में वापस याद आ गया। जब हम स्कूल से छूट कर घर आते ही बस्ते को इस तरह पटक देते थे जैसे वह सदियों से हमारे कंधों पर बोझ की तरह लदा पड़ा हो। घरवालों का बार-बार कहना कि क्या स्कूल में टीचर कोई काम नही देती, तो उन्हें तसल्ली देने के लिये यह कहने मे कोई हर्ज़ नही होता कि हमने तो अपना सारा काम स्कूल में ही निपटा लिया है, आपको चेक करना हो तो कर लो। हमें यह बात पता थी कि हमारी कॉपी पर लिखी हुई तारीख के अलावा वे कुछ और नहीं समझ पायेंगे और सबूत के बतौर हमारी लिखावट तो वहां मौजूद थी ही।

लेकिन अपने इस इतिहास को याद करने के बाद हमें अपने आप पर गुस्सा और शर्म दोनों आ रहा था और साथ-साथ उन छाया जैसों से जलन भी होती, जो अपना सारा काम पूरा कर टीचर की नज़रों में वाहवाही बटोरती रहती है।

देखते ही देखते हमारे अड़तालीस घंटों की डेड लाइन में से सिर्फ तीस-बतीस घंटे ही बच रह थे। इस सोच-सोच में ही हमारे स्कूल की छुट्टी भी हो गयी। फिर वही घर जाना और बस्ता फेंक कर स्कूल के सारे गिले-शिकवे भुला कर बाहर गली में अपने दोस्तों के पास खेलने निकल आना।

खेल ही खेल में अपने स्कूल के काम की टेंशन वापस याद आई तो जल्दी से खेल बीच में ही छोड़ घर की तरफ दौड़ पड़ी और कॉपी के पन्नों को इधर से उधर पलटने लगी। जिस वक्त मैं पन्नो को भरने में उलझी थी तो घर के बाकि लोग टेलिविजन देखकर मेरा मन ललचा रहे थे।

नज़रों के सामने पड़ी कॉपी में शोभा मैडम की ही शक्ल नज़र आती। महीनों का बचा काम इतनी जल्दी बिना किसी मदद के कर पाना मुश्किल था इसलिए कुर्सी पर बैठे हुये किसी सोच में डूबी थी और अपने शातिर दिमाग में मैडम की डांट से बचने की कोई तरकीब लड़ा रही थी। फिर अचानक से उठी और अपनी कॉपी के पिछले पन्नो को बड़े गौर से देखने लगी। कई पन्नो पर शोभा मैडम के बिलकुल एक समान हस्ताक्षर थे। मैं उसी हस्ताक्षर पर बार-बार पेंसिल दोहरा रही थी।

बच्चों को साइन करने का बड़ा शौक होता है। लेकिन टीचर के साइन को गौर से देखना दिमाग में अजीब सी हलचल पैदा कर रहा था। अगले दिन उटपटांग सी किसी चाल को बुनकर बड़ी ही चहल-पहल के साथ अपनी सहेलियों के ग्रुप के पास आकर खड़ी हो गई और मौका मिलते ही नीलम को बताया। नीलम ने फिर सहेलियों को संबोधित किया, “मेरे पास शोभा मैडम कि डांट से बचने की लिए एक रामबाण उपाय है।” सभी हैरत के साथ पूछने लगे, “बता न यार क्या बात है?”

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“तो सुनो मेरी तरकीब। मैं सोच रही हूँ कि क्यों ना हम अपना आधा-अधूरा काम करके कॉपी को खुद से चेक करके मैडम को दिखा दें कि हमारी कॉपी तो आपने पहले ही चेक कर दी थी…। लेकिन यह बात सिर्फ हमारे बीच ही रहनी चाहिए और मैडम की छाया को तो बिलकुल भी पता नहीं चलनी चाहिए।”
सभी मेरे चेहरे को देख ही रहे थे कि क्लास में टीचर दाखिल हुई और इतनी ही बात पर महफिल को तोड़ते हुये सभी अपनी-अपनी जगह बैठ गए।

इस तरकीब को सुनकर सब ठहाके मार कर हंस रहे थे। बस फिर क्या था, नीलम भड़क उठी और कहने लगी, “अपना सारा काम ईमानदारी से पूरा तो करो, मैं भी देखती हूँ तुम को कितने मार्क्स मिलते हैं।” शोभा मैडम भी क्लास में आ चुकी थी। उनके गुस्से से भरे चेहरे को देखने पर पता चला कि मैडम के अल्टिमेटम के सिर्फ चौबीस घंटे ही रह गए हैं। फिर समझ आया कि टीचर के प्रकोप से सिर्फ वही तरकीब हमें बचा सकती है। अब तो हम इंतज़ार कर रहे थे कि कब मैडम जाएँ और हम उस तरकीब पर अमल करें। टीचर के जाते ही सभी मेरे डेस्क के पास ऐसे जुट गए जैसे गुड़ के पास मक्खियाँ क्योंकि यह आइडिया भले ही मेरे पास था लेकिन टीचर कि जगह हस्ताक्षर करने कि हिम्मत तो सिर्फ नीलम में थी।

हमें अब अपना काम जल्दी करना था। हमारा काम बड़े ज़ोरों-शोरों से चल पड़ा और आखिरकार शोभा मैडम के आने से पहले ही खत्म भी हो गया। सभी के कहने पर नीलम ने सबसे पहले खुद ही की कॉपी मैडम के फर्जी हस्ताक्षर कर मैडम को दिखाने ले गयी। जब मैडम को दिखाने के लिए कॉपी टेबल पर रखी तो मैडम कभी कॉपी को देखती तो कभी नीलम को, नीलम भी कभी कॉपी को देखती फिर मैडम को और अपनी निगाहें नीचे झुका लेती। अचानक मैडम ने कहा “और बताएं कितने मार्क्स देंगी आप अपने ही कॉपी को, शोभा मैडम नंबर दो?” और कुर्सी से उठ एक थप्पड़ जड़ दिया और कहने लगी, “कल अपने साथ अपने पैरेंट्स को भी ले आना, ज़रा उन्हें भी तो पता चले कि उनकी बेटी कितनी तरक्की पर चल रही है।”

इतना सुनते ही सब हंसने लगे। नीलम ने जब देखा कि उसकी बेइज्जती पर दोस्त सब ही हंस रहे हैं तो उसे गुस्सा आ गया। उसने हम सहेलियों को देखते हुए कहा, “हँस क्या रही हो? तुमने भी तो अपनी कॉपी मुझसे ही चेक करवाई है।” यह सुनकर मैडम उनके पास गई और उनके पीछे भी पड़ गई।

उस दिन हम सब को एक साथ दो मुहावरों का मतलब और उनका असल ज़िंदगी मे उपयोग भी पता चला-

पहला- जिसका काम उसी को साजे, दूजा करे तो ठेंगा बाजे…
(यह हम सब पर सूट होता था)

दूसरा- हम तो मरेंगे सनम, तुमको भी ले के डूबेंगे…
(यह नीलम पर फिट बैठता है)

पूजा का जन्म 1996 दिल्ली में हुआ। ये अभी बी॰ए सेकंड इयर मे पढ़ती है । दक्षिणपुरी में रहती हैं। अंकुर के मोहल्ला मीडिया लेब पिछले एक साल से जुड़ी है इन्हे लेब सुनने सुनाने माहोल मे मे अपनी रचनाओ को सुनने और दूसरों की रचनाओ सुन कर उस पर संवाद करना पसंद है। इनकी दोस्ती किताबों से जल्दी होती है।

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By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Sushila is one of the most educated women in her district of Kolamjara. But when she decided to run for Gram Pradhan, she faced massive discrimination because she’s a Dalit. She shares her story.

चित्रकूट जि़ले के मऊ ब्लाॅक, कोलमंजरा ग्राम पंचायत से सुशीला ने 2015 में ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ा। 28 साल की सुशीला अपने जि़ले की सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी महिला हैं। एम.ए., बी.एड. कर चुकी सुशीला गांव के कल्याण और समाज सेवा में लगी हुई हैं।

अपने शुरुआती संघर्ष को बताते हुए सुशीला कहती हैं, “जब मैं पढ़ने के लिए मऊ जाया करती थी तभी से मुझे दलित जाति की होने के कारण लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता था। इसके बाद जब मैंने चुनाव लड़ने का सोचा तब तो हर तरफ से मेरा विरोध किया जाने लगा। व्हाट्सएप पर, फोन पर और रास्ते में आते-जाते हुए लोग मुझसे उल्टी-सीधी बातें किया करते थे।

प्रधान बनने के बाद जैसे सब बदल गया है। लोग अब आदर करते हैं, मेरी बातों को सुनते हैं, अपनी समस्याएं बताते हैं। मेरा सहयोग करने के लिए यहां कोई नहीं है। इसलिए प्रधानी का सभी काम मैं अकेले ही करती हूं। गांव के विकास के लिए अस्पताल बनवाना, शौचालय बनवाना, गरीबों के लिए आवास बनवाना, आदि कई काम करती हूं।

मैं अपने जैसी बाकी महिलाओं को यह संदेश देना चाहती हूं कि लड़कियों को पढ़ाओ और बेटा-बेटी में कोई फर्क न करो। मैं अपनी लगन और मेहनत से प्रधान बनी लेकिन यदि सभी लड़कियां पढ़ेंगी तो शायद वो प्रधानमंत्री भी बन जाएं।”

Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

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अविनाश कुमार च़चल

7मंगलवार 23 फरवरी की सुबह जब मैं यह ब्लॉग लिखना शुरु किया तो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पाँच छात्र प्रशासनिक भवन (एड ब्लॉक) पर बैठे थे। लेकिन वो सिर्फ पाँच नहीं थे। कैंपस में उनके साथ सैकड़ों छात्र भी बैठे हुए थे। रातभर एक बेहतर दुनिया और देश बनाने पर विचार करते हुए, गीत गाते हुए वो निर्भिक बैठे थे। जिन पाँच छात्रों पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया है, वे संविधान और कानून में विश्वास जताते हुए देशभर में आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और शोषित तबकों पर किये जा रहे अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करने का आह्वान कर रहे थे। दूसरी तरफ पूरे देश में इन छात्रों के समर्थन में लोग लिख रहे थे। सोशल मीडिया पर इन छात्रों के भाषणों को अपलोड किया जा रहा था, उसे हजारों लोग शेयर कर रहे हैं, सुन रहे हैं। अपलोड किये इन्हीं भाषणों में से एक में छात्र ओमर खालिद कह रहा है- “अगर विश्वविद्यालय में असहमति का अधिकार नहीं है तो वह जेल जैसा है। इसलिए हम अपने बोलने की आजादी के लिये संघर्ष जारी रखेंगे।”

कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के हित में आवाज़ उठाने वाली कार्यकर्ता सोनी सोरी पर हमला किया गया। अभी उनका ईलाज चल रहा है। रविवार 27 फरवरी को ग्वालियर में मशहूर समाजशास्त्री और जेएनयू में प्रोफेसर विवेक कुमार की सभा में हिंसक वारदात को अंजाम दिया गया। पूरे देशभर से ऐसी खबरें आ रही हैं, जिसमें बोलने की आजादी पर हिंसक हमले भी किये जा रहे हैं। हमारे लोकतंत्र के लिये असल खतरा ऐसी घटनाएँ हैं।

लेकिन इन सारी बुरी खबरों के बावजूद उम्मीद जिन्दा है। आज देशभर में हज़ारो लोग अपनी अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र को बचाने के लिेये सड़कों पर उतर चुके हैं। 18 फरवरी की शाम ट्विटर पर मंडी हाउस ट्रेंड कर रहा था। उसी दिन दोपहर मंडी हाउस से जंतर-मंतर एक प्रोटेस्ट मार्च निकाला गया। करीब 15 हजार लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। हिस्सा लेने वालों में छात्र, प्रोफेसर, कलाकार, लेखक, मजदूर, किसान, सामाजिक कार्यकर्ता, सब थे। मार्च में शामिल लोग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिहाई की मांग कर रहे थे, जेएनयू के छात्रों पर लगे देशद्रोह के मुकदमे को हटाने की मांग कर रहे थे, जेएनयू को बदनाम करने की साजिशों के खिलाफ नारे लगा रहे थे।

पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने एक बार फिर कुछ सवाल उठाये हैं:

क्या भुखमरी से आज़ादी की माँग देशद्रोह है? क्या दंगाईयों से आज़ादी की माँग देशद्रोह है? क्या मुनाफाखोर पूंजीवादी व्यवस्था से आज़ादी की माँग देशद्रोह है ? क्या अपने देश के खेत, पानी, जंगल को बचाने की मांग करना करने वाला राष्ट्रविरोधी है? क्या देश के पर्यावरण को बचाने की मांग करना राष्ट्रविरोधी है? क्या किसानों की आत्महत्या पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोधी है? क्या विस्थापन के खिलाफ आवाज उठाना राष्ट्रविरोधी है? क्या सरकार की नीतियों से असहमत होना राष्ट्रविरोधी होना है?

और क्या कॉरपोरेट सेक्टर को लाखों करोड़ रुपये का टैक्स छूट दे देना राष्ट्रवादी कदम है? क्या किसानों की आत्महत्या को फैशन बताना राष्ट्रवादी कदम है? क्या किसी के घर में घुसकर उसके कथित रूप से कुछ खाने पर उसे मार देना राष्ट्रवादी कदम है? क्या अदालत परिसर में पत्रकारों, प्रोफेसरों और छात्रों के साथ खुलेआम मारपीट करना राष्ट्रवादी कदम है? क्या कानून और संविधान की मूल भावना के खिलाफ देश में नफरत की राजनीति करना राष्ट्रविरोधी कदम नहीं है? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश से इस परिपक्वता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वहां बोलने की आजादी, सवाल उठाने की आजादी और असहमत होने की आजादी दी जायेगी?

आज हमसब इन सवालों से जूझ रहे हैं। पिछले कुछ सालों से लगभग दुनिया भर में राष्ट्रवाद को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है। हमारे देश में भी यह बहस अपने तीखे सवालों से साथ मौजूद है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि वर्तमान सरकार अपने निजी हितों के हिसाब से राष्ट्रवाद को परिभाषित करने की कोशिश मे जुटी है? क्या टीवी चैनलों के माध्यम से जनता के बीच यह प्रचारित नहीं किया जा रहा है जो भी सरकार की नीतियों के खिलाफ बोले, वह राष्ट्रविरोधी है?

IMG_5530कन्हैया कुमार और जेएनयू इसी सरकारी प्रोपेंगडा के शिकार हुए हैं। इससे पहले भी सामाजिक कार्यकर्ता और अपने अधिकारों के लिये आवाज उठाने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा लगाया जाता रहा है। कूडंकुलम इसका एक उदाहरण है, जहां परमाणु परियोजना का विरोध कर रहे स्थानीय समुदाय के लोगों पर देशद्रोही होने का मुकदमा लगाया गया था, तमिलनाडू में शराबबंदी के खिलाफ गीत गाकर लोगों को जागरुक कर रहे लोकगायक कोवन पर भी देशद्रोही होने का मुकदमा लगाया गया। इसी तरह मध्यप्रदेश में स्थानीय वनसमुदायों के हितों के लिये संघर्ष कर रही प्रिया पिल्लई को राष्ट्रविरोधी बताया गया, देश के पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाने वाली ग्रीनपीस जैसे संस्थाओं पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप लगाया गया, समावेशी विकास की बात करने वाले संस्थाओं का एफसीआरए निरस्त किया गया और अब जेएनयू को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताया जा रहा है।

जेएनयू को शायद इसलिए टारगेट किया जा रहा है क्योंकि पिछले दशकों में इस विश्वविद्यालय ने देश भर के तमाम समस्याओं पर लगातार सरकारों से असुविधाजनक सवाल पूछता रहा है। उन्होंने विकास के उस मॉडल पर सवाल उठाने की हिम्मत की, जिसमें देश का एक बड़ा तबका गरीब से गरीब होता चला गया है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों पर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने कब्जा जमा लिया है और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है।

देश आज कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। जब टीवी चैनल में जेएनयू पर पैकेज बनाया जा रहा उसी बीच छत्तीसगढ़ में कॉर्पोरेट कंपनी को खदान देने के लिये आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है, देश के कई हिस्सों में सैकड़ों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लोगों की भूखमरी से मौत हो रही है। रोहित वेमुला जैसे दलित छात्रों को विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव की वजह से आत्महत्य करना पड़ रहा है। क्या यह खबरें पूरे देश को नहीं जाननी चाहिए, क्या उन्माद फैलाने की जगह इन सवालों पर पूरे देश में बहस नहीं होनी चाहिए, क्या साफ हवा, पानी और बेहतर जीवन का अधिकार सबको मिले, इसके लिये देश की सरकार और खुद सभी देशवासियों को नहीं प्रयास करना चाहिए?

लेकिन यह सारे सवाल आज गायब होते नज़र आते हैं। देश को असल समस्याओं से भटकाया जा रहा है। राष्ट्रवाद का मतलब किसी खास राजनीतिक पार्टी या नेता की अंधभक्ति बताया जा रहा है, उस समय राष्ट्रगान रचयिता रविन्द्रनाथ टैगोर को याद किया जाना जरुरी है, जिन्होंने कहा था- राष्ट्रवाद और मानवता में मैं सबसे पहले मानवता को चुनना पसंद करुंगा।

Posted by ROHIT KUMAR in Hindi

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रोहित कमार:

“कमी नहीं कद्रदां की अकबर, करो तो पहले कमाल पैदा” – अकबर इलाहाबादी

r k laxmanमशहूर उर्दू शायर अकबर इलाहाबादी का उपरोक्त शेर भारतीय ‘आम आदमी’ के सर्वमान्य प्रतीक रासीपुरम कृष्णा स्वामी लक्ष्मण अर्थात आर के लक्ष्मण पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आर के लक्ष्मण एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही दिमाग में ‘आम आदमी’ की एक ऐसी छवि उभर आती है जिसकी गहरी पीड़ा को उन्होंने अत्यंत ही सहजता से अपने व्यंग्यात्मक कार्टूनों के माध्यम से जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किया और साथ ही इस पर सोचने के लिए विवश भी। उन्हें चित्र-व्यंग्य का भिष्मपितामह कहा जाना किसी भी रूप में अतिश्योक्ति नही है।

उनका जन्म दिनांक 24 अक्टूबर 1921 को मैसूर में हुआ था। उनके पिता एक शिक्षक थे, वह सात भाई-बहन थे जिनमे उनके बड़े भाई प्रसिद्ध उपन्यासकार आर के नारायणन भी शामिल थे। उन्हें बचपन से ही कार्टून बनाने का बहुत शौक था। बचपन में एक बार पीपल के पत्ते का चित्र बनाने के लिए उन्हें अपने शिक्षक से अत्यंत सराहना मिली जिससे प्रोत्साहित होकर उनके अन्दर चित्रकार बनने का एक जूनून सवार हुआ और उनके इसी जूनून ने उन्हें विश्व के प्रमुख व्यंग्य-चित्रकारों में एक अलग एवं विशिष्ट पहचान दिलाई।

वह ब्रिटेन के मशहूर कार्टूनिस्ट सर डेविड लौ से अत्यंत प्रभावित थे। एक बार मुंबई के प्रसिद्ध जे जे कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स ने उन्हें यह कहते हुए उनका दाखिला लेने से इंकार कर दिया था कि उनके चित्रों में ऐसी कोई विशेष बात नही है। कुछ वर्षों के उपरांत ही उन्हें उसी संस्थान में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया था।

वह कभी भी असफलता से घबराते नहीं थे और यही कारन है कि उनके कार्टूनों में ‘आम आदमी’ की रीढ़ हमेशा सीधी रही क्योंकि यह ‘आम आदमी’ कभी झुका नही। 1947 में लक्ष्मण ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से जुड़े जहाँ 1951 में उनका कॉलम “यू सेड इट” अर्थात “यह आपने कहा” नाम से प्रथम पृष्ठ पर शुरू हुआ जो एक “आम आदमी” की आवाज़ बनकर उभरी। लक्ष्मण के ‘आम आदमी’ की खास बात यह थी कि वह कुछ न कहकर भी सबकुछ कह जाता था। सूक्ष्म के सहारे विराट का परिचय कराने की जो कला लक्ष्मण के पास थी वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अपने चित्र-व्यंग्य के माध्यम से ‘आम आदमी’ की पीड़ा के साथ-साथ समाज की विकृतियों, राजनीतिक विचारधारा की विषमताओं को भी व्यक्त किया।

विसंगती की पहचान के लिए समाज हितैषी राजनीति की समझ और समाज-विरोधी तत्वों की जैसी पहचान लक्ष्मण के कार्टूनों में मिलती है वैसी अन्यत्र नही। अपने कार्टूनों में भारतीय राजनीती की विशिष्टताओं के विभिन्न पहलुओं को अत्यंत ही मुखरता एवं निर्भयता से उजागर करने वाले आर के लक्ष्मण ने लम्बे समय तक ‘आम आदमी’ की आवाज़ को व्यंग्यात्मक लहजे में व्यक्त किया और अपनी कृतियों से लाखों लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट ला दी। उनके इन्ही अदभुत एवं अद्वितीय व्यक्तित्व के कारन 1984 में उन्हें ‘रैमन मैग्सेसे पुरष्कार’ से नवाजा गया। इसके साथ ही 2005 में भारत की सरकार ने भी उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से नवाज़ा।

एक लम्बी बीमारी की वजह से आम आदमी को एक स्वतंत्र आवाज़ देने वाले इस महान शख्सियत ने 26 जनवरी 2015 अर्थात भारतीय गणतंत्र दिवस के दिन ही सदा-सदा के लिए ‘आम आदमी’ को अकेला छोड़कर जीवन के सबसे बड़े सार्वभौमिक सत्य से साक्षात्कार हेतु प्रस्थान किया। आज वह हमारे बीच नहीं रहे परन्तु उनके आम आदमी का अमर चित्र हमारे मानस-पटल पर स्मृति के रूप में सदैव संचित रहेगा।

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रवि रणवीरा:

अच्छा हुआ है कि अभी तक जातियता की परिभाषा देने वालों की नज़र ‘D.Lit.’ शब्द पर नहीं पङ़ा है वरना अभी तक इसको भी ‘दलित’ उच्चारण कर – कर के राजनीतिक दलदल में डाल दिया होता और इसी डर से अशोक वाजपेयी ने डी . लिट . की ख्याति वापस कर दी। खैर भारत की राजनीति की बात ही निराली है क्योंकि यहाँ पल-पल में लोगों को देशद्रोही व सहिष्णु-असहिष्णु बनाया जाता है और जात-धर्म के ऊपर राजनीतिक चक्र तो आजादी के साथ ही चलता आ रहा है। परंतु यह सवाल तो पुराना है क्योंकि मौजूदा माहौल तो ऐसा हो गया है कि एल. के. अडवानी ने कुछ महीनों पहले कहा कि देश में आपातकाल की स्थिति आने वाली हैं और हो ना हो यह बात सामने आ जाएगी।

और कहें भी क्यों नहीं, भला क्योंकि कुलबर्गी जैसे निष्पक्ष लेखक को मौत और राम मंदिर आंदोलन के बारे में सच लिखने वाले रामचंद्र गुहा जैसे लेखक को पाकिस्तान जाने की नसीहत दी जा रही है। छोङ़ीए यहां तो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर तक को देशद्रोही कहा गया और इतना ही नहीं कई बार तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया लेकिन जो निष्पक्ष हैं वो तो लोकतंत्र के लिए ही समर्पित है और वो हर हाल हर साल हर बार छिपे हुए राजतंत्र के चाल को नाकाम करने की कोशिश करेगा ही करेगा क्योंकि “जग के जोगी को डर काहे का “। विदेशी सम्बन्ध तो मजबूत हो रहें हैं लेकिन देश के हालात पर काबू करना जरूरी है क्योंकि राष्ट्र की शांति ही विकास के मार्ग की पहली सीढ़ी होती है। वैसे भी सोशल नेटवर्क ने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन से सबको जोङ़ कर रखा है तो बेहतर होगा कि पहले घरेलू कलह को खत्म किया जाए तभी तो होगा सबका साथ, सबका विकास का सपना पूरा। लेकिन हालात तो कुछ ऐसे हैं:

बीजेपी शासन काल का बगावती दौर

बीफ पर बवाल, मंदिर-मस्जिद पर बवाल, राष्ट्रीय गीत, असहिष्णुता पर उठते सवाल इत्यादि मुद्दो से तो जनता घबराई हुई थी फिर भी हालात को ना समझते हुए, ऐसी स्थिति हो गई है कि देश की जागरूक जनता अब सचमुच में बौखला गई हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के लगभग दो साल के शासन काल में ही तीन बङ़े युवा आंदोलन हुए और अभी तो तीन साल बाकी है मोदी सरकार के, इसलिये लोग व्याकुल भी हैं। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने जनता के लिए काम नहीं किए हैं , लेकिन जिस तरह का युवा जनाक्रोश हो रहें हैं, उनके समक्ष विकास और विश्वास की लहर टूट गई है सरकार के प्रति। लोगों को तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि क्या यह वही नरेंद्र मोदी हैं जो कि चुनावी रैली के दौरान युवा भारत का नारा लगा रहे थे।

ftiiराजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार के पीछे युवाओं का बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि उस समय देश में लगभग 75% युवा मतदाता सूची में शामिल थे। लेकिन बात अगर हम फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे की करें तो यहां गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ छात्र आए क्योंकि बीजेपी ने राजनीतिक तौर पर नियुक्ति की है जो कि बिल्कुल भी उचित नहीं है। इस नियुक्ति की निंदा पुरे देश ने की फिर भी सरकार खामोश हैं और देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्र भी अपने भविष्य की चिंता छोड़ कर खङ़े है सरकार के कुनियुक्ति के खिलाफ। हालांकि यहां 1962 से लेकर अब तक 40 हङ़तालें हो चुकी हैं, लेकिन यह अब तक की सबसे बड़ी हङतालो में से एक हैं। बात अगर मिडिया शोधों के आधार पर करें तो यह केवल गंदी राजनीति का नतीजा है और श्रेष्ठ कलाकार अनुपम खेर, परेश रावल व पेंटल के आधार पर गजेंद्र के पास लगभग 200 फिल्मों का अनुभव है तो इसीलिए उनके विजन और सोंच को भी अनुभव के आधार पर एक मौका दिया जाना चाहिए। हाँ, यह बात भी सही है कि अब तक के चेयरमैन के तुलना में गजेंद्र चौहान कुछ नहीं है लेकिन वरिष्ठ कलाकार व निर्देशक श्याम बेनेगल जो कि एफ.टी.आई.आई. के चेयरमैन रह चुके हैं कि उन्होंने कहा कि “चौहान बीजेपी से है तो इसका मतलब यह थोड़ी हैं कि वह निर्देश देंगे कि सारी फिल्में भगवा रंग में बनाओ”।

Image posted by #OccupyUGC on their Facebook page
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वास्तव में इस बात पर गौर करना चाहिए और अनुभव के आधार पर गजेंद्र चौहान को अवसर देना चाहिए। दुसरा छात्र आंदोलन जो नोन नेट फेलोशिप पर था यानी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास किए बिना उच्च शिक्षा ( एम. फिल  व पी.एच.डी.) के लिए छात्रवृत्ति नहीं मिलेगी। लेकिन यह सम्भव नहीं है कि सभी लोग इस परीक्षा को पास कर लें क्योंकि यह कोई सामान्य परीक्षा नहीं है और यह फैसला छात्रों के विकास के प्रति नहीं है। इस आंदोलन की निंदा तो व्यापक रूप से हुई क्योंकि हमारे देश के छात्र तो बेरोजगारी जैसी समस्याओं के वजह से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए सामर्थ्य जुटा नहीं पाते हैं और जो आगे पढ़ना चाहते हैं उनको इस तरह हतोत्साहित करना तो कतई उचित नहीं है। पूरे देश के छात्र-छात्राओं ने इसका विरोध किया लेकिन सरकार को तो कोई खबर ही नहीं है।

hyderabadतीसरा बड़ा छात्र आंदोलन जो कि अभी तक जारी है, रोहित वेमुला का आत्महत्या काण्ड जिसके समर्थन में भारत के सारे विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं समेत प्रोफेसर तक धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय इस वक्त दिल्ली के रामलीला मैदान में तब्दील हो गया है। लगभग देश के सभी युवाओं में एक-सा परिवर्तनकारी लहर सवार हो गया है क्योंकि एक के बाद एक लगातार राष्ट्रीय स्तर पर जन-आंदोलन चल रहे हैं और सरकार है कि कोई फैसला नहीं ले रही हैं।

सरकार अगर तत्काल फैसले पर विचार करती है तो विश्वविद्यालय स्तर के मसले पर राष्ट्रीय स्तर के हस्तक्षेप नहीं होते। एक तरफ से देखा जाए तो बीजेपी सरकार भी व्याकुल हो गई है क्योंकि सही निर्णय लेने के बजाय इस मुद्दे को दलित व अन्य विवादों से जोड़ कर उकसाने का काम कर रही हैं जो कि बीजेपी व छात्र हित में नहीं है। बल्कि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो छात्र साफ-साफ कह रहे हैं कि हमें बस इंसाफ चाहिए और कुछ नहीं। खुद को राष्ट्रभक्त कहने वाली पार्टी ही इस केस को घुमा फिरा रहीं हैं जबकि सच तो यह है कि इंसाफ देने के लिए कोई धर्म व जात गत मापदंड नहीं बनाया गया है तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि वह दलित था या नहीं था।

छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज का आदेश

“जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।” जो कि वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी व आज के मौजूदा छात्र पर फबता हैं। छात्र तो अराजकता-नाइंसाफी के खिलाफ सङ़क पर आ गए हैं क्योंकि लोकतंत्र के साथ नाइंसाफी होती है तभी जनाक्रोश बाहर आता है , अम्बेडकर भी इस बात को मानते थे।

समस्याएं तो बहुत है पर समाधान कुछ नहीं है जिसके कारण आज यह छात्र आंदोलन हो रहे है। हम ऐसा भी नहीं कह सकतें हैं कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है क्योंकि अगर ऐसा होता तो शायद इंसाफ की गुहार लगाते छात्रों पर पुलिस अंधाधुंध लाठीचार्ज नहीं करती। पुलिस इस तरह से अपराधियों के साथ भी पेश नहीं आती और इस तरह के रवैये को पूरे देश की मिडिया ने निंदा की है क्योंकि यह अमानवीय व्यवहार से भी परे है। लाठीचार्ज का पालन जितनी तेजी से किया गया, अगर उतनी तेजी से छात्रहित में फैसला सुनाया गया होता तो आज बीजेपी के ब्लैक दिन नहीं आते और ना ही हमारा डेमोक्रेसी, ‘डेमोक्रेजी ‘ में तब्दील होता। आज के छात्रों के आंदोलन को भले ही राजनीतिक शिकार माना जा रहा है लेकिन वास्तव में देखा जाए तो पहले आंदोलन शुरू हुए फिर नेताओं का आवागमन हुआ है और यदि आपकी सरकार भी विपक्ष में होती तो ऐसा ही करती। पर विडंबना तो यह है कि आप सत्ता में हो कर भी राजनीति कर रहे हैं और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा का यह वक्तव्य “पार्टी अगर अपने इस रवैये को नहीं बदली तो जनता धूल चटा देगी” पुष्टि भी कर रहा है।

एफ. टी. आई. आई. तो राजनीति का शिकार हैं तभी तो देश के अन्य हिस्सों के छात्रों ने समर्थन नहीं दिया लेकिन नो नेट फेलोशिप व रोहित वेमुला काण्ड में पूरा देश समर्थन दे रहा है इसलिए यह राजनीतिक शिकार नहीं है। लेकिन इन तीन आंदोलनों ने बीजेपी सरकार को झकझोर कर रख दिया है और दुसरी तरफ अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के मसले भी सामने आए हैं तो इससे यह साफ-साफ दिख रहा है कि लगभग सारे सरकारी शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है और बेचारे छात्र नदी के किनारे की तरह बस राजनीतिक या भ्रष्टाचार की मार झेल रहे हैं।

तभी तो रोहित जैसे निडर व कुशल छात्र ने अपने अनमोल जीवन को त्याग दिया और आत्महत्या-पत्र के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वह समाजिक विकास का समर्थक था तभी तो उसने किसी को भी कसूरवार नहीं कहा और आंदोलन के लिए भी मना कर दिया। लेकिन रोहित जैसे अन्य होनहार छात्रों को बचाने के लिए जरूरत है, छिपे हुए राजतंत्र को खत्म करने की। इस तरह के आंदोलन से सरकार के साथ – साथ छात्रों को भी बहुत नुकसान हो रहा है और साधारण तौर पर देखा जाए या कुछ विशेषज्ञों के अनुसार एक जन हङ़ताल व आंदोलन की वजह से विकास कार्य लगभग छह माह पीछे चला जाता है।

और यह समाज के लिए हितकारी तो कतई नहीं है लेकिन क्या करें, कुछ विशेष रिपोर्टों के मुताबिक हङ़ताल की वजह से ही पारदर्शिता आती है और एक निष्पक्षता का जन्म होता है या अनुभव के आधार पर बात किया जाए तो यह सत्य भी है और जरूरी है असमाजिक तत्वों को खत्म करने के लिए। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जन-जन के नेता हैं और जिस तरह से वे विदेशी देशों के साथ मधुर रिश्ते बनाने में सफल हो रहे हैं तो इस आधार पर पर उन्हें कुशल व सफल नेता कहना ही उचित है। लेकिन अब जरूरत है कि वे देश में पैदा हुए कलह व अराजकता को मिटा कर युवाओं के साथ भी रिश्तों को सुधारें ताकि युवा भारत का सपना पूरा हो सके। आप लोकतंत्र की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे हैं और उम्मीद है कि आप निष्पक्षता के आधार पर कर्मठता दिखाएंगे।

kitchen ankur society story

सुनयना:

kitchen ankur society storyदोपहर के तकरीबन एक बजे का समय था और गरम हवाओं के साथ मौसम कुछ नम था। ऐसी तपती दोपहर में जब काफी समय बाद घर लौटी तो पता चला कि माँ घर में नहीं थी। कई महीनों बाद मैं दिल्ली लौटी थी, जहां मेरी मम्मी, पापा, भाई, बहन सब रहते हैं। घर में घुसते ही मैंने कुछ बदलाव महसूस किए।

मुझे देख दोनों छोटे भाइयों के चेहरों पर मुस्कान थी। घर का सन्नाटा भी दबे पांव बाहर निकल गया और चहल-पहल मेरे साथ दाखिल हुई। सभी आ-आकर मिल रहे थे, बातें कर रहे थे – कुछ यहाँ की तो कुछ वहाँ की, जहां मैं रहकर आई थी, पंजाब अपने गाँव की। बस माँ ही घर में नहीं थी जिनसे मैं ढेरों बातें करना चाहती थी। मैंने जब अपने भाइयों से पूछा तो उन्होने बताया कि ‘मम्मी-पापा दोनों मौसी के घर गए हुये हैं, शाम तक ही लौटेंगे। तुम आओगी इसलिए हमें घर पर ही छोड़ गए, वरना हम भी उनके साथ जाते।’

उफ़्ह… मेरी वजह से इनका जाना रह गया, और तो और, इसका मतलब था कि आज का पूरा दिन मुझे ही संभालना था।

मैं सोच ही रही थी कि सबसे छोटे भाई ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा “बहुत भूख लगी है, जल्दी से कुछ खाने को दे दो।” मैंने दोनों भाइयों से कहा, ‘बस थोड़ी देर रुको, मैं कुछ बना देती हूँ। एक लंबी सांस भरते हुये किचन का दरवाजा खोला जिसके किवाड़ आपस में भिड़े हुये थे। किवाड़ खोलकर जैसे ही सामने देखा तो गैस पर सुबह की चाय के बर्तन ज्यों के त्यों पड़े थे। कुछ चाय पिये हुये कप, चाय बनाने वाला बर्तन आदि गैस के पास ही फैले पड़े थे। चीनी, पत्ती और कुछ मसालो के डब्बे भी गैस के पास ही रखे हुये थे। रात के बर्तन भी ऐसे ही पड़े थे।

रसोईघर की यह हालत मैंने पहली बार ही देखी थी। वो भी मम्मी की गैरहाजरी में। मम्मी घर में होती है तो किचन की सारी चीजें अपनी जगह पर मुस्कुरा रही होती हैं। किचन कुछ ऐसी हालत में था जैसे सभी काम अधूरे में ही छूट गए हों।

मैं कुछ पल ठहरी फिर शांति से सोचा कि मुझे ही करना होगा। क्यूँ न आज मैं किचन संभालकर देखूँ। वैसे भी काफी दिन हो गए कुछ पकाए हुये। गाँव में तो कुछ करना ही नहीं पड़ता था। पानी पीने के लिए फ्रिज का दरवाजा खोला तो देखा कि पानी की एक भी बोतल नहीं है। सारी खाली बोतल गैस की शेल्फ के नीचे सिलेंडर के पास बिखरी पड़ी थी। बस अपना हाथ आगे बढ़ाते हुये वहीं से शुरुआत कर दी। पानी की सभी बोतलें साफ़ की और पीने के पानी से भर कर ठंडी होने के लिए फ्रिज में लगा दी। सारे गंदे बर्तन साफ किए और दीवार के एक कोने पर कीलों से लटके रेक पर सजाना शुरू कर दिये। ग्लास, कटोरी, चम्मच, थाली सभी को छोटे-बड़े आकार के हिसाब से टिका दिये। फिर बड़े बर्तन सिलेंडर के पास खाली हो चुकी जगह पर एक के ऊपर एक रख दिये। पहली बार मैंने किचन को अपने अनुसार सजाया था।

अब किचन बहुत ही अच्छा लग रहा था। पूरे घर के इस खास भाग में कुछ तो खास था जिसे आज मैंने पहली बार इत्मीनान से महसूस किया था। गैस की अजीब सी महक, एक कोने में रखी टोकरी से आती सब्जियों की महक, गले में धसक देते मसालो की महक, साथ ही साथ गैस पर पकने वाले खाने की महक। मैंने भाइयो के लिए खाना बनाना शुरू किया। जो अभी भी किचन के बाहर भूखे बैठे थे।

जब मसाले डालने की शुरुवात की तो मम्मी ने न होकर भी मेरी मदद की क्योंकि मसाले के हर डिब्बों पर उनके नाम की पर्ची लगी हुई थी। जैसे चीनी के डिब्बे पर चीनी, नमक के डिब्बे पर नमक, मिर्च के डिब्बे पर मिर्च लिखा हुआ था और सभी जरूरत के हिसाब से ही रखे हुये थे। दालों के डिब्बे एक तरफ, मसालों के एक तरफ और चाय बनाने की सामाग्री एक साथ रखी हुई नज़र आ रही थी।

जब मैंने मसाले डालने के लिए एक के बाद एक कुछ डिब्बे खोले तो देखा सभी डिब्बों के अंदर एक छोटी चम्मच जरूर थी जो स्वादानुसार मात्रा के हिसाब से एक-एक चम्मच ही लेने को कह रही थी। इन सभी चीज़ों पर नज़र मारते हुये मैंने मसालो का इस्तेमाल किया और बहुत ही कम समय में दोनों भाइयो के लिए बिना किसी परेशानी के खाना बना लिया। गरम-गरम पुलाव के साथ जब मैंने प्लेट भाइयों के सामने रखी तो उसकी खुशबू को अपनी साँसो में भरते हुये दोनों खुश हो गए, जो उनके चेहरे से साफ झलक रहा था।

दो चार चम्मच खाकर एक भाई ने सी… सी… करते हुये पानी मांगा और पानी पीकर एकदम से कहा बहुत तीखा है। शुरुवात के दो चार चम्मचो में जैसे भूख की वजह से ये तीखापन गायब हो गया था। तीखा कम करने के लिए मैंने एक चम्मच देसी घी डाल दी। जिससे कुछ राहत मिली। दूसरा भाई खूब मजे से खाते हुये कहने लगा, यह बहुत स्वादिष्ट है।

हमारे किचन में सभी चीजे ऐसे खास तरीके से लगी होती है की किसी अनजान को भी वहाँ काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती।

sunayna

 

 

सुनयना, जन्म 1997, ‘अंकुर- कलेक्टिव ‘की नियमित रियाज़कर्ता। दक्षिणपुरी में रहती हैं।

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सुरेश जोगेश:

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एक घटना जिसने मुझे आज उतना ही झकझोर करके रख दिया जितना दिसम्बर 2012 के “निर्भया काण्ड” ने किया था। बस एक चीज जो मुझे अतिरिक्त लगती है वो है उसका दलित होना और एक चीज जो मुझे गायब लगती है वो कड़ाके की ठण्ड में इंडिया गेट पर हाथ में मोमबतियां लिए देश भर के मुर्दों का इकठ्ठा होना। या फिर बजाय इसके मैं जिन्दा लाशों का कहूँगा।

उसे नया नाम देकर, उसके नाम से जाति हटाकर सब उस जघन्य घटना पर इंसानियत दिखाकर उसके लिए न्याय की मांग कर रहे थे। मैं सुबह 6 बजे आकर दिल्ली एयरपोर्ट के पास वाले बस स्टैंड पर उतरा था पर अपने काम से। जाड़े ने मेरी टांगों ने को इतना शून्य कर दिया था कि 5 मिनट के लिए खड़ा हो पाना मुश्किल हो रहा था पर उस दृश्य ने एक पल में यह सब भुलाकर दुसरे ही भारत में पहुंचा दिया था।

आज फिर एक कक्षा 4 की मासूम निर्भया के साथ बलात्कार हुआ है। ठण्ड भी पहले से जरा कम है पर इंडिया गेट है कि फिर भी सूना है। वो लाठियां खाती और इतनी ठण्ड में पानी की तेज बौछारें झेल रही भीड़ गायब है, वो मोमबतियां हाथ में लिए नारे लगाते जोशीले युवा गायब हैं।
न जाने किस जाति के रहे होंगे वो लोग, या फिर सब धर्म-सब जाति के लोग जो निर्भया के नाम से जाति छिपाने के कारण इकट्ठे हो पाए होंगे। जो कुछ भी इसके पीछे सोच रही होगी पर उसके लिए न वो निर्भया जिम्मेदार रही होगी ना ही यह। उनके साथ जब बलात्कार हुआ, जब उनके गुप्तांगों में सरिये और गन्ने ठूंसे गए तब वो दोनों शायद इस बारे में नहीं सोच रही होगी। दरअसल वो सोच तब हमारे दिमाग में पल रही होगी।

उसका दलित होना उसके पक्ष में नहीं गया या फिर उसके मां-बाप का मांग-मांगकर गुजार बसर करना।

स्कूल से आने के बाद गन्ने के खेत में पशुओं के लिए चारा चुनने गयी उस मासूम के साथ बलात्कार किया गया। फिर भी मन न भरने पर उसके नाजुक निजी अंगों में गन्ना ठूंस दिया गया। उफ्फ, कितना दर्दनाक और भयावह रहा होगा उस 10 साल की लड़की के लिए ये सब।

पिछला किस्सा देखता हूँ तो मीडिया का बड़ा योगदान रहा था तब। सारे मुद्दे भूलकर सिर्फ इस पर बात रखी गयी जिसका परिणाम भी हुआ। पर अब मीडिया भी गायब है। शायद मीडिया को उसका दलित होना गवारा नहीं। उनके समाचार पत्र, चैनल अछूत हो जाते होंगे शायद इसका कवरेज करते हुए. खैर, जो मसला रहा होगा, यह उनका अपना धंधा है, इसमें दखलंदाजी करने वाला मैं कौन होता हूँ।

उनकी वही जाने, क्या छापना है क्या नहीं यह उनका निर्णय होगा. कब कहना है कि भारत में जातिगत भेदभाव ख़त्म हो गया, कब नहीं. उस कार्यक्रम में मौजूद किस सख्श को दलित चिंतक बोलना है किसको मनुवादी चिन्तक/सवर्ण चिन्तक……नहीं। नहीं, ये नहीं हो सकता। मुझे जाने क्यूँ लग रहा कि इस दुसरे टैग से मेरा पाला पहली बार पड़ रहा है। खैर, फैसला फिर भी उनका ही होगा।

जिनके चैनल वही जानें, पर आप-हम को यह क्या हो गया?

कडाके की ठण्ड में पानी तेज की बोछारें और लाठियां झेलकर इंसानियत उस भीड़ को यह क्या हो गया? मोमबतियां हाथ में लिए नारे लगाते उन युवाओं को यह क्या हो गया?

देश का युवा और उनकी इंसानियत को शायद कुछ अलग चाहिए। जो बात आम है भला उसके लिए ये सब क्यूँ किया जाय। बोरिंग होती है, है न?

सवाल काफी हैं पर किसके पास जाया जाय जवाब के लिए? लाल किले का वो परिसर सूना है. वो मोमबतियां हाथ में लिए लाठियां, पानी की बौछारें झेलती वो भीड़ गायब है। अब वो सड़कें सूनी है।

या फिर मीडिया ने उस प्रवाह के साथ इस बात को उन तक पहुँचने ही नहीं दिया। उन्हें भी तो बोरियत होती होगी एक जैसी खबरे करते हुए, चूँकि उस वर्ग के लिए यह रोज की बात है जिस वर्ग से वो आती थी। समाचार पत्र, चैनलों को भी तो अछूत होने से बचाना पड़ता होगा। इसलिए कुछेक ने इसे चुटकी से छुआ है जैसे हम मरी छिपकली या ऐसी किसी अन्य गन्दी वस्तु को उठाकर साइड में रखते हैं या फेंक देते हैं।

उन जगहों पर ज्यादा ढूंढने पर हाथ में “Stop Caste Violence”(जातीय हिंसा बंद करो), “Rohith Vemula forever”, “Stop Institutional Discrimination”( संस्थानिक भेदभाव बंद करो) के बैनर लिए या डॉ आंबेडकर की प्रतिमायें लिए कुछ लोग नजर आते हैं।
सुनता हूँ कि रोहित की लडाई भी इसी सोच के खिलाफ थी। उसे अपना बलिदान देना पड़ा। जाने के बाद उसके साथ भी कुछ ऐसा होता दिखाई पड़ता है मुझे। चर्चा हर बार जाकर उसकी जाति पर रूकती दिख रही है, कुछ भी हो जाते-जाते वो एक क्रांति का बीज बो गया, पर शायद उसे जाति साफ़ बताके जाना चाहिए था या फिर सुसाइड नोट के साथ कास्ट सर्टिफिकेट ही छोड़ जाता।

लेकिन यह लिखते वक़्त पूरे रिसर्च के दौरान मैंने जितना खोजा उससे ज्यादा पाया।

कुछेक चैनलों ने “बलात्कार” के अलावा “दलित के साथ बलात्कार” नाम का अलग टॉपिक/टैग बना रखा है तो किसी ने इस नाम से अपनी वेबसाइट पर एक अलग पोटली. जहाँ इस तरह का कचरा डाल दिया जाता है।

फिर सोचता हूँ, तो क्या इनमें से एक भी निर्भया कहलाने के लायक नहीं थी? सब मिलकर एक निर्भया भी नहीं क्या?

Image source: Jon S/Flickr

रवि कुमार गुप्ता:

newspapers29 जनवरी 2005 को भारतीय पत्रकार सोसाईटी ने इस दिन को भारतीय अखबार दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया और 11 साल से हम इसे मनाते आ रहे हैं। लेकिन अफसोस कि अभी तक इस दिवस को अखबारों ने जगह नहीं दी और ना ही पूरी तरह से हम ही जान पाए हैं।

इसे हम इन्कार तो नहीं कह सकतें हैं पर नज़रअंदाज़ करने से कम भी नहीं आँक सकतें। अँग्रेजी नूतन वर्ष से लेकर वेलेंटाइन डे तक को हम अपने अखबारों में कई सप्ताह से पहले से जगह देते हैं लेकिन अखबार अपने ही देश में नाम के लिए मोहताज है या यूं कहें कि अपने ही घर में अजनबी हैं। हाँ! यह कङवा सच है। लेकिन इस विचारणीय एेतिहासिक दिवस पर समाचार पत्र के मुख्य योगदान पर बात करना जरूरी है क्योंकि सिर्फ शिकायत करने से हासिल कुछ नहीं होता है।

1780 में जब अंग्रेज़ जेम्स ऑगस्टस हिकी ने ‘बंगाल गैजेट्स’ नामक अखबार को पहली बार कलकत्ता में प्रकाशित कर हमें अखबार से अवगत कराया। हालांकि ऑगस्टस हिकी ने खबर से ज्यादा अफवाहों को स्थान दिया जिसके कारण उन्हें काफी दिक्कत व आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन जो राह उन्होंने दिखाई वह सराहनीय से भी सर्वोपरि है क्योंकि वहीं तो हमारे अखबारों के जनक हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए जिम्मेदार कदम उठाने की जरूरत होती हैं तभी तो आज हम लगभग 70 हजार अखबारों से घिरे हैं और सुबह की चाय से लेकर शाम के सोने तक अखबारी बने रहते हैं। आज के समय के समाचार पत्र को सूक्ष्म दुनिया ही कहना बेहतर होगा।

समय के साथ अखबार का बदलाव

‘हिक्की गैजेट्स’ पहला भारतीय अखबार सिर्फ अफवाहों से भरा हुआ था तो वहीं दूसरी ओर राजा राममोहन राय ने कुछ वर्षों बाद इसका उपयोग भारतीय कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा को खत्म करने के लिए किया और इसके बढ़ते सुप्रभाव के वजह से ही 1950 तक अखबारों की संख्या लगभग 200 तक पहुंच गई। आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी (यंग इंडिया), लाला लाजपत (केशरी व मराठा) राय इत्यादि क्रांतिकारियों ने भी समाचार पत्रों का भरपूर सहयोग लिया तो इस आधार पर अखबार के क्रांतिकारी अदा को भी नकारा नहीं जा सकता है।

इतना ही नहीं भारतीय संविधान के पिता भीम राव अम्बेडकर ने भी जात – पात व छुआछूत – भेदभाव को मिटाने के लिए समाचार पत्रों के सहारे आंदोलन किए। लेकिन जब देश आज़ाद हो गया तो अखबारों ने क्रांति का काम छोड़कर आर्थिक विकास में भी काफी अच्छी भूमिका अदा की। परन्तु हमारे आलोचकों ने कहना शुरू किया कि अखबार अब व्यवसाय का केंद्र बन गया है क्योंकि अब ज्यादा-से-ज्यादा विज्ञापन ही प्रकाशित हो रहें हैं। हाँ! यह बात सही है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अखबार को चलाने के लिए पैसे की जरूरत कल भी थी और आज भी है। कल तक के समाचार पत्र राजा-महाराजा के भरोसे थे और आज लोकतांत्रिक दौर में लोगों के भरोसे चल रहे हैं बल्कि कल की तुलना में आज के अख़बारों में ज्यादा से ज्यादा खबर – जानकारी है और सक्रियता हैं। दुसरी तरफ अखबारों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए खास योगदान दिया है जिसको साधारण तौर पर हम विज्ञापन के रूप में देखते हैं। यह बात तो हम भलीभांति जानते हैं कि पत्रकारिता में पत्रकारों व अन्य काम करने वाले लोगों को अर्थात अखबार को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत होती हैं जो कि विज्ञापन के माध्यम से मिलता है फिर भी ना जाने क्यों हम बेवजह ही अखबार को बाजारीकरण से जोड़ कर निंदा करते हैं जबकि दुसरा सच तो यह भी है कि विज्ञापन देने वाले भी हम ही लोग हैं।

अखबार का वास्तविक रूप

हजारों साल पहले जब चीन ने पेपर की खोज की तब जाकर के यह सपना साकार हुआ और आखिरकार हमनें पशुओं के चमङे, पत्थरों इत्यादि पर लिखना बंद कर कागज को अपनाया। जबकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे प्लूटो व अरस्तू जैसे दार्शनिकों के विचारों का यह प्रयास है। खैर दोनों ही बात काफी हद तक सही है लेकिन साधारण तौर पर हम कह सकतें हैं कि जैसे – जैसे मानव सभ्यता विकास की दिशा में आगे बढ़ने लगी और हम आधुनिक होने लगे हमने अपने जीवन को सुगम-सहज बनाने के लिए खोज किया और इन्हीं अविष्कारो में से एक अखबार भी है। हमारी अखबारी यात्रा लगभग आज से 400 साल पहले भारत में अखबार व्यापारीकरण के मकसद से ही कोलकाता में आया क्योंकि कोलकाता उस दौरान भी व्यापार का मुख्य केंद्र था और आज भी है। लेकिन धीरे-धीरे हम इसकी उपयोगिता को देखे व समझे तो इसका प्रयोग जनता को जागरूक करने के लिए या यूं कहें कि आजादी की लड़ाई में हथियार के रूप में इस्तेमाल किए और बात अगर आज के मिडिया काल या सूचना काल की करें तो देखेंगे कि केवल भारत में लगभग 70 हजार अखबार कम्पनियां हैं और यह संख्या बढती जा रही हैं।

जिस तरह से अखबार समय के साथ बदलता व बढ़ता जा रहा है तो हमें इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अखबार ने क्रांतिकारी अदा के साथ – साथ देश को सूचना व आर्थिक क्षेत्रों में विस्फोटक गति दी है जो कि अविस्मरणीय है। हम सब भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि इतनी मँहगाई के जमाने में भी अखबार ही एकमात्र हैं जो कि आसानी से व दो-चार रूपये में मिलता है और मनोरंजन के साथ-साथ समाचार और जानकारी विस्तृत रूप से देता है, जिसको हम अपने समय के अनुसार शांति से पढ़ कर संग्रह कर सकते हैं। सारे खबरों का खबर रखने वाला अखबार ही आज अपने दिवस में अपने ही पन्ने से गायब हैं पर पाठकों के दिल में जिंदा है और जिंदा रहेगा, बस यही शुभकामनाएं हैं “भारतीय अखबार दिवस” पर।

A woman adjusts her scarf as the sun sets over Kashmir's Dal Lake in Srinagar July 18, 2010. REUTERS/Danish Ismail  (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: ENVIRONMENT SOCIETY) - RTR2GIJ3

By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. As a Dalit woman and a single mother, Rajkumari overcame several obstacles when she won the Block Development Council elections from her village. Just when she thought that she would finally be able to live a respectable life, things took an ugly turn.

A woman adjusts her scarf as the sun sets over Kashmir's Dal Lake in Srinagar July 18, 2010. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: ENVIRONMENT SOCIETY) - RTR2GIJ3
REUTERS/Danish Ismail

मिर्ज़ापुर , पलड़ी, शिवगढ़: एक महीने पहले तक, राजकुमारी के लिए जि़ंदगी में सब कुछ ठीक था। उसने अभी अपने गांव शिवगढ़ मिर्ज़ापुर से ब्लॉक विकास परिषद (बीडीसी) का चुनाव जीता था। एक दलित औरत और एकल मां के रूप में वो अपने बेटे के इलाज और अपनी सोलह साल की लड़की की शिक्षा के लिए पैसे जुटा रही थी। राजकुमारी मज़दूरी करके अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थी।

23 दिसंबर की रात को उसकी जि़ंदगी में सब बदल गया। उसकी सोलह साल की बेटी गीता का शिवगढ़ के कुछ लोगों ने बलात्कार किया।

बेटी का गायब होना

इस सब की शुरुआत हुई बीडीसी चुनावों से। राजकुमारी ने बताया कि उसे उसके प्रतियोगियों में से एक श्याम बहेरिया ने बार बार धमकी दी। राजकुमारी के पिता रामधनी ने बताया, “वे मतगणना वाले दिन भी आए और बोले कि अगर मेरी बेटी जीती तो ऐसा कर देंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।”

23 दिसंबर को गीता अपनी नानी के साथ थी और मोबाइल पर गाने सुन रही थी। रात 11 बजे के करीब सब सोने चले गए। एक घंटे बाद रामधनी की आंख खुली और घर के अंदर गए। वे देख कर चैंक गए कि गीता वहां नहीं थी। घबराकर उन्होंने सब घरवालों को जगाया। घर के लोग और पड़ोसी उसे ढूंढने निकले।

कुछ समय बाद उन्होंने मोबाइल पर कॉल किया। मोबाइल बजने की आवाज़ पास के एक खेत से आ रही थी। जब वे मोबाइल तक पहुंचे तो उन्होंने पाया गीता बेहोश पड़ी थी। उसके कपडे़ फटे थे और शरीर पर खून के दाग थे। जब वो होश में आई तो गीता ने बताया कि दो आदमियों – पप्पू और बिंदु बहेरिया – ने उसे उठाया और नजदीक के खेत ले गए। उन्होंने उसका मुंह और हाथ बांध दिए और कपड़े फाड़ दिए। उन्होंने उसे नचाया और फिर उसका बलात्कार किया।

पुलिस का व्यवहार

अगले दिन राजकुमारी गीता को पलड़ी पुलिस थाना ले गई। पुलिस ने एफआईआर लिखने या उसकी चिकित्सीय जांच करवाने से मना कर दिया। राजकुमारी के अनुसार पुलिस ने गीता से अपमानजनक और असंवेदनशील सवाल पूछे। “क्या हुआ था और कैसे किया? क्या तुम्हें पीलिया हुआ है जो तुम एक शब्द भी नहीं बोल सकतीं?” थाने पर मौजूद दरोगा अखिलेश्वर ने कहा। वे सवाल पूछते हुए हंस रहे थे और कहा कि गीता को समझौता कर लेना चाहिए।

अगले दिन पप्पू और बिंदु के रिश्तेदार राजकुमारी के घर आए और कहा कि उसे थाने के बाहर ही समझौता कर लेना चाहिए। जब परिवार ने उनकी बात मानने से मना कर दिया तो वे फिर विनती करने के लिए आए। गीता कमरे से यह कह कर चली गई कि उसे नींद आ रही है। कुछ समय बाद उसकी नानी कमरे में गईं तो उसे पंखे से लटका पाया।

जब उप जि़लाअधिकारी राजकुमारी से मिलने गईं तो उन्होंने उससे बोला कि वो दिखाए कि कैसे उसकी बेटी ने अपने आप को फांसी लगाई थी।

आखिरकार दफा 376, 306, और 456 के तहत पलड़ी थाने में केस दर्ज हुआ है। पप्पू और बिंदु दोनों जेल में है। मगर राजकुमारी ने जीने की इच्छा छोड़ दी है।

Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

shani shingnapur mandir

पूजा त्रिपाठी

shani shingnapur mandirआज अखबार में खबर पढ़ी कि एक महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर में 26 जनवरी को उस सालों पुरानी परंपरा को तोड़ने की तैयारी कर रहा है जिसमें महिलओं का उस चबूतरे पर जाना वर्जित है जहां शनि पत्थर स्थापित है। पिछले साल नवंबर महीने में शिंगणापुर शनि मंदिर के चबूतरे पर एक महिला के प्रवेश पर काफी बवाल हुआ था, मंदिर के पुजारियों और गांव के लोगों ने मंदिर का शुद्धिकरण किया था। परंपरा का हवाला देते हुए कहा गया कि शनि मंदिर के चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

मुंबई के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के लिए कुछ नियम हैं। इस मंदिर में हाल ही में अनीता शेटे को मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया है और वह भी शनि मंदिर में महिलाओं के लिए बने नियमों को नहीं बदलना चाहतीं। अनीता का कहना है कि हम इस परंपरा को कायम रखना चाहते हैं। मंदिर की पवित्रता के लिए गांव के ज्यादातर लोगों की भी यही मान्यता है कि चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश न हो।

पढ़कर अच्छा लगा, याद आया इस मंदिर से जुड़ी एक ऐसी घटना जिसने मेरे बाल मन को विचलित कर दिया था, कुछ साल पहले मैं अपनी माँ की सहेलियों के साथ शनि शिंगणापुर और शिर्डी की यात्रा पर गयी थी। तो हुआ ये कि यह महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर पहुंचा, महिलाओं का शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ाना वर्जित होता है इसीलिए सभी लोग किसी प्रॉक्सी की तलाश में लग गये जो उनकी तरफ से शनि भगवान पर तेल चढ़ा दे।

जहाँ सब महिलायें व्यस्त हो गयी तो मैं घूमते, घूमते उस चबूतरे पर पहुँच गयी और चबूतरे के किनारे लगी रेलिंग पकड़ कर प्रतिमा पर हो रही पूजा देखने लगी इस बात से बिलकुल अनजान कि मैं कितना बड़ा “पाप” कर रही हूँ। थोड़े देर बाद एक पंडित का ध्यान रेलिंग को पकड़े इस छोटी सी लड़की पर गया। वो उसकी ओर बढ़े, हाथ से एक धक्का दिया और कहा, “माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या?” वो बच्ची थोड़े देर रोती रही, उसे समझ ही नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी। उसे कारण तो बता दिया उसकी माँ ने पर फिर भी उसे समझ नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी।

ऐसा नहीं है कि शनि शिंगणापुर ही ऐसा मंदिर है जहाँ इक्कीसवी शताब्दी में भी ऐसी रिग्रेसिव परम्परायें चल रही हैं। कई ऐसे पूजा स्थल हैं जो नारी सशक्तिकरण को चिढ़ाते हुए खड़े हैं – राजस्थान के पुष्कर शहर के कार्तिकेय मंदिर, मुंबई के वर्ली समुद्र तट पर हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह और केरल के तिरुअनंतपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर।

वे 400 महिलायें जिन्होंने इस मंदिर में जाने और सदियों से चल रही अंधी परम्पराओं को चुनौती देने का फैसला लिया है, जाइए : उस बच्ची के लिये, इस लेखक के लिये, सदियों से पीछे धकेली जा रही औरतों के लिए और उन स्त्रियों के लिये भी जाइये जो आपको धर्मं के नाम पर, परंपरा के नाम पर रोकने की कोशिश करेंगी ।

नयी शताब्दी के दौर में इसी देश में स्त्री ने कई पुरुष वर्चस्वी क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया है। विस्मय तब होता है जब धर्म के नाम पर वह मनुस्मृति के विधान धारण करने लगती है, वह हर उस नियम को स्वीकार करती है जो उसके लिए किसी और ने लिख छोड़े हैं , यह कुछ और नहीं रूढ़ परम्पराओं के प्रति उसकी भयजनित मान्यता दर्शाता है …विचित्र लेकिन सच।

“आओ मिलें

मिलकर तोड़े

हर उस ज़ंजीर को

जिसने कल पैर बांधे थे

आज गला जकड़ रहे हैं

देवी-देवी के ढोल ने हमें कर दिया है बहरा

श्रध्दा के शोकगीत से होती है उबकाई

परम्परायें जब उठाती हैं सर

तो कुचले जातें हैं कितने नारी विमर्श के स्वर

गन्दा समझ जिसे करते हो बाहर

गर उस खून का रंग लाल है

तो क्रांति का भी

मैं नकारती हूँ तुम्हारे हर उस भगवान को

जो माँ की कोख से नहीं जन्मा है।”

school stairs

To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighbourhoods.

कोमल यादव:

school stairsहाथों में थमी डायरी, धीरे-धीरे चलती कलम और सुर में सुर मिलाते-गूंजते गाने माहौल की शुरुआत कर चुके थे। हर एक की जुंबा से निकलता गाना डायरी के कोहरे पन्नों का हिस्सा बनता जा रहा था।

क्लास की थकावट और पसीनों की मार ने सभी की हालत को सुस्त कर दिया था पर हर आती मंडली अपनी इस सुस्त हालत में चुस्त होती जा रही थी। कोई दीवार से टेक लगाए, कोई मस्ती से पैर पसारे तो कुछ घुटनों तक सलवार चढ़ाए, सामने की खिड़की से आती हवा का लुत्फ उठाने में मस्त था।

ठंडी-ठंडी हवा जैसे-जैसे बदन को सहलाने लगी, वैसे-वैसे शायरी का भूत सबके सिर चढ़ने लगा था। ‘वो मेरी जान है दिल का अरमान है, वो जी नहीं सकते मेरे बिना!’ दीवार से टेक लगाए बैठी कुसुम ने टशन के साथ कहा। सभी जोर-जोर से ताली बजाते हुए उसकी ओर देखने लगे। वह शायरी के लिए सबके बीच मशहूर है। हर कोई कभी न कभी अपनी फरमाइश रख ही देता है। वह सबके बीच इतनी खास बन चुकी है कि हर पीरियड पर सजती महफिल दिन में एक बार जरुर उसकी शायरी का हिस्सेदार बनती है।

आज भी सीढ़ी के उपर से लेकर नीचे तक बैठी सभी टोलियों की निगाहें और कान दोनों ही उसके होने लगे थे। सबकी आपसी बातचीत कुछ पल के लिए थम गई थी। उसने तेज़-तेज़ चलती हवा के लुत्फ को और हसीन बनाते हुए कहा, ‘कौन कहता है हवा फ्री की होती है! कौन कहता है हवा फ्री की होती है, कभी दस रुपये वाला चिप्स का पैकेट खरीदकर देखो, उसमें सात रुपये की हवा और तीन रुपये की चिप्स होती है।’ सब तालियां बजाते ‘वाह-वाह’ कहने लगे। वाहवाही का मज़ा अभी सबने लूटा ही था कि ‘पी.टी. मैडम आ गई, पी.टी मैडम आ गई’ कहते हुए हड़बड़ी में भागती लड़कियाँ अपनी क्लासों की ओर बढ़ने लगीं। उनके खौफ से सीढ़ी पर सजी महफिल पलभर में अपनी क्लासों की ओर फुरर्र हो गई।

वह जगह कुछ पलों के लिए खामोश हो गई जहाँ अब कुछ नहीं सिर्फ़ खिड़की से आती दीवारों से टकराती हवा का साया था। उसके खालीपन में भी सरसराहट का एक अहसास था। ऐसा मालूम पड़ रहा था मानो हवाएँ आपस में बतिया रही हों, जिन्हें अक्सर अकेलेपन का मौक़ा मिलता नहीं पर आज पहली दफा वह सुबह के समय खाली थी।

पीटी मैम की वजह से सभी बच्चे अपनी क्लासों में कैद हो चुके थे। बार-बार दरवाजे से अंदर झांकती आँखें उन्हीं के जाने की राह ताक रही थी। हर क्लास का दरवाजा मिनट-मिनट पर खुलता रहा।

poverty in india

रवि कुमार गुप्ता:

poverty in indiaसमाज का वैसा भाग जो कि अपने आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम नहीं हैं और निर्धनता यह सिद्ध करती हैं की समाज का चौतरफा विकास अभी भी बाकी हैं, चाहे वो गरीबी की दर ३० % हो या २० % और भारत सरकार की राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार लगभग २२% लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे है। एक विकसित व खुशहाल समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है की वो आर्थिक व सामाजिक आधार पर पिछड़े लोगो को सार्वजनिक तौर पर सुविधाएँ उपलब्ध कराये।

सामाजिक सुरक्षा तो हर नागरिक के लिए जरूरी है लेकिन विशेषतः आवश्यक है वैसे जनमानस के लिए जो असमाजिक खतरों के दायरे में हैं और वो हैं हमारे समाज के ३० % गरीब नागरिक। सरकार इनकी सुरक्षा अथवा विकास के लिए आज़ादी के बाद से ही कार्यरत हैं क्यूँकि आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. अम्बेडकर के अनुसार – “एक कल्याणकारी समाज के गठन के लिए सबका विकास होना जरूरी हैं” तो फिर ३० % गरीबों को असामाजिक – सुरक्षा देना तो अति आवश्यक हैं और इस संदर्भ में कुछ पैनी व विश्लेषित बातें निम्नलिखित हैं :-

1. सामाजिक – समानता – “समाज में हर व्यक्ति का समान अधिकार हैं और जिस समाज में समानता नहीं हैं, उसका मूल रूप से विकास सम्भव नहीं हैं।” डॉ. अम्बेडकर का यह कथन अनुभविक स्तर से देखा जाये तो सही हैं क्यूंकि आज हम समानता के अधिकार के वजह से ही एक लोकतंत्रात्मक देश में हैं और लोकतंत्र में जन – जन की भागीदारी महत्वपूर्ण हैं। जॉन हॉब्स के सिद्धांत – “राज्य की उत्पति व सामाजिक समझौते का सिद्धांत यह कहता हैं कि सामाजिक तौर से राज्य का निर्माण हो और एक सफल राज्य के निर्माण के लिए यह चुनौती होती हैं की वो अपने नागरिकों को कैसे संतुष्ट रखेगा।” गरीबी के वजह से लोगो का आस्था व संतोष, सरकार के प्रति टूटता हैं, इसलिए लोकतंत्र यह कहता हैं की सबको सामाजिक तौर से समानता दी जानी चाहिए।

2. संविधान – सुरक्षा – लोकतंत्र को बचाने व अर्थकारी बनाने के लिए संविधान बनाया गया है। संविधान ही तो राष्ट्र की सुन्दरता को बढाती है। संविधान के द्वारा ही हम किसी राज्य या राष्ट्र को सुचारू व अनुशासित रूप से चलते हैं। संविधान हमें सामाजिक-सुरक्षा की गारण्टी भी देता हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्व भी सभी कॉम निर्वाह मजदूरी, प्रसूति सहायता इत्यादि प्रदान कराता हैं। संवैधानिक सुंदरता को बरकरार रखने के लिए गरीबो को सामाजिक – सुरक्षा देना जरूरी हैं क्यूंकि डॉ. प्रेम सिंह की किताब “उदारवाद की कट्टरता” यह कहती है कि समाज में समरसता बनाये रखने के लिए सामाजिक – सुरक्षा मुहैया करवाना सरकार का दायित्व हैं।

3. आर्थिक – विकास – किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए अर्थव्यवस्था का मजबूतीकरण अनिवार्य हैं। आर्थिक-विकास के लिए यह आवश्यक है कि गरीबी को मिटाया जाये क्यूँकि यह विकास कि सबसे बड़ी बाधा हैं। आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में सफल नहीं हो पता हैं, चाहें भोजन हो या शिक्षा। आर्थिक स्तर से विकास करने के लिए रोजगार का होना आवश्यक हैं और जबतक बेरोजगारी रहेगी, हम सामाजिक तौर से आर्थिक विकास नहीं कस पाएंगे और भारत सरकार ने इसको दूर करने करने के लिए ‘रोजगार गारंटी योजना’ को लागू कर के बेरोजगार ग्रामीणों को रोजगार देने में सफल रही हैं। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए यह भी जरूरी हैं की राष्ट्रीय आय को बढ़ाया जाये और राष्ट्रीय आय को बढ़ने के लिए हमें ३० % गरीबी की खाई को भरना होगा ताकि सकल घरेलू उत्पाद और सकल राष्ट्रीय उत्पाद को बढ़ावा मिले। सबका साथ ही हमारे विकास के मार्ग को मंजिल तक पंहुचा सकता हैं।

4. स्वस्थ्य व संगठित समाज निर्माण – जिस तरह कोई बीमारी मानव शरीर को कमजोर और खोखला बना देती हैं, ठीक उसी तरह से गरीबी भी समाज के लिए बीमारी की तरह ही हैं, जोम की विकास के राह में बाधा बनती हैं। गरीबी की वजह से आम लोग सही शिक्षा दवा – ईलाज, भोजन, आवास इत्यादि भौतिक जरूरतों को भलीभांति रूप से पूरा नहीं कर पति हैं। जिस समाज में भौतिक जरूरतों का अभाव रहेगा उस समाज का सर्वांगीण विकास तो कतई सम्भव नहीं हैं। भले ही हम युवा भारत का नारा लगा ले लेकिन वास्तव में तो हम, एक स्वस्थ्य व सुसंगठित समाज का निर्माण कभी कर नहीं सकते हैं। गरीबी यह साबित करती हैं की हम आज भी असामाजिक – तत्वों से ग्रसित हैं और जब से सरकार ने सरकारी योजनाओं जैसे की इंदिरा आवास योजना, राशन – वितरण, सर्व – शिक्षा अभियान, सरकारी अस्पताल व अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित योजना, जन – धन योजना, अटल पेंशन योजना इत्यादी योजनाओं को लागू किया और समाज में फलकारी परिवर्तन भी दिखे।

“सोने की चिड़ियाँ” कहा जाने वाला भारत के लिए गरीबी एक दाग के जैसा है और यह हमारे लिए चुनौती बन चूका हैं। आज भी हम सामाजिक तौर पर आज़ाद नहीं हैं क्यूंकि बेरोजगारी व भूख की जंजीरों ने हमारे पैरों को जकड कर रखा है। गरीबी यह बता रही है की हम आज भी मोहताज हैं रोटी, कपड़ा और माकन के लिए। गरीबी की गुलामी ने हमे असुरक्षा के दायरे में खड़ा कर रखा हैं, तभी तो आज हम सामाजिक सुरक्षा के लिए चिंतित हैं, लेकिन सच तो यह भी हैं की संघर्ष, मानव सभ्यता के साथ ही चला आ रहा हैं और हम सामाजिक-सुरक्षा के माध्यम से आज गरीबी की दर को ७३ % से घटा कर आज ३०% तक ला दिए हैं लेकिन सवाल तो यह भी उठता है की योजनाएं तो ४० – ५० वर्षों से चलाई जा रही हैं और हम आज भी गरीबी की गिरफ्त में हैं तो हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते है की इसके लिए हम खुद ही जिम्मेवार है क्यूंकि हमने अपने सामाजिक दायित्व को निः स्वार्थ भाव से निभाया नहीं हैं।

महात्मा गांधी का “न्यायसिता का सिद्धांत” यह कहता हैं की समाज के उच्चवर्गीय लोगों का यह दायित्व बनता हैं की वो पिछड़े – वर्ग को भी अपने साथ ले कर चले और गाँधीजी हृदय परिवर्तन की बात करते हैं तभी तो आज गैर – सरकारी संग़ठन भी समाज के उठान के लिए काम कर रहे हैं ताकि समाज में आर्थिक व सामाजिक तौर से समानता आये और हम भी विकसित देशों में शामिल हो जाये। गांधीजी की किताब “मेरे सपनों का भारत” में भी सामाजिक उत्थान के लिए गरीबों को सामाजिक स्तर से उठाने की बात की पुष्टि करते हैं। सचमुच में हमे फिर से भारत को “सपनों का भारत” बनाना हैं तो गरीबों की गिनती को शून्य करना होगा। लोकतंत्र यह कहता है की समाज में सबका समान अधिकार हैं और इस समानता की समरसता को बनाये रखने के लिए हमें जन – जन को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से मजबूत बनाना ही होगा।

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हरीश परिहार:

rajasthan high courtराष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति नाम के तथाकथित धार्मिक ग्रन्थ को पब्लिकली जलाया था। कारण: घ्रणित किताब मनुस्मृति दलितों व महिलाओं के मानव अधिकारों के विरोध में लिखी गयी थी। जाहिर तौर पर इस किताब में पाखंड है। जाति के आधार पर छुआछूत, ऊँच-नीच, असमानता का कारण मनुस्मृति ही है। सदियों से सोशल डीग्रेडेशन का मुख्य कारण मनुस्मृति है। मानव समाज में जाति के आधार पर भेदभाव को जन्म मनुस्मृति ने दिया था। चार वर्णों की व्यवस्था का भी उद्गम मनुस्मृति से होता है। वर्ण व्यवस्था ने मानव समाज में ऊँच-नीच को जन्म दिया। हिन्दू समाज में दलितों के मानव अधिकार मनुस्मृति की वजह से छीन लिए गये। इससे सम्बंधित तमाम प्रकार की बातें मनुस्मृति में लिखी हुयी है। आज के आधुनिक युग में भी हम तमाम प्रकार की ख़बरों से रूबरू होते हैं जिसमे यह पढ़ने या देखने को मिलता है कि फलांना जगह दलितों के घर जला दिए गये। फलांना जगह दलित लड़कियों के साथ उच्च जाति के असामाजिक तत्वों ने बलात्कार किया या फलांना जगह दलित महिला को नंगा कर घुमाया इत्यादि। (सन्दर्भ के तौर पर फरीदाबाद की घटना का जिक्र किया जा सकता है या फिर जोधपुर व बीकानेर में उच्च जाति के अध्यापक द्वारा दलित बच्चे को पीटा जाना आदि।)

इस प्रकार की तमाम प्रकार की दुखद ख़बरें हर रोज अख़बार, दूरदर्शन या फिर सोशल मीडिया पर देखने को मिलती है। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मनुस्मृति मानव समाज के लिए खतरा है। यह मानवीय मूल्यों को ठेस पहुंचाती है। मनुस्मृति को मनु नाम के काल्पनिक व्यक्ति ने लिखा था। काल्पनिक इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मनु को किसी ने देखा नहीं था और न ही इतिहास में मनु की शक्ल के बारे में कोई जानकारी मिलती है। मनुस्मृति की वजह से महिलाओं व दलितों के साथ अन्याय होता आ रहा है। भारत में महिलाओं के विरोध में कई प्रकार की रुढ़िवादी परम्पराएँ चलती आ रही हैं। मिसाल के लिए दहेज़ प्रथा हो या घुंघट प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या हो या बाल विवाह इत्यादि। या फिर कन्या-दान जैसा शब्द।

मनुस्मृति दहन का मकसद दलितों व महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अन्याय को खत्म करके समानता वाले समाज की स्थापना करना था। यानी कि छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, ऊँच-नीच, को ख़त्म करना तो था ही, इसके साथ-साथ चार वर्णों की व्यवस्था को भी ख़त्म करना था यानी कि ब्राह्मणवाद को ख़त्म करके समाजवाद, आम्बेडकरवाद स्थापित करना था। दलितों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए मनुस्मृति-दहन-दिवस मील का पत्थर साबित हुआ। बाबा साहेब आम्बेडकर ने उस दिन शाम को दिए भाषण में कहा था कि मनुस्मृति-दहन 1789 की “फ्रेंच-रेवोलुशन” के बराबर है। जाहिर है कि बाबा साहेब आम्बेडकर हिन्दू समाज में जात-पात के खिलाफ थे और सारा आम्बेडकरी साहित्य इस बात की पुष्टि करता है। इस प्रकार से मेरी राय के अनुसार मनुस्मृति मानवता के विरुद्ध है व उसका रचियता मनु अन्याय का प्रतीक है

28 जून, 1989 को राजस्थान हाई कोर्ट के नये परिसर में मनु की मूर्ति का इंस्टालेशन किया गया था। माना जाता है कि मूर्ति की डिमांड लोकप्रिय नहीं थी और स्पष्ट है कि कुछ ‘पाखंडी’ लोग ही इस प्रकार अन्याय का समर्थन कर सकते हैं। शुरुआत से लेकर कार्य पूर्ण तक इस काम को गोपनीय रूप से अंजाम दिया गया, इसलिए चलते काम के बीच इसका विरोध नहीं हो पाया। इसकी जानकारी केवल उन्ही लोगों को थी जो मूर्ति लगवाना चाहते थे। स्पष्ट है कि मनु अन्याय का प्रतीक है, इसके बावजूद भी कुछ पाखंडी एवं रुढ़िवादी लोगों की डिमांड का सम्मान करते हुए न्यायालय द्वारा मनु, जिसको किसी ने देखा भी नहीं होगा फिर भी उसकी मूर्ति या पुतला बनाकर राजस्थान उच्च न्यायलय में लगाया जाना अन्याय के पक्ष में जाकर फैसला देने के बराबर है।

ध्यान रहे कि संवैधानिक रूप से न्यायालय एक ऐसी संस्थान है जहाँ पर सामाजिक व आर्थिक न्याय की उम्मीद की जाती है। मूर्ति लगने के बाद कई दलित संगठनों व महिला संगठनों ने इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया। धरना प्रदर्शन को देखते हुए 27 जुलाई, 1989 पर राजस्थान हाई कोर्ट की एक पीठ ने 48 घंटे की समयावधि के अन्दर-अन्दर मूर्ति को हटाने का निर्देश दिया। इसे ध्यान में रखते हुए विश्व हिन्दू परिषद के आचार्य धर्मेन्द्र ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण के न्यायालय में एक रिट पेटीशन दाखिल कर दी और न्यायलय ने स्टे आर्डर लगाकर मूर्ति हटाने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनु की मूर्ति राजस्थान हाई कोर्ट में आज भी विद्धमान है।

मेरा प्रशन है कि ऐसा न्यायालय न्याय देता होगा कि केवल निर्णय?

भारतीय संविधान में मनुस्मृति से सम्बंधित कानून: राष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर व संविधान निर्माण समिति के द्वारा मनुस्मृति सम्बंध में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रावधान लाया गया जिसके अंतर्गत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में अगर 26 जनवरी 1950 के बाद अगर कोई पुरानी परम्परा या विधान जो मौलिक अधिकारों का हनन करे, जो किसी प्रकार की रूढी भी हो सकती है, तो इस प्रकार की परम्परा को अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जायेगा। इस प्रकार से मेरा मानना है कि मनु की मूर्ति का हाई कोर्ट में लगा होना एक प्रकार से संविधान की अवमानना है।

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सुमन त्रिभुवन:

अहमदनगर में भगतगली नाम का पुराना रेडिलाईट एरिया है । एक हफ्ते पहले मैं अपनी सहेलियों से मिलने और स्नेहालय के एक कार्यक्रम के बारे में बात करने के लिए भगतगली गई। तब सभी औरतें एक टि.व्ही. न्युज चॅनल देख रही थी। उसमें बार-बार तमिलनाडू और चेन्नई में आई बारिश और तबाही को दिखाया जा रहा था। मेरी सहेली दीपा उसे देखकर रो रही थी। बाकी सभी महिलाएँ भी उन दृश्यों से बहुत दुखी थी। मीना पाठक ने बात छेड़ी। उसने कहा, “हमें कुछ करना चहिए। चेन्नई के लोग बहुत बुरे हाल में दिख रहे है।”

इस पर कमल ने कहा, “सरकार को मदद करना चहिए। मदद करना सरकार का काम है। अपने देश के अमीर लोग अवश्य मदद करेंगे। हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है । हम बस ईश्वर से हालत सुधारने के लिए प्रार्थना करेंगे।”

इसर् बहस में गली की सारी औरतें शोमल हुई । हर कोई अपनी राय देने लगा। फिर हमने शेवगाँव फोन लगाया। वहाँ के रेडलाईट एरिया में काम करने वाली जया जोगदंड ने कहा कि वहाँ भी सभी औरते दो दिन से इस बरबादी के कारण दुखी है। सभी को लगता है कि कुछ करना चहिए। श्रीरामपुर में सुनिता उनवणे ने धनगरवस्ती रेडलाईट एरिया से बताया कि यहॉ की वैश्या महिलाँए कुछ चंदा जमा करने के काम में जुट गई हैं। कोपरगाँव में सुभाषनगर से संगीता शेलर ने बताया कि उसे महिलाओं ने 5 हजार रूपय दिए हैं। और तमिलनाडू भेजने के लिए कुछ रस्ता ढूंड रही है। यह सब सुनकर दीपा और मीना ने कहा, हमें भी कुछ करना चाहिए। सरकार या दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, या फिर क्या करेंगे, इसके बारे में हमें नहीं सोचना चाहिए। हमें क्या कर सकते है, यह हमे देखना चाहिए। तमिलनाडू के लोग हमारे अपने भारतवासी हैं, अगर हमारे अपने भाई-बहनों पर कोई संकट आजाए, तो क्या हम सरकार का या दुसरे लोगों का इंतजार करेंगे? मैंने इसपर कहा, प्रभु रामचंद्र के श्रीलंका तक सेतू बनाने के काम में गिलहरी नें जो काम किया वह हमें करना चाहिए। क्योंकि हम लोग अपने अधिकारों की लढ़ाई स्नेहालय के माध्यम से लड़ते हैं, फिर जब अपने देशवासियों पर संकट आती है, तो हमें अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन भी करना चाहिए।

मैंने याद दिलाया कि इस से पहले 1993 में मुम्बई के बाम्ब विस्फोट के समय, गुजरात और महाराष्ट्र के भुकंम्प में, कारगिल युध्द में, सुनामी के दौर में, ओरिसा के चक्रवात में, एच.आय.व्ही. एड्स पीडितों के लिए आत्महत्या करनो वाले किसानों के परिवारो के लिए, 2013 में महाराष्ट्र के सुखाग्रस्त इलाके के लिए हम वैश्याओं ने अपना योगदान दिया था। पिछले साल कश्मीर में आई बाढ़ और उत्तराखंड के महाप्रलय के समय भी हमने साथ दिया था। जब हम थोड़ा सा देश के लिए देते हैं, तो लगता है कि हमें खुद को भारतीय कहने का अधिकार सचमुच हैं। एसे समय में अगर हम कुछ नहीं करते, तो हम अपनी निगाहों में गिर जाते हैं। समाज की नजरों में हम अपनी मजदूरी के कारण गिरे हुए हैं, पर उसका हमें कोई इल्म नहीं है । लेकिन हम खुदकी नजर में कभी गिरना नहीं चाहते।

फिर हम नें फैसला किया कि 4 दिन हम एक वक्त खाना खाएंगें, कोई भी औरत नशा नहीं करेगी, और जितने पैसे बचते हैं, वह हम तमिलनाडू के पीडितों को देंगे। हमनें पूरे अहमदनगर जिले के सभीं रेडिलाईट एरिया में शाम तक फोन किए। सभीं का मन पहले से ही कुछ करने के लिेए बना था। स्नेहालय के प्रवीण मुत्याल सर को यह बात हमनें बताई। उन्होंने कहा कि फिलहाल पंतप्रधान सहायता निधी को पैसे देना बहतर रहेगा।

DSCN0865रेशमा ने कहा कि वह भी पैसे देगी, लेकिन हमनें कह कि एच.आय.व्ही के कारण उसकी हालत बहुत खराब है, वह अब धंदा भी नहीं करती, महिलाओं के लिए खाना बनाना और उनके बच्चे संभालना ही उसका काम हैं। उसकी आमदनी पेशा करने वाली दुसरी महिलाओं स कम है, इलिए उसका पैसा हम नहीं लेंगे। उसने कहा कि एक ना एक दिन उसे मरना ही है, वह कुछ अच्छा काम कर के मरना चाहती है। फिर मैंने कहा, चलेगा, लेकिन उसे दोनो वक्त खाना खाना चाहिए और हमारी तरह एक वक्त का खाना नहीं छाड़ना चाहिए। उसे यह भी स्वीकार नही था। उसने कहॉं कि वह खाना खा ही नहीं सकती जब इतने लोग बाढ़ की तबाही की वजह से भुखें हैं। फिर सब जगह यह मिशन शुरू हुआ।

3500 में से लगभग 2000 महिलाओं ने अपनी कमाई ईमानदारी से, प्यार और समर्पण भाव से तमिलनाडू के लिए दी। मुझे लगता है कि इस में सराहने लायक कुछ भी नहीं हैं। हमारे 1 लाख रूपय हमने जिलाधिकारी अनिल कवडे को दे दिये। अब सभी की इच्छा है कि और 4 लाख रूपय अगले 2 महीनों में इकट्ठा करके देंगे। स्नेहालय ने बताया कि गूंज नामक दिल्ली की संस्था इस काम में दिर्घकालीन कार्य करती हैं। उसे ही हम अपना सहयोग देंगे। कुछ महिलाओं की ईच्छा हैं कि प्रत्यक्ष रूप में चेन्नई जा कर लोंगों की सहायता करे। अवसर मिले तो यह भी होगा।

Ayodhya

By Khabar Lahariya:

KL Logo 2 (1)Editor’s Note: As part of Youth Ki Awaaz and Khabar Lahariya‘s collaboration, we bring to you this story from the hinterlands of the country’s largest state – Uttar Pradesh. Yugal Kishore Saran Shastri is a journalist who stays on the outskirts of the disputed Ramjanambhoomi site, Ayodhya. He is also the Mahant of the Saryu Kunj mandir but hasn’t performed a single pooja in 23 years. Watch him talk about the money behind religion, caste discrimination in the country, and Ayodhya as Ramjanambhoomi. 

Brought to you in collaboration with Khabar Lahariya.

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To whom does the city belong? To really answer this question we need to think beyond property and possession, and see things in terms of home and a sense of belonging. These young Delhiites will share stories about their city in this column. It is a city with its ears close to the ground, made up of narrow bylanes, street corners, tea stalls and numerous places where people meet and talk. The writers have emerged from collectives engaged in writing practices hosted by Ankur Society for Alternatives in Education in Delhi’s working class neighborhoods.

आरती अग्रवाल: 

school gateस्कूल का मेन गेट नीले रंग से रंगा है। सुबह के छह बजे वह खुल कर सभी बच्चों के आने का इंतज़ार करने लगता है। हर बच्चा उससे होता हुआ स्कूल में दाख़िल हो जाता है।

चौकीदार सभी बच्चों को गेट से अन्दर करते हुए कह रहे हैं, “सभी अंदर जाओ, अपने बैग क्लास रूम में रख कर आओ, अभी कुछ देर मे घंटी बजने वाली है। जल्दी से सभी प्रेयर ग्राउंड में इकट्ठा हो जाओ, नहीं तो मैडम डाटेंगी।” वह अपनी कुर्सी से उठा और एक कदम आगे बढ़कर सिर झुका कर मैडम को नमस्ते बोला, सामने से आती हरे रंग की बुटेदार साड़ी पहने प्रिंसिपल ने सिर हिलाते हुए कहा, “बलराज टाईम हो गया है। घन्टी बजा दो।” वह सुनते ही ‘अच्छा जी, अच्छा जी’, कह उस तरफ दौड़ गया।

बच्चों का एक समूह दीवार के एक कोने से छुप-छुपकर, पता नहीं किसे देख कर भाग रहा है। कुछ लड़कियां समूह में खड़ी बातें कर रही हैं, “ये सुमन आज फिर नहीं आई, उसने तो लेट आने का रिकॉर्ड बना लिया है।” तभी काजल बोली, “ऐसे मत बोल, किसी की मजबूरी समझनी चाहिये, उसकी मम्मी बाहर काम करने जाती है। जब उसके पापा ठीक थे तब तो वह समय से पहले ही आ जाती थी।”

Picture 1463तभी प्रेयर की घन्टी बज उठी। काजल बोली, “आज तो हमें ही लेट वालों को पकड़ना है।” वह वहां से खिसक कर गेट के पास आ खड़ी हुई, स्कूल की घन्टी बज उठी। जिस-जिस को जहाँ भी सुनाई दे रही है, वह वहीं से दौडता हुआ, प्रेयर ग्राउंड में पहुचने की हड़बड़ी में है। स्टूडेंट सड़क से भाग कर मेन गेट तक पहुंचना चाह रहा है कि स्कूल का खुला हुआ गेट कहीं बन्द न हो जाए। जो लडकियां लेट वालों को पकड़ने के लिए खड़ी है, उनमें से एक ने गेट से झांकते हुए जोर से आवाज़ लगाई, जल्दी भागो प्रेयर शुरू होने वाली है।यह सुनते ही सड़क से आते हुए बच्चों ने दौड़ लगानी शुरू कर दी।

सभी भागते हुए गेट के अन्दर आकर अपनी-अपनी क्लास की लाईन में लग गए। तभी स्कुल के चौकीदार आए और गेट बन्द करने लगे। जो बच्चे कुछ दूर थे वे भी भाग कर गेट के अन्दर आ गए। तभी पी टी वाली मैडम ने सीटी बजाते हुए, इशारा से कह रही थी कि अब जो आएगा वह लाईन मे नहीं लगेगा।

उनका इशारा पाते ही गेट पर खड़ी लड़कियां में से एक बोली, ये तो बहुत बनती है, अभी तो टाईम है। तभी काजल चुटकी लेते हुए बोली, “देख निशा मैडम आ रही है इन्हें रोक लूँ।” तभी दीपा बोली, “इससे तो 50 रूपये फाइन लेंगे।” सभी हाथ उठा कर एक दूसरे को ताली देकर हंसने लगी। लेट वाली लाइन में खड़े सभी बच्चे भी दबे स्वर में बोले, “इन्हें भी तो हमारे साथ खड़ा होना चाहिये।” सभी ठहाका मार कर हंसने लगे।

तभी काजल बोली, “यार अच्छा हुआ कि हमारी ड्यूटी यहाँ लगी है, नहीं तो प्रार्थना में बोर हो जाते।” अभी उसकी बात खत्म भी नहीं हुई थी कि तभी मोटर साईकिल की आवाज ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक साथ सभी एक-दूसरे से बोल उठीं, तेरा बॉयफ्रेंड है, तुझसे मिलने आया है। सभी ठहाका मार कर हंसने लगती हैं।

उधर प्रार्थना में पीछे की लाइन वाले बच्चे एक दूसरे को नोच-नोच कर चुप खड़े हैं। आगे के बच्चे आँख बन्द कर ऊँचे स्वर मे प्रार्थना गाए जा रहे हैं। मैडम भी अपनी बातों में मशरूफ हैं। किसी का भी ध्यान प्रार्थना में नहीं है। जैसे ही प्रार्थना खत्म हुई और पूरा ग्राउंड ड्रम की आवाज से गूंज गया।

लेटकमर वाले बच्चे ड्रम के बजते ही नाचने वाले एक्शन करने लगे। तभी काजल बोली, “सुमन तुझे तो खूब अच्छा डांस आता है, तू डांस कर हम तेरा नाम मैडम को नहीं देंगे, कह देंगे कि तुम हमारे साथ ड्यूटी पर थी।” सुमन ने फटाक से कहा, “सच?” और दीपा ने कहा, “हाँ- हाँ।”

पास खडी और लड़कियों ने भी कहा, “अगर हम आपको डान्स करके दिखायेंगे तो क्या हमें भी छोड़ दोगे?” काजल ने हाथ को हवा में लहराते हुए कहा, “भई ये तो डांस देखने के बाद ही बता सकते हैं।” सुनते ही सभी ठहाका मार कर हंसने लगे। तभी सीटी की आवाज सुन सभी सीटी की तरफ देखने लगे और उनकी महफिल यहीं खत्म हो गई। सभी मुंह लटकाए मैडम की तरफ चल दिए। गेट बन्द हो चुका था और गेट से खुलते एक छोटे गेट पर ताला लग चुका था।

aarti-yuthआरती अग्रवाल, जन्म 1996 , ‘अंकुर- कलेक्टिव ‘की नियमित रियाज़कर्ता। उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी ‘ और ‘अकार ‘ मे प्रकाशित।

swachh bharat modi garabage in india

सलमान फहीम:

swacch bharat modiजब प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने हाथ में झाङू पकड़ा था तो मुझे लगा था कि शायद अब मेरे मुल्क की काया पलट होगी और हमारा ये देश सही मायनों में स्वच्छ होगा। पर मेरा ये सोचना उतना ही गलत था जितना की एक बबूल के पेड़ से साए की उम्मीद करना। तो आखिर क्या वजह है कि आज एक साल से भी ज्यादा दिन गुज़र गए “स्वच्छ भारत” के नारे को, पर अब भी हमारा ये देश गंदगी के दलदल में उतना ही धसा हुआ है जितना पहले था। सरकार और उसके नुमाइंदे तो कटघरे में खड़े होते ही हैं पर कहीं न कहीं दोष तो हमारा भी है, कहीं न कहीं दोष हमारा ही है।

बात अगर नारों की हो तो हमारे देश में भगवान की कृपा से इसकी कभी कोई कमी नहीं रही, हर नयी सरकार के अपने नारे होते हैं, होने भी चाहिए, पर सरकारों को यह समझना होगा कि आज के हिंदुस्तान और पहले के हिंदुस्तान में ज़मीन और आसमान का फर्क है। पहले नेताओं के नारों पर लोग दिल्ली से लेकर जेल तक जाने को राज़ी थे क्योंकि उन नारों में अपना निजी स्वार्थ कम और सच्चाई ज्यादा होती थी और तब के लोग अपने बारे में कम और देश के बारे में ज्यादा सोचते थे। आज के हिंदुस्तान में नारे परिहास का विषय हैं और बङ़े अफसोस के साथ कहना पङ़ रहा है कि “स्वच्छ भारत” का नारा भी मज़ाक बन कर रह गया है।

इस दौर में जहाँ हमारी देशभक्ति महज़ सिनेमाघरों में राष्ट्रगान पर खड़े होने तक सीमित है या पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन वाट्सेप या फेसबुक पर तिरंगे की फोटो लगाने तक, ये दर्शाता है कि हमारे पास भारत के लिए ही समय नहीं है, स्वच्छ भारत तो बङी दूर की कौड़ी है। सही मायनों में हमारा देश इस लिए भी साफ सुथरा नहीं क्योंकि किसी को देश की नहीं पङ़ी है। यहाँ आपको अपने घरों को चमकाने वाले करोड़ों मिलेंगे पर अपनी कालोनी या अपना मोहल्ला साफ सुथरा रखने वाले कम, और यही सोच “स्वच्छ भारत” के रास्ते का सबसे बङ़ा रोड़ा है। अपने घर में हम गंदगी करने से पहले दस बार सोचेंगे पर रास्ते पर वो केले का छिलका फेंकते वक्त हम एक बार भी नहीं सोचेंगे और ना सोचते हैं।

हम हिंदुस्तानियों को अल्लाह ने ना जाने किस मिट्टी से बनाया है, हम विदेशों में जाकर वहां की साफ सफाई देखकर इतने मंत्रमुग्ध हो जाते हैं कि वहां कचरा फेकने के लिए डस्टबिन ना भी हो तो हम अपनी जेब को डस्टबिन बनाने से गुरेज़ नहीं करते। वहीं अपने देश में कदम रखते ही हम में से कुछ गुटखे और पान की पीक से सड़क को इतना लाल कर देते हैं की काबिल से काबिल पेन्टर भी शर्मा जाये। आश्चर्य की बात ये है कि एक पढ़ा लिखा वर्ग इसमें संलिप्त है जिसको पता है कि उस पानी की बोतल या चिप्स के पैकेट की सही जगह डस्टबिन है ना की सड़क का किनारा। पर इसमें उनकी भी गलती नहीं क्योंकि ‘ये भारत है और यहाँ सब चलता है’, पर शायद उन्हें यह मालूम नहीं कि इसी “चलता है” ने आज हमारी मातृभूमि की ये दशा कर दी है कि इसकी सफाई के लिए सरकार को हमसे “स्वच्छ भारत टैक्स” वसूलना पड़ रहा है। यह बात और है कि इसका प्रभाव कम और दुष्प्रभाव होने की आशंका ज्यादा है।

मैं यह बात तजुर्बे से कह रहा हूँ क्योंकि गाहे-बगाहे मुझे ट्रेन में सफर करना पड़ जाता है और वहाँ मैंने देखा है कि कैसे लोग टिकट के साथ-साथ यह अधिकार भी पा जाते हैं कि वो मूँगफली का छिलका या तेल में सना कचौडियों वाला अखबार अपनी सीट के नीचे सरका दें। अगर आप ने साहस करके पूछ भी लिया तो जवाब ये मिलेगा, “पैसा दिये हैं, फोकट में थोड़ी ना बैठे हैं”। अब ज़रा अनुमान लगाइए कि “स्वच्छ भारत” टैक्स देने वाला गंदगी क्यों नहीं करेगा, आखिर उसने इसके पैसे दिए हैं।खैर, मैं आशा करता हूँ कि भारत के सवा सौ करोड़ लोग मुझे इस विषय पर गलत साबित करेंगे और सरकार भी इन पैसों का सही उपयोग करेगी।

garbageसरकारों की बात हो, पिछली या अब की, एक चीज़ बड़ी अजीब लगती है। हर सरकार भारत को स्वच्छ करने के इस मिशन को अपनी साख का सवाल समझती है ना की देश की साख का। इसलिए इसका प्रचार प्रसार तो ज्यादा होता है पर ज़मीनी हकीकत ऊँट के मू मे ज़ीरे जितनी भी नहीं होती है। मौजूदा सरकार स्वच्छ भारत को शौचालयों के निर्माण से जोड़ कर देखती है, मोदी सरकार का संकल्प है कि 2019 से पहले 12 करोड़ शौचालयों का निर्माण किया जाये, वो बात अलग है कि एक साल में यह आंकड़ा अभी लाखों तक ही पहुँचा है। शुरुआत में इस अभियान में तेजी दिखी, नेता-अभिनेता सबने हाथ में झाङू पकड़ा और फोटो भी खिचवायी पर धीरे-धीरे इसका बुखार उतर गया।जो शौचालय बने उनमें से कई आज धूल फाक रहे, कुछ में गोबर के उपले रखे जा रहे और कुछ बंद हो गये। कई शौचालयों में पानी की टंकी नहीं, जहां टंकी है वहाँ पानी का पाइप नहीं और जहाँ दोनो है वहाँ पानी ही नहीं। पर सरकार इन ही शौचालयों का श्रेय लेते नहीं थकती, न देश में और ना ही विदेशों में।

शौचालयों का निर्माण आवश्यक ही नहीं अतिआवश्यक है, खासकर उस देश के लिए जहाँ की 60 फीसद आबादी इससे अछूती है, पर केवल निर्माण ही काफी नहीं बल्कि उसकी समीक्षा भी ज़रूरी है और ज़रूरी है ये सुनिश्चित करना कि वह आम जनता के इस्तेमाल के लिये योग्य हो। उसके बाद अगर सरकार श्रेय ले तो ये उसका हक होगा पर उससे पहले ये वोट बटोरने का महज़ एक ज़रिया ही बन कर रह जायेगा। इसके साथ ही सरकार को “कचरा नियंत्रण” या “वेस्ट मैनेजमेंट” पर कोई ठोस काम करके दिखाना होगा, मैं उम्मीद करता हूँ कि प्रधानमंत्री जी अपने सिंगापुर दौरे से इस बिंदु पर अहम जानकारी लेकर आयेगें। आपको बताते चलू कि सिंगापुर का “वेस्ट मैनेजमेंट” दुनिया में अव्वल दर्जे का माना जाता है। “कचरा नियंत्रण” सुनने में जितना सरल लगता है असल में है उससे लाखों गुना जटिल और हमारे देश के लिये तो ये 125 करोड़ गुना मुश्किल है, पर कई दशकों बाद इस देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आई है और हमें एक ऐसा प्रधानमंत्री दिया है जो इन विषयों पर खुल के बोलता है, अब देखना यह होगा कि वह इस दिशा में काम कितना कर पाता है।

इसे दुर्भाग्य ही कहिये की आज़ादी के तकरीबन सात दशक बाद भी सफाई और स्वच्छता के लिए इस देश को किसी अभियान की ज़रूरत पड़ रही है जबकी होना तो कुछ और ही चाहिये था। दरअसल बात ये है कि इस देश में अधिकारों की बातें ज्यादा होती हैं, कर्तव्यों की बहुत कम।हमने इतने सालों में अपनी इस माँ को दिया ही क्या है सिवा गंदगी और कूड़े के, हमने इसके हर एक अंग को गंदा किया है। पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, हमने कुछ नहीं छोड़ा है, हमने इसको अपने घर की गंदगी से नवाज़ा है, अपनी गाड़ियों के धुएं से और अपनी फैक्ट्रियों के जहरीले पानी से।पर अब शायद वो वक्त आ गया है जब इस माँ को उसका अधिकार मिलना चाहिये, स्वच्छता का अधिकार, साफ सुथरा रहने का अधिकार।हमें इस देश के प्रति अपना कर्तव्य समझना होगा, हमें समझना होगा कि भारत तब ही स्वच्छ होगा जब हर भारतीय स्वच्छ होगा, जब उसकी सोच स्वच्छ होगी।आइये हम सब मिलकर भारत को स्वच्छ बनाये, ना सिर्फ अपने लिये बल्कि अपने आगे आने वाली नस्लों के लिये ताकि वो एक स्वस्थ भारत में साँस ले सके, एक स्वच्छ भारत में जी सके।

mumbai national anthem row

दिव्य प्रकाश दूबे:

मैं तमाशा पिक्चर के उसी शो में था जिसका वीडियो आज सुबह से ऑनलाइन चल रहा है जिसमें एक फ़ैमिली को लोगों ने नैशनल ऐन्थम के समय न खड़े होने की वजह से हॉल से निकाल दिया गया। कमाल की बात ये है कि ‘Times Of India’ की वेबसाइट को ये नहीं पता कि हॉल बैंगलुरु का है या मुम्बई का लेकिन फ़ैमिली ‘मुस्लिम’ थी ये पता है।

mumbai national anthem rowइस मुद्दे या ‘नॉन’ मुद्दे को समझने से पहले इधर-उधर की एक दो बातें जान लेना सही रहेगा।

मुंबई में फ़िल्म शुरू होने से पहले स्क्रीन पर लिखा आता है ‘please stand up for national anthem’ (कृपया राष्ट्र गान के लिए खड़े हो जाॅंए)। नैशनल ऐन्थम खड़े न होने पर कोई legal implication (कानूनी निहितार्थ) नहीं है। हालाँकि ये बात घ्यान में रखना चाहिए कि जब भी नैशनल ऐन्थम बजे तो आप उसको तिरस्कार करने वाली कोई बात न करें।

ख़ैर ये बात सच है कि वो फ़ैमिली नैशनल ऐन्थम पर बैठी रही थी। जैसे ही नैशनल ऐन्थम ख़त्म हुई तुरंत गंजे वाले अंकल ने गरियाते हुए कहा, “Fucking, you have to stand for it” (तुम्हे खड़ा होना चहिए था)। अंकल ने जब यही लाइन कई बार अलग अलग ‘टोन’ में रिपीट करके कही तो भीड़ इकट्ठा होने लगी। उस फ़ैमिली ने बोला, ‘खड़े नहीं हुए इसका ये मतलब नहीं कि respect (आदर) नहीं करते।’

इस पर अंकल ने कहा, ‘रिस्पेक्ट कैसे नहीं देगा तू, fucking, you have to stand for it (तुम्हे खड़ा होना चहिए था) मेरी फ़ैमिली के बहुत सारे लोगों ने इसके लिए जान दी है।’

भीड़ में से एक बंदा बोला ‘बॉस मेरा पैर टूटा हुआ था फिर भी मैं खड़ा होता था।’

भीड़ में कई सारे लोग अलग-अलग टोन में कुछ-कुछ बोलने लगे। धीरे-धीरे शोर और भीड़ बढ़ते गए। PVR के कर्मचारी आ गए और स्क्रीन पर चल रहे ट्रेलर को रोक दिया गया। उन्होने आकर उस फ़ैमिली को वहाँ से बाहर निकलने को कहा। फ़ैमिली के बाहर जाते ही आधे हॉल ने ताली बजायी। तमाशा फ़िल्म शुरू होने से पहले अच्छा ख़ासा तमाशा हो चुका था। फ़िल्म का माहौल सेट हो चुका था।

मैं ये जानता हूँ कि उस फ़ैमिली को खड़े होना चाहिए था out of respect (सम्मान की खातिर), आख़िर केवल 52 सेकंड के लिए खड़े होने के लिए ऐसे भी क्या नख़रे। दूसरी तरफ़ ये देशभक्ति उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है कि कोई आदमी फ़ैमिली के साथ है और आप उसको फ़्री फ़्लो में गालियाँ देना शुरू कर दो और हॉल से बाहर निकाल दो ।

हिंदुस्तान में देशभक्ति की औक़ात अगर बस इतनी है कि पिक्चर हॉल में जो खड़ा हो गया वो देशभक्त हो जाएगा तो सनम ऐसी देशभक्ति हमें ले डूबेगी एक दिन।

जब वो फ़ैमिली हॉल से निकली थी तब वो केवल फ़ैमिली थी। मीडिया में आते ही वो ‘मुस्लिम’ हो गयी। हाल में उनसे लड़ने वाले लोग ‘केवल हिन्दू’ नहीं थे लेकिन मीडिया में वो सारे लोग हिन्दू हो गए।

भीड़ में अल्पसंख्या में होना अगर ख़तरनाक है तो बहुसंख्या में होना ज़्यादा ख़तरनाक। उस दिन की असली कहानी तो ये ही थी। बात ये है कि हम तक कहानी पहुँचने में कितने तड़के लग चुके होते हैं ये कोई नहीं जनता। सच तड़का लगने के बाद, केवल सच लगता है पर होता नहीं।

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