लोकतंत्र को कौन कमजोर कर रहा है? जन आन्दोलन या सरकार?

Posted on July 2, 2011 in Politics

By संदीप सिंह:

लोकप्रिय जन आन्दोलनों और सिविल सोसायटी की भूमिका तथा लोकतंत्र पर उसके असर के बारे में आज एक बहस चल रही है. अपने हालिया एक बयान में गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि ‘ चुने हुए जन प्रतिनिधि सिविल सोसायटी के सामने नहीं झुक सकते ‘ क्योंकि यह ‘ संसदीय लोकतंत्र ‘ को कमजोर करेगा. दबंगई पर उतरी यूपीए सरकार, भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों और जनाकांक्षा को लगातार बदनाम करने की कोशिशों में लगी हुई है. उसका कहना है कि सिविल सोसायटी को कानून बनाने का अधिकार नहीं है – लोकतंत्र में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ चुने हुए जन प्रतिनिधियों का विशेषाधिकार है. हांलाकि ऊपर से देखने में यह बात लोकतंत्र की सुस्थापित मान्यताओं के तहत ठीक दिखती है लेकिन आज हमें इस तर्क का बारीक विश्लेषण करना चाहिए.

क्या जनांदोलन और सिविल सोसायटी कार्यकर्ता सच में लोकतंत्र और संसद को कमजोर कर रहे हैं? या लोकतंत्र के लिए और बड़े खतरे हैं जिन्हें चिदंबरम और उनकी भाषा बोलने वालों द्वारा दक्षतापूर्वक छुपाया जा रहा है ? सबसे पहले यह आरोप कि सिविल सोसायटी कार्यकर्ता संसद को ही नजरअंदाज कर रहे हैं, बेबुनियाद है. सिविल सोसायटी कार्यकर्ता तो दरअसल जो कानून बनने वाला है उसके मसौदे को एक दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वे इन कानूनों के बारे में लोगों की राय भी तैयार कर रहे हैं और चाहते हैं कि चुने हुए जन प्रतिनिधि लोगों की राय के बारे में जवाबदेह भी हों. इस प्रक्रिया में आम लोगों को इन कानूनों के विशेष प्रावधानों और उन प्रावधानों पर चल रही बहसों के बारीक नुक्तों के बारे में जानने का और बहसों में शामिल होने का मौका पहले से कहीं ज्यादा मिलता है. लेकिन, अभी भी कानून बनाने की वास्तविक जिम्मेदारी संसद के सदस्यों पर ही रहती है; यद्यपि यह सच है कि जन भागीदारी के लिए चल रहे प्रयत्नों के चलते संसद के भीतर चलने वाली बहसें आम नागरिकों द्वारा ज्यादा सावधानीपूर्वक जांची-परख जायेंगी.

चिदंबरम और कांग्रेस पार्टी, संसद से बनने वाले कानूनों के बारे में लोगों द्वारा ली जा रही दिलचस्पी और जांच- परख की इस सचेत प्रक्रिया से असहज दिखाई दे रहे हैं. अपने एक लेख में, कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी सड़कों पर चल रहे आन्दोलनों की तुलना सड़कों होने वाली दबंगई और फासीवाद से करते हैं और होशियार रहने की ताकीद करते हैं. सिविल सोसायटी कार्यकर्ताओं द्वारा वित्त मंत्री से बहस को टेलीविजन पर लाने की मांग की आलोचना करते हुए चिदंबरम ने कहा कि आखिर संसद में होने वाली बहसें तो टेलीविजन पर दिखाई ही जाती ही हैं और ‘ मतदाता समय – समय पर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं ‘. लगता है कि सरकार यह कहना चाह रही है कि लोकतंत्र सिर्फ मतदाताओं द्वारा ‘समय – समय पर’ जन प्रतिनिधियों का चुनाव करने तक सीमित है! एक बार वोट करने के बाद क्या लोग, नीतियों को दिशा देने का अपना अधिकार अगले पांच सालों के लिए अपने द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों को अर्पित कर देते हैं? दूसरे शब्दों में, क्या सरकार ये कहना चाह रही है कि नागरिकों के लिए लोकतंत्र पांच साल में सिर्फ एक बार उपलब्ध होगा? क्या लोगों के पास, जब जरूरत हो तो सड़कों विरोध प्रदर्शन करके, उन जन प्रतिनिधियों को यह बताने का अधिकार नहीं है कि वे किस तरह के कानूनों को चाहते हैं? खासकर तब जब कि इन कानूनों का लोगों के जीवन पर बहुत ज्यादा असर पड़ने वाला है.

ये चौंकाने वाली बात है कि, सरकार, जो नहीं चाहती कि सिविल सोसायटी के लोग संसद को डिक्टेट करें, को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि कॉर्पोरेट CEOs, लाबीइस्ट और विदेशी ताकतें हमारे कानूनों, नीतियों और यहाँ तक कि मंत्रियों की नियुक्तियों तक को डिक्टेट कर रही हैं. इसका ज्वलंत उदहारण नीरा राडिया टेप खुलासे हैं जहाँ हमने देखा कि किस तरह मुकेश अम्बानी और उनकी लाबीइस्ट मुख्य विपक्षी पार्टी को डिक्टेट कर रहे हैं कि उर्जा के महत्त्वपूर्ण सवाल पर संसद में उस पार्टी का स्टैंड क्या होगा. विकीलीक्स ने उजागर किया है कि भारत की संसदीय प्रक्रियाओं, मंत्रियों के चुनाव ( याद कीजिये कि विकीलीक्स के खुलासे जहाँ हमने देखा कि मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री बनाने के पीछे अमेरिका का कितना असर था ) विदेश नीति के मुद्दों, आर्थिक कानूनों और नीतियों पर अमेरिका का अत्यधिक प्रभाव रहता है. भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र के ऊपर इस अमेरिकी निगरानी और दबाव के बारे में चिदम्बरम, मनीष तिवारी का एक भी बयान या लेख क्यों नहीं दीखता है? अपने देश के नागरिकों द्वारा उठाये जा रहे सवालों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताने वाली ये सरकार हमारे संसदीय लोकतंत्र की संप्रभुता पर पड़ने वाले इस स्पष्ट बाहरी असर को खतरा क्यों नहीं मानती?

गौरतलब है कि सरकार लोकपाल समिति के सिविल सोसायटी कार्यकर्ताओं की भूमिका के बारे में तो भौहें तान रही है. लेकिन खुद अनिर्वाचित व्यक्तियों, जो लगभग हर बार कॉर्पोरेट CEOs ही होते हैं, को अति महत्त्वपूर्ण रणनीतिक नीति – निर्धारक जगहों पर ऐसे तरीकों से नियुक्त कर रही है जो संसद और नागरिकों के जानने के अधिकार को कमजोर करते हैं. इसका एक निर्णायक दृष्टान्त National Intelligence Grid ( NATGRID ) है जिसे अभी हाल- हाल में सिक्युरिटी कैबिनेट कमेटी से ‘ सैद्धांतिक ‘ सहमति दी गयी है. NATGRID के कार्यकारी निदेशक कैप्टन रघु रामन हैं, जो महिंद्रा स्पेशल सर्विस ग्रुप के पूर्व कार्यकारी निदेशक रह चुके हैं. इस पद पर उनकी नियुक्ति किस संसदीय या लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से की गयी ? गृहमंत्री द्वारा उन्हें क्यों चुना गया , इस बारे में लोगों को कुछ पता नहीं है. साथ ही उनके विचार और स्टैंड्स के बारे में भी लोगों को नहीं मालूम है.

सिविल सोसायटी कार्यकर्ता public personalities हैं जिनके विचार आम लोगों द्वारा बहस और विश्लेषण के लिए खुले हैं. अन्ना हजारे जो भी कह रहे हैं यह जरूरी नहीं है कि हम उससे सहमत हों, पर उनके विचार आलोचना या मूल्यांकन के लिए हमारे सामने हैं. लेकिन कैप्टन रघु रामन जैसे लोगों के मामले में यह बात एकदम भिन्न है. उदहारण के लिए, कितने लोग राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत के लोकतंत्र पर उनके विचारों से अवगत हैं? जब वे महिंद्रा स्पेशल सर्विस ग्रुप के चीफ थे ,उन्होंने ” ठंढे लोगों का देश ” नाम से एक लेख लिखा. इस लेख में वे कहते हैं, ” उद्यमियों को अपनी स्वयं की सुरक्षा टुकडियां बनाने की जरूरत है…. दरअसल विचार यह है कि अपनी स्वयं की सुरक्षा टुकडियां रखी जायं जो कानून लागू करने वाली अन्य संस्थाओं के साथ मिल कर काम करें. आप इसे एक निजी क्षेत्रीय सेना के रूप में सोचिये. अगर बड़े व्यावसायिक जार अपने साम्राज्यों को अभी बचाना नहीं शुरू करते हैं तो वे पायेंगे कि दुश्मनकीसीमाएंउनकेसाम्राज्योंमेंघुसरहीहैं.”

एक व्यक्ति जो निजी क्षेत्रों के मालिक कॉर्पोरेट ‘जारों’ द्वारा भारत की जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए निजी सेनाओं के संचालन की कवायद करता है क्या चिदंबरम बता सकते हैं कि कैसे ऐसा व्यक्ति को देश के सबसे संवेदनशील, ख़ुफ़िया विभागों की शीर्षस्थ संस्था का नेतृत्व कर रहा है? क्या भारत की संसद और भारत के लोग इस बात को जानते हैं कि NATGRID एक ऐसे व्यक्ति द्वारा संचालित है जिसके विचार और विश्वदृष्टि सबसे निकृष्ठ किस्म के पिट्ठू गणतंत्र से मिलते हैं?

संसद को कमजोर किये जाने का एक और उदाहरण UID प्रोजेक्ट है. UID ऑथारिटी ऑफ़ इंडिया जो नन्दन निलेकनी ( एक और कॉर्पोरेट CEO ) के नेतृत्व में चल रही है – अपने अस्तित्व में बिना संसद की मंजूरी के आयी है, नागरिक समाज में इस पर बहस की बात तो दूर छोडिये. The National Identification Authority of India (NIAI) बिल अभी सिर्फ राज्य सभा में पेश हुआ है, अभी इस पर कोई बहस नहीं हुई है न ही यह राज्य सभा से पास हुआ है, और लोकसभा में तो यह अभी पेश होना ही बाकी है. कैबिनेट कमेटी के मिली अनुसंशा मात्र को आधार बनाकर नंदन निलेकनी द्वारा संचालित UIDAI की तरफ से तमाम राज्यों में निजी संस्थाओं व सरकारी मंत्रालयों के साथ सहमति पत्र (MoUs) हस्ताक्षर किये गए हैं (जिसमे अमेरिका की कुख्यात संस्था CIA की एजेंसियां शामिल हैं ) और UID कार्ड्स बांटे जा रहे हैं. क्या यह संसदीय लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता है?

रघु रामन या निलेकनी जैसे लोगों की क्या विश्वसनीयता है ? ये चुने हुए संसद सदस्य नहीं हैं. यहाँ तक कि वे ऐसे राजनीतिज्ञ भी नहीं हैं जिन्हें एक अंतराल बाद चुनावों का सामना करना है ? न ही वे कोई नौकरशाह हैं जो कम से कम कुछ नियम- कानूनों और जिम्मेदारियों से बंधा हुआ है. वे कॉर्पोरेट मुनाफे की स्वार्थसिद्धि के लिए चिंतित महज एक कॉर्पोरेट CEO हैं. फिर भी हम देखते हैं कि ऐसे लोग कैसे मनमाने ढंग से नियुक्त किये जाते हैं? और इन्हें देश की नीतियों पर दूरगामी असर डालने वाली रणनीतिक संस्थाओं में बिठा दिया जाता है? यह लोकतंत्र और लोगों के अधिकारों के ऊपर बढ़ते हमले का सूचक है.

भारत द्वारा भ्रष्टाचार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में हस्ताक्षर करने के सवाल को पर टीवी चैनल की एक डिबेट में कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बड़े ही धर्मनिष्ठ तरीके से कहा कि म्युनिसिपैलिटी का कानून भी यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय कानून से टकराता है तो उस अवस्था में ज्यादा प्रभावकारी म्युनिसिपैलिटी कानून ही माना जायेगा. देश की जनवादी संस्थाओं और संप्रभुता के प्रति यह आदर प्रशंसनीय है – पर किसी को आश्चर्य हो सकता है कि जब WTO द्वारा निर्देशित आर्थिक नीतियों का मामला आता है तब यह आदर कहाँ उड़ जाता है? उन स्थितियों में, भारत सरकार फिर यह क्यों कहती है कि उसके हाथ बंधे हुए हैं और WTO के निर्देशों के पालन हेतु देश के कानूनों में संशोधन करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है ? ऐसा लग रहा कि सरकार संसदीय लोकतंत्र और संप्रभुता के सिद्धांत को सिर्फ अपनी सुविधानुसार पेश करती है.

जनांदोलनों और सिविल सोसायटी द्वारा संचालित की जा रही प्रक्रियाएं – जिनसे हम पूरे सहमत हों अथवा नहीं – लोकतंत्र को मजबूत करती हैं. नागरिकों को चुने हुए जन प्रतिनिधियों को यह बताने का पूरा अधिकार है वे किस तरह के कानून चाहते हैं, किन कानूनों को वे बदलना या ख़त्म करना चाहते हैं. विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) कानून संसद में बिना किसी विरोध के पास हो गया था, लेकिन जब इसे लागू किया गया तब यह स्पष्ट हो गया कि जिन नागरिकों को यह सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला था – किसान – वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे. क्या यह एक ज्यादा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया नहीं होती कि संसद में इसे पास करने से पहले किसानों को इसे जांच-परख लेने का अधिकार दिया जाता? आज, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे बड़े किसान विद्रोहों ने सरकारों को भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के मौजूदा कानूनों के बारे पुनर्विचार करने पर कर दिया है. देशद्रोह कानून के खिलाफ भी देश में एक जनमत बनता दिख रहा है; पहले भी जनांदोलनों ने AFSPA जैसे कानूनों पर बड़ी बहस को जन्म दिया है. एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये सारी जरूरी प्रक्रियाएं हैं और सरकार इन भागीदारी प्रक्रियायों को बदनाम करने की कोशिश में सिर्फ अपने तानाशाही रवैये को ही दिखा रही है.

जिस अंगरेजी अखबार ने चिदम्बरम की ‘चुने हुए जन प्रतिनिधि सिविल सोसायटी के सामने नहीं झुक सकते ‘ वाली न्यूज छापी थी एक पाठक ने कमेन्ट करते हुए अख़बार के वेब पन्ने पर एकदम सटीक बात लिखी. इस पाठक ने अपने मर्मभेदी कमेन्ट में लिखा कि” हाँ, उन्हें सिर्फ कॉरपोरेट्स और देश को लूटनेवालों के सामने झुकना चाहिए”. जैसे-जैसे कॉर्पोरेट घरानों द्वारा डिक्टेटेड और संरक्षित भ्रष्टाचार ज्यादा से ज्यादा सामने आ रहा है , ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार के तर्कों से सहमत लोगों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है.

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