चाल तवाइफी – A Poem On Slut Walk

Posted on November 27, 2011 in Society

विनय वेद:

तेरी नज़र का गोश्त, तेरी नज़र की मैं गिरावट !

तेरी नज़र के जिम्मे, मेरी बनावट या दिखावट !!

क्यूँ तेरी नज़र के दायरे में मेरी ज़िंदगी, बंदगी,
क्यूँ नहीं मेरा खुदा, नहीं मेरी अपनी सजावट !

क्यूँ पर्दा मेरे चेहरे पे मगर तेरी नज़र पर नहीं,
क्यूँ मेरे जिस्म से होती तेरे मज़हब की बनावट !

आदम की छाती से तोड़ कर हड्डी से नहीं बनी,
मैं कोख़ की मल्लिका, मैं बराबर की हूँ बनावट !

बस कर अपने सहूलियत की आदम ये ठेकेदारी,
इंसान को इंसान रहने दे, बंद कर दे मिलावट !

हूँ मजबूर कि तुझे मैं कुछ और दिखती ही नहीं,
मैं चलूँ चाल तवाइफी, समझ जा मेरी सजावट !

चाल तवाइफी !

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