अब बच्चों के कंधों पर होगा भारत की अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने का दारोमदार!

Posted on June 19, 2015

By Reni Jacob:

भारत में लाखों गरीब परिवार ऐसे हैं जिनमें लाखों बच्चे गरीबी का जीवन को अभिषप्त हैं। तो इसलिए क्यों नहीं स्कूल के बाद बच्चों को काम करने दिया जाए, जिससे वे कुछ पैसे कमा सकें और गरीबी को मिटाने में मदद करें? केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा घरेलू उधमों और आडियो-विजुअल एंटरटेनमेंट क्षेत्र में 14 वर्श से कम आयु के बच्चों को काम करने की अनुमति देने के पीछे तो कम से कम यही मंषा दिख रही है। बाल श्रम (रोकथाम और नियमन) संषोधन विधेयक 2012 के तहत किया गया यह आधिकारिक संषोधन भारत में लाखों बच्चों से उनके बचपन की खुषी छीनने का प्रस्ताव लगता है।

Image Credit: Sam Theodore
Image Credit: Sam Theodore

भारत के लिए जरूरी है कि वह देष में कानून बनाते समय और उनके क्रियान्वयन में यूएनसीआरसी में बतार्इ गर्इ बच्चों की परिभाशा 18 वर्श से कम आयु के मनुश्य का सम्मान करने की प्रतिबद्धता का सम्मान करे। एक ओर जहां सरकार बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य षिक्षा अधिकार (आरटीर्इ) अधिनियम 2009 के तहत यह सुनिषिचत करने की कोषिष कर रही है कि 6 से 14 वर्श की आयु वर्ग वाले सभी बच्चे स्कूलों में दाखिला लें, नियमित रूप से स्कूल जाएं और प्राथमिक षिक्षा पूरी करें और दूसरी तरफ अब अपवादस्वरूप यह नया प्रस्ताव ला रही है जो इसी आयुवर्ग के बच्चों को बाल श्रम में धकेलने की कोषिष लगता है।

केंद्र के इस कदम का मतलब है कि पहले से ही मुषिकलों में फंसे हुए षिक्षा क्षेत्र को छात्रों को स्कूलों में अपनी पढ़ार्इ जारी रखने के लिए पहले से ज्यादा मषक्कत करनी पड़ेगी और साथ ही षिक्षा की गुणवत्ता के मोर्चे पर भी अधिक चुनौतियां पेष आएंगी। षिक्षा क्षेत्र को अभी तक करीब 50 वर्श पूर्व गठित कोठारी आयोग की सिफारिषों का महज आधा ही आवंटन मिल रहा है। आरटीर्इ अधिनियम का उददेष्य बच्चों के सीखने के लिए अनुकूल व उन पर केंदि्रत माहौल उपलब्ध कराकर बच्चों को डर, तनाव और चिंता से मुक्त करना है। इन सभी परिसिथतियों को देखते हुए यह सोचकर हैरानी होती है कि भारत में जब 14 वर्श से कम आयु के लाखों बाल श्रमिक स्कूली समय के बाद या छुटिटयों में काम करेंगे तो वे उस डर और पीड़ा से कैसे मुक्त हो पाएंगे, जिससे उन्हें षोशक व अनियिमितता भरे माहौल में दो-चार होना पड़ता है।

सस्ता श्रम, यूनियनबाजी का कोर्इ मामला नहीं और नाजुक उंगलियों का समीकरण भारत में कर्इ घरेलू उधमों और अनियमित क्षेत्रों के उधोगों को एकदम अनुकूल लगता है। किसी भी बच्चे को किसी उधोग में काम में नहीं झोंका जाना चाहिए और इसका कोर्इ अपवाद भी नहीं होना चाहिए। सच तो यह है कि बाल श्रम को जोखिम और गैर-जोखिम श्रेणी में विभाजित करने की बात ही बेमानी है। क्या अच्छा बाल श्रम’ भी कहीं मुमकिन है?

संषोधन में प्रस्तावित अपवादों की सूची कथित तौर पर गैर-जोखिम घरेलू उधम और आडियो-विजुअल एंटरटेनमेंट उधोग को षामिल किया गया है। तथाकथित पारिवारिक उधमों की बेहद विकेंदि्रत और अनियमित प्रवृति को ध्यान में रखते हुए इस नियम के उल्लंघन के मामलों की पहचान करना किसी भारी-भरकम चुनौती से कम नहीं होगा। इसके अलावा, संषोधन (14 वर्श से कम आयु वाले) बाल श्रमिकों को किसी अन्य एंटरटेनमेंट या खेल गतिविधियों में भी काम करने की अनुमति देता है, जिसमें कर्इ खामियां हैं, जिनका लाभ दलाल व नियोक्ता उठा सकते हैं। बड़े उधोगों के लिए तो राह और भी आसान हो गर्इ। हाल में किए गए संषोधन की बदौलत अब उन्हें सिर्फ अपना काम परिवरों को आउटसोर्स करना है।

इन बच्चों के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार को समाप्त करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि हम बाल सुरक्षा को प्राथमिकता दें और सुनिषिचत करें कि बाल श्रम की बहुलता वाले इलाकों में स्कूलों में दाखिला सिर्फ दिखावा नहीं हो। बच्चों को काम करने की अनुमति देने के बजाय जरूरतमंद समुदायों को उचित वेतन वाले रोजगार के अवसर मुहैया कराना ज्यादा कारगर साबित होगा। सरकार की विज्ञपित में कहा गया है, बाल रोजगार पर पूर्ण प्रतिबंध को ध्यान में रखते हुए देष के सामाजिक ताने-बाने और सामाजिक-आर्थिक परिसिथतियों पर गौर करना समझदारी है। ऐसे में हमारे लिए यह षर्म की ही बात होगी अगर 46 लाख बाल श्रमिकों को हमारे सामाजिक ताने-बाने और सामाजिक-आर्थिक परिसिथतियों की बलि चढ़ना पड़े।

The author is Advocacy director at World Vision India.

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