माखनलाल विश्वविद्यालय में हज़ारों छात्रों के भविष्य के साथ हो रहा है मज़ाक #लड़ाईजारीहै

Posted on June 12, 2015 in Campus Watch, Hindi

दीपिका शर्मा

मेरी मम्मी चाहती थीं कि लड़की बीएड कर ले और टीचर बने। मम्मी ही क्या, ज़्यादातर लड़कियों की मां यही चाहती हैं कि उनकी लड़की टीचर बने या ऐसी ही कोई नौकरी करे जिसमें सुबह जाए और शाम को पति के आने से पहले घर आ जाए। लड़कियों के लिए टीचरी का जॉब अच्छा होता है। वहीं पापा का कहना था, मम्मी गलत ही क्या कह रही हैं। मां और पापा दोनों नौकरी पेशा थे, पढ़े-लिखे थे और इतने खुले दिमाग के थे कि मुझे आगे भी पढ़ाना चाहते थे, लेकिन उसके बाद भी कॉलेज खत्म होने पर और भोपाल में ऐशिया के पहले और सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडमिशन मिलने तक, हर दिन घरवालों को मनाना होता था कि वह मुझे पत्रकार बनने के लिए राजस्थान से इतना दूर भोपाल भेजें। माखनलाल पत्रकारिता विवि का एन्ट्रेंस एग्जाम देने से लेकर इंटरव्यू के लिए कॉल आने तक हर दिन इस डर में निकला कि कब अचानक मम्मी या पापा मना कर दें कि बस बहुत हुआ, अब नहीं जाना कहीं, यहीं रह कर पढ़ो।

makhanlal university protest

परिवार में मुझसे पहले शायद कोई लड़की नहीं थी जिसने इस तरह का कोई प्रोफेशन चुना हो। मम्मी पापा के लिए ‘सरकारी नौकरी ही जीवन का सार है’ जैसे परिवेश में मेरा पत्रकारिता को चुनना उनके लिए किसी ‘बेवकूफी’ से कम नहीं था। बहुत कोशिशों, मिन्नतों और सरकारी कॉलेज में बेहद कम फीस में पत्रकारिता के कोर्स के लिए चुने जाने पर बड़े अनमने मन से मां ने कहा था, ‘कर लो, इसके बाद पीएचडी कर लेना तो टीचर की बजाए प्रोफसर बन जाओगी।’

मैं अकेली लड़की नहीं हूं इस देश की जिसे घर से बाहर निकल कर पढ़ाई करने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ी हो या घरवालों को मनाने के लिए तरह-तरह के तर्क रखने पड़े हों। आज भी देश में हज़ारों लड़कियों को 10वीं के बाद अपनी पढ़ाई आगे करने के लिए घरवालों के सामने तर्क देने होते हैं। जैसे-जैसे डिग्री ऊंची होती जाती है, हमारे भारतीय घरों में लड़कियों को और भी पुख्ता और मजबूत तरीकों से समझाना पढ़ता है कि आखिर उन्हें टीचर बनने के अलावा कोई अन्य पेशा चुनने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है। उस पर भी अगर बात मीडिया की हो तो तर्क और उन्हें रखने का तरीका और भी नायाब चुनना पड़ता है।

मेरे साथ, और मेरे बाद, भोपाल के इस सबसे बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालय में न जाने कितनी लड़कियां घर वालों को मना कर, समझाकर, रो कर, रुलाकर, गिड़गिड़ाकर, रूठकर या मिन्नत कर के पत्रकार बनने की कोशिश में आई होंगी। लेकिन आज सोच के भी डर लग रहा है कि इस विश्वविद्यालय में फैली राजनीति और इस संस्थान के ‘बॉस’ कैसे उन हज़ारों छात्रों के भविष्य के साथ भद्दा मज़ाक कर रहे हैं।

मीडिया की सबसे पहली जरूरत है फील्ड। अगर आप फील्ड की हकीकत से वाकिफ नहीं हैं तो आप लायक ही नहीं हैं कि अपने आप को मीडियाकर्मी कह सकें। भविष्य में सच्चाई की तह तक पहुंचने और किसी घटना के दोनों पहलू जानने के लिए दर-दर की ठोकर खाने वाले पत्रकारों को, ब्लैक बोर्ड पर पत्रकारिता सिखाई जा रही है। क्योंकि इन छात्रों को न तो इंटर्नशिप नसीब है, और न ही इन्हें किसी स्टडी टूर के लिए कहीं भेजा जाता है। वहीं इसके उलट, इस विश्वविद्यालय के कुलपति देश-विदेश के इतने टूर कर रहे हैं कि छात्रों को अपने कुलपति का चेहरा देखे हुए महीनों हो जाते हैं।

आज भी ‘नारद’ को पहला पत्रकार और ‘महाभारत के संजय’ को पहला इलेक्ट्रोनिक मीडिया रिपोर्टर बता कर इन बच्चों को भविष्य के मीडिया के लिए तैयार किया जा रहा है। ‘उदंत मार्तण्ड’ को हिंदी पत्रकारिता का पहला सूरज मानने वाले इन छात्रों को मीडिया की काली रातों, और उन काली रातों के बावजूद सच्चाई की लौ जालाए रखने के गुर कभी नहीं आ पाएंगे, क्योंकि माखनलाल विश्वविद्यालय के छात्रों को किताबों से 2 और 2 का मतलब 4 होना सिखाया जा रहा है, लेकिन सड़क पर बैठे 2 भूखे और 2 बेसहारा के हक की बात करने पर क्या समीकरण बनेगा इसका उन्हेूं कोई इल्म नहीं।

शर्मनाक है कि एक व्यक्ति पिछले 5 सालों से हज़ारों मीडिया छात्रों के भविष्य के साथ मजाक कर रहा है और इन बच्चों का भविष्य बनाने वाले (टीचर) सिर्फ ‘जिल्ले ईलाही की जय हो’ कर रहे हैं। यह युनिवर्सिटी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए ईंटें तैयार करने के बजाए उसकी जड़ों को खोखला कर रही है।

मैं बैचेन हूं तो उन लड़कियों के बारे में सोच कर जो एक अच्छी पत्रकार बनना चाहती हैं। जो भविष्य में शायद अपनी नौकरी के पहले ही दिन ऐडिटर के आगे कभी ज़ोर से न कह पाएं कि मैं फील्ड के लिए पूरी तरह तैयार हूं, आप बस काम बताईए। परेशान हूं उन मीडिया छात्रों के भविष्य को लेकर जो इस यूनिवर्सिटी की दीवारों में अटैंडेंस के डर से कभी यह नहीं जान पाएंगे कि अखबार CMYK और टीवी चैनल RGB की तकनीक से कहीं ज्यादा गाढ़े और गहरे रंगों का नाम है।

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