मैं जंगल की बेटी और जंगल मेरा मायका

Posted on June 5, 2015 in Environment, Hindi

उपासना बेहार:

महिलाओं का शुरू से ही कुदरत से बेहद नज़दीकी संबंध रहा है। एक तरफ वो प्रकृति की उत्पादनकर्ता-संग्रहकर्ता हैं, तो दूसरी तरफ प्रबंधन और संरक्षण की भूमिका निभाती रही हैं। महिलाओं ने इसकी रक्षा के लिए कई आंदोलन चलाए और अपने प्राण देने से भी नही हिचकिचाई। देश में हुए कई पर्यावरण-संरक्षण आंदोलनों, खासकर वनों के संरक्षण में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इन आंदोलनों पर अगर नज़र डाले तो अमृता देवी के नेतृत्व में किये गए आन्दोलन की तस्वीर सबसे पहले आती है। वर्ष 1730 में जोधपुर के महाराजा को महल बनाने के लिए लकड़ी की ज़रुरत आई तो राजा के आदमी खिजड़ी गांव में पेड़ों को काटने पहुचें। उस गांव की अमृता देवी के नेतृत्व में 84 गांव के लोगों ने पेड़ों को काटने का विरोध किया, परंतु जब वो ज़बरदस्ती पेड़ों को काटने लगे तो अमृता देवी पेड़ से चिपक गयी और कहा कि, “पेड़ काटने से पहले हमें काटना होगा।” राजा के आदमियों ने वहीं अमृता देवी को पेड़ के साथ काट दिया।

यहीं से मूल रूप से चिपको आन्दोलन की शुरुआत हुई। अमृता देवी के इस बलिदान से प्रेरित होकर गांव की महिलाएं और पुरुष पेड़ से चिपक गए। इस आन्दोलन ने एक विकराल रूप ले लिया और 363 लोग विरोध के दौरान मारे गए, तब जाकर राजा ने पेड़ों को कटवाना रोका।

इसी आंदोलन ने आज़ादी के बाद हुए चिपको आंदोलन को प्रेरित किया और दिशा दिखाई। सरकार ने 26 मार्च 1974 को चमोली ज़िले के नीती घाटी के जंगलों को काटने का कार्य शुरू करना था। इसका रैणी गांव के निवासियों ने ज़ोरदार विरोध किया जिससे डर कर ठेकेदारों ने रात में पेड़ काटने की योजना बनायी। लेकिन गौरा देवी ने गाँव की महिलाओं को एकत्रित किया और कहा कि “जंगल हमारा मायका है हम इसे उजड़ने नहीं देंगे।

सभी महिलाएं जंगल में पेड़ों से पूरी रात निर्भय होकर चिपकी रही। ठेकेदारों को फिर खाली हाथ जाना पड़ा और यह आन्दोलन पूरे उत्तराखंड में फ़ैल गया। इसी प्रकार टिहरी जिले के हेंवल घाटी क्षेत्र के अदवाणी गांव की बचनी देवी भी ऐसी ही महिला हैं। जब 30 मई 1977 को अदवाणी गांव में वन निगम के ठेकेदार पेड़ों को काटने लगे तो बचनी देवी गांववासियों को साथ लेकर पेड़ बचाओ आंदोलन में कूद पड़ी और पेड़ों से चिपककर ठेकेदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें भगा दिया। यह संघर्ष तक़रीबन एक साल चला और इस आन्दोलन के कारण पेड़ों की कटान पर वन विभाग को रोक लगानी पड़ी।

दक्षिण में भी चिपको आन्दोलन की तर्ज पर ‘अप्पिको’ आंदोलन उभरा जो 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र से शुरू हुआ। सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश से काटा जा रहा था, तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया। यह आन्दोलन लगातार 38 दिनों तक चला।

इसी तरह से बेनगांव, हरसी गांव की हज़ारों महिलाओं और पुरुषों ने पेड़ों के काटे जाने का विरोध किया और पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले से लगा लिया। निदगोड में 300 लोगों ने इक्कठा होकर पेड़ों के गिराये जाने की प्रक्रिया को रोककर सफलता प्राप्त की। उत्तराखण्ड में महिलाओं ने “रक्षा सूत्र” आंदोलन की शुरुवात की जिसमे उन्होंने पेड़ों पर “रक्षा धागा” बांधते हुए उनकी रक्षा का संकल्प लिया। नर्मदा बचाओ आन्दोलन और साइलेंट घाटी आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

भारत में आज़ादी के पहले से वन नीति है, पहली राष्ट्रीय वन नीति 1894 में बनी थी। स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति 1952 में, वन संरक्षण अधिनियम 1980 में बनी नई नीतियों में महिलाओं का कहीं ज़िक्र नहीं था। वनों को लेकर महिला एक उत्पादनकर्ता, संग्रहणकर्ता, संरक्षक और प्रबंधक की भूमिका निभाती है, इस कारण प्रकृति से खिलवाड़ का दुष्प्रभाव सबसे ज़्यादा महिलाओं पर ही पड़ता है।

इन सब आन्दोलनों के दबाव के कारण 1988 में जो राष्ट्रीय वन नीति बनी उसमें महिलाओं की सहभागिता को महत्व दिया गया और उनकी वनों पर निर्भरता, वनों को लेकर ज्ञान, और वन प्रबंधन में उनकी सक्रीय भागीदारी को समझा गया। इसके साथ यह सोच भी बनी कि अगर वन प्रबंधन में महिलाओं की भी भागीदारी होगी तो वन नीति के लक्ष्य को आसानी से पाया जा सकता है।

इसी सोच के चलते संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम के अंतर्गत हर गांव में वन समिति बनाई गयी और उस समिति में महिलाओं को भी शामिल किया गया। 1995 में राष्ट्रीय वन नीति में बदलाव करते हुए समितियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण कर दिया गया। परंतु देखने में आया है कि ज़्यादातर महिलाओं को संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम और वन समिति के बारे में जानकारी नहीं है।

पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में महिलाओं को कहने-बोलने की जगह कम ही मिल पाती है, लेकिन देखना ये है कि महिलाये इन चुनौतियों को कैसे पार पाती हैं और वनों के स्थायित्व विकास के लिए क्या और किस तरीके के कदम उठाती हैं।

फोटो आभार: कल्पवृक्ष फेसबुक पेज और Uttarakhand – Land of Gods   

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