इस हिंदी दिवस, हिंदी किताबों को ‘कूल’ बनाने की मेरी छोटी सी कोशिश

Posted on September 14, 2015 in Culture-Vulture, Hindi

दिव्य प्रकाश दुबे

14 सितंबर को हिन्दी दिवस होता है, ये GK का ज्ञान मैं इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि हिंदुस्तान में हिन्दी दिवस किस दिन होता है ये बात जानने या न जानने से हम सब की जिंदगी में कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

हिन्दी दिवस है, एक दम कुछ intellectual टाइप के लोगों को आज बड़ी चिंता होने लगेगी कि हिन्दी की हालत आज बड़ी ही खराब है। कई लोग तो आँसू की नदिया बहा देंगे हिन्दी की दयनीय स्थिति पर, कुछ तो ऐसे भी मिलेंगे जिन्होंने हिन्दी की खराब स्थिति पर PhD कर रखी होगी।

hindi books collage

देखिये, हिन्दी की किताब पढ़ने के साथ दिक्कत ये है की पूरी किताब पढ़के भी नयी vocabulary तो सीखते नहीं जो हम लोग MBA के entrance में, या कहीं बोलने में काम आए। स्टाईल नहीं न हिन्दी में और वैसे भी हिन्दी की किताब लेकर फ्लाइट में या ट्रेन में जाओ तो बड़ा ही ‘down market’ लगता है। वहीं अगर हाथ में अँग्रेजी की कोई भी किताब होती जो भले हम पढ़ते नहीं बस ट्रेन में लेकर जाते या कॉलेज में हाथ में दबाये रहते तो बड़ा ही confident सा फील होता है।

अपने आस पास जरा नज़र घुमा के देखिये, अंग्रेजी की किताबें तो हर जगह मिलती हैं, pirate होती हैं, हम लोग मोलभाव करके फुटपाथ से भी ले लेते हैं। फुटपाथ वाली दुकान पर आप हिन्दी की किताब पूछोगे तो दुकानदार ऊपर से नीचे तक आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने किताब की दुकान पर कॉन्डोम मांग लिया हो। हाँ हिन्दी के नाम अगर उसके पास कुछ मिले तो शायद आपको “मस्तराम” जैसा कुछ टिका दे, उसकी demand रहती ही है।

देखिये इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि हिन्दी में किताबों की स्थिति बड़ी गड़बड़ है तो सवाल ये उठता है कि इसका जिम्मेदार आखिर है कौन?

किसी हिन्दी के लेखक से कभी गलती से मत पूछ लीजिएगा ये सवाल, वो तुरंत अपनी आँखें लाल करके बोलेगा- “पूरा सिस्टम खराब है, पब्लिशर जिम्मेदार है, सरकार जिम्मेदार है, कैपिटलिस्म जिम्मेदार है। ऊपर से नीचे तक सब भ्रष्ट हैं!”

चलिये आपको एक राज़ की बात बता देता हूँ। हिन्दी की extremely bad situation के लिए बहुत हद तक हिन्दी के लेखक ही जिम्मेदार हैं। हिन्दी का लेखक अपने पाठक से इतनी दूरी बना कर रखता है जितनी कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच है। अपनी ही लिखी हुई चीज को प्रचार करने को हिन्दी का लेखक इतना बुरा मानता है जैसे वो किताब का नहीं सिगरेट या बीड़ी का प्रचार कर रहा हो। अब भइया, जब पता ही नहीं चलेगा कि कोई नयी किताब आई है तो उसका बिकना और पढ़े जाना तो बहुत दूर की कौड़ी है।

हिन्दी के बहुत से बड़े लेखक सोते-जागते खाते-पीते intellectual जैसा behave करते हैं। वही intellectual (बुद्दिजीवी), जो पब्लिक में न ज़ोर से हँसता है न बोलता है बस सोचता रहता है, कभी-कभी बस थोड़ा मुस्कुरा देता है और समय-समय पर चिंता व्यक्त करता रहता है, नारी से लेकर दलित तक सारे विमर्श करता रहता है। दिक्कत एक ही है कि हिन्दी का लेखक पूरी दुनिया में हिन्दी के पाठक के अलावा सबके लिए लिखता है। कभी-कभी तो इतना complex लिख देता है कि उसको समझने के लिए दूसरे उसके जैसे ही intellectual (बुद्दिजीवी) को बुलाना पड़े।

अब देखिये ये हिन्दी का रोना धोना तो लगा रहेगा। मैंने ये सोचा है कि जो भी मेरी हिन्दी की सबसे favourite किताबें हैं, महीने में एक किताब मैं अपने किसी जानने वाले को जरूर गिफ्ट करूंगा, और दूसरा काम ये कि जहां भी किताबें मिलती हैं उस दुकानदार से हिन्दी की किताब रखने के लिए कहूँगा। आप में से ज़्यादा से ज़्यादा लोग अगर अपने-अपने शहरों में दुकानदार से हिन्दी किताब रखने के लिए कहें तो शायद कुछ हवा का रुख बदले। मुझे मालूम है मेरे ये करने से कोई दुनिया नहीं बदलने वाली लेकिन इस बार कोशिश करने का मन है। बहुत हुआ हिन्दी के लिए रोना धोना, क्या पता आप में से कुछ लोग ऐसा करें तो हिंदुस्तान में हिन्दी भी थोड़ी ‘cool’ हो जाए।

यह हैं मेरी कुछ पसंदीदा किताबें, जो मैं न जाने कितनी गिफ्ट कर चुका हूँ और आगे भी करने वाला हूँ

चित्रलेखा- भगवती चरण वर्मा
गुनाहों का देवता- धर्मवीर भारती
सिनेमा और संस्कृति- राही मासूम रज़ा
क्या भूलूँ क्या याद करूँ- हरिवंश राय बच्चन
ट-टा प्रोफ़ेसर- मनोहर शाम जोशी
मृत्युंजय- शिवाजी सावंत

ये तो रही मेरी लिस्ट आप कौन सी किताब गिफ़्ट करने वालें हैं?

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