कहानी घर-घर की: रियल एस्टेट बिल्डरों की मनमानी और ग्राहकों की परेशानियाॅं

Posted on November 24, 2015 in Hindi

विक्रम प्रताप सिंह सचान:

Office_Building_Under_Constructionअपना एक आशियाना बनाना, उसे दुनिया की हर खूबसूरती बख्श देना हर इनसान का सपना होता है। अमूमन घर का सपना पूरा करने के लिये बुजुर्ग लोग अपने जीवन की समूची कमायी और नौजवान हो सकने वाली अनुमानित कमायी लगा देते है। कर्जदार होने और किश्ते चुकाने का सिलसिला चल पड़ता है। किन्तु बावजूद इसके घर कब मिलेगा? मिलेगा भी या नहीं? सौदे की शर्तो के आधार पर ही मिलेगा या नहीं? ये सवाल हमेशा जहन को कचोटते रहने वाले होते है। अन्यथा ऐसे लोगो की कमी नहीं जिनकी आँखें पोज़ेशन के इंतज़ार में पथरायी जाती है, जो घर का किराया और खरीदे घर की किश्ते दोनों भर रहे है। जो बिल्डर से कानूनी लड़ाई में उलझे अपनी किस्मत को कोस रहे है। एनसीआर, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई , पुणे, चण्डीगढ़ में लाखों लोग इस दर्द के पीड़ित है। किन्तु इनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं। जिन संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती वो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

क्या आपको मुम्बई का कैम्पा-कोला कमपाउण्ड याद है? बिल्डिंग पर चलता सरकारी बुलडोजर याद है? घर बचाने की जद्दोजहद करते लोग याद है? पूरे मामले में गलती किसकी थी? बिल्डर की और नियामक संस्थाओं की? पर सजा मिली घर के खरीददार को। देश में कोका-कोला की तर्ज कमपाउण्ड पर ही आज भी कारोबार चल रहा है। हाँ तरीके थोड़े बदल गये है।

बीते दशक में जमीने सोने के भाव बिकी शायद यही कारण था घर बनाना, बेचना एक कारोबार में बदल गया। व्यावसायिकता ने जोर पकड़ा और साथ ही साथ घर की कीमतों ने। कारोबार में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों ने पाँव जमाये। रफ्ता-रफ्ता बाजार बड़ा होता चला गया। हालत यहाँ तक आ गयी की बिना किसी तरह निर्माण हुये भी घरों की खरीद फरोख्त होने लगी। घर इन्वेस्टमेंट के इंस्ट्रुमेंट के तौर पर उभरा। घर बनने की खबर से बन कर मिल जाने तक की बीच में कई बार खरीद फरोख्त होती और अनन्तः जरूरतमन्द तक पहुँचते-पहुँचते दाम आसमान छूने लगे। इस सब के बावजूद सरकार ना कोई नियामक सँस्था ला सकी, ना ही किसी अन्य तरीके से ग्राहकों का दर्द काम कर सकी।

घर की खोज में निकले एक ग्राहक के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ होती है:

1. प्री-लॉन्च जैसे कांसेप्ट का दोहन, बिना किसी कानूनी इजाजत के लोगो से पैसा वसूल करना और प्रॉपर्टी की ट्रेडिंग को बढ़ावा देना।

2. बिल्डर और प्रमोटर्स के बारे में कोई वित्तीय जानकारी ना उपलब्ध होना। इस कारण से एक स्वस्थ वित्तीय कम्पनी की जानकारी कर पाना मुश्किल होता है। यदि कम्पनी की वित्तीय जानकारी उपलब्ध भी हो तो उस प्रोजेक्ट विशेष की जानकारी नहीं होती।

3. बिल्डर द्वारा जिस जमीन पर निर्माण कार्य करने का प्रस्ताव है, उसके मालिकाना हक़ के बारे में जानकरी ना होना। जो दस्तावेज उपलब्ध कराये जाते है, उनकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में होती है। इस कार्य के लिये जो नियामक संस्थाये है उनसे जानकरी निकलवा पाना दुष्कर कार्य है। सो अधिकतर समझौते बिना पूरी जानकारी के हो जाते है।

4. ग्राहकों से पैसा लिया जाता है किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिये और बाद में अन्य प्रोजेक्टस में लगा दिया जाता है। बिल्डर्स द्वारा पोजेसन में देरी का मूलकारण भी यही होता है।

इन सब दुश्वारियों के उपरान्त घर का सौदा हो जाता है उसके बाद और समस्याएं ग्राहकों के सामने आती है। बिल्डर की तरफ से समय-समय कई अन्य तरीकों से वादाखिलाफी की जाती है।

ग्राहकों का इस तरह से शोषण किया जाता है:

1. समय पर पोज़ेशन न मिलना।
2. डील फाइनल होने के बाद फ्लैट का एरिया चेंज करना, उसके एवज में पैसे की मांग करना।
3. कन्स्ट्रक्शन क्वालिटी का घटिया होना, इसकी गुणवत्ता केवल और केवल बिल्डर की श्रद्धा पर निर्भर करती है। यदि आप कंस्ट्रक्शन क्वालिटी से संतुष्ट नहीं है तो मनमसोस कर रह जाने के अलावा कोई अन्य तरीका नहीं होता।
4. कई मामलात में किसी और की जमीन को अपना दिखा कर बेचा जाना।
5 . अथॉरिटी से बिना परमिशन के कंस्ट्रक्शन का कार्य शुरू होना।
6 . कुछ टावर बन जाने पर पजेशन देना , जबकि सोसाइटी रहने योग्य नहीं होती।
7 . बिल्डर का कानूनी कार्यवाही से न डरना।
8 . नंबर ऑफ़ फ्लोर्स में परिवर्तन पूरे के पूरे फ्लैट का ले-आउट चेंज करने के उद्देशय।
9. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के सहारे घर के दाम बढ़े हुए दिखाने का यत्न।
10. ब्लैक मनी को बढ़ावा देना।
11. एंड यूजर की जगह किसी एक ही व्यक्ति को ग्बहुत सारे फ्लैट उपलब्ध करना बाद में उन्ही फ्लैट्स को ऊँचे दामों पर बेचना।

चण्डीगढ़ के जीरकपुर में एक नामी गिरामी बिल्डर ने 1500 फ्लैट्स की बिल्डिंग का पोसेशन २ साल देर से दिया। ग्राहकों की पीड़ा तब और बढ़ गयी जब उन्हें ये पता लगा कि बिल्डर ने करीब आधे फ्लैट किसी दूसरी एजेन्सी को बेच दिये है। अब पोसेशन के लिये उस एजेन्सी से बात करनी पड़ी जो ना निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार है और ना ही विलम्ब की पेनल्टी देना चाहता है। कुछ लोगो ने जब विरोध दर्ज कराया तो ये कह कर जाने को कहा की जाओ मुकदमा लड़ लो।

दूसरी ओर हरियाणा के पंचकुला में भी बेहद नामी गिरामी बिल्डर के ऊपर वन विभाग ने मुकदमा कर दिया और ग्राहकों का पैसा सालों तक फँसा रहा। चण्डीगढ़ के IT पार्क में नामी बिल्डर ने ग्राहकों को प्लॉट्स बेचकर पैसा ले लिया किन्तु चण्डीगढ़ प्रशासन और बिल्डर के बीच कानूनी लड़ायी का खामियाजा लोगों ने करीब 8-9 साल तक भुगता। नोयडा के नवनिर्मित सेक्टर्स में 90 % फ्लैट्स का पोज़ेशन सालो से ज्यादा डिले हुआ है। कई ऐसे बिल्डर भी है जिन्होंने बिना रजिस्ट्री के ही लोगो को पोज़ेशन दे दिया। गैर कानूनी ढंग से लोग रह रहे है। ये बिना सरकारी नुमाईंदों की मिली भगत के सम्भव नहीं।

ज्ञात हो कि बिल्डर या इस तरह की एजेंसी के पास कानूनी लड़ाई के लिये स्थापित सिस्टम होता है, जबकि ग्राहक के लिये मुकदमा लड़ना एक दुस्वप्न की तरह है। जो अन्ततः ग्राहक को बिल्डर की शर्तो पर मानना होता होता है या फिर कानूनी लड़ाई की मानसिक और आरती प्रताड़ना झेलनी होती है।

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