क्या सड़कों के नियमों को कायम रखना सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी है?

Posted on November 2, 2015 in Hindi

व्यक्तिगत या सार्वजनिक साधन से यात्रा करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह, शाम आप या आपका कोई प्रियजन शहर के यातायात का हिस्सा होते हैं। सुबह हर पारिवारिक व्यक्ति का सबसे प्राथमिक काम बच्चों को स्कूल या स्कूल बस तक ले जाना होता है। अक्सर देखने में आता है कि स्कूल बस में बच्चे को ज़रा भी असुविधा हो जाये तो माँ-बाप बस वाले के ऊपर, बस स्टॉफ के ऊपर गुस्सा करते हैं।

बच्चे की सुविधा, सुरक्षा स्कूल में स्कूल बस में माँ बाप की चिंताओं का सबब होता है। यदि बस ड्राईवर स्कूल बस को गलत दिशा में गलत तरीके से, अधिक गति से चलाता है और ये आपकी नज़र में आ जाये तो बस ड्राईवर की शिकायत होती है। किन्तु ये बात खुद पर लागू हो सके ऐसे किसी ख्याल से दूर ही रहते हैं लोग।

traffic light signal

इन्हीं में से अधिकांश मां बाप जब घर से दफ्तर के लिये निकलते हैं तो बहुत व्यस्त नज़र आते हैं। समय इतना कम कि एक हाथ में स्टीयरिंग और दूसरे में मोबाइल होता है। व्यस्तता इतनी की गाड़ी चलाते हुये और सड़क पार करते हुए उन्हें ये बात ध्यान नहीं रह जाती कि वो अपनी जान और साथ ही अपने ही जैसे किसी की जान खतरे में डाल रहे हैं। जाहिर है कि बात जल्दी गाड़ी चलाने और फ़ोन पर बात करने तक ही सीमित नहीं है। गाड़ी तेज़ चलाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, हाई बीम पर गाड़ी चलाना इतनी जल्दी कि 1-2 मिनट बचाने के लिये रेडलाइट क्रॉस करने से भी बाज नहीं आते।

शायद ये ख्याल भी दिमाग के किसी कोने में नहीं आता कि जिस बच्चे की सुरक्षा के लिये वो खुद बस के ड्राईवर से लड़ जाते हैं, वहीं आदतें वो खुद जीते हैं। यदि कोई यातायात नियमों का हवाला दे, तो दोष दूसरे के मत्थे मढ़ कर पल्ला झाड़ लेते हैं।

जब आप अपनी जान खतरे में डालते हैं तब साथ ही साथ आप अपने बच्चे का भविष्य भी खतरे में डालते हैं। यातायात के नियमों का पालन करना और करवाना केवल स्कूल बस, ऑटो चालक और ट्रैफिक पुलिस की ज़िम्मेदारी नहीं है । ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

कई बार के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहूं तो हर आदमी दूसरे से आगे निकल जाने की चेष्टा रखता है। सड़क पर चलने की अधिकतम रफ़्तार क्या है ये मुद्दा होता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसा मज़े और दूसरों पर रौब जमाने के लिये भी करते है।

भारत में चण्डीगढ़ की यातायात व्यवस्था को अपेक्षाकृत अच्छा माना जाता है। चण्डीगढ़ के कई चौराहों पर स्पीकर लगे हुए हैं जो यात्रियों को ये बताते रहते है कि “दुर्घटना से देर भली”, “कहीं कोई है जो आपका इंतज़ार कर रहा है”। ये बात बहुत सारे लोगों के कानों से बस होकर गुज़र जाती है। किन्तु पैर जब गाड़ी के एक्सीलरेटर पर जाता है तो सब नियम कायदे कानून हवा हो जाते हैं। ये प्रवृत्ति बेहद चिन्ताजनक है। ये ज़रूरी है कि सब नियमों का पालन करें और जो नहीं करता उसकी शिकायत करें। चण्डीगढ़ के अखबारो में ये खबर आम रहती है कि किसी ने ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले की तस्वीर खींचकर फेसबुक पर डाल दी और पुलिस ने उसका चालान काट दिया।

सरकारों को भी ये देखना चाहिये कि ट्रैफिक पुलिस को प्रॉपर ट्रेनिंग मुहैय्या करायी जाय। उन्हें पेशेवर तरीके से काम करने की हिदायत मिले। मैं आज तक कभी नहीं देख पाया कि पुलिस वाले प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ने का इशारा करते हो। चण्डीगढ़ में अक्सर ये पाया है कि पुलिस का बर्ताव ज्यादा पेशेवर है। यातायात कर्मी बाकायदा सीटी बजा कर चौराहें के बीच नियम के अनुसार सिग्नल देते हैं, खासकर जब ट्रैफिक का कण्ट्रोल किसी कारणवश मैन्युअल हो।

यातयात के नियम स्कूली बच्चों की शिक्षा के अंग होने चाहिये, पढ़ाई के शुरुआती दिनों से ही। एक बेहतर और सुरक्षित समाज के लिये ये बहुत ज़रूरी है कि अच्छी गणित और अच्छी विज्ञान के साथ-साथ अच्छी नागरिक शास्त्र भी पढ़ी जाए और हम सब अच्छे नागरिक बनें।

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