अगर भारत को ‘सपनो का देश’ बनाना है, तो यह बात याद रखना ज़रूरी है

Posted on January 4, 2016 in Hindi, Society

poverty in indiaसमाज का वैसा भाग जो कि अपने आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम नहीं हैं और निर्धनता यह सिद्ध करती है कि समाज का चौतरफा विकास अभी भी बाकी है, चाहे वो गरीबी की दर 30% हो या 2०% और भारत सरकार की राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार लगभग 22% लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे है। एक विकसित व खुशहाल समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है की वो आर्थिक व सामाजिक आधार पर पिछड़े लोगो को सार्वजनिक तौर पर सुविधएं उपलब्ध कराये।

सामाजिक सुरक्षा तो हर नागरिक के लिए ज़रूरी है, लेकिन विशेषतः आवश्यक है वैसे जनमानस के लिए जो असमाजिक खतरों के दायरे में हैं और वो हैं हमारे समाज के 30 % गरीब नागरिक। सरकार इनकी सुरक्षा अथवा विकास के लिए आज़ादी के बाद से ही कार्यरत हैं क्योंकि आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. अम्बेडकर के अनुसार – “एक कल्याणकारी समाज के गठन के लिए सबका विकास होना ज़रूरी हैं” तो फिर 30 % गरीबों को असामाजिक – सुरक्षा देना तो अति आवश्यक हैं और इस संदर्भ में कुछ पैनी व विश्लेषित बातें निम्नलिखित हैं :-

1. सामाजिक – समानता – “समाज में हर व्यक्ति का समान अधिकार है और जिस समाज में समानता नहीं है, उसका मूल रूप से विकास सम्भव नहीं हैं।” डॉ. अम्बेडकर का यह कथन अनुभविक स्तर से देखा जाये तो सही है क्योंकि आज हम समानता के अधिकार की वजह से ही एक लोकतंत्रात्मक देश में हैं और लोकतंत्र में जन – जन की भागीदारी महत्वपूर्ण है। जॉन हॉब्स के सिद्धांत – “राज्य की उत्पति व सामाजिक समझौते का सिद्धांत यह कहता है कि सामाजिक तौर से राज्य का निर्माण हो और एक सफल राज्य के निर्माण के लिए यह चुनौती होती है कि वो अपने नागरिकों को कैसे संतुष्ट रखेगा।” गरीबी के वजह से लोगों की आस्था व संतोष, सरकार के प्रति टूट जाता है, इसलिए लोकतंत्र यह कहता है कि सबको सामाजिक तौर से समानता दी जानी चाहिए।

2. संविधान – सुरक्षा – लोकतंत्र को बचाने व अर्थकारी बनाने के लिए संविधान बनाया गया है। संविधान ही तो राष्ट्र की सुन्दरता को बढाती है। संविधान के द्वारा ही हम किसी राज्य या राष्ट्र को सुचारू व अनुशासित रूप से चलते हैं। संविधान हमें सामाजिक-सुरक्षा की गारण्टी भी देता है। राज्य के नीति निदेशक तत्व भी सभी कॉम निर्वाह मज़दूरी, प्रसूति सहायता इत्यादि प्रदान कराता है। संवैधानिक सुंदरता को बरकरार रखने के लिए गरीबो को सामाजिक – सुरक्षा देना ज़रूरी है क्योंकि डॉ. प्रेम सिंह की किताब “उदारवाद की कट्टरता” यह कहती है कि समाज में समरसता बनाये रखने के लिए सामाजिक – सुरक्षा मुहैया करवाना सरकार का दायित्व है।

3. आर्थिक – विकास – किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए अर्थव्यवस्था का मज़बूतिकरण अनिवार्य है। आर्थिक-विकास के लिए यह आवश्यक है कि गरीबी को मिटाया जाये क्योंकि यह विकास कि सबसे बड़ी बाधा है। आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति अपनी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने में सफल नहीं हो पता है, चाहें भोजन हो या शिक्षा। आर्थिक स्तर से विकास करने के लिए रोज़गार का होना आवश्यक है और जबतक बेरोज़गारी रहेगी, हम सामाजिक तौर से आर्थिक विकास नहीं कर पाएंगे और भारत सरकार ने इसको दूर करने करने के लिए ‘रोज़गार गारंटी योजना’ को लागू कर के बेरोज़गार ग्रामीणों को रोज़गार देने में सफल रही है। अर्थव्यवस्था की मज़बूती के लिए यह भी ज़रूरी है कि राष्ट्रीय आय को बढ़ाया जाये और राष्ट्रीय आय को बढ़ाने के लिए हमें 30% गरीबी की खाई को भरना होगा ताकि सकल घरेलू उत्पाद और सकल राष्ट्रीय उत्पाद को बढ़ावा मिले। सबका साथ ही हमारे विकास के मार्ग को मंजिल तक पंहुचा सकता हैं।

4. स्वस्थ्य व संगठित समाज निर्माण – जिस तरह कोई बीमारी मानव शरीर को कमज़ोर और खोखला बना देती है, ठीक उसी तरह से गरीबी भी समाज के लिए बीमारी की तरह ही है, जो हमारे विकास की राह में बाधा बनती है। गरीबी की वजह से आम लोग सही शिक्षा दवाई, ईलाज, भोजन, आवास इत्यादि भौतिक ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं। जिस समाज में भौतिक ज़रूरतों का अभाव रहेगा उस समाज का सर्वांगीण विकास तो कतई सम्भव नहीं है। भले ही हम युवा भारत का नारा लगा ले लेकिन वास्तव में तो हम, एक स्वस्थ्य व सुसंगठित समाज का निर्माण कभी कर नहीं सकते हैं। गरीबी यह साबित करती है कि हम आज भी असामाजिक तत्वों से ग्रसित हैं और जब से सरकार ने सरकारी योजनाओं जैसे की इंदिरा आवास योजना, राशन – वितरण, सर्व – शिक्षा अभियान, सरकारी अस्पताल व अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित योजना, जन – धन योजना, अटल पेंशन योजना इत्यादी योजनाओं को लागू किया और समाज में फलकारी परिवर्तन भी दिखे।

“सोने की चिड़ियां” कहे जाने वाले भारत के लिए गरीबी एक दाग के जैसा है और यह हमारे लिए चुनौती बन चुका है। आज भी हम सामाजिक तौर पर आज़ाद नहीं हैं क्योंकि बेरोज़गारी व भूख की जंज़ीरों ने हमारे पैरों को जकड़ कर रखा है। गरीबी यह बता रही है कि हम आज भी मोहताज हैं रोटी, कपड़ा और मकान के लिए। गरीबी की गुलामी ने हमें असुरक्षा के दायरे में खड़ा कर रखा है, तभी तो आज हम सामाजिक सुरक्षा के लिए चिंतित हैं, लेकिन सच तो यह भी है कि संघर्ष, मानव सभ्यता के साथ ही चला आ रहा है और हम सामाजिक-सुरक्षा के माध्यम से आज गरीबी की दर को 73 % से घटा कर आज 30% तक ला दिए हैं लेकिन सवाल तो यह भी उठता है की योजनाएं तो ४० – ५० वर्षों से चलाई जा रही हैं और हम आज भी गरीबी की गिरफ्त में हैं तो हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते है की इसके लिए हम खुद ही जिम्मेवार है क्यूंकि हमने अपने सामाजिक दायित्व को निः स्वार्थ भाव से निभाया नहीं हैं।

महात्मा गांधी का “न्यायसिता का सिद्धांत” यह कहता हैं की समाज के उच्चवर्गीय लोगों का यह दायित्व बनता हैं की वो पिछड़े – वर्ग को भी अपने साथ ले कर चले और गाँधीजी हृदय परिवर्तन की बात करते हैं तभी तो आज गैर – सरकारी संग़ठन भी समाज के उठान के लिए काम कर रहे हैं ताकि समाज में आर्थिक व सामाजिक तौर से समानता आये और हम भी विकसित देशों में शामिल हो जाये। गांधीजी की किताब “मेरे सपनों का भारत” में भी सामाजिक उत्थान के लिए गरीबों को सामाजिक स्तर से उठाने की बात की पुष्टि करते हैं। सचमुच में हमे फिर से भारत को “सपनों का भारत” बनाना हैं तो गरीबों की गिनती को शून्य करना होगा। लोकतंत्र यह कहता है की समाज में सबका समान अधिकार हैं और इस समानता की समरसता को बनाये रखने के लिए हमें जन – जन को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से मजबूत बनाना ही होगा।

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