वेलेंटाइन डे के बारे में हर अखबार छापता है, पर 29 जनवरी को ‘भारतीय अखबार दिवस’ सब भूल गए

Posted on February 2, 2016 in Hindi, Media

रवि कुमार गुप्ता:

newspapers29 जनवरी 2005 को भारतीय पत्रकार सोसाईटी ने इस दिन को भारतीय अखबार दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया और 11 साल से हम इसे मनाते आ रहे हैं। लेकिन अफसोस कि अभी तक इस दिवस को अखबारों ने जगह नहीं दी और ना ही पूरी तरह से हम ही जान पाए हैं।

इसे हम इन्कार तो नहीं कह सकतें हैं पर नज़रअंदाज़ करने से कम भी नहीं आँक सकतें। अँग्रेजी नूतन वर्ष से लेकर वेलेंटाइन डे तक को हम अपने अखबारों में कई सप्ताह से पहले से जगह देते हैं लेकिन अखबार अपने ही देश में नाम के लिए मोहताज है या यूं कहें कि अपने ही घर में अजनबी हैं। हाँ! यह कङवा सच है। लेकिन इस विचारणीय एेतिहासिक दिवस पर समाचार पत्र के मुख्य योगदान पर बात करना जरूरी है क्योंकि सिर्फ शिकायत करने से हासिल कुछ नहीं होता है।

1780 में जब अंग्रेज़ जेम्स ऑगस्टस हिकी ने ‘बंगाल गैजेट्स’ नामक अखबार को पहली बार कलकत्ता में प्रकाशित कर हमें अखबार से अवगत कराया। हालांकि ऑगस्टस हिकी ने खबर से ज्यादा अफवाहों को स्थान दिया जिसके कारण उन्हें काफी दिक्कत व आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन जो राह उन्होंने दिखाई वह सराहनीय से भी सर्वोपरि है क्योंकि वहीं तो हमारे अखबारों के जनक हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए जिम्मेदार कदम उठाने की जरूरत होती हैं तभी तो आज हम लगभग 70 हजार अखबारों से घिरे हैं और सुबह की चाय से लेकर शाम के सोने तक अखबारी बने रहते हैं। आज के समय के समाचार पत्र को सूक्ष्म दुनिया ही कहना बेहतर होगा।

समय के साथ अखबार का बदलाव

‘हिक्की गैजेट्स’ पहला भारतीय अखबार सिर्फ अफवाहों से भरा हुआ था तो वहीं दूसरी ओर राजा राममोहन राय ने कुछ वर्षों बाद इसका उपयोग भारतीय कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा को खत्म करने के लिए किया और इसके बढ़ते सुप्रभाव के वजह से ही 1950 तक अखबारों की संख्या लगभग 200 तक पहुंच गई। आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी (यंग इंडिया), लाला लाजपत (केशरी व मराठा) राय इत्यादि क्रांतिकारियों ने भी समाचार पत्रों का भरपूर सहयोग लिया तो इस आधार पर अखबार के क्रांतिकारी अदा को भी नकारा नहीं जा सकता है।

इतना ही नहीं भारतीय संविधान के पिता भीम राव अम्बेडकर ने भी जात – पात व छुआछूत – भेदभाव को मिटाने के लिए समाचार पत्रों के सहारे आंदोलन किए। लेकिन जब देश आज़ाद हो गया तो अखबारों ने क्रांति का काम छोड़कर आर्थिक विकास में भी काफी अच्छी भूमिका अदा की। परन्तु हमारे आलोचकों ने कहना शुरू किया कि अखबार अब व्यवसाय का केंद्र बन गया है क्योंकि अब ज्यादा-से-ज्यादा विज्ञापन ही प्रकाशित हो रहें हैं। हाँ! यह बात सही है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अखबार को चलाने के लिए पैसे की जरूरत कल भी थी और आज भी है। कल तक के समाचार पत्र राजा-महाराजा के भरोसे थे और आज लोकतांत्रिक दौर में लोगों के भरोसे चल रहे हैं बल्कि कल की तुलना में आज के अख़बारों में ज्यादा से ज्यादा खबर – जानकारी है और सक्रियता हैं। दुसरी तरफ अखबारों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए खास योगदान दिया है जिसको साधारण तौर पर हम विज्ञापन के रूप में देखते हैं। यह बात तो हम भलीभांति जानते हैं कि पत्रकारिता में पत्रकारों व अन्य काम करने वाले लोगों को अर्थात अखबार को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत होती हैं जो कि विज्ञापन के माध्यम से मिलता है फिर भी ना जाने क्यों हम बेवजह ही अखबार को बाजारीकरण से जोड़ कर निंदा करते हैं जबकि दुसरा सच तो यह भी है कि विज्ञापन देने वाले भी हम ही लोग हैं।

अखबार का वास्तविक रूप

हजारों साल पहले जब चीन ने पेपर की खोज की तब जाकर के यह सपना साकार हुआ और आखिरकार हमनें पशुओं के चमङे, पत्थरों इत्यादि पर लिखना बंद कर कागज को अपनाया। जबकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे प्लूटो व अरस्तू जैसे दार्शनिकों के विचारों का यह प्रयास है। खैर दोनों ही बात काफी हद तक सही है लेकिन साधारण तौर पर हम कह सकतें हैं कि जैसे – जैसे मानव सभ्यता विकास की दिशा में आगे बढ़ने लगी और हम आधुनिक होने लगे हमने अपने जीवन को सुगम-सहज बनाने के लिए खोज किया और इन्हीं अविष्कारो में से एक अखबार भी है। हमारी अखबारी यात्रा लगभग आज से 400 साल पहले भारत में अखबार व्यापारीकरण के मकसद से ही कोलकाता में आया क्योंकि कोलकाता उस दौरान भी व्यापार का मुख्य केंद्र था और आज भी है। लेकिन धीरे-धीरे हम इसकी उपयोगिता को देखे व समझे तो इसका प्रयोग जनता को जागरूक करने के लिए या यूं कहें कि आजादी की लड़ाई में हथियार के रूप में इस्तेमाल किए और बात अगर आज के मिडिया काल या सूचना काल की करें तो देखेंगे कि केवल भारत में लगभग 70 हजार अखबार कम्पनियां हैं और यह संख्या बढती जा रही हैं।

जिस तरह से अखबार समय के साथ बदलता व बढ़ता जा रहा है तो हमें इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अखबार ने क्रांतिकारी अदा के साथ – साथ देश को सूचना व आर्थिक क्षेत्रों में विस्फोटक गति दी है जो कि अविस्मरणीय है। हम सब भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि इतनी मँहगाई के जमाने में भी अखबार ही एकमात्र हैं जो कि आसानी से व दो-चार रूपये में मिलता है और मनोरंजन के साथ-साथ समाचार और जानकारी विस्तृत रूप से देता है, जिसको हम अपने समय के अनुसार शांति से पढ़ कर संग्रह कर सकते हैं। सारे खबरों का खबर रखने वाला अखबार ही आज अपने दिवस में अपने ही पन्ने से गायब हैं पर पाठकों के दिल में जिंदा है और जिंदा रहेगा, बस यही शुभकामनाएं हैं “भारतीय अखबार दिवस” पर।

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