यह 3 छात्र आंदोलन साफ-साफ बताते हैं कि देश की युवा शक्ति मोदी सरकार से खुश नही है और क्यों

Posted on February 9, 2016 in Campus Watch, Hindi

रवि रणवीरा:

अच्छा हुआ है कि अभी तक जातियता की परिभाषा देने वालों की नज़र ‘D.Lit.’ शब्द पर नहीं पङ़ा है वरना अभी तक इसको भी ‘दलित’ उच्चारण कर – कर के राजनीतिक दलदल में डाल दिया होता और इसी डर से अशोक वाजपेयी ने डी . लिट . की ख्याति वापस कर दी। खैर भारत की राजनीति की बात ही निराली है क्योंकि यहाँ पल-पल में लोगों को देशद्रोही व सहिष्णु-असहिष्णु बनाया जाता है और जात-धर्म के ऊपर राजनीतिक चक्र तो आजादी के साथ ही चलता आ रहा है। परंतु यह सवाल तो पुराना है क्योंकि मौजूदा माहौल तो ऐसा हो गया है कि एल. के. अडवानी ने कुछ महीनों पहले कहा कि देश में आपातकाल की स्थिति आने वाली हैं और हो ना हो यह बात सामने आ जाएगी।

और कहें भी क्यों नहीं, भला क्योंकि कुलबर्गी जैसे निष्पक्ष लेखक को मौत और राम मंदिर आंदोलन के बारे में सच लिखने वाले रामचंद्र गुहा जैसे लेखक को पाकिस्तान जाने की नसीहत दी जा रही है। छोङ़ीए यहां तो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर तक को देशद्रोही कहा गया और इतना ही नहीं कई बार तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया लेकिन जो निष्पक्ष हैं वो तो लोकतंत्र के लिए ही समर्पित है और वो हर हाल हर साल हर बार छिपे हुए राजतंत्र के चाल को नाकाम करने की कोशिश करेगा ही करेगा क्योंकि “जग के जोगी को डर काहे का “। विदेशी सम्बन्ध तो मजबूत हो रहें हैं लेकिन देश के हालात पर काबू करना जरूरी है क्योंकि राष्ट्र की शांति ही विकास के मार्ग की पहली सीढ़ी होती है। वैसे भी सोशल नेटवर्क ने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन से सबको जोङ़ कर रखा है तो बेहतर होगा कि पहले घरेलू कलह को खत्म किया जाए तभी तो होगा सबका साथ, सबका विकास का सपना पूरा। लेकिन हालात तो कुछ ऐसे हैं:

बीजेपी शासन काल का बगावती दौर

बीफ पर बवाल, मंदिर-मस्जिद पर बवाल, राष्ट्रीय गीत, असहिष्णुता पर उठते सवाल इत्यादि मुद्दो से तो जनता घबराई हुई थी फिर भी हालात को ना समझते हुए, ऐसी स्थिति हो गई है कि देश की जागरूक जनता अब सचमुच में बौखला गई हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के लगभग दो साल के शासन काल में ही तीन बङ़े युवा आंदोलन हुए और अभी तो तीन साल बाकी है मोदी सरकार के, इसलिये लोग व्याकुल भी हैं। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने जनता के लिए काम नहीं किए हैं , लेकिन जिस तरह का युवा जनाक्रोश हो रहें हैं, उनके समक्ष विकास और विश्वास की लहर टूट गई है सरकार के प्रति। लोगों को तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि क्या यह वही नरेंद्र मोदी हैं जो कि चुनावी रैली के दौरान युवा भारत का नारा लगा रहे थे।

ftiiराजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार के पीछे युवाओं का बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि उस समय देश में लगभग 75% युवा मतदाता सूची में शामिल थे। लेकिन बात अगर हम फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे की करें तो यहां गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ छात्र आए क्योंकि बीजेपी ने राजनीतिक तौर पर नियुक्ति की है जो कि बिल्कुल भी उचित नहीं है। इस नियुक्ति की निंदा पुरे देश ने की फिर भी सरकार खामोश हैं और देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्र भी अपने भविष्य की चिंता छोड़ कर खङ़े है सरकार के कुनियुक्ति के खिलाफ। हालांकि यहां 1962 से लेकर अब तक 40 हङ़तालें हो चुकी हैं, लेकिन यह अब तक की सबसे बड़ी हङतालो में से एक हैं। बात अगर मिडिया शोधों के आधार पर करें तो यह केवल गंदी राजनीति का नतीजा है और श्रेष्ठ कलाकार अनुपम खेर, परेश रावल व पेंटल के आधार पर गजेंद्र के पास लगभग 200 फिल्मों का अनुभव है तो इसीलिए उनके विजन और सोंच को भी अनुभव के आधार पर एक मौका दिया जाना चाहिए। हाँ, यह बात भी सही है कि अब तक के चेयरमैन के तुलना में गजेंद्र चौहान कुछ नहीं है लेकिन वरिष्ठ कलाकार व निर्देशक श्याम बेनेगल जो कि एफ.टी.आई.आई. के चेयरमैन रह चुके हैं कि उन्होंने कहा कि “चौहान बीजेपी से है तो इसका मतलब यह थोड़ी हैं कि वह निर्देश देंगे कि सारी फिल्में भगवा रंग में बनाओ”।

Image posted by #OccupyUGC on their Facebook page
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वास्तव में इस बात पर गौर करना चाहिए और अनुभव के आधार पर गजेंद्र चौहान को अवसर देना चाहिए। दुसरा छात्र आंदोलन जो नोन नेट फेलोशिप पर था यानी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास किए बिना उच्च शिक्षा ( एम. फिल  व पी.एच.डी.) के लिए छात्रवृत्ति नहीं मिलेगी। लेकिन यह सम्भव नहीं है कि सभी लोग इस परीक्षा को पास कर लें क्योंकि यह कोई सामान्य परीक्षा नहीं है और यह फैसला छात्रों के विकास के प्रति नहीं है। इस आंदोलन की निंदा तो व्यापक रूप से हुई क्योंकि हमारे देश के छात्र तो बेरोजगारी जैसी समस्याओं के वजह से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए सामर्थ्य जुटा नहीं पाते हैं और जो आगे पढ़ना चाहते हैं उनको इस तरह हतोत्साहित करना तो कतई उचित नहीं है। पूरे देश के छात्र-छात्राओं ने इसका विरोध किया लेकिन सरकार को तो कोई खबर ही नहीं है।

hyderabadतीसरा बड़ा छात्र आंदोलन जो कि अभी तक जारी है, रोहित वेमुला का आत्महत्या काण्ड जिसके समर्थन में भारत के सारे विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं समेत प्रोफेसर तक धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय इस वक्त दिल्ली के रामलीला मैदान में तब्दील हो गया है। लगभग देश के सभी युवाओं में एक-सा परिवर्तनकारी लहर सवार हो गया है क्योंकि एक के बाद एक लगातार राष्ट्रीय स्तर पर जन-आंदोलन चल रहे हैं और सरकार है कि कोई फैसला नहीं ले रही हैं।

सरकार अगर तत्काल फैसले पर विचार करती है तो विश्वविद्यालय स्तर के मसले पर राष्ट्रीय स्तर के हस्तक्षेप नहीं होते। एक तरफ से देखा जाए तो बीजेपी सरकार भी व्याकुल हो गई है क्योंकि सही निर्णय लेने के बजाय इस मुद्दे को दलित व अन्य विवादों से जोड़ कर उकसाने का काम कर रही हैं जो कि बीजेपी व छात्र हित में नहीं है। बल्कि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो छात्र साफ-साफ कह रहे हैं कि हमें बस इंसाफ चाहिए और कुछ नहीं। खुद को राष्ट्रभक्त कहने वाली पार्टी ही इस केस को घुमा फिरा रहीं हैं जबकि सच तो यह है कि इंसाफ देने के लिए कोई धर्म व जात गत मापदंड नहीं बनाया गया है तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि वह दलित था या नहीं था।

छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज का आदेश

“जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।” जो कि वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी व आज के मौजूदा छात्र पर फबता हैं। छात्र तो अराजकता-नाइंसाफी के खिलाफ सङ़क पर आ गए हैं क्योंकि लोकतंत्र के साथ नाइंसाफी होती है तभी जनाक्रोश बाहर आता है , अम्बेडकर भी इस बात को मानते थे।

समस्याएं तो बहुत है पर समाधान कुछ नहीं है जिसके कारण आज यह छात्र आंदोलन हो रहे है। हम ऐसा भी नहीं कह सकतें हैं कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है क्योंकि अगर ऐसा होता तो शायद इंसाफ की गुहार लगाते छात्रों पर पुलिस अंधाधुंध लाठीचार्ज नहीं करती। पुलिस इस तरह से अपराधियों के साथ भी पेश नहीं आती और इस तरह के रवैये को पूरे देश की मिडिया ने निंदा की है क्योंकि यह अमानवीय व्यवहार से भी परे है। लाठीचार्ज का पालन जितनी तेजी से किया गया, अगर उतनी तेजी से छात्रहित में फैसला सुनाया गया होता तो आज बीजेपी के ब्लैक दिन नहीं आते और ना ही हमारा डेमोक्रेसी, ‘डेमोक्रेजी ‘ में तब्दील होता। आज के छात्रों के आंदोलन को भले ही राजनीतिक शिकार माना जा रहा है लेकिन वास्तव में देखा जाए तो पहले आंदोलन शुरू हुए फिर नेताओं का आवागमन हुआ है और यदि आपकी सरकार भी विपक्ष में होती तो ऐसा ही करती। पर विडंबना तो यह है कि आप सत्ता में हो कर भी राजनीति कर रहे हैं और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा का यह वक्तव्य “पार्टी अगर अपने इस रवैये को नहीं बदली तो जनता धूल चटा देगी” पुष्टि भी कर रहा है।

एफ. टी. आई. आई. तो राजनीति का शिकार हैं तभी तो देश के अन्य हिस्सों के छात्रों ने समर्थन नहीं दिया लेकिन नो नेट फेलोशिप व रोहित वेमुला काण्ड में पूरा देश समर्थन दे रहा है इसलिए यह राजनीतिक शिकार नहीं है। लेकिन इन तीन आंदोलनों ने बीजेपी सरकार को झकझोर कर रख दिया है और दुसरी तरफ अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के मसले भी सामने आए हैं तो इससे यह साफ-साफ दिख रहा है कि लगभग सारे सरकारी शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है और बेचारे छात्र नदी के किनारे की तरह बस राजनीतिक या भ्रष्टाचार की मार झेल रहे हैं।

तभी तो रोहित जैसे निडर व कुशल छात्र ने अपने अनमोल जीवन को त्याग दिया और आत्महत्या-पत्र के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वह समाजिक विकास का समर्थक था तभी तो उसने किसी को भी कसूरवार नहीं कहा और आंदोलन के लिए भी मना कर दिया। लेकिन रोहित जैसे अन्य होनहार छात्रों को बचाने के लिए जरूरत है, छिपे हुए राजतंत्र को खत्म करने की। इस तरह के आंदोलन से सरकार के साथ – साथ छात्रों को भी बहुत नुकसान हो रहा है और साधारण तौर पर देखा जाए या कुछ विशेषज्ञों के अनुसार एक जन हङ़ताल व आंदोलन की वजह से विकास कार्य लगभग छह माह पीछे चला जाता है।

और यह समाज के लिए हितकारी तो कतई नहीं है लेकिन क्या करें, कुछ विशेष रिपोर्टों के मुताबिक हङ़ताल की वजह से ही पारदर्शिता आती है और एक निष्पक्षता का जन्म होता है या अनुभव के आधार पर बात किया जाए तो यह सत्य भी है और जरूरी है असमाजिक तत्वों को खत्म करने के लिए। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जन-जन के नेता हैं और जिस तरह से वे विदेशी देशों के साथ मधुर रिश्ते बनाने में सफल हो रहे हैं तो इस आधार पर पर उन्हें कुशल व सफल नेता कहना ही उचित है। लेकिन अब जरूरत है कि वे देश में पैदा हुए कलह व अराजकता को मिटा कर युवाओं के साथ भी रिश्तों को सुधारें ताकि युवा भारत का सपना पूरा हो सके। आप लोकतंत्र की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे हैं और उम्मीद है कि आप निष्पक्षता के आधार पर कर्मठता दिखाएंगे।

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