क्यों गायब होती जा रही है बच्चों की ज़िन्दगी से कला?

Posted on May 30, 2016 in Culture-Vulture, Hindi, Society

मुझे याद है जब मैंने पहली बार लकड़ी का एक छोटा सा कलमदान बनाया था, अपने रोज़मर्रा के काम की आदतों से कुछ अलग करने की यादें ख़ास होती हैं। पहली बार साइकिल चलाना हो या पतंग उड़ाना, इस तरह की यादें हम में से बहुत सारे लोग साझा करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ हमारी प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं। “आने वाले कल की तैयारियां जितनी जल्दी शुरू कर दी जाएँ, उतना अच्छा,” इस खयाल के साथ आने वाले कल को सवारना शुरू कर दिया जाता है।

“बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़ के वो भी हम जैसे हो जाएंगे” निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी ये पंक्तियाँ कुछ चंद शब्दों में काफी बड़ी बात कह जाती हैं। हम अपने घरों में देखें या फिर आस-पास, आज-कल के नौनिहालों का कला से कितना परिचय है, यह मसला काफी गम्भीर है। क्या तस्वीरें उभर के आती हैं आपके मन में जब आप, आज के बच्चों के बारे में सोचते हैं। एक तरफ चेहरे पर मुस्कान, पीठ पर लदा एक भारी सा बस्ता दिखता है और जिन कन्धों पर बस्ते ना हो उनकी हथेलियों पर उम्र से पहले की मेहनत के छाले दिखाई देते हैं। कितनी आसानी से उनके सवालों को एक ख़ास उम्र तक के लिए टाल दिया जाता है। मैं कभी-कभी कला की परिभाषा की खोज में अपने बचपन की तरफ चला जाता हूँ और स्कूल की आठ में से सातवीं या फिर आठवीं वेला (पीरियड) में पढ़ाई जाने वाली कला की किताब की कुछ पंक्तियों को याद करने की कोशिश करता हूँ। क्या कुछ शब्दों को रटे-रटाए तरीकों में बिठा कर इस परिभाषा को हासिल किया जा सकता है?

कहते हैं किसी भी बच्चे के सीखने और सँवरने की शुरुआत उसके घर से होती है और इसमें कोई दो राय भी नहीं होनी चाहिए। हमारे घरों में कला को कैसे देखा जाता है? जाने माने नामों का जिक्र कर देना, और काफी सारे सवालों को हवा में छोड़ देना। फलां-फलां महान कलाकार, महान तो थे, पर उन्होंने ऐसा किया क्या था? प्रेमचंद की बात करें या कबीर की, कितनी बार इनकी महानता के किस्सों ने (यहाँ ध्यान दें कि महानता के किस्सों की बात हो रही है), आपको बचपन में लिखने को प्रेरित किया? इनके एक-दो लेख या रचनाएँ छोड़ दें तो इससे ज़्यादा बच्चों के सामने आ भी नहीं पाता है। कितने ही घरों में उपन्यास पढ़ना बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता, लेकिन स्कूल के पर्चे में, लेखक साहब का जीवन परिचय लिखने के लिए उनके नाम ज़रूर याद करवाए जाते हैं।

एक लम्बे अर्से तक ‘टैगोर’ मेरे लिए राष्ट्रगान और गीतांजलि के लेखक भर थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गीतांजलि में क्या लिखा था, उन्हें ये पुरस्कार क्यों दिया गया इसका कोई अंदाज़ा भी नहीं था, और उनके संगीतकार और चित्रकार के पहलू को तो छोड़ ही दीजिये।

एक बार फिर से सोचते हैं, कैसे देखते हैं हम कला को? कभी-कभी लगता है, कलाकारों के नाम और उनके काम जनरल नॉलेज से अधिक हैं ही नहीं।

हमारे देश में कला की समृद्ध विरासत रही है। कुछ क्षेत्रों में कला के विभिन्न प्रारूपों को भरपूर प्रोत्साहन भी मिलता रहा है, पश्चिम बंगाल नें संगीत, चित्रकला, साहित्य और शिल्पकला के क्षेत्र में अपना एक अलग नाम बनाया है। दक्षिण भारतीय क्षेत्रों से मिली कर्नाटिक शास्त्रीय संगीत की देन का अपना महत्व है। इनके अतिरिक्त विभिन्न आंचलिक क्षेत्रों से आने वाले कला प्रारूपों जैसे, मधुबनी, वारली कला, आंचलिक और क्षेत्रीय संगीत और शिल्पकला के विभिन्न रूप, ऐसी ना जाने कितने कला प्रारूपों की बात की जा सकती है, लेकिन इनकी समय के साथ घटती प्राथमिकता और इनका घटता महत्व चिंता का विषय है।

ना जाने कितने कला के ऐसे प्रारूप हैं जो समय के साथ लुप्त हो चुके हैं। समय के साथ बढ़ती जरूरतों ने कला को हाशिये पर डाल दिया है, और ऐसे में बच्चों के साथ कला का सम्बन्ध एक “एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी” से ज्यादा कुछ नहीं बचा है। आज कला की सुलभता घटती जा रही है, जिस तक एक विशेष वर्ग की ही पहुँच ज्यादा है। आज के मशीनी युग में बच्चों की सोच का भी मशीनीकरण किया जा रहा है। कच्ची उम्र से ही बच्चों को अंजाने में ही सही पर कारखानों, फैट्रियों या विभिन्न औद्योगिक संस्थांनो के हिसाब की “मैनपावर” बनाया जा रहा है। अगर हमारे आने वाले कल की सोच को इतना सीमित करना ही उद्देश्य है, तो हमें इसके परिणामों के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

क्यों ना हम कल्पनाओं के बादलों को धानी रंगों से भर लेने दें उन्हें, किसी मेज पर अगर ढोलक की थाप पर से ताल की समझ बन सकती है तो हम समझ लेने दे उन्हें। समझ की शुरुआत से ही, “आप बड़े होकर क्या बनोगे”, जैसे सवालों का बोझ, यकीन मानिए उस सीमित मानसिकता वाले स्कूली बस्तों से कहीं ज्यादा है। कला केवल मनोरंजन का एक ज़रिया हो, इस तरह की सोच से बचे जाने की आवश्यकता है। कला अपनी बात कहने का एक तरीका है, वो कल्पनाओं को आकार देती है, वो एक सोच को सच्चाई में बदलने का तरीका होती है। अब अगर दीवार को नया करना है तो पुराना पलस्तर खुरचेगा ही।

हमारे जीवन में कला की महत्ता समझते हुए कुछ लोग इसे बचाने के लिए प्रयासरत हैं। अभी हाल ही में एक दोस्त के ज़रिये ‘ म्यूजिक बस्ती‘ नाम की एक संस्था के बारे में जानने को मिला। ये लोग बच्चों को संगीत के जरिये ज़िंदादिली का सबक सिखलाते हैं, आने वाले कल के लिए जस्बे से तैयार होना सिखाते हैं। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में जहाँ बच्चों को मुलभुत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, वहां उनके लिए संगीत और कला के बारे में सोचना, लगभग असम्भव हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों की रूचि के अनुसार उनके अंदर के संगीत को तलाशने और तराशने का काम करने वाला यह संगठन बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक मंच भी प्रदान करता है। ऐसी ही एक दोस्त ‘स्लैम आउट लाउड‘ के नाम से बच्चों को कविताओं के ज़रिये खुद को जताने के तरीके सिखलाने का एक प्रोग्राम चलाती हैं। कला ना केवल बच्चों के चहुंमुंखी मानसिक विकास में सहायक होती है बल्कि यह उनकी क्रियात्मकता और आत्मविश्वास को भी एक नया आयाम देती है। कुछ मन ऐसे हैं जहां सुर भी हैं और ताल भी, पर साज कहीं आस-पास नहीं है और ना उनकी बारीकियों को सिखाने को कोई मौजूद है। कुछ सपने शब्दों की बाज़ीगरी को भी देखते होंगे, वहां तक पहुंचने की छोटी से छोटी कोशिश को भी पीठ पर एक थपकी दे दी जाए। बच्चों के सर्वांगीर्ण विकास के लिए विभिन्न संस्थाओं की इस तरह की कोशिशों को देखना काफी अच्छा लगता है।

क्यों ना संगीत को सोच की अंडरलाइन की जगह एक हेडिंग बनने दें, शब्दों के ज़ायके को मन से महसूस किया जाए, क्यों ना रंगों को एक नए सिरे से बयां होने दे। एक कोशिश की जाए कागज पर रंगों को फैलाकर निश्छल कहानियाँ गढ़ने की, एक कोशिश कलम की स्याही के लिए, एक कोशिश नन्ही उँगलियों के नीचे से गुज़रने वाले तारों के लिए। कहीं ऐसा ना हो कि ज़रूरतों की कतारों में हमारी कला की धरोहर, वो अनमोल विरासत काफी पीछे छूट जाए।

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