रूबी राय को जेल भेजने से क्या शिक्षा व्यवस्था की कमियां दूर हो जाएंगी?

Posted on June 30, 2016 in Hindi, Society

दीपक भास्कर:  

रूबी राय बिहार इंटरमीडिएट परीक्षा 2016 की टॉपर, फ़र्ज़ी टॉपर होने के आरोप में जेल में बंद कर दी गयी। सवाल ये नहीं कि उसने गलत किया कि नहीं, वो तो अभी 18 साल की भी नहीं हुई है। उसे गलत और सही के पचड़े में क्यूँ फंसाना? असल मुद्दा तो टॉपर बनने की ख्वाहिश का है। रूबी बिहार में सबसे ज्यादा टॉपर देने वाले प्राइवेट कॉलेज वी के राय कॉलेज की छात्रा थी। इस कॉलेज ने लगभग हर साल टॉपर ही दिए हैं, ऐसे राज्य में और भी कॉलेज हैं, जिनके रिजल्ट अचंभित करने वाले होते हैं।बिहार का हर वह छात्र जो कोटा में जाकर इंजीनियरिंग या मेडिकल की तैयारी करना चाहता है, प्रायः ऐसे कॉलेज में एडमिशन लेता है।

जब रूबी का मामला मीडिया में आया तो हंगामा मच गया। ऐसा लगा मानो पहली बार ऐसा हुआ हो। लेकिन जो आप देख नहीं पाते वो सब सही तो नहीं हो रहा होता है ना! समस्या ये नहीं कि रूबी नें गलत तरीके से टॉप किया, समस्या यह है कि रूबी टॉप क्यों करना चाहती है।मैं समस्याओं के कारण ढूंढने में ज्यादा रूचि रखता हूँ। तो रूबी टॉपर कांड में दोषी कौन है? रूबी की गिरफ्तारी तो होनी ही थी। सबसे सरल है किसी ऐसे को गिरफ्तार कर जेल में डाल देना और फिर सब कुछ नार्मल जैसा दिखाकर आगे बढ़ जाना। क्यों! पिछली बार भी हुआ था….पूरी दुनिया ने देखा था हम सबको खिड़कियों पर लटके हुए, फिर क्या हुआ? वो उस साल की न्यूज़ थी, ये इस साल की खबर है।

रूबी को गिरफ्तार कर पटना पुलिस नें अपना काम कर दिया। आप और किसको गिरफ्तार करते? क्या आप उन तमाम मुखिया, सरपंच, मंत्री, शिक्षा मंत्री, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करते, जिन्होंने सरकारी स्कूलों में ‘शिक्षा मित्रों’ को तमाम तरह के प्रपंचों को अपनाकर नियुक्त किया था। क्या “शिक्षा मित्रों” की अवैध नियुक्ति पर हमने कुछ कहा था? नहीं! क्यूंकि उसमे हम सब थे, क्यूंकि उसमें हमारा भाई था, बहन थी, दोस्त थे, सगे सम्बन्धी थे, हम क्यूँ बोलते? तो क्या तब हम समाज को ख़राब नहीं कर रहे थे? आप लाख तर्क दे लें, लेकिन उससे होगा क्या? हम बस समाज बनकर सबको दोष देते रहे। कभी हमने अपने गिरेबां में झाँक कर नहीं देखा।

हम समाज हैं और हम किसी भी घटना के लिए दोषी कहाँ होते हैं? आप रूबी राय पर हंस रहे हैं लेकिन आप सोचिये कि अगर वो पोलिटिकल साइंस का सही उच्चारण भी कर लेती, या फिर वो ये भी बता देती कि इसमें राजनीति की पढाई होती है, तो क्या आप मान लेते कि उसको पोलिटिकल साइंस आती है? आप उन शिक्षा मित्रों से भी पूछिए, उनका भी इंटरव्यू लीजिए कि पोलिटिकल साइंस में कितने पेपर पढ़ने होते हैं और क्या पढ़ना होता है, तब आपको रूबी की असली कहानी पता चलेगी।

हम जैसे समाज में है, हमारी सरकारें भी तो वैसा ही करेंगी। इतना ही क्यूँ, जिस दिन फोकनिया बोर्ड (जो की बिहार मदरसा बोर्ड के द्वारा चलता है) का मामला खुलेगा आपकी आँखे बाहर निकल आएंगी। साहब! ‘अल्लाह’ भी ठीक से जो लिख नहीं पाते उसे वहां 90% नंबर आते हैं। बिहार में शिक्षक बनने के लिए ये जरूरी अंक थे। मध्यमा बोर्ड का भी हाल वैसा ही है। अब उसका क्या करेंगे? जब सब कुछ चुनाव जीतने के लिए ही करना हो तो फिर आप ऐसी ही व्यवस्था बना पाते हैं। केंद्र से लेकर राज्यों तक, हर पार्टी को बस चुनाव जीतना है। पार्टियां भी क्या करें, आप भी तो ऐसा ही कुछ चाहते हैं।

जो मुखिया गरीब था, जब उसने जीतने के बाद चार अलग-अलग रंग की स्कार्पियो खरीदी तो हमने क्यूँ नहीं विरोध किया? क्या हम नहीं जानते थे की ये सब काले कारनामे का नतीजा है। सत्ता वर्ग तो ऐसा होता ही है, लेकिन हमने विरोध की सत्ता को क्यूँ छोड़ दिया? असल में जेल रूबी को नहीं, हम सबको, मतलब इस समाज को जाना चाहिए, क्या रूबी टॉपर बनना चाहती? किसको चाहिए था ये टॉपर? निस्संदेह हमें यानी कि समाज को चाहिए था। और क्यूँ चाहिए था आपको टॉपर? क्यूंकि वो टॉप करती तभी तो उसे नौकरी मिलती, तभी तो उसको समाज में इज्जत मिलती, तभी तो आप चौक-चौराहे और दूसरे गाँव में अपनी मूंछें तरेरते, तभी तो उसकी शादी अच्छी जगह होती, तभी तो उसका गेहुआं या काला रंग ज्यादा मायने नहीं रखता, तभी तो उसके मोठे होंठ भी आपको सुन्दर लगते, तभी तो आप शायद उसके माता-पिता से उसे  सोने के अंडे देने वाली मुर्गी समझकर थोड़ा कम “दहेज़” लेते, तभी तो शायद आप उसे जला नहीं देते गैस सिलिंडर फटने वाले कांड में, तभी रूबी को आप सब मिलकर डायन नहीं कहते।

सोचिये क्यूँ किसी को टॉप करना पड़ता है,? क्यूँ किसी को नौकरी के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता है, पैसे देकर भी सरकारी नौकरी लेना कितना जरूरी हो जाता है क्यूंकि सरकारी नौकरी नहीं हो तो हम उसे समाज में जगह ही नहीं देते, आज लाखों छात्र सेवादार की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं, कभी हमने सोचा कि हम क्या कर रहे हैं? सरकारी नौकरी की चाह रूबी को नहीं बल्कि समाज को है।

क्या हमने कभी किसी मेहनत करने वाले छात्र (जिसे किसी कारणवश कम अंक आएं हों) का हौंसला बढ़ाया? हमने सिर्फ सफलता की पूजा की, उसे आदर्श माना, और उसी का मीडिया ने इंटरव्यू भी लिया। असफलता तो कलंकित है। उसे हमने कभी नहीं सराहा, कि कोई बात नहीं जिंदगी में बहुत अवसर आते हैं। हम समाज हैं सफलताओं का, तो उसमे रूबी टॉपर बनने के लिए कुछ भी करेगी और वो सही भी है। क्यूंकि हम चाहते हैं कि वो टॉप करे, रूबी दोषी नहीं है। सरकार को तो मैं क्यां दोष दूँ, दोषी तो हम हैं और हम समाज हैं। हम दोष उसके ऊपर मढ़ दें वो अलग बात है, लेकिन दोष स्थांतरित तो हो नहीं सकता। अगर रूबी को हमने जीने नहीं दिया तो हम कातिल समाज होंगे।

रूबी मैं तुमसे कह रहा हूँ कि तुम चिंता मत करना, तुम जीना, इस समाज के सामने खड़ी रहना। तुमने तो पापा से कहा भी था कि तुम्हे सिर्फ पास होना था। लेकिन पापा तो समाज में रहते हैं ना, उनको अपनी इज्जत भी तो बढ़ानी थी, तुम दोषी नहीं हो, बल्कि उस व्यवस्था में जो लोग हैं उनसे कहीं ज्यादा पोलिटिकल साइंस तुम्हे आता है, कम से कम तुम्हे ये तो पता था कि तुमने कौन सा विषय लिया है, कितने पास हुए छात्रों को ये भी नहीं पता होगा। तुम्हे भी तो आइ.ए.एस. ही बनना था, तुम शायद ये चाहती भी ना होगी।

तुम निराश मत हो, हँसो हम पर, इस समाज पर, जिसने तुम्हे टॉप करने के लिए मजबूर किया, बोलो इनसे कि, दहेज़ के लिए लड़कियां जलाने वाले तुम मुझे क्या कोसोगे। कहना इनसे कि तुम्हारे वाले जेल से बेहतर ये जेल है, तुम जेल नहीं गयी हो रूबी, ये टॉपर की लालसा वाला समाज जेल गया है, ये व्यवस्था जेल गयी है। तुमने बिना पोलिटिकल साइंस पढ़े सब कुछ पढ़ लिया होगा अब तक रूबी अगर तुम्हे पोलिटिकल साइंस आती भी तो किसी एक छोटी सी गलती पर हम ये कहने से नहीं चूकते कि तुम एक “लड़की” हो, रूबी तुम दोषी हो, जेल में हो… इसी से हम दोष मुक्त हो जाते हैं।

फोटो आभार: ट्विटर/हॉस्टन सिस्टम्स

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