कैसे देश की यह गायब होती विरासत लाखों लोगों को दे सकती है रोज़गार

Posted on June 16, 2016 in Hindi, Society

नीतीश कुमार के पिछले कार्यकाल के दौरान बिहार सरकार ने अपने कर्मियों को सप्ताह में कम से कम दो दिन खादी पहनकर ड्यूटी पर आना अनिवार्य किया था। इसके बाद कुछ ही समय पहले, चुनाव के बाद बनी नई सरकार और बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलोजी (एन.आई.एफ.टी.) के साथ हाथ मिलाया और “संतति” नाम से एक नया ब्रांड भी लॉन्च किया। खादी के क्षेत्र में बिहार में किए गए ये दोनों प्रयास नए हैं और खादी के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकते हैं। मगर देशभर की तरह बिहार में भी दम तोड़ रही खादी को उसका सही स्थान दिलाने की दिशा में ये प्रयास अपर्याप्त ही कहे जाएंगे।

महात्मा गांधी ने खादी को “स्वतंत्रता की पोशाक” कहा था। यह केवल अंग्रेजों से देश को मिली स्वतंत्रता की पोशाक भर नहीं, बल्कि उससे भी आगे, आत्मनिर्भरता की पोशाक है। खादी केवल वस्त्र नहीं, संस्कार है, जो व्यक्ति और समाज को स्थानीय संसाधनों का उपयोग और आत्मनिर्भर बनना सिखलाता है। मगर आधुनिकता और औद्योगीकरण की होड़ में खादी अपने ही देश में पिछड़ गई है। लगातार उपेक्षा के कारण देशभर में खादी आंदोलन मर-सा गया है। कभी स्वतंत्रता की पोशाक कही जाने वाली खादी, आजादी के बाद धीरे-धीरे सत्ता की पोशाक बनकर आम जन-जीवन से कट गयी।

लंबे समय तक सरकारी कोष से करोड़ों-अरबों रुपये खर्च होकर भी खादी मर-सी गई और देशभर में खादी संस्था चलाने वाले लोग, और ज्यादा संपन्न होकर मुटियाते चले गए। अब तो ऐसा लगता है कि सरकारों ने भी खादी को लाइलाज बीमार मानकर इसकी ओर से मुंह फेर लिया है। ऐसे समय में बिहार में सरकार के स्तर पर किए जा रहे प्रयास खादी को नवजीवन प्रदान करने वाले साबित हो सकते हैं। मगर इसके लिए सरकार को खादी के प्रति अपना नज़रिया बदलना होगा। “खादी का प्रचार-प्रसार” या फिर “खादी का कल्याण” करने के प्रचलित सरकारी मकसद से बाहर निकलकर राज्य में रोजगार और आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए खादी की योजनाएं बनानी होंगी और उन पर उसी अनुरूप बड़े फोकस के साथ अमल करना होगा।

इस “बड़े फोकस ” को एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। बिहार सरकार ने अपने कर्मियों से सप्ताह में दो दिन खादी पहनने को कहा है। इसके साथ-साथ यदि यह नियम लागू कर दिया जाए कि सरकारी आदेश से पहनी जाने वाली वर्दी खादी की होगी, तो केवल इस एक आदेश को सही ढंग से लागू करने के लिए खादी के कपड़ों की इतनी बड़ी मात्रा में ज़रूरत पड़ेगी कि राज्य में उत्पादित खादी के कपड़ों की कमी हो सकती है। सरकारी कार्यालयों में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी, वाहन चालक, पुलिस बल, सशस्त्र पुलिस बल, होमगार्ड ही नहीं; सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी… यह इतनी बड़ी संख्या हैं कि सरकारी आदेश को मानकर यदि वे खादी की वर्दी पहनें तो केवल इतने से ही बिहार में खादी के क्षेत्र में लाखों लोगों के रोजगार का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।

बिहार न केवल बड़ी आबादी वाला राज्य है, बल्कि यहां की जनसंख्या का घनत्व भी काफी ज़्यादा है। झारखंड के अलग होने के बाद खेती योग्य जमीन के अलावा यहां कोई दूसरा बड़ा प्राकृतिक संसाधन भी नहीं है। सारी खनिज संपदा झारखंड के हिस्से में चली गई और नदियों से मिलने वाली रेत और कुछ पहाड़ियों से मिलने वाले पत्थर ही यहां बचे हैं। ऐसे में स्थानीय संसाधन आधारित रोजगार, बिहार की प्रगति के लिए वरदान साबित हो सकती है। खादी ऐसा ही एक क्षेत्र है जिसमें सारा काम श्रम बल से होना है और कम निवेश में रोजगार के अवसरों की उपलब्धता की सम्भावना भी ज़्यादा है।

मगर इसमें कई व्यवहारिक संकट हैं। गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब खादी का आंदोलन चलाया था तब यह व्यवसाय नहीं था। आमतौर पर सूत कातने का काम ठीक-ठाक घर की महिलाएं अपने फुरसत के समय में किया करती थी, अधिकांश मामलों में कोई मजदूरी नहीं ली जाती थी। तब तो कई परिवारों में अपने पहनने के लिए खुद से सूत कातने का भी चलन था। आज खादी का काम तभी चल सकता है जब इसके प्रारंभिक स्तर से ही इसके काम में लगे लोगों को, बाजार भाव से मज़दूरी मिले। हाथ से सूत कातना और फिर हथकरघे पर कपड़ा बुनना इन कारणों से खादी, मिल के रंग-बिरंगे और फैशनेबल मगर सस्ते कपड़ों के मुकाबले काफी महंगी हो जाती है। यहीं से सरकारी अनुदान और आमतौर पर कभी नहीं लौटाया जाने वाले सरकारी ऋण का खेल शुरू हो जाता है। खादी संस्थाओं और देश की सभी सरकारों ने हमेशा ही खादी को जीवन देने के नाम पर अनुदान और सस्ते ऋण देकर उन्हें बाज़ार की प्रतियोगिता से दूर रखा जिसका दुष्परिणाम आज देश में खादी की दुर्दशा के रूप में देखने को मिलता है।

यह समझने की ज़रूरत है कि बाजार में धड़ल्ले से बिकने वाले सभी कपड़े खादी से सस्ते नहीं होते हैं। कंपनियां एक से एक महंगे कपड़े बनाती हैं और लोग उन्हें खरीदते भी हैं। क्या हमारी खादी बाज़ार में उपलब्ध अलग-अलग भाव (मूल्य) और गुणवत्ता वाले कपड़ों के बीच अपने भाव और गुणवत्ता के साथ अपना स्थान नहीं बना सकती है? हाथ से बने होने और केवल प्राकृतिक संसाधनों से बनने वाली खादी की गुणवत्ता आज भी ना केवल विश्वप्रसिद्ध है, बल्कि इंटरनेट के इस युग में इस गुणवत्ता को जान-समझकर लोग खादी के बेहतर कपड़े खरीदने को लालायित भी रहते हैं। महानगरों में बड़े स्टोरों के अलावा पचासों ऑनलाइन स्टोर हो गए हैं जो खादी के कपड़े बेच रहे हैं। उनकी दुकान खूब चल भी रही है। दूसरे शब्दों में, खादी भारत ही नहीं, विदेशों में भी अपनी एक प्रतिष्ठित पहचान बना चुकी है।

ऐसे समय में खादी, जो कम निवेश में ही बड़ी संख्या में रोजगार सृजन का रास्ता बन सकती है, उसे सरकार के स्तर पर नए, उत्पादक और ज़रूरी संकल्पों के साथ पोषण और बढ़ावा मिलने की ज़रूरत है। यहां यह स्पष्ट समझ लेने की ज़रूरत है कि खादी संस्थाओं को केवल अनुदान बांट कर इतिश्री कर लेने वाले प्रचलित सरकारी तरीके से काम नहीं चलने वाला। सरकार और खादी संस्थाओं को भी प्रोफेशनल होना होगा। सरकारी स्तर के कामकाज को लालफीताशाही से बाहर निकालना होगा। खादी संस्थाओं को भी अपनी पुरानी जकड़न से मुक्त होकर हर स्तर पर गुणवत्ता और बाज़ार की प्रतियोगिता के लिए तैयार होना होगा। नए-नए लोगों को जोड़ना होगा। नई संस्थाएं खड़ी करनी होंगी। मांग और आपूर्ति के बीच सेतु का काम करने वाली एजेंसियां और नए-नए ब्रांड सामने लाने होंगे। वह सब कुछ करना होगा जिससे खादी के विकास के साथ-साथ रोजगार के विकास का भी रास्ता भी खुले।

खादी को आज नए कामगारों के लिए प्रशिक्षण व कौशल विकास, व्यापक शोध-अन्वेषण व संरक्षण, पूँजी, नए उद्यमी और बाजार सहायता कि ज़रूरत है। यह सब कुछ यदि सही समय पर और सकारात्मक तरीके से मिले तो खादी को कोई रोक नहीं सकता और बिहार जैसे राज्य में तो यह रोज़गार के सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक साबित हो सकता है।

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