कैसे मासिक धर्म के कारण महिलाओं के साथ होता भेदभाव, पितृसत्ता की देन है

Posted on June 23, 2016 in Hindi, Society

अलका मनराल:

समाज में महिला पुरुष के बीच के अन्तर को कम करने की बात जोर-शोर से होती रहती है, पर इसके लिए हमेशा से ही कोई ऐसी घटना का होना जरुरी होता है, जो इस मुद्दे की तरफ ध्यान खींचे। ऐसी ही घटना कुछ समय पहले हुई, जब एक लड़की ने शनि शिंगणापुर मंदिर में तेल चढ़ा दिया, जिसके बाद सदियों से बंद धार्मिक जगहों पर जाने के लिए महिला संगठनों के कूच करने की मुहिम शुरु हो गई। इस कोशिश का ही नतीजा हैं कि महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में 400 साल पुरानी प्रथा खत्म हुई और साथ ही त्र्यंबकेश्वर में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की रजामंदी दे दी गई। पर हमारे समाज के लिए शर्म की बात है कि इस प्रथा को तोड़ने में कितना समय लग गया और यह तोड़ी भी गयी तो अदालत के हस्तेक्षप के बाद। खैर अभी ऐसी कई जगह हैं जहाँ आज भी महिलाओं का जाना मना है। महिलाओं के साथ ये भेदभाव सिर्फ किसी एक धर्म में नहीं हैं बल्कि हर धर्म में हैं, आज भी मुस्लिम धर्म की महिलाओं के मस्जिदों में जाने पर पूरी तरह से पाबंदी है।

मंदिरो में महिलाओं के जाने की मनाही के पीछे दिए जाने वाले तर्क बड़े ही बेतुके हैं। कहीं कहा जाता हैं कि महिला को मासिक धर्म के समय इन पवित्र जगहों में नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे उन जगहों की पवित्रता खत्म हो जाएगी। तो कहीं कुछ जगह ऐसी बना रखी हैं, जहां महिला को मासिक धर्म शुरू होने की उम्र में आने के बाद से ही ये मनाही शुरू हो जाती है। चाहे महिला की उस देव या देवी में कितनी ही भक्ति क्यों ना हो, उसे उस मंदिर में नहीं जाने दिया जाएगा क्योंकि महिला से उस देव या देवी के अपवित्र होने का खतरा है। समझने की बात ये है कि कैसे मासिक धर्म का होना ही एक महिला को अछूत बना देता है, जबकि यह केवल एक शारीरिक प्रक्रिया हैं, जिसके कारण एक महिला में किसी को संसार में लाने की क्षमता है। पर दुख की बात है कि समाज ने उसकी इस शारीरिक प्रक्रिया को छूत के रोग में बदल दिया है।

कहीं कहा जाता है कि महिलाओं की इन पवित्र स्थानों में मौजूदगी से पुरूषों की नीयत खराब हो सकती है और वो इबादत में मन नहीं लगा पाएंगे, इसलिए नीयत खराब करने वाली चीज ही हटा दी जाए। ये तो वही बात हो गई कि सजा दोषी को ना देकर पीड़ित को दें। इससे ये बात तो साफ हैं कि किसी भी धर्म में महिलाओं का स्थान दूसरा ही है, जो पुरूषों के सही गलत के जोड़ घटाव के बाद ही उन्हें मिला है।

आज जब महिलाओं के मासिक धर्म पर शर्म नहीं करने पर बहस चल रही हैं, तो अभी हाल ही में इस विषय पर एक वीडियो भी आया, इस वीडियो में एक लड़की अलग-अलग केमिस्ट की दूकान पर जाकर सेनेटरी पैड खरीद रही थी और जब दुकानदार उस पैड को काली थैली या अखबार में लपेटकर दे रहा था तो लड़की पूछ रही थी कि काली थैली या अखबार में लपेटकर क्यों दे रहे हो? लड़की के ऐसा पूछने पर उसे अजीबो गरीब जवाब मिल रहे थे और हद तो ये थी कि कुछ ने कहा कि ये सेक्स की चीज़ है, खुले में आपको शर्म नहीं आएगी। कुछ महाराज तो यहाँ तक बोल गये कि ऐसी बात करने पर लड़कियों का रेप नहीं होगा तो क्या होगा। सोचिए एक सेनेटरी पैड की बात खुले में करने पर किसी को रेप करने का हक मिल गया। पीरियड्स एक शर्म की बात है! इस पर खुलकर बात नहीं कर सकते! कुछ घरों में पीरियड्स होने पर महिला को अलग कर देते हैं और घर के सबसे बड़े सदस्य से लेकर घर के सबसे छोटे सदस्य को पता होता हैं कि फलना को पीरियड्स हो रहे हैं और वे उस महिला से घिनाते हैं। जबकि होना ये चाहिए कि समाज में इस मुद्दे पर खुल कर बात होनी चाहिए और मासिक धर्म के प्रति समाज के नजरियों में बदलाव आना चाहिए।

महिलाओं के साथ होने वाले हर भेदभाव के पीछे की वजह सदियों पुरानी पितृसत्ता ही है, जो आज अपने बदले हुए तेवर के साथ समाज में मौजूद है। पर महिलाएं जैसे-जैसे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती रहेंगी, वो अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ और अधिक बोलेंगी। अब समय आ गया हैं कि महिलाएं अपनी सीमाएं खुद़ निर्धारित करें ना कि पुरूषों के बनाए सदियों पुराने नियमों पर सिर हिलाएं। वैसे हाल के दिनों में महिलाओं के लिए निषिद्ध स्थानों में महिलाओं का जाना काबिले-तारीफ हैं और ऐसी उम्मीद है कि आने वाले कल में, हम महिलाएं समानता की अपनी लड़ाई में कुछ और नये आयाम पा लें।

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