कैसे आधुनिकता की अंधी सोच से बढ़ते शहर, गाँवों को खा रहे हैं

Posted on June 15, 2016 in Hindi, Society

सौरभ सिन्हा:

ऊंची-ऊंची इमारतों और उनकी ग्लास विंडोज़ में अक्सर जो शहर, प्रतिबिम्ब के तौर पर दिखता है, वो सोचने पर मजबूर करता है। क्या है जो इन जगमगाते रास्तों और रौशनी से लैस शहरों को और बड़ा करने को मजबूर करता है, कि बिना उसके तो मानो समय ही थम जायेगा। क्यों सालों से फल-फूल रहे शहरों के लोअर-मिडिल क्लास के लोग आज भी बिजली, पानी, ट्रैफिक, प्रदुषण से लगातार जूझ रहे हैं? क्या जनसँख्या में आई वृद्धि को हम कारण मान बस अपने-अपने काम पे जुट जाएँ? नहीं तो वो कौन से शब्द हैं, – ग्लोबलवार्मिंग, नहीं क्लाइमेट चेंज- हाँ!
या फिर एक और कूलर या ए.सी. लगा कर इंतज़ार करें कि आसमान से आग गिरनी कब बंद होगी?

शहर को गाँव से अलग कुछ ऐसे समझा जाता है कि यहाँ विकास बेहतर होगा, जनसँख्या ज्यादा होगी। चमचमाती हुई सड़कें होंगी, गाड़ियाँ तेज़ भागेंगी, दुकाने ज्यादा होंगी। यथासंभव लोगों के लिए खरीद-बिक्री करना आसान होगा, शिक्षा और स्वास्थ्य की सेवाएं आपको तरीके से और वक़्त पर मुहैया हो पाएंगी। वन-टच इन्टरनेट सेवा, ऑनलाइन वॉलेट, जैसी सुविधाएं और सस्ते 4-जी प्लान रूप बदल-बदल कर परोसे जाएंगे। पर बदले में रहने-काम करने की जगह छोटी होगी, हवा थोड़ी कम आएगी, पेड़, पक्षी होंगे कुछ जगहों पर, और महंगे रेस्तरां देर रात तक चल पाएंगे।

गाँव ऐसे नहीं होंगे– वहां ज़रूरी नहीं कि सड़कें अच्छे से बनी हों, बिजली ज़रूरी नहीं कि आये, काम ज़रूरी नहीं कि मिल ही जाये, पुलिस बुलाने के एप्प ज़रूरी नहीं कि काम करते हों। स्कूल-कॉलेज-अस्पताल ज़रूरी नहीं कि उपयोग में आ ही जाएँ। ज़रूरी नहीं किआपके मौलिक अधिकार का हनन हो तो रिपोर्ट करने को न्यूज़ चैनल के पत्रकार पहुँच ही जाये, और ये तो बिलकुल भी ज़रूरी नहीं कि वो छप ही जाए। वहाँ लोगों के लिए मंत्रियों के ट्विटर हैंडल जवाबदेह नहीं होंगे, अफसर-कलेक्टर के जन-विरोधी हुक्मों का विरोध करने के लिए कोई बंदोबस्त नहीं होंगे, उनके आकाओं के गुंडों से पिटने पर तो शायद ही कोई आउटरेज हो।

आने वाले समय में छोटे बच्चे जब हवा की थैली खरीदने को पॉकेट मनी मांगे तो उनसे कहियेगा कि विकास बड़ा ज़रूरी था, इसलिए सारे पेड़-जंगल हम खा-निगल गए, पीने का पानी बजट का बड़ा हिस्सा बन जाये तो बताइयेगा नदियाँ-झरने ऐसे ठीक से इस्तेमाल में नहीं आ पा रहे थे, सो उन्हें मल्टी-नेशनल कंपनियों को बेचना ज़रूरी हो गया था। फिर उम्मीद कीजियेगा कि वो भी आपके लॉजिक की बखिया-उधेड़ ना करें, और अगर करें तो बस उन्हें देश का दुश्मन मत कहियेगा। पॉकेट मनी बंद मत कीजियेगा।

गाँव का शहरीकरण लोगों की समस्याओं का हल बताया जाने लगा है। कहा जा रहा है कि गाँव की बेरोज़गारी और बदहाली उसी जगह को शहर बनाने से हल हो जाएगी। हाल ही में एक नयी स्मार्ट-सिटी की लिस्ट निकली। बहुत सारे लोग खुश थे कि अब उनके छोटे शहर, बड़े शहर बन जायेंगे। यह सच है कि मूल सुविधाओं के आभाव में ऐसी बातें विश्वास दिलाती हैं कि महानगरों की तरह वहाँ भी उन्नति आएगी।

इन सपनों की संरचना में खूबसूरती और सावधानी से शहरी गरीबी, मजदूर वर्ग के रहने के लिए बनी झुग्गियों के उजड़ने-बसने की गाथा और निम्न सुविधाओं के साथ भागते-जूझते लोगों की जीवन की कहानियों को गायब कर दिया जाता है। मानो कोई जादू की छड़ी हो। इन नए ओवर-स्मार्ट शहरों में बड़े फ्लाईओवर होंगे, और उनके साथ जिंदल स्टील के नाम से सजी गार्डन-लाईटें। इसके ठेकेदार नेताओं के रिश्तेदार तो बिलकुल नहीं होंगे। कोई पुल-फ्लाईओवर कभी किसी सुबह खुद यूँ ही नहीं गिर पड़ेगा। सब कुछ सुहाना और मनोरम होगा। पानी के ए.टी.एम. हर जगह लगे होंगे। आज सिग्नल पर गुब्बारे बेचने वाले बच्चे उन्ही जगमगाते दफ्तरों के शीशे साफ़ कर रहे होंगे। मंदिर-गुरूद्वारे और समाजसेवी संगठन, उन्हें हर मंगलवार और शनिवार को पूड़ी-सब्जी खिला कर धार्मिकता का घड़ा भरेंगे। वो शहर सजीव होंगे, मनोरंजन पर हक़ सबका होगा, बराबरी से।

या शायद ऐसा ना हो!

जिस रफ़्तार से विकास के नाम पर कानून की धज्जियाँ उड़ाई गयी हैं ऐसी घटनाओं की सूची काफी लम्बी है। हाल की ही बात करें तो भूमि अधिग्रहण पर लगातार विरोध होने के बाद भी लगातार 3 अध्याधेश लाये गए– कहा गया कि देश की तरक्की कोई कानून नहीं रोक सकेगा। सब कुछ बदलेगा, हम बदल देंगे! 2006 में आख़िरकार पास हुए वन अधिकार कानून को गाँव-पंचायत से लेकर प्रधान-मंत्री कार्यालय तक तोड़ मरोड़ देना। छत्तीसगढ़-ओडिशा के आदिवासी समुदायों ने जो अधिकार सालों तक लड़ने के बाद हासिल किये,उन सामुदायिक अधिकारों के पर्चों को भी खनन कंपनियों के लिए निरस्त कर दिया गया। रिफॉर्म्स के नाम पर मजदूरों के अधिकारों और सुविधाओं का हनन तो वैसे भी आखिर ‘मेक इन इंडिया’ का साइड-इफ़ेक्ट मात्र ही है। इतनी कुर्बानी तो देश के विकास के लिए देनी ही पड़ती है, आखिर कैसे देशभक्त हो तुम!

देश का संविधान सरकार को हक़ और ज़िमेद्दारी देता है, कि वो देश के लोगों की तरफ से प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल और बेहतरी का काम करे- एक ट्रस्ट की तरह। भारत जैसे एक नए लोकतंत्र में सरकारों के लिए ये सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि इन पर ही देश की अर्थ-व्यवस्था, लोक-नीति और न्याय की प्रक्रिया निर्भर करती है। व्यापक स्तर पर ना सिर्फ उन्हें निजी मुनाफे के लिए बेच देना, बल्कि वहां रहने-बसने वाले देश के नागरिकों को बलपूर्वक, गैर-कानूनी प्रक्रिया से और खोखले सपने दिखाकर ठग लेना पता नहीं इस उच्चतम और सभ्य समाज में कब नॉर्मल सा हो गया।

मेरे अपने शहर– जहाँ मेरा घर है, वहाँ नए घर अब लम्बे या चौड़े नहीं ऊंचे बनने लगे हैं। पुराने दूकानदार नई बड़ी दुकानों से सस्ते सामान, ज़ाहिर तौर पर नहीं बेच पा रहे हैं। बेरोज़गारी पहले से ज्यादा बढ़ी है। स्कूल-कॉलेज के स्तर बड़े शहरों के स्तर के आस-पास भी नहीं है, हाँ उनकी फीस 5-गुना ज़रूर बढ़ गयी है। गंभीर बीमारी हो जाये तो आपको आज भी लोग दिल्ली-कलकत्ता की तत्काल टिकट की लाइन में नज़र आयेंगे। एक शांतिप्रिय शहर में अचानक से लोगों को अपने धर्म का एहसास होने लगा है– दुसरे धर्म के लोग दुश्मन से लगने लगे हैं। सेनाएं तैयार खड़ी हैं, बोर्ड-बैनर और हाथ-जोड़ते चेहरों के साथ, हर उस को मार बाहर करने के लिए जो उनके गोरख-धंधे का विरोध करते हो।

शायद मेरे देश में बच्चों को सवाल करने का कभी अधिकार रहा ही नहीं है।

लम्बे समय से गाँव की अशिक्षा, बदहाली और बेरोज़गारी को वहीं के लोगों के मत्थे मढ, उनकी पूँजी, मेहनत और जीवन की लूट वहीं के ज़मींदार-अमीर वर्ग नें की है। आज समीकरण बदले हैं। मालिक कुछ दुसरे-बाहरी भी आ गए हैं – पहले वाले उन्हें मजबूर कर रहे हैं कि पैसे लेकर अपनी ज़मीन पर जल्दी प्रोजेक्ट लगवा लें। इसी से उनका विकास होगा। कई परिवार इस फेरे में अपना बहुत कुछ गवां चुके हैं। कितने ही लोग विरोध करने के फलस्वरुप जेलों में दिन काट रहे हैं। ऐसे कितने ही संघर्षशील परिवारों की कहानियां न्यायालयों, अख़बारों के आस-पास भी नहीं फटक पाती हैं, कई उनसे न्याय मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

ग्राम सभाओं और पंचायतों के बचे-खुचे विरोध को प्रशासन अक्सर ‘मैनेज’ कर लेता है। संवेदनशीलता की उम्मीद कर थक चुके देश में लाखों-करोड़ों लोग अपना बचा-खुचा जीवन लेकर एक बेहतर जीवन की आशा में इन्ही स्मार्ट-शहरों की तरफ रुख कर रहे हैं। क्या उनके मेहनत पर चलते, सांस लेते हमारे स्मार्ट-शहर उन्हें इस सभ्य नागरिक समाज में स्थान देंगे? क्या बस जीने भर का खाने के अलावा ये शहर उन्हें कुछ और दे पाएंगे? और ऐसे में आने वाले समय में क्या हम सबको पीने को पानी उपबब्ध होगा, जीने की गारंटी होगी? इन सवालों पर क्या उनकी राय ली लाएगी– उन्हें अमल में लाया जायेगा?

ऐसे कौन से शिखर पे ले जा रहे हैं हमें ये लोग– क्या इस सवाल का कभी कोई जवाब दिया जाएगा?

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