पोलियो के बाद मुझे बोझ समझा जाता था, अब मेरी खुद की पहचान है

Posted on July 15, 2016 in Disability Rights, Hindi

पुनीता आज कई चीजें कर रही हैं। वो मधुमक्खी पालन करती हैं, वो ऑर्गेनिक तरीकों से एडिबल आयल (खाद्य तेल) बनाती हैं, और स्थानीय स्तर पर ऑर्गेनिक फार्मिंग (जैविक कृषि) के तरीकों और उनके फायदों पर सलाह भी देती हैं। उनमें आया यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण है, केवल इसलिए नहीं क्योंकि पुनीता अपना खुद का व्यवसाय चला रही हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वो एक विकलांग महिला हैं जो उनके आस-पास और काफी सारे लोगों को प्रेरित कर रही हैं।

जब वो बड़ी हो रही थी तो एक विकलांग लड़की होने के कारण उन्हें हमेशा पड़ोसियों के ताने सुनने पड़ते थे कि कैसे वो हमेशा एक बोझ ही रहेंगी और एक ऐसे गांव जहां खेती ही आमदनी का एकमात्र साधन है वहां ये किसी काम नहीं आ सकेंगी। जब वो पांच वर्ष की थी तो पोलियो वायरस से प्रभावित होने के कारण उनके शरीर के निचले हिस्से में लकवा मार गया। अब वो अपने पैरों का इस्तेमाल नहीं कर सकती हैं और एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए अपने हाथों का इस्तेमाल करती हैं।

पुनीता उत्तर प्रदेश के महाराजगंज ज़िले के दुरावा गांव में रहती हैं। उत्तर प्रदेश ना केवल जनसंख्या के आधार पर भारत का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि यहां पोलियो के शिकार लोगों की संख्या भी काफी ज़्यादा है। इसी कारण यहां विकलांग लोगों की तादात काफी ज़्यादा है।

नौवीं कक्षा की सबसे उम्रदराज छात्रा:

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फोटो आभार : सीबीएम/परविंदर सिंह

घास-फूस से बने एक टूटे हुए शेड जिसकी छत अभी हाल ही में आये एक तूफान से टूट गयी है, उसके नीचे ज़मीन पर बैठी पुनीता की आंखों में सूरज की तरह चमक मौजूद है।

पुनीता बताती हैं, “मैं इस उम्र (25 वर्ष ) में स्कूल जा रही हूं और मुझे इसमें किसी भी तरह की शर्म महसूस नहीं होती कि मैं नौंवी कक्षा की सबसे उम्रदराज विद्यार्थी हूं।” पुनीता जब 13 वर्ष की थी तो उन्हें स्कूल जाना छोड़ना पड़ा था।

सीबीएम के द्वारा विकलांग लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाए जा रहे, जैविक कृषि (ऑर्गेनिक फार्मिंग) प्रोजेक्ट्स में भाग लेने से, उनके अन्दर इस नए आत्मविश्वास का संचार हुआ है। इसके बाद से पुनीता ने अपने जीवन में कई बदलाव महसूस किए हैं, जिसमें (मधुमक्खी पालन और खाद्य तेल निकालने की मशीन से होने वाली) अच्छी आमदनी से लेकर ऑर्गेनिक फार्मिंग पर उनकी अच्छी जानकारी की वजह से समाज में मिलने प्रतिष्ठा तक आते हैं।

पुनीता की मधुमक्खियाँ:

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फोटो आभार : सीबीएम/परविंदर सिंह

चार बड़े-बड़े पेड़ों के नीचे छाया में सात सफेद लकड़ी के बक्सों के अंदर काफी कुछ होता रहता है। पुनीता इसके बारे में बताने को लेकर काफी उत्सुक हैं कि ये आखिर है क्या। वो बड़े विश्वास के साथ बताती हैं, “ये शहद की मक्खी के बक्से हैं जो इतनी गर्मी के बाद भी पूरी तरह से भरे हैं। ये इसी तरह रहते हैं क्योंकि मैं इन्हें चीनी, गुड़ और पानी का मिश्रण देना कभी नहीं भूलती।”

पुनीता खुद के लिए बनायी गयी एक ख़ास व्हीलचेयर पर इन बक्सों के आस-पास घूमते हुए बताती हैं कि वो गांव के उन चुनिन्दा लोगों में से एक हैं जो शहद निकालती हैं और अच्छे दामों पर बेचती भी हैं। हालांकि जहां ये बक्से रखे हैं वहां की ज़मीन काफी उबड़-खाबड़ है, लेकिन इस बक्सों को इस तरह से बनाया गया है कि पुनीता इन तक पहुंच सकें। इन बक्सों से एक साल में करीब 84 लीटर शहद निकलता है। यह शहद 400/- रूपए प्रति लीटर के हिसाब से बेचा जाता है, इस प्रकार शहद से होने वाली आय सालना करीब 33600/- रूपए होती है। पुनीता को केवल इन बक्सों के रख-रखाव और शहद निकालने की ही ट्रेनिंग नहीं मिली बल्कि उन्हें यह भी बताया गया कि खेती के लिए भी मधुमक्खियां कितनी फायदेमंद हो सकती हैं, खासतौर पर सब्जियों की खेती के लिए।

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फोटो आभार : सीबीएम/परविंदर सिंह

इसके साथ-साथ उन्हें एक खाद्य तेल निकालने की मशीन भी उपलब्ध करवाई गयी है, जिससे स्थानीय रूप से उगाए जाने वाली सरसों और सूरजमुखी के बीज से तेल निकाला जाता है। इस मशीन को पैसे लेकर वह स्थानीय किसानों को उपलब्ध कराती हैं। वो खुद भी बीज खरीदती हैं और उनका तेल निकालकर स्थानीय बाज़ार में इसे एक जैविक उत्पाद (ऑर्गेनिक प्रोडक्ट) के रूप में बेचती हैं। इससे भी उनकी आमदनी में अच्छा इज़ाफा होता है।

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फोटो आभार : सीबीएम/परविंदर सिंह

मेरी एक पहचान है:

पुनीता हालांकि शादीशुदा हैं, लेकिन उनकी अपने पति के साथ बातचीत काफी सीमित है, और वो इस बारे में ज़्यादा बात करना पसंद भी नहीं करती। उन्होंने तुरंत कहा, “मैं आजाद हूं और मेरा खुद का बैंक अकाउंट है। ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर पर मेरे ज्ञान जो मुझे इस ट्रेनिंग से मिला है, की वजह से मुझे इज्ज़त मिलती है।”

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फोटो आभार : सीबीएम/परविंदर सिंह

पुनीता ने ना केवल इस प्रोजेक्ट से नयी संभावनाएं तलाशी हैं, बल्कि वो अपने परिवार में एक मज़बूत आवाज़ बनकर भी उभरी हैं। वो मज़बूती के साथ कहती हैं, “अब मेरी खुद की एक पहचान है। पहले ऐसा नहीं था, जब मुझे एक बोझ की तरह देखा जाता था।  विकलांग लोगों को हमेशा नज़रंदाज़ कर दिया जाता है, क्योंकि परिवार के लोग उन्हें आर्थिक रूप से एक बोझ समझते हैं। आज घर के पास और गांव में ही अपनी आजीविका खुद से कमाने के कारण मैं अपने जीवन में बदलाव ला पायी हूं।”

आजीविका के साधनों की उपलब्धता:

विकलांग लोग दुनिया में सबसे गरीब लोगों में से हैं, और भारत में गरीबी में रह रहे विकलांग लोगों की एक बड़ी संख्या है। आजीविका के साधनों और आजाद जीवन तक पहुंच ना हो पाना, विकलांग लोगों के लिये सम्मानजनक जीवन जीने की राह में सबसे बड़ी रूकावट है। ऐसे माहौल में, पुनीता की कहानी, विकलांग लोगों को पदोन्नति दिए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा प्रयोग की गयी कहावत, अपने भाग्य के निर्माता को सही साबित करती है। अधिकतर लोग जो विकलांग हैं अपनी आजीविका ग्रामीण इलाकों में रह कर अनियोजित तरीकों से कमाते हैं, आज ज़रूरत है कि अन्य क्षेत्रों में उनकी सहभागिता को लेकर बने इस अंतर को कम किया जाए।

सीबीएम और इसकी सहायक संस्थाओं नें कृषि के क्षेत्र में विकलांग लोगों को शामिल करने के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जिसमें विकलांग और सक्षम लोग साथ मिल कर जैविक उत्पाद (ऑर्गेनिक प्रोडक्ट) उगा और बेच सकें, यह एक नियंत्रित प्रक्रिया है जिसमे पहले से मौजूद संसाधनों से ही इसे विकसित किया जाता है। पांच राज्यों के 11000 किसान और पुनीता जैसे 5000 लोग इस प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। आर्थिक मदद और ज़रूरी प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) उपलब्ध कराए जाने पर कृषि का क्षेत्र विकलांग लोगों के सशक्तिकरण का मज़बूत ज़रिया बन सकता है।

अनुवाद – सिद्धार्थ भट्ट

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