चिल्कोट रिपोर्ट: क्या इराक हमले में ब्रिटिश भागीदारी को टाला जा सकता था?

Posted on July 11, 2016

मुकुंद वर्मा:

बचपन में पढाया गया था-जो चीजें जैसी दिखती है, अक्सर वैसी होती नहीं है। जैसे सारी चीजें मॉलिक्यूल्स से बनती है। मॉलिक्यूल्स एटम से और एटम इलेक्ट्रान, प्रोटोन आदि से। फिर ये सारे पार्टिकल्स भी किसी और चीज से बने होते हैं। यही बात आम जीवन में भी लागू होती है। वैसे इसका महत्व तो पता था, लेकिन इस बात का इतना महत्व हो सकता है ये पता नही था, क्यूंकि यही बातें राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय लेवल की राजनीति पर भी लागू होती हैं।

अभी-अभी 2 दिन पहले लन्दन से एक रिपोर्ट आई है, जिस रिपोर्ट का नाम है- चिल्कोट रिपोर्ट। इसे द इराक इन्क्वायरी रिपोर्ट से भी आप गूगल पर सर्च कर सकते हैं। ये रिपोर्ट ब्रिटेन के इराक युद्ध में हिस्सा लेने के कारणों और परिणामों को सामने रखती है। इस रिपोर्ट के सामने आने के पहले मैंने कई तरह के वीडियोस देख रखे थे, जिसमे इराक और अफगानिस्तान पर हमला करना महज एक बहाना था ताकि तेल के कारोबार को काबू में रख कर डिफेंस कम्पनीज को फायदा पहुँचाने जैसी बातें दिखाई गयी थी। खैर उन बातों का आप यकीन कर भी सकते हैं, और नही भी, क्यूंकि वो तो बस एक थ्योरी थी। लेकिन जब चिल्कोट रिपोर्ट, जो कि लन्दन की आधिकारिक रिपोर्ट है, पढ़ी तो लगा कि शायद ये कांस्पीरेसी वाली थ्योरी गलत नही है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इराक के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन अंतिम विकल्प नही था। क्यूंकि किसी भी इंटेलिजेंस एजेंसी के पास कोई पुख्ता जानकारी नही थी कि इराक के पास “वेपन्स ऑफ़ मास डिस्ट्रक्शन” है। दूसरा यूनाइटेड नेशंस और सिक्यूरिटी काउंसिल भी मिलिट्री ऑपरेशन के पक्ष में नही थे और दूसरे विकल्प ढूंढ रहे थे। तीसरा, इराक पर आरोप था कि वो परमाणु बम बना रहा था, लेकिन जिस तरह से उस पर बाकी प्रतिबन्ध लगे थे, उस तरह से इराक को परमाणु बम बनाने में कई साल लगते, इन सालों में इराक के साथ बातचीत या कोई और विकल्प इस्तेमाल कर मिलिट्री ऑपरेशन टाला जा सकता था। चौथा, इससे पहले कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अपनी संसद को इसके लिए मनाते, वो कई महीनों पहले बुश को कह चुके थे कि चाहे कुछ भी हो जाये, हम आपका साथ देंगे, मतलब उन्होंने मिलिट्री ऑपरेशन को अपनी “पर्सनल चॉइस” बना लिया था। पाँचवा, और सबसे महत्वपूर्ण कि उन देशों के मीडिया ने भी सरकार पर सवाल नही उठाये, उन्होंने युद्ध को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया, अपने रिपोर्टर्स भेजे, उनकी मदद से उड़ती मिसाइल, चलती गोलियों और फटते बमों को टीवी पर लाइव टेलीकास्ट किया, मानो वहां इंसान की जान नही जा रही हो, बल्कि दिवाली खेली जा रही हो।

यह रिपोर्ट इन्टरनेट पर उपलब्ध है, आप डाउनलोड कर के पढ़ सकते हैं। वो सारी बातें जान सकते हैं जो मैं यहाँ इतने कम शब्दों में नही बता सकता। आप जरुर पढ़िए, इस इराक युद्ध में जो डेढ़ लाख लोग मरे हैं, कम से कम उनके लिए ही सही। अपने आप से पूछियेगा की क्या उन मौतों का होना जरुरी था? ऐसा क्या हासिल हुआ इतने इराकी और कई ब्रिटेन या अमेरिका के सैनिकों की जान गँवा के? आप पढियेगा क्यूंकि जब अगली बार दुनिया में कोई भी सरकार युद्ध की बात करे, तो आप सोच पाइयेगा की क्या सच में यह युद्ध जरुरी है, या फिर कहीं कोई चीज ऐसी तो नही, जो जैसी दिख रही है, वैसी है नही।

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