कब बंद होगा हिन्दी सिनेमा में दिखाया जाने वाला लैंगिक भेदभाव?

Posted on July 23, 2016 in Culture-Vulture, Hindi

सिद्धार्थ भट्ट:

21 जुलाई को दिल्ली के सीरी फोर्ट काम्प्लेक्स के पास हैय्या: ओर्गनाइज फॉर एक्शन नाम की एक नॉन प्रॉफिट संस्था द्वारा हिंदी सिनेमा में दिखाए जाने वाले लिंग आधारित भेदभाव पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। न्यू नेरेटिव नाम की श्रंखला के अन्दर चलाए जा रहे “स्मैश द संस्कार” नाम के इस कार्यक्रम में करीब 40 लोगों ने शिरकत की।

इस कार्यक्रम की शुरुवात हिंदी फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के एक दृश्य से हुई जिसमें फिल्म का हीरो , हिरोइन के ट्रेन में अकेले होने पर उसके साथ बात करने की पहल करता है। यह फिल्म का काफी जाना-माना दृश्य है, जिसमें पुरुषवादी सोच के एक साथ कई उदाहरण जैसे महिला के ना चाहने पर भी जबरदस्ती उससे बात करने के प्रयास करना, उसे छूने के प्रयास करना, आदि देखने को मिलते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि इसे एक मजाक के तौर पर या फिर बैकग्राउंड में रूमानी संगीत के साथ फिल्म में दिखाया जाता है।

इसी तरह फिल्म कुछ कुछ होता है का एक सीन जिसमें फिल्म का हीरो, कुछ लड़कों के साथ कॉलेज में विदेश से आयी नयी लड़की से हिन्दी गाना गाने के लिए कहता है। और वह लड़की  ओम जय जगदीश गाने लगती है और कहती है कि विदेश में रहकर भी वो उसके संस्कार नहीं भूली। इस सीन में ना केवल लड़कों की इस टोली को, एक लड़की को परेशान करने बल्कि संकृति और संस्कार के नाम पर पुरुषवादी सोच और लैंगिक भेदभाव को एक आम चीज की तरह दिखाया गया है।

राजा हिन्दुस्तानी का एक दृश्य जिसमें फिल्म का गरीब हीरो, हिरोइन से इसलिए लड़ रहा है क्यूंकि, हिरोइन के अमीर पिता ने उसे एक घर तोहफे में दिया है जिसे एक पुरुष का अहम स्वीकार नहीं कर पाता। वहीं कॉकटेल फिल्म के एक दृश्य में फिल्म की आधुनिक हिरोइन, हीरो को रिझाने के लिए खाना पकाते हुए दिखाई जाती है।

चर्चा इसी बात पर हुई कि ज्यादतर फिल्मों में एक तरीके की समानता देखने को मिलती है। इनमें पुरुष का हमेशा मुख्य किरदार में दिखाया जाता है, और रोमांस की एक ऐसी परिभाषा को रचने की कोशिश करना जहाँ महिला की इच्छा का कोई ख़ास महत्व नही होता है। महिलाओं का शादी से पहले सेक्स करने को दिखाए जाने से लेकर लड़कियों के पीछे भागने वाला हीरो जो शादी किसी संस्कारी लड़की से ही करना चाहता है। आज की आधुनिक लड़कियों का शादी के बाद भारतीयकरण कर दिया जाना। महिला को परुष से किसी भी तरह आगे होने की बात को तो जगह ही नहीं दी जाती है, और इसका सबसे अच्छा तरीका उसे घर सम्भालने वाली महिला जो हर वक़्त त्याग के लिए तैयार है, दिखाकर किया जाता है।

समय-समय पर भारतीय सिनेमा में भी मुख्य महिला किरदारों वाली फ़िल्में बनती रही हैं, लेकिन इनकी संख्या काफी कम रही है। कार्यक्रम के दौरान एक युवक ने इसी पर अपनी सोच ज़ाहिर करते हुए कहा कि, “ज्यादातर फ़िल्में और दृश्य पुरुष की मेल फेंटेसी आगे ले जाने का काम करती हैं ।” एक अन्य युवती ने कहा कि, “यह इसी पुरुषवादी सोच का ही नतीजा है कि फिल्मों में बलात्कार के दृश्य तो बेरोकटोक दिखाए जाते हैं लेकिन स्त्री पुरुष के करीबी पलों को दिखाए जाने पर काफी शोर शराबा मचा दिया जाता है।”

कार्यक्रम के अंत में, इसमें भाग ले रहे लोगों के अलग-अलग ग्रुप बनाए गए। उन्हें फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की तर्ज पर फिल्म के एक दृश्य को गढ़ने के लिए कहा गया। इस दृश्य में सिमरन को राज के पिता शराब पीते हुए देखते हैं और अब उसे राज के पिता को मनाना है। अलग-अलग दलों की इसे लेकर काफी रोचक प्रतिक्रिया रही।

उन्होंने अपनी कल्पनाओं के आधार पर कभी सिमरन को एक लाचार लड़की की एक्टिंग करते हुए दिखाया। जबकि वो असल में हीरो के पिता का संस्कारों को लेकर उनकी सोच और उनकी पुरुषवादी सोच का मजाक उड़ा रही है। तो कभी उन्होंने सिमरन को एक ऐसी लड़की के रूप में दिखाया जो समाज की संस्कारी लड़की की छवि से बिलकुल उलट है। उसे पता है कि इस पुरुषवादी सोच का सामना कैसे किया जाए। एक दल ने तो हीरो के पिता को सिमरन के विचारों से प्रभावित होकर उनकी पुरुषवादी सोच को बदलते हुए भी दिखाया।

कहते हैं की सिनेमा समाज का दर्पण होता है, और यह समाज में सन्देश भेजने का एक मजबूत जरिया भी है। आज फिल्म जगत में युवा निर्देशक की संख्या काफी ज्यादा है। ऐसे में महिलाओं को लेकर असंवेदनशीलता, और उनके खिलाफ बढ़ते अपराध और भेदभाव को देखते हुए यह बेहद जरुरी है कि फिल्म उद्योग में सक्रिय लोग इस मुद्दे की अहमियत को समझे और एक जिम्मेदार और संवेदनशील सिनेमा को बढ़ावा दें।

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