मणिपुर के गाँव वालों की मेहनत और लगन से बना है ख़ास जरूरतों वाले बच्चों का यह स्कूल

Posted on July 16, 2016 in Disability Rights, Hindi, Inspiration

यूथ की आवाज़:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

2005 में मणिपुर के पियरसनमन  गाँव के एक युवा जोड़े श्री पाउजागिन और श्रीमती डॉनडूशिंग को एक बेटा हुआ। उन्होंने उसका नाम मालसौन रखा जिसका अर्थ होता है ब्लेस्ड(सौभाग्यशाली)। कुछ समय बीतने के बाद पाउजागिन को पता चला कि इस नन्हे बच्चे में देखने की क्षमता नहीं है, उन्हें ये भी शक था, कि बच्चा साथ ही में औटिस्टिक भी है। और विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए सबसे पास उपलब्ध स्कूल, दो घंटे की दूरी पर मणिपुर राज्य की राजधानी इंफाल में था। इसलिए पाउजागिन ने अपने गाँव में समुदाय के लोगों को इकठ्ठा किया, और यह फैसला लिया गया कि गाँव के ही सब लोग मिल कर पूरी तरह से, ख़ास (स्पेशल) जरूरतों वाले बच्चों के लिए एक विशेष (स्पेशल) स्कूल बनाएँगे।

यह काम आसान नहीं था, पाउजागिन ने स्कूल की ज़मीन के लिए अपनी खुद की  ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया। गाँव के अन्य लोगों ने भी अपनी मेहनत की कमाई, इस स्कूल को बनाने में लगाई और इसके लिए चंदा इकठ्ठा किया। एक ऐसी जगह जहाँ अधिकांश लोगों की आमदनी अच्छी है, लेकिन वहां अक्षमता (डिसएबिलिटी) के साथ संघर्ष कर रहे लोगों के लिए किसी भी तरह की विशेष सुविधाएँ नहीं हैं, अक्षमता (डिसएबिलिटी) के साथ संघर्ष कर रहे लोग और उनके परिवार काफी परेशानियों और अकेलेपन में जिन्दगी जीते हैं, साथ ही समाज की इस विषय पर सोच भी मानसिक रूप से काफी थका देने वाली होती है। मालसौन इनिशिएटिव इस सोच में बदलाव लेकर आता है, इस गाँव के लोगों के मिलेजुले प्रयास से बना यह स्कूल अधिकारिक रूप से 2011 में शुरू हुआ।

इस गाँव के लोगों की इच्छाशक्ति के इस उदाहरण ने यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र संघ) डेवेलपमेंट प्रोग्राम का ध्यान जल्द ही अपनी तरफ खींच लिया। यू.एन.डी.पी. के वालंटियर प्रोग्राम से मिली, प्रशिक्षित लोगों की सहायता से जिनमे फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, और स्पेशल एजुकेशन और स्कूल प्रशासन के विशेषज्ञ शामिल थे, इस स्कूल को विकास करने में काफी मदद मिली।

इस स्कूल का प्रयास है कि सही तरीकों और एक सहायक वातावरण में सभी बच्चों की क्षमताओं का पूरा विकास किया जाए, मालसौन जिसे संगीत बहुत पसंद है को कविताओं और गानों से स्पीच थेरेपी सिखाई गयी। देखने की क्षमता ना होने के कारण उसे ख़ास तरीकों से जरुरी बातें भी सिखाई गयी, इन तरीकों में कार्ड बोर्ड पर चिपकाए गए पतली रस्सी के टुकड़ों का इस्तेमाल करने जैसे आसान तरीके हैं ( देखें इस विडियो में, यहाँ बच्चे कैसे सीखते हैं)।

जहाँ एक ओर यह स्कूल विशेष जरूरतों वाले बच्चों के सीखने और विकसित होने के लिए एक उम्दा जगह है, वहीं सभी बच्चों के लिए इस तरह के स्कूल मौजूद नहीं हैं या वहां तक उनके लिए पहुँच पाना संभव नहीं है। इसलिए यह इनिशिएटिव ऐसे बच्चे जो स्कूल नहीं आ सकते उनको घर पर ही पढ़ाने और सिखाने की सुविधा भी देता है। इस स्कूल का विकास पाउजागिन और उनकी पत्नी के द्वारा बनाए गए सेंटर फॉर कम्युनिटी इनिशिएटिव की लगातार कोशिशों का नतीजा है। डॉनडूशिंग, समुदाय के लोगों इस प्रयास में शामिल करने का काम कर रही हैं और देखती हैं किन बच्चों को इस तरह की ख़ास सुविधाओं की जरुरत है। वो खुद को ऐसी पजल का हिस्सा बताती हैं जहाँ सभी लोग एक ऐसे हिस्से की तरह हैं जो इसे सुलझाने के लिए ज़रूरी हैं।

आज इस स्कूल में 30 बच्चे सीख रहे हैं और 40 बच्चों को घर पर सीखने और पढ़ने की सुविधा दी जाती है। अफ़सोस कि मालसौन अब उनमे से एक नहीं है। इस साल 23 अप्रैल को मालसौन का निधन हो गया। हालांकि उसने अपनी छोटी सी जिंदगी में इस दुनिया में कोई चीज नहीं देखी और ना ही कोई शब्द कहा, लेकिन उसके जीवन ने गाँव के सभी लोगों को मिलकर यह स्कूल बनाने के लिए प्रेरित किया, जिसका बहुत अधिक महत्व है। द मालसौन इनिशिएटिव दुनिया में उन लोगों के लिए एक उम्मीद की किरन की तरह है, जिन्हें दुनिया उपेक्षा और असंवेदनशीलता से देखती है।

special school

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