“ठीक तुम्हारे पीछे”: बाज़ार से राजनीति को जोड़ती मानव कॉल की कहानियां

Posted on July 5, 2016 in Books, Culture-Vulture, Hindi
मानव कौल

किसी रात अकेले में हम चाय बनाकर पीते हैं। उस रात हमें नींद नहीं आ रही होती। हम तय नहीं कर पा रहे होते हैं कि चाय अच्छी है, या नींद का ना आना बुरा। मानव कौल की कहानियों को पढ़ते हुए इसी असमंजस से गुजरना होता है। मानव कौल की कहानियों का पहला संग्रह हाल ही में ‘हिन्द युग्म प्रकाशन’ ने छापा है। कहानी संग्रह का नाम है- “ठीक तुम्हारे पीछे”

मानव कौल एक फिल्म अभिनेता हैं, उससे पहले थियेटर करने वाले एक्टर-डायरेक्टर। उनकी कहानियां इन्हीं दोनों के बीच के एक अंतराल जैसी लगती हैं। उसमें नाटकीयता भी है, कहने की अलग शैली भी, और जो कहा जा रहा विषय है वो एक व्यापक फलक को खुद में समेटने की जद्दोजहद करता दिखता है। लेकिन इन सबके बीच का एक केन्द्रीय भाव है- आदमी का अकेलापन। ये अकेलापन लेखक का नितांत प्राइवेट स्पेस भी है और दुनियावी चीजों में फँसे उसके पात्रों की स्थिति भी।

इन कहानियों के पात्र अपने उसी अकेलेपन से संवाद करते हैं। इस संवाद में कुछ बेहद साफ वाक्य भी बन पड़ते हैं, कुछ धुंधले से शब्द छूट जाते हैं तो कुछ बेहद खालीपन से भरे होते हैं। कुछ तो इतने आपस में गड्मड् हो गए हैं कि उनके ओर-छोर का कोई पता ही नहीं चलता। ऐसी ही कहानी है ‘टीस’, संग्रह की सबसे आखिरी से दूसरी कहानी। इस कहानी की टीस इतनी भीतर तक पैठती है कि पाठक भी कुलबुलाने लगता है, और लेखक तो कई बार बीच कहानी में ही आगे ना पढ़ने की सलाह दे जाता है। इस कहानी में एक दोस्त है, एक प्रेमी, एक मुंहबोला भाई और इन तीनों को आपस में पिरोनेवाला एक लेखक कमल। लेकिन ये चारों पात्र आपस में इतने गुंथे हैं कि कहानी के एक पैराग्राफ में भाई ही प्रेमी हो जाता है, दोस्त कहानी का पात्र भर।

विषय के स्तर पर भी यह कहानी संग्रह, एक नयेपन को समेटे है। वह कई बनी बनायी मूर्तियों को धड़ाम से तोड़ता है। मसलन ‘माँ’ शीर्षक वाली कहानी को ही पढ़ा जाये। मां शब्द के साथ पवित्रता, नैतिकता, महानता को इतने महीन तरीके से टांक दिया गया है, कि कई बार वो एक बोझ सा बन जाता है। लेकिन यह बोझ अनकहा ही बना रहता है। मानव कौल ने अपनी इस कहानी में उस अनकहे को कहने का साहस किया है। एक माँ है, जो अकेली है, जो प्रेम में पड़ जाती है और वह प्रेमी उसका पति नहीं है। उस माँ का एक बेटा है, जो ना अपने माँ के अकेलेपन को बांट पाता है और न ही उसके प्रेम को। पूरी कहानी बस इसी ना बांट पाने के दुख का ब्यौरा है- एक बेबसी, पछतावा जो माँ के मरने के ठीक बाद बेटे के मन में घर कर गया है।

इस कहानी संग्रह की कई ऐसी कहानियां हैं जो वाकई ‘मौन में बात’ करने जैसी हैं। मौन में बात करते हुए हम दुनिया की चिंताओं, बहसों से थोड़ा फुरसत पाते हैं। अपने भीतर झांकते हैं, अपने आसपास की दुनिया, संबंध को आंकने की कोशिश करते हैं। संग्रह की ज्यादातर कहानियों में उन्हीं संबंधो की एक पड़ताल की गयी है- पिता-बेटे का संबंध, दुनिया की नजरों में ‘चरित्रहीन’ बन चुकी मां और बेटे का संबंध, दूर शहर में अपनी बीबी से अलग रह रहे बेटे और माँ का संबंध, एक अकेले पिता का अपने बेटे से अनकहा संवाद, एक तलाकशुदा पति का जा चुकी पत्नी से मिलने से पहले का इंतजार, कमरे के कुछ सामनों की उठापटक, एक बड़ी उम्र की लड़की के ‘चक्कर’ में फंसे लड़के का आकर्षण, बहुत पहले छूट गए मुमताज भाई पतंगवाले, एक अनलकी लड़का जिसका नाम लकी है। इन कहानियों में ऐसी ही छोटे-छोटे अनकहे बोझों को उतारने की कोशिश की गयी है- जो ना जाने कब से हमारे जीवन में, हमारे रिश्तों में आकर बैठ गए हैं। कोई-कोई कहानी इसी बोझ को उतारने में थोड़ी लंबी हो गयी है तो कोई-कोई इतनी छोटी कि लगे बीच में ही छूट गयी है।

इन कहानियों की समीक्षा नहीं की जा सकती, जिसे हम चालू शब्दों में, भाषा, कथ्य, उद्देश्य, पात्र के आधार पर करते रहते हैं। भाषा के स्तर पर इसमें कई जगह अंग्रेजी के शब्दों को रोमन में लिख छोड़ा गया है, लेकिन वह कहीं से वल्गर नहीं लगता। हिन्दी कहानियों को अंग्रेजी स्टाईल में जिस तरह से ‘बाजार की चीज’ बनाने की होड़ मची है, ये कहानियां उस अश्लीलता को कहीं से नहीं छूती दिखती। लेकिन बाजार का तो पता नहीं, पाठकों के भीतर गहरे तक पैठती जरुर है। बहुत दिनों बाद हिन्दी को ऐसा लेखक मिला है, जो बाजार और राजनीतिक घोषणा दोनों में से किसी एक कैंप में जाता नहीं दिखता। हां वो बीच का कड़ी हो सकता है जिससे आम जीवन के रिश्तों, मन के भीतर के द्वन्द, अकेलेपन के भावों और प्राइवेट खालीपन में जन्मे एहसासों को किसी नदी के किनारे पहुंचा सके।

आप चाहें तो इस 115 रुपये की छोटी सी किताब को एक झटके में भी पढ़कर खत्म कर सकते हैं, और बचा-बचा कर जीवन के कई अंतराल पर रेफरेंस की तरह भी पढ़ सकते हैं।

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