आखिर क्या वजह है कि सब लोग गेम ऑफ़ थ्रोंस देखना चाहते हैं?

Posted on July 2, 2016 in Culture-Vulture, Hindi

करीब 10 साल पहले की बात रही होगी, मैं ट्यूशन से घर लौटा था। दरवाज़ा खोला तो सोफे पर बैठे हुए या कहिये आधे लेटे हुए, बड़े भैया टी.वी. देख रहे थे। टी.वी. पर कुछ अंग्रेज़ी में आ रहा था, जिसमें बीच-बीच में टी.वी. से ऑटोमेटिक सी हँसी की आवाज़ आ रही थी। बार-बार वही आवाज़…बार-बार वही हँसी। इसके बाद हर दिन भैया उस टी.वी. वाली हँसी के साथ हँसते रहे और मैं ऐसे ही शाम को ट्यूशन से लौटने पर सीधे अपने कमरे में जाकर कहानियां पढ़ता रहा।

धीरे-धीरे पता चल गया कि भैया ‘फ्रेंड्स’ नाम का कोई सिटकॉम देखते हैं। उसके किरदारों के देखते-देखते हँसते हैं। फिर भैया के दोस्त, उनके दोस्तों के दोस्त, मेरे दोस्त, मेरे दोस्तों के दोस्त और मेरे कज़िन्स ना जाने कितने सारे मेरी उम्र के लोग इस ‘फ्रेंड्स’ पर मर रहे थे। वह सब मिलते थे तो वही बातें करते थे, उस ही के जोक्स पे हँसते थे और सबको हँसाते थे। सबको समझ में आता था, मैं सिर्फ रेचल और पेनी ही सुन पाता था… शायद इस शो के किरदारों के नाम रहे होंगे।

जब वह लोग बातें करते और हँसते तो मैं ऐसे वक्त में सुनकर बस हँस देता था। बिना यह बताए कि मैंने यह कभी नहीं देखा। धीरे-धीरे लोग मुंहफट हो गए, कहने लगे, “फ्रेंड्स नहीं देखा?अबे यह नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा।”

मैं सोचने लगा कि आखिर यह क्या बला है? किसी ने बताया कि यह हँसाता है, इसलिए लोग इसे देखते हैं और इस पर मरते हैं। मेरे पास हँसने के लिए एक हज़ार वजहें थीं और हँसने के लिए किसी सिटकॉम का सहारा लेने की ज़रुरत नहीं पड़ी।

आज 10 साल बीत चुके हैं और मैं अभी भी हिंदी में ही कवितायें लिख रहा हूं, पर अब एक एक नया बवाल है। मेट्रो में, बस में, ऑफिस के गलियारे में, कैंटीन में, या हर उस जगह पर जहां मेरी उम्र के चार लोग एक साथ मिल जाते हैं, एक ही बात करते हैं। ‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’… इसके पहले सीजन के पहले एपिसोड से लेकर अगले सीजन के उस एपिसोड तक जिसका ब्रोडकास्ट अभी भी पेंडिंग है।

मुझे पहले ‘फ्रेंड्स’ की बातों में चुप रहना पड़ता था। अब इस ‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’ की चर्चा में चुप रहना पड़ता है। हां इतना ज़रूर जानता हूं कि इसमें कोई जॉन स्नो है, जिस पर लड़कियां मरती हैं।

मुझे धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा है कि मैं इस एज से पीछे चल रहा हूँ। ‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’ नहीं देखा? यह पूछकर मुझे लोग एहसास कराते हैं कि जहां मेरी उम्र के लोग वक्त के साथ चल रहे हैं, उस दौर में, मैं वक्त से पीछे छूटता जा रहा हूं। लेकिन कितना पीछे? यह भी एक सवाल है।

एक दिन मैंने एक दोस्त से पूछ लिया, एक एपिसोड कितने मिनट का होता है? उसने बताया, करीब 45 मिनट का (यानी सिस्टम ऑन करके उसमें वीएलसी प्लेयर और सबटाइटल के अरेंजमेंट का टाइम मिला लिया जाए तो करीब-करीब एक घंटा।)

और कितना एपिसोड आये हैं अब तक?

करीब 60, यानी 1 घंटे के 60 एपिसोड्स, और सच में गणित का हिसाब लागाया जाये, तो मैं इस एज से 60 घंटे पीछे चल रहा हूं। बस 60 घंटे।

मुझे एक बात खटकती है और वह यह कि भैया तब ‘फ्रेंड्स’ देखा करते थे, आज वही भैया ‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’ कैसे देख लेते हैं? फिर समझ में आता है कि मनोरंजन का सामाजिक बदलाव से कितना नाता है।

पहले हमारे देश की पीढ़ी, जो नयी-नयी अंग्रेज़ी सीख रही थी, वह हँसना चाह रही थी, ‘फ्रेंड्स’ ने उसे दोस्त और हँसी दोनों दे दिए। दोस्ती और हँसी का रिश्ता तो पुराना है ही। पर सवाल यह है कि हँसने-हँसाने वाली पीढ़ी एकदम से मारकाट और युद्ध कहां से देखने लगी और पसंद करने लगी?

युवा अपना अक्स सामने वाली खिड़की में देखना चाहते हैं। बात स्पष्ट है कि जिस दौर में युवा पीढ़ी नया सीख रही थी, वह वहां मनोरंजन को एक विकल्प के रूप में देख रही थी, चिंताएं ज़्यादा नहीं थी, बस सब कुछ स्ट्रक्चर के नाम पर चलता था। उस ही तय तरीके से इसलिए ‘फ्रेंड्स’ की दोस्ती और हँसी दोनों लुभावने दिखते थे।

लेकिन दौर बदलने से पीढ़ी भी बदल गयी। यह पीढ़ी अब महत्वाकांक्षी यानी एम्बिशियस हो चुकी है। अब महज़ हँसने से काम नहीं चलेगा। इस उम्र में इस पीढ़ी को लड़ना होगा। यह पीढ़ी कट-थ्रोट कम्पटीशन में जी रही है, मार-काट और लड़ाई, असली हो या ना हो, लेकिन इमोशनल युद्ध तो लोग हर रोज़ हार-जीत रहे हैं। इसी का अक्स उन्हें इस गेम’ में दिखाई देता है।

इस पीढ़ी के लोग जीतना चाहते हैं और ऑफिस में बगल में जो क्युबिकल लगा है ना, जिस पर उनका बॉस बैठा जमा है, उसकी कुर्सी थ्रोन ही दिखायी देती है और उसके लिए वह हर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

अब आप तय कर लीजिये कि आप जमाने से आगे हैं या पीछे। जो भी हो, अब जब लोगों के हँसने और बर्बर युद्ध को पसंद करने का सार समझ आ ही गया है तो देखने का मतलब नहीं बनता। देखते रहिये, समझते रहिये।

अगर आप भी ‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’ से वंचित रह गए हैं तो अपने मन से किसी पाप का भय निकाल दीजिये। ज़िंदगी का गेम’ ज़्यादा मज़ेदार है, उसे खेलते रहिये।

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