बचपन से सवाल पूछने की आदत ने कैसे मेरी ज़िन्दगी बदल दी

Posted on July 27, 2016 in Hindi, My Story

 

उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी कसबे में मेरी परवरिश हुई, पिता एक सरकारी अफसर थे तो बुनियादी ज़रूरतों को लेकर कोई संघर्ष नहीं था। जब मैं बड़ा हो रहा था, तो सभी की तरह मेरे आस-पास की चीज़ों को लेकर मन में कई सवाल आते थे। छोटी जाति के लोगों से क्यों ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए, या मुस्लिमों से दूर क्यों रहना चाहिए या दीदी अब बाहर खेलने क्यों नहीं जाती। मेरे इस तरह के सवालों को ज़्यादातर नज़रअंदाज कर दिया जाता या फिर ज़्यादा पूछने पर किताबी और असल बातों के अंतर को समझाने की कोशिश की जाती।

इस तरह के कई अनुभवों में से एक अनुभव है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता। हमारे यहाँ पूजा, धार्मिक क्रियाओं और शादी जैसे मौकों पर एक ख़ास तरह का आंचलिक संगीत बजाया जाता है जिन्हें दास या औजी कह कर पुकारे जाने वाले लोग बजाते हैं, ये हमारे क्षेत्र के दलित हैं। कभी-कभी वो लोग हमारे घर आते थे तो उनके लिए चाय से लेकर खाने के बर्तन अलग होते और उन्हें घर के अन्दर आने की भी इजाज़त नहीं होती। जब मैंने इस बात को लेकर सवाल उठाया तो जवाब मिला कि ये “निचली जाति” के लोग हैं।

स्कूल के समय से ही मुझे इतिहास बहुत पसंद था, बचपन से ही कविताएँ लिखने का शौक भी था तो स्कूल के बाद की पढ़ाई  के लिए जब मैंने इतिहास और साहित्य को चुनना चाहा तो पिताजी ने कहा, “दिमाग खराब है, आजकल तो लड़कियां भी साइंस पढ़ रही हैं और तुम्हें इतिहास पढ़ना है! इंजीनियरिंग वगैरह कर लो, कुछ ना कुछ हो जाएगा लाइफ का।” इस बार तो कोई सवाल पूछने का भी मौका नहीं मिला और बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हो गयी। कॉलेज के समय दोस्तों के साथ अच्छे से गुज़रा, लेकिन मेरी सवाल करने की आदत अब तक बरक़रार थी। कॉलेज ख़त्म होते-होते मेरी एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी भी लग गयी।

मेरी पोस्टिंग राजस्थान के एक छोटे से शहर में हुई थी। वहां करीब ढाई साल रहने के बाद मेरा तबादला मुंबई हो गया। मुंबई में चीजें काफी अलग थी, कॉर्पोरेट की चमक-धमक, बड़ी-बड़ी मशीनें और सपनों का शहर मुंबई। ऐसा लगा कि अब मैं सही जगह आ चुका हूँ। लेकिन कुछ समय के बाद यहाँ भी काम रोजमर्रा की ज़िन्दगी का एक हिस्सा भर था। मुझे लगता कि जैसे लोग एक दुसरे से अनकही दूरी बनाकर चल रहे हैं। ऐसा लगता कि सब अपने-अपने सपनों और उम्मीदों की तरफ बस जैसे आँख बंद किये भाग रहे हों। शुरुवात में लगा कि यहाँ रहने का शायद यही तरीका है। लेकिन रह रह कर ये सवाल मन में आता-जाता रहता कि क्या बड़े शहरों में ऐसे ही होता है?

इन सबके बीच मैंने लम्बें समय के बाद एक कविता लिखी और पहली बार उसे अपने दोस्तों के साथ साझा भी किया। पहली बार ऐसा लगा कि कुछ अच्छा किया है, इसके बाद समय-समय पर लिखना चलता रहा, अब कविताएं मेरे लिए खुद को व्यक्त करने का तरीका बन गयी थी।

इसी दौरान मेरी दोस्ती कुछ ऐसे लोगों से हुई जो टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस से सोशल वर्क की पढ़ाई कर रहे थे। इनके साथ समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों पर बातें होती रहती, कई चीजें थी जिन्हें लेकर मेरी सोच के पीछे कोई तर्क और तथ्य नहीं होते। जैसे आरक्षण नहीं होना चाहिये क्यूंकि कई सारे दलित और पिछड़ी जाति के लोग भी अमीर होते हैं, कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां मारे जाने वाले सभी लोग आतंकवादी हैं, ऐसी कई चीजें थी जिन पर मैंने भी बिना कुछ जाने अपनी राय बना ली थी। लेकिन मैंने इन लोगों के साथ रहकर समझा कि किसी चीज़ पर राय बनाने से पहले तथ्यों को जानने की कोशिश करनी चाहिये।

मुंबई में करीब 2 साल से ज़्यादा रहने के बाद मुझे काम के सिलसिले में अफ्रीका के एक छोटे से देश मलावी में 6 महीने रहने का मौका मिला। एक गरीब अफ्रीकी देश जहाँ, बेरोजगारी, एच.आइ.वी, किशोरियों का बेहद कम उम्र में माँ बनना और शिक्षा की सीमित पहुँच जैसे कई मुद्दों से वहां के लोग संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से काफी सारे मुद्दों से हम अच्छी तरह से वाकिफ हैं, लेकिन उन्हें देखने के हमारे और उनके नज़रिए में काफी फर्क है। मैं बस यही समझने की कोशिश कर रहा था कि शादी से पूर्व माँ बन चुकी लड़कियों को हम अलग नज़र से क्यों देखते हैं, क्यों एच.आइ.वी के पीड़ितों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। समझ नहीं आ पाता था कि कैसे 200 सालों की गुलामी झेल चुके भारतीय मूल के लोगों का वहां के लोगों के प्रति व्यवहार काफी हद तक गुलाम भारत में रहे अंग्रेजों की तरह है।

इन सब सवालों के साथ जब मैं मलावी से वापस आया तो एक अजीब सी बैचैनी थी, अपने काम को लेकर और हमारे आस-पास होने वाली चीजों को लेकर। लेकिन समझ में नहीं आता था कि मैं क्या कर सकता हूँ। मैं वापस उसी दिनचर्या में लौट चुका था और फिर मेरी मुलाक़ात कुछ ऐसे लोगों से हुई जो दिन में मेरी तरह अलग-अलग काम करते और रात में एक फोक-फ्यूज़न बैंड के ज़रिये अपनी संगीत की रूचि को पूरा करते। जल्द ही ये लोग मेरे अच्छे दोस्त बन गए और मैं इस बैंड के लिए लिखने लगा। बेयर फीट प्रोजेक्ट नाम के इस छोटे से बैंड के साथ बिताए दो सालों ने मुझे, मेरे लेखन को एक नए स्तर पर ले जाने में मदद की। साथ ही मेरे उन सवालों का जवाब भी दिया जिनमें मुझे लगता कि काम से अलग जो चीज़ें हमें पसंद हैं उन्हें कैसे किया जाए।

मेरे अन्दर की बैचैनी बढ़ती जा रही थी और हर वक़्त मुझे अपने पेशे के चुनाव को लेकर शंकाएं होती। लेकिन और कोई विकल्प ना होने के डर से मैं कोई कदम नहीं उठा पाता। मुंबई में मुझे पांच साल हो चुके थे, अब लगा सेटल हो जाना चाहिए, इसी कयावाद में मैंने ट्रान्सफर लेकर दिल्ली का रुख किया। लेकिन मुझे अपने अन्दर आ चुके बदलावों का सही अंदाज़ा नहीं हुआ था। दिल्ली की यूनिट में काम के पहले ही दिन मुझे पता चल चुका था कि ऐसे ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगा।

तीन महीनों के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी, सवाल तब भी बहुत सारे थे, लेकिन सवालों से डरने पर उनके जवाब नहीं मिलते उन्हें तलाशना होता है। ये मेरा सबसे अहम् सबक था। इसके बाद मैंने घूमने का फैसला किया और करीब 6 महीने भारत के कुछ हिस्सों को देखा, खुद के साथ समय बिताया और जानने की कोशिश की कि मैं असल में क्या करना चाहता हूँ। इस तरह के सवालों के जवाब इतनी आसानी से शायद सबको नहीं मिल पाते। इसके बाद 6 महीने और लगे, मुझे कुछ जवाब मिले और उनमे सबसे ज़्यादा ज़रूरी जवाब था कि मुझे क्या नहीं करना है। आज मैं यूथ की आवाज़ में हिन्दी के सह संपादक के तौर पर काम कर रहा हूँ।

ऐसा लगता है, कभी-कभी क्या करना है से ज़्यादा ज़रूरी होता है, यह जानना कि क्या नहीं करना है। अगर मैंने खुद से सवाल नहीं किए होते तो शायद मैं जीवन में असफल हो जाने के अपने डर से कभी बाहर नहीं निकल पाता। आज मेरे आस-पास चीज़ें बेहद अलग हैं। बहुत से लोग मेरे लिए गए फैसलों के कारण मेरे जीवन का हिस्सा हैं और बहुत से नहीं भी हैं। लेकिन आज जब मैं पीछे मुड़ कर अपने सफ़र को देखता हूँ तो एक ख़ुशी होती है कि मैं अपने डर को छोड़कर आगे बढ़ पाया। और मेरे हिसाब से आगे बढ़ना ही ज़िन्दगी को जीना है।

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