आजादी के पहले और बाद के इन आंदोलनों ने बदली देश की तस्वीर

Posted on August 15, 2016 in Hindi, Society

रूचि वर्मा:

सन् 1757 का वो दिन भारत के लिए बहुत ही दुखद साबित हुआ जिस दिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच प्लासी का युद्ध हुआ। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराज़ुद्दौला को हरा दिया था। इस युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहीं से शुरु हुई थी हमारी दासता की कहानी, इसके बाद पूरे 200 सालों तक हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। भारत को आजाद कराने के लिए उस समय के युवाओं और दिग्गजों ने कई तरह के आंदोलनों का आगाज किया। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और अपनी मांग को मनवाने के लिए आजादी के समय इजाद हुई आंदोलन करने की प्रथा आज तक चली आ रही है। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं आजादी के पहले और बाद के ऐसे ही कुछ आंदोलनों के बारे में जिन्होंने भारत की तस्वीर को बदल कर रख दिया।

आजादी के पहले के आंदोलन

1857 की क्रांति:
1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों और आगजनी से हुआ था और आगे चलकर इसने एक बड़ा रूप ले लिया।

चौराचौरी कांड:
1 फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड भारत के इतिहास के पन्नों में कभी ना भूलने वाला काला दिन है। इसी दिन चौरीचौरा थाने के दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने आजादी की लड़ाई लड़ रहे वालंटियरों की खुलेआम पिटाई शुरू कर दी। सत्याग्रहियों की भीड़ इसके बाद पुलिसवालों पर पथराव करने लगी। जवाबी कार्यवाही में पुलिस ने गोलियां चलाई, जिसमें 260 व्यक्तियों की मौत हो गई। पुलिस की गोलियां तब रुकीं जब उनके सभी कारतूस समाप्त हो गए। इसके बाद सत्याग्रहियों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होनें थाने में बंद 23 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया।

नमक आंदोलन:
नमक आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने मार्च 1930 में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की थी। यह यात्रा समुद्र के किनारे बसे शहर दांडी के लिए थी, जहां जाकर बापू ने भारत में नमक बनाने के लिए अंग्रेजों के एकछत्र अधिकार वाला कानून तोड़ा और नमक बनाया था।

असहयोग आंदोलन:
सितंबर 1920 से फरवरी 1922 के बीच महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया गया। जलिया वाला बाग नरसंहार सहित अनेक घटनाओं के बाद गांधी जी को लगा कि ब्रिटिश हाथों से एक उचित न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की।

भारत छोड़ो आंदोलन:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने का काम किया था। 9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ यह वह आंदोलन था, जिसमें पूरे देश की व्यापक भागीदारी रही थी।

आजादी के बाद के आंदोलन

चिपको आन्दोलन:
गांधीवादी विचारधारा पर आधारित चिपको आन्दोलन चांदनी प्रसाद भट्ट और सुन्दरलाल बहुगुणा की अगुवाई में किया गया। भारत के जंगलो को बचाने के लिए किया गया यह आन्दोलन शीघ्र ही तेजी से फैला और पूरे देश में प्रसिद्ध हुआ। यह आन्दोलन 1970 की शुरुआत में शुरू हुआ था जब कुछ महिलाओं ने पेड़ काटने का विरोध करने का एक अलग ही तरीका निकाला। जब भी कोई व्यक्ति पेड़ काटता था तो यह महिलाएं पेड़ से चिपक कर खड़ी हो जाती थीं। यह आन्दोलन पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैला और हजारों लाखों लोग इसमें शामिल होते चले गए।

जेपी आन्दोलन:
पूरे भारत की राजनीति की दिशा बदल देने वाला ‘जेपी आन्दोलन’ 1974 में बिहार के विद्यार्थियों द्वारा बिहार सरकार के अन्दर मौजूद भ्रष्टाचार के विरूद्ध शुरू किया गया था। यही आन्दोलन बाद में केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार की तरफ मुड़ गया। इस आन्दोलन की अगुवाई प्रसिद्ध गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्त्ता जयप्रकाश नारायण ने की थी जिन्हें जेपी भी कहा जाता था। इस आन्दोलन को ‘सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन’ भी कहा जाता था। आन्दोलनकारी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ‘अब्दुल गफूर’ को हटाने की मांग कर रहे थे, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी’ ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब यह आन्दोलन सत्याग्रह में बदल गया और आन्दोलनकारी एक-एक कर गिरफ्तारी देने लगे। जेपी पूरे देश में घूम-घूमकर कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार करने लगे और सभी केन्द्रीय विपक्षी दलों को पार्टी के विरुद्ध एकजुट करने लगे। यह जेपी आन्दोलन का चमत्कार ही था की केंद्र में ‘जनता दल’ की सरकार बनी जो आजाद भारत की पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी और इसी जेपी आन्दोलन के कारण ‘इंदिरा गाँधी’ जैसी दिग्गज नेता को भी चुनाव हारना पड़ा।

जंगल बचाओ आन्दोलन:
प्रसिद्ध ‘जंगल बचाओ आन्दोलन’ 1980 में बिहार से जंगल बचाने की मुहिम से शुरू हुआ जो बाद में झारखण्ड और उड़ीसा तक फैला। 1980 में सरकार ने बिहार के जंगलो को मूल्यवान सागौन के पेड़ो के जंगल में बदलने की योजना पेश की, और इसी योजना के विरुद्ध बिहार के सभी आदिवासी काबिले एकजुट हुए और उन्होंने अपने जंगलो को बचाने हेतु एक आन्दोलन चलाया। इसे ‘जंगल बचाओ आन्दोलन’ कहा गया।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन:
साल 1985 से शुरू हुआ ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ नर्मदा नदी पर बन रहे अनेक बांधो के विरुद्ध शुरू किया गया और इस प्रसिद्ध आन्दोलन मेंक्षेत्र के बहुसंख्यक आदिवासी, किसान, पर्यावरणविद और मानवाधिकार आन्दोलनकारियों ने सरकार के इस बांधो के फैसले के विरुद्ध आन्दोलन शुरू किया। बाद में इस आन्दोलन में प्रसिद्ध सेलिब्रिटीज भी जुड़ते हुए चले गये और अपना विरोध जताने के लिए भूख हड़ताल का प्रयोग भी किया। बाद में कोर्ट ने दखल देते हुए सरकार को आदेश दिया कि पहले प्रभावित लोगों का पुनर्वास किया जाए तभी काम आगे बढाया जाए और बाद में कोर्ट ने बांधो के निर्माण को भी मंजूरी दी।

जनलोकपाल बिल – एंटी करप्शन आन्दोलन:
साल 2011 में ही प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर जनलोकपाल बिल के लिए भूख हड़ताल शुरू की, जिसके समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ। इस आन्दोलन को इतनी सफलता मिली कि यह पिछले 2 दशक का सबसे लोकप्रिय आन्दोलन बना और बाद में इसी आन्दोलन की बदौलत अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमन्त्री बने।

निर्भया आन्दोलन:
साल 2012 में दिल्ली में हुए एक गैंगरेप के बाद इस देश ने अपने नागरिकों का एक ऐसा गुस्सा देखा जो महिलायों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध था। इससे एक स्फूर्त आन्दोलन खड़ा हुआ जिसे निर्भया आन्दोलन कहा गया। हजारों लोग विरोध करने के लिए सड़को पर उतर आये और पूरा सोशल मीडिया इस आन्दोलन से भर गया। यहां तक कि लोगों ने अपनी प्रोफाइल पिक्चर की जगह एक ब्लैक डॉट की इमेज लगायी। इसके बाद पूरे देश की विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार ने महिला सुरक्षा को लेकर विभिन्न कदम उठाये।

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