कैसे फंड्स और कंडोम की कमी एड्स के खिलाफ हमारी जंग को प्रभावित कर रही है

Posted on August 4, 2016 in Health and Life, Hindi, Specials, Stories by YKA

अभिषेक झा:

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

“नड्डा जी यू.एन. (संयुक्त राष्ट्र संघ) जाते हैं, और 2030 तक दुनिया से एड्स को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए पूरा सहयोग देने की बात कहते हैं। क्या यह संभव है, जब इसके लिए जरुरी फंड्स सही तरीके से नहीं दिए जा रहे हों?” यह कहना है आल इंडिया नेटवर्क ऑफ़ सेक्स वर्कर्स के नेशनल प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर अमित कुमार का। वो इस बात को समझा रहे थे, कि कैसे उनकी संस्था को लगता है कि सरकार अपने इस लक्ष्य को पाने में सफल नहीं हो पाएगी। ऐसा इसलिए क्यूंकि, सरकार ने नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एन.ए.सी.पी.) जो इसके चौथे चरण के आखिरी साल में है, से एड्स से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले वर्ग की भागीदारी को ही कम कर दिया है।

एन.ए.सी.पी. का संचालन नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एन.ए.सी.ओ.) द्वारा किया जाता है। इसे हर राज्य में स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी (एस.ए.सी.एस.) के द्वारा लागू किया जाता है। 1999 के आखिर में शुरू हुए एन.ए.सी.पी. के दूसरे चरण से, एड्स के नये इन्फेक्शन के मामलों को रोकने के लिए ऐसे समुदायों के साथ ज़मीनी स्तर पर प्रयास शुरू करना, इस प्रोग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है जिनको एड्स की बीमारी होने का सबसे अधिक खतरा है। इनमें महिला सेक्स वर्कर और उनके पास आने वाले लोग, परुषों के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने वाले पुरुष, ट्रांसजेंडर लोग, और सिरिंज से नशा करने वाले लोग आते हैं। यह प्रयास सामुदायिक स्तर पर विभिन्न एन.जी.ओ. और सी.बी.ओ. (कम्युनिटी बेस्ड आर्गेनाइजेशन) के कार्यकर्ताओं और पिअर एजुकेटर्स (एड्स से सबसे ज्यादा प्रभावित समुदाय से आने वाले वो लोग जो एड्स की जानकारी अपने समुदाय के लोगों तक पहुंचाते हैं) द्वारा किये जाते हैं, ताकि दूर दराज के इलाकों में भी किसी एच.आई.वी. प्रभावित तक पहुंचा जा सके।

फंड्स में होने वाली देरी एच.आइ.वी./एड्स की लड़ाई को प्रभावित करती है

NACO1दिल्ली स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी (डी.एस.ए.सी.एस.) के साथ काम कर रही इंडिया सोसाइटी फॉर एप्लाइड रिसर्च एंड डेवलपमेंट के प्रोग्राम मेनेजर डी. उमाकांत शर्मा ने बताया कि, “जब समय पर इन कार्यकर्ताओं और पिअर एजुकेटर्स को इनका मेहनताना नहीं मिलता है तो यह इनके मनोबल को प्रभावित करता है, और इनके काम को भी प्रभावित करता है। जिससे आशा के अनुरूप नतीजे नहीं मिलते हैं।”

डॉ. शर्मा डी.एस.ए.सी.एस. के साथ पिछले डेढ़ से दो सालों में आ रही परेशानियों के बारे में बता रहे थे। पांच अलग-अलग संस्थाएं जो डी.एस.ए.सी.एस. के साथ मिल कर काम कर रही हैं से बात करने पर पता चला कि 2014-15 और 2015-16 वित्तीय वर्ष में उन्हें 5 या 6 महीनो का फंड नहीं मिला है। हालांकि उन्हें इस साल अप्रैल से सितम्बर महीने तक का फंड अभी हाल ही में मिला है, लेकिन पिछला बकाया एक चिंता का विषय है। कुछ लोगों ने नाम ना छापने की शर्त पर ही अपनी बातें कही।

विभिन्न संस्थाओं से मुझे पता चला कि फंड में देरी के चलते सबसे ज्यादा पिअर एजुकेटर्स प्रभावित होते हैं। एक ऐसी ही संस्था *अ के प्रोग्राम डायरेक्टर *अमिताभ  पिअर एजुकेटर्स के बारे में बताते हैं, “ये लोग अपने दोस्तों और जानकारों को एड्स के खतरे से बचाने का बेहद उम्दा काम कर रहे हैं। ऐसे में जब इन्हें इनका मेहनताना नहीं मिलता तो इन्हें इस तरह के प्रोग्राम फर्जी लगते हैं।”

*छाया, जो *स नाम की संस्था में एक कार्यकर्ता (आउट रीच वर्कर या ओ.आर.डब्लू.) हैं, ने मुझे बताया कुछ पिअर एजुकेटर्स ऐसे भी हैं जिन्हें उनके घर से निकाल दिया गया है या उन्होंने खुद घर छोड़ दिया है, ऐसे में उनके पास किसी अन्य सपोर्ट सिस्टम का विकल्प नहीं है। जब उनको पैसे नहीं मिलते हैं तो उन्हें “मजबूरन सेक्स वर्क में वापस जाना पड़ता है।” अमिताभ आगे बताते हैं कि सेक्स वर्क में एक ग्राहक से उन्हें 100 से 200 रूपए मिलते हैं। पैसों की जरुरत के कारण कभी-कभी उन्हें ऐसे ग्राहकों के साथ जाने पर भी मजबूर होना पड़ता है, जो कंडोम का इस्तेमाल नहीं करना चाहते।

अमिताभ फंड की कमी के प्रभाव को समझाते हुए बताते हैं कि, “ये सारी प्रक्रिया (डी.एस.ए.सी.एस. से तालमेल की समस्या से लेकर एड्स की समस्या तक) आपस में जुड़ी हुई हैं।” ये सेक्स वर्कर्स इस तरह के जोखिम इसलिए उठाते हैं क्यूंकि इन्हें भी अपने रोजाना के खर्चों के लिए पैसों की जरुरत होती है।

वो आगे बताते हैं कि जब डी.एस.ए.सी.एस. से फंड को लेकर कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती तो वो भी कार्यकर्ताओं और पिअर एजुकेटर्स को उनके मेहनताने को लेकर कोई ठोस जानकारी नहीं दे पाते हैं, जिससे संस्था और कार्यकर्ताओं के सबंधों पर भी प्रभाव पड़ता है। बाद में कुछ लोग यह काम छोड़ भी देते हैं। छाया बताती हैं कि पिछले 2 सालों में 20 में से करीब 16 से 17 पिअर एजुकेटर्स और 6 में से 3 या 4 कार्यकर्ता उनकी संस्था छोड़ चुके हैं।

एक अन्य संस्था *बी में प्रोग्राम मेनेजर के तौर पर काम करने वाली *बीना कहती हैं कि, इससे संस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। उनकी संस्था हर साल एक मीटिंग करती है जिसमे सुरक्षित सेक्स के तरीकों और एड्स से सम्बंधित अन्य जानकारियों पर बात की जाती है। इसका खर्चा डी.एस.ए.सी.एस. से मिलने वाले फंड से ही उठाया जाता है, लेकिन फंड मिलने में हुई देरी के कारण उनकी संस्था पिछले वर्ष यह मीटिंग नहीं करा पाई। इसके अलावा सामान्य मीटिंग्स करने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

डॉ. शर्मा बताते हैं कि, “डी.एस.ए.सी.एस. से फंड, संस्था के काम के आधार पर दिए जाते हैं, और फिर हमसे पूछा जाता है कि काम क्यूँ नहीं हुआ है?” एन.ए.सी.ओ. के निर्देशों के अनुसार अगर किसी संस्था का प्रदर्शन साल में 2 बार खराब रहता है तो, उसे मिलने वाले फंड पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सकती है। दिसंबर 2015 तक हरियाणा में करीब 62 एन.जी.ओ. हरियाणा एस.ए.सी.एस. से मिलने वाले फंड की कमी के चलते बंद किए जा चुके हैं। इसका कारण यही दिया गया कि उनका ‘प्रदर्शन’ अच्छा नहीं था।

क्या हैं देरी का कारण

एन.ए.सी.ओ. की सहयोगी संस्थाओं को मिलने वाले फंड में देरी की शुरुवात 2014 के आस-पास हुई, जब फंड देने की प्रक्रिया को बदल दिया गया। यह तय किया गया कि एन.ए.सी.पी. को दिए जाने वाले फंड पहले राज्य को दिए जाएंगे, जहाँ से राज्य की नियामक संस्था उन्हें वितरित करेगी।

आर.टी.आइ. एक्ट के अन्तर्गत 2015 में रोइटर रिपोर्टर के द्वारा दस्तावेजों को देखे जाने पर यह सामने आया कि कई राज्यों में राज्य की नियामक संस्थाओं द्वारा फंड रोके जा रहे हैं, और उनका इस्तेमाल अन्य योजनाओं में किया जा रहा है। इससे पहले 2013 में स्वस्थ्य मंत्रालय, 18 महीनों के लिए एड्स, टी.बी. और मलेरिया के लिए मिलने वाली 187 मिलियन डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय मदद को वापस हासिल करने में असफल रहा जिससे दवाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

एन.ए.सी.ओ. के डाइरेक्टर जनरल नवप्रीत कंग ने सेक्स वर्कर्स के साथ हुई एक मीटिंग में माना कि पिछले 2 सालों से “पैसों को लेकर समस्या हो रही है।” हालांकि उन्होंने कहा कि आने वाले 6 महीनों में यह समस्या सुलझा दी जाएगी, क्यूंकि फंड वितरण के पुराने मॉडल को ही फिर से इस्तेमाल किया जाएगा।

2012 में एन.ए.सी.पी. के चौथे चरण की शुरुवात के बाद से विदेशी सहायता में आई कमी के चलते सरकार के रुख पर भी उंगलियाँ उठाई जा रही हैं क्यूंकि एड्स और एच.आइ.वी. को लेकर सरकार का रवैय्या धीमा और रुढ़िवादी रहा है। दवाइयों की कमी, कंडोम की कमी, जमीनी संस्थाओं को कंडोम उपलब्ध कराने में देरी जैसी बातें रोज सामने आ रही हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में एन.ए.सी.पी. के फंड में भी 22% (1785 करोड़ से 1397 करोड़ ) की कमी की गयी थी, जिसे इस वर्ष वापस 1700 करोड़ कर दिया गया।

महाराष्ट्र एस.ए.सी.एस. के साथ काम कर रही संस्था संग्राम की जनरल सेक्रेटरी मीना सेशु ने मुझे बताया कि, गेट्स फाउंडेशन के जाने के बाद से ही एन.ए.सी.पी. ने कोई जवाब नहीं दिया है। महाराष्ट्र स्टेट एड्स कण्ट्रोल सोसाइटी (एम.एस.ए.सी.एस.) से मिलने वाली फंडिंग पिछले 2 सालों में काफी अनियमित रही है “उनके पास किसी भी चीज पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं होते।”

और भी हैं प्रभाव

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फंड वितरण में देरी, चाहे एन.ए.सी.ओ. से हो या एस.ए.सी.एस. से इसके परिणाम तो होते ही हैं। एड्स को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील वर्गों में कंडोम, ज़मीनी संस्थाओं द्वारा ही वितरित किए जाते हैं। मीना सेशु बताती हैं, जब एम.एस.ए.सी.एस. के पास स्टॉक में कंडोम होते हैं तब भी दिक्कत होती है। उनका काम सांगली और सतारा जिलों में सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, क्यूंकि यह काम अल्फबेटिकली किया जाता है, जिसका अर्थ कि इन जिलों में सबसे अंत में कंडोम पहुँचते हैं।

बीना जो बी संस्था में काम करती हैं, बताती हैं कि, जब अप्रैल और मई के महीनों में पूरे देश में कंडोम की कमी की बात हो रही थी, तो उनके पास बिलकुल भी कंडोम नहीं थे। तब उन्होंने मार्च महीने के स्टॉक में से करीब 1300 कंडोम वितरित किए थे।

छाया ने बताया कि संस्था के पास भी 2 से 3 महीनों तक बिलकुल कंडोम उपलब्ध नहीं थे, जब तक कि जून में उन्हें 15 से 16 हज़ार कंडोम नहीं मिल गए, जहाँ उनको एक महीने में 52000 कंडोम की जरुरत होती है। छाया ने बताया कि समुदाय के लोगों ने जून में उपलब्ध कराए गए कंडोम की क्वालिटी सही ना होने की भी शिकायतें की। जब महीने के अंत में मैंने उनसे मुलाकात की तो उनका जुलाई का स्टॉक भी ख़त्म हो चुका था।

इंडियन मेडिसिन डेवेलपमेंट ट्रस्ट के ऑफिस में मेरी मुलाकात शक्तिवाहिनी के मेंटेनेंस एंड एवेलुएशन ऑफिसर छोटू राम से  हुई। उन्होंने मुझे बताया कि क्यूंकि उनकी संस्था महिला सेक्स वर्कर्स की बहुतायत वाले इलाके में काम करती है इसलिए उन्हें कंडोम की कमी का सामना नहीं करना पड़ता। हालांकि शक्तिवाहिनी के अध्यक्ष रवि कान्त ने भी महीनों से फंड ना मिलने की बात कही।

इस समस्या से कैसे लड़ रही हैं संस्थाएं

स्क्रॉल.इन के साथ हुए एक हालिया इंटरव्यू में एन.ए.सी.ओ. के जॉइंट कमिश्नर ने कहा कि अगर दवाओं की कमी हो तो स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी किसी भी उपलब्ध फंड से दवाएं खरीद सकती हैं। अमिताभ ने बताया कि कार्यकर्ताओं का मेहनताना ना मिलने पर उन्हें भी एस.ए.सी.एस. से जुड़े एन.जी.ओ. से बात करने को कहा गया है।

डॉ. शर्मा बताते हैं कि उनकी संस्था लोन देकर सहायता करती भी है, जो डी.एस.ए.सी.एस. से मिलने वाले फंड में से वापस लिया जाता है। लेकिन ये लोन केवल ज़मीनी कार्यकर्ताओं की जरूरतों के लिए ही दिए जाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि वो जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ काम कर रहे एन.जी.ओ. के साथ मिल कर इस प्रक्रिया को स्थाई नहीं बना सकते।

अमिताभ ने मुझे बताया कि, “ज़मीनी प्रयास करने वाली एक संस्था का बजट 20 से 22 लाख रूपए का होता है।” अगर हमें ये फंड नहीं मिलता है तो किस एन.जी.ओ. के पास सालाना 18 से 20 लाख खर्च करने का सालाना कॉर्पोरेट फंड होता है। बीना की संस्था भी इसी तरह के लोन पर चल रही है, लेकिन ये काफी नहीं है, जिस कारण उन्हें जून में किराया ना दे पाने के कारण उनका दफ्तर खाली करना पड़ा।

हालांकि डॉ, शर्मा ने बताया कि उन्होंने सुना है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 के तीन महीनो का बकाया फंड जुलाई के अंत में दिया जाएगा, लेकिन अन्य लोगों को इससे कोई ख़ास उम्मीद नही है।

क्या हैं भविष्य की उम्मीदें

आल इंडिया नेटवर्क ऑफ़ सेक्स वर्कर्स से जुड़े अमित कहते हैं कि एन.ए.सी.पी.-IV के गलतियों को तभी सुधार जा सकता है, जब सेक्स वर्कर समुदाय के लोगों से बात की जाए और उनके सुझावों को एन.ए.सी.पी.-V में शामिल किया जाए। अमित कहते हैं कि वैसे तो उनकी संस्था के अध्यक्ष अभी चल रहे एन.ए.सी.पी.-IV की समीक्षा कर रही समिति का हिस्सा हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि समुदाय के लोगों को सही तरीके से इसमें शामिल नहीं किया गया है।

इसलिए जब मैंने छाया को बताया कि एन.ए.सी.ओ. के डायरेक्टर जनरल ने अगले 6 महीनों में फंड में होने वाली देरी के ख़त्म हो जाने की बात कही है, तो उन्हें इसमें कोई ख़ास उम्मीदें नज़र नहीं आई। इस पर अमिताभ का कहना है कि उनका जवाब ज्यादातर ऐसा ही होता है: “आ रहा है जी, आ रहा है जी, अब आ जाएगा।”

कुछ संस्थाओं और उनमे काम करने वाले लोगों के नाम उनके कहने पर बदल दिए गए हैं।

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