31 सालों से चल रहे नर्मदा बचाओ आन्दोलन पर क्यूँ ध्यान नहीं दे रही है सरकार?

Posted on August 9, 2016 in Hindi, Society

अविनाश कुमार चंचल:

पिछले हफ्ते दिल्ली सहित कई शहरों में बारिश होती रही। बारिश के बाद कहीं ट्रैफिक जाम और सड़कों पर पानी भर जाने की खबर आती रही तो कहीं लोग बारिश में भीगते हुए सेल्फी लेते रहे। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने बारिश की खूब तस्वीरें शेयर की। यह बारिश देश के कई हिस्सों में किसानों के लिये राहत की खबर भी बनी।

लेकिन नर्मदा घाटी में रह रहे लगभग 45 हजार परिवार और दो लाख लोगों के लिये यह बारिश कोई खुश होने की खबर नहीं है। बारिश नर्मदा घाटी के लोगों के लिये डर है, डूब जाने, सब कुछ खत्म हो जाने, विस्थापित होने का डर। जब-जब नर्मदा घाटी में बारिश तेज होती है, लोगों के चेहरे पर इसी डर की लकीर उभर आती हैं।

इसी डर से उबरने के लिये नर्मदा के लोग पिछले तीस सालों से लड़ रहे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन अपने 31वें वर्ष में प्रवेश कर गया है, लेकिन बेबसी, विस्थापन की समस्या ज्यादातर घरों में अभी भी ज्यों-का-त्यों मौजूद है। अभी भी इस डर के खिलाफ नर्मदा घाटी में आंदोलन जारी है। 30 जुलाई से आंदोलनकारी बड़वानी, मध्यप्रदेश में सत्याग्रह पर बैठे हैं। यह तीसरा साल है जब लोगों को सत्याग्रह शुरू करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व कर रही हैं। 30 जूलाई को देश भर से जनसंगठनों के लोग नर्मदा सत्याग्रह को समर्थन देने सैकड़ों की संख्या में बड़वानी पहुंचे। इस रैली को #RallyForTheValley  का नाम दिया गया।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन 1

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालते ही जिन फैसलों को सबसे पहले लिया था, उसी में था सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई को 17 मीटर बढ़ाने का। इस ऊँचाई को बढ़ाने से पहले ना तो लोगों के पुनर्वास और राहत के लिये कोई योजना बनायी गयी, और ना ही प्रभावित लोगों को भरोसे में लेने का प्रयास किया गया। नर्मदा में सरदार सरोवर बाँध का मतलब है लाखों लोगों का विस्थापन, सैकड़ों गाँवों और आबाद बस्तियों का उजड़ जाना, जंगलों का खत्म हो जाना, लोगों की रोजी-रोटी, व्यापार, दुकान, मंदिर एक पूरी सभ्यता-संस्कृति और उस जीवन का खत्म हो जाना, जो हजारों सालों में विकसित हुई है। क्या कथित मुख्यधारा वाला विकास का मॉडल आदिवासियों के दर्द पर ही लिखा जाना तय कर दिया गया है? सरदार सरोवर बांध से विस्थापित होने वाले लोगों में करीब 60 प्रतिशत लोग आदिवासी हैं।

आज नर्मदा बचाओ आंदोलन आजादी के बाद शुरू अहिंसक आंदोलनों में सबसे लंबा चलने वाला आंदोलन बन चुका है। इस आंदोलन का ही नतीजा है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बाँधों को बनाने वाली विकास की पूरी धारणा को चुनौती मिली है। दुनिया भर में विकास के इस मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं, जो खेतों, जंगलों, पेड़ों, गाँवों, लोगों, नदियों और जीवन को खत्म करके अपनाया जा रहा है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुताबिक मोदी सरकार ने सरदार सरोवर बांध का कार्य भी अब पूरा कर दिया है। गेट्स लगाकर बांध की उंचाई 138.68मीटर्स तक पहुंचाई गयी है, बस गेट्स लगाना बाकी है। करीबन 50000 परिवारों का पुनर्वास पूरा ना होते हुए; हजारों लोगों को जमीन, हजारों भूमीहीनों को वैकल्पिक आजीविका सभी सुविधाए सिंचाई एवं घर प्लॉट के साथ पुनर्वास स्थल प्राप्त हुए बिना, घर, खेत-खलिहान, 244 गाँव और एक धरमपुरी नगर डूबोना क्या न्याय है? क्या इसे विकास के नाम पर भी मंजूर किया जा सकता है?

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरदार सरोवर बाँध को बनाते समय कहा गया था कि किसानों की करीब 8 लाख हेक्टेयर खेत को पानी दिया जा सकेगा, लेकिन हकीकत में 2.5 लाख हेक्टेयर जमीन में पानी नहीं पहुंचाया जा सका। उल्टे किसानों के हिस्से का पानी उद्योगों को बेशर्मी से बांटा जा रहा है। कोकाकोला को 30 लाख लीटर, मोटरकार फैक्ट्रीज को 60 लाख लीटर पानी प्रतिदिन देने का अनुबंध किया गया है। इतना ही नहीं उद्योगों को 4 लाख हेक्टेयर जमीन भी दी जा रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार सबसे गंभीर बात यह भी है कि बांध की लागत मूल 4200 करोड रु. से 90000 करोड रु. तक बढाने की घोषणा अधिकृत रुप से हो चुकी है। लेकिन अब तक नहरें 30-40% तक ही बनायी गयी हैं, इसलिए बाँध में उपलब्ध पानी भी सिंचाई या कच्छ-सौराष्ट्र के लिए उपयोग में नहीं लाया जा रहा है। फिर भी बांध को बनाने की जल्दबाजी दिखायी जा रही है।

फिलहाल नर्मदा सत्याग्रह शुरु हुए हफ्ता बीत चुका है। हर रोज नर्मदा बचाओ आंदोलन की तरफ से ईमेल पर बड़वानी से बुलेटिन भेजा जा रहा है। पता चल रहा है प्रत्येक ब्लॉक से 4-4 गाँव के लोग हर रोज सत्याग्रह पर बैठ रहे हैं। इनमें महिलाएँ, बच्चे, नौजवान सभी शामिल हैं। बेहतर कल के गीत गाए जा रहे हैं, सत्याग्रहियों ने पर्यावरण बचाने के लिये पौधा रोपना भी शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ सरकार देश के सबसे बड़े अहिंसक आंदोलन को लगातार नजरअंदाज कर रही है। लेकिन लोग डटे हुए हैं, इस बार फैसला लिया है कि जब तक सरकार उनकी समस्याओं को नहीं सुनती, तब तक डूब जायेंगे लेकिन सत्याग्रह नहीं तोड़ेंगे। डर बस इतना है कि लगातार जल स्तर बढ़ रहा है, कहीं नर्मदा घाटी आने वाले दिनों में लाखों लोगों के लिये जलसमाधि ना बन जाए, जो एक लोकतांत्रिक देश के लिये शुभ संकेत नहीं होगा।

फोटो आभार: नर्मदा बचाओ आंदोलन फेसबुक पेज।

 

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