कश्मीर में भारत के लिए मौजूद नफरत के लिए कौन है जिम्मेदार?

Posted on August 1, 2016 in Hindi, Society

अविनाश कुमार चंचल

मेरे एक परिचित कश्मीर में हैं, अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में। इतनी ठंडी रातों में ठीक से सो भी नहीं पा रहे। घाटी में तनाव बढ़ने के बाद ठीक से खाने की सप्लाई भी नहीं है। कई बार नाश्ता मिलता है, तो दोपहर का भोजन नहीं, कई बार सिर्फ दिन में एक बार। फोन की सुविधा नहीं है। घर वालों से चार-पाँच दिन में एक बार बात हो पा रही है। सब लोग परेशान हैं। दूसरे लोगों की तरह उन्हें भी लगता है ये कश्मीरी बहुत बदमाश हैं।

ऐसे ही हजारों और सिपाही हैं, जिनका वेतन राष्ट्रवादी पत्रकारों-नेताओं के मुकाबले छँटाक भर भी नहीं है। जो सेना के जवानों के नाम पर टीवी पर अपनी भुजाएँ फड़फड़ाते रहते हैं। वन रैंक-वन पैंशन, सांतवा वेतन आयोग हर जगह सेना के जवानों को निराशा के सिवाय और क्या हासिल हुआ है? अगर गलती से शहीद हो गए तो परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है। गूगल कर लीजिए, सैकड़ों ऐसी रिपोर्ट मिल जाएंगी, जिसमें शहीद परिवार की बदहाली, सरकार के झूठे वादे, लाचारगी, बेबसी के किस्से बिखरे पड़े हैं।

खैर, नौकरी है तो मजबूरी है। हजारों लोग उसी बेबसी में सरहदों और कंफिल्क्ट जोन में फँसे हुए हैं।

दूसरी तरफ कश्मीर है। कश्मीर के लोग हैं, जिनके लिये भारत का मतलब आंतक है। भारत पैलेट गन है, जो उनके बच्चों, महिलाओं, युवकों, बेटों, पिताओं, दोस्तों, भाईयों को अँधा कर रही है। भारत गोली का दूसरा नाम है। एनकाउंटर है, गुम कर दिये गए लोगों की कब्रगाह है। दिन-रात एक डर में जीने की मजबूरी है। छोटे-छोटे बच्चों तक में भारत दहशत का दूसरा नाम है। भारत के खिलाफ गुस्सा इतना, कि जानते हुए भी कि मारे जायेंगे, अँधे कर दिये जायेंगे, जेल जाना पड़ेगा- कश्मीर में लोगों ने पत्थर उठा लिया है।

सेना के जवान गोली चला रहे हैं और स्थानीय लोग पत्थर, सैकड़ों लोगों के मारे जाने की खबर है। सेना के जवान भी घायल हो रहे हैं, पुलिस के लोग भी मारे जा रहे हैं। दोनों पक्ष अपनी हिंसा को रिएक्शन बता खुद को जस्टिफाई कर रहे हैं।

घाटी में गुस्सा है। इमरजेंसी जैसे हालात हैं। फोन जैसी बेसिक सुविधाएँ बंद कर दी गयीं। अखबारों और मीडिया पर भी रोक लगाई गयी। राष्ट्रीय मीडिया देशभक्ति से भरकर उन्माद फैलाने वाली रिपोर्टिंग करती जा रही है। मीडिया अपनी जवाबदेही तय नहीं कर रहा, प्राइमटाइम बहसों में दूसरे पत्रकारों को एंटी-नेशनल बताया जा रहा है, उन पर कार्रवाई की मांग की जा रही है। पूरे देश में एक बड़ा तबका है जो बड़ा ही कंफर्टजोन में बैठा है, वो इन प्राइम टाइम बहसों को सुन रहा है और कथित राष्ट्रवादी भावनाओं में बहकर घाटी में बमों की बरसात करने की वकालत कर रहा है। हिंसा-मारकाट के अलावा कोई दूसरे रास्तों पर बात नहीं कर रहा।

सोशल मीडिया पर लगातार कश्मीरी लोगों के खिलाफ जहर उगला जा रहा है। कुछ सवाल मेरे मन में भी हैं- कश्मीर भारत का हिस्सा है, तो कश्मीरी पाकिस्तानी कैसे हो गए?अगर कश्मीरी हमारे लोग हैं तो फिर उनसे संवाद स्थापित करने की जरुरत है या उन पर गोलियां बरसाना ज्यादा कारगर है? क्या देश के किसी भी हिस्से में धरना-प्रदर्शन करने वाले नागरिकों पर अँधा बना देने वाली पैलेट गन का इस्तेमाल जायज है?  या फिर ये सिर्फ कश्मीर है इसलिए किया जा रहा है। शांति बहाल करने की कोशिशों में हमारे गृहमंत्री घाटी का दौरा करते हैं। लेकिन इसके तुरंत बाद सेना का बयान आता है कि वे पैलेट गन का इस्तेमाल जारी रखेंगे। क्या दुनिया में शांति बहाली का कोई भी प्रयास हिंसा और युद्ध के साथ-साथ चल पाया है?

कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है। साठ साल से ज्यादा हो गए, इसका कोई ठोस हल हमने नहीं खोजा है। नतीजा हुआ है कि कश्मीरी मारे जा रहे हैं और इसमें सिर्फ मुसलमान नहीं है, वे कश्मीरी हिन्दू भी हैं, जिन्हें रातों-रात अपना घर छोड़ विस्थापितों की जिन्दगी जीने को मजबूर होना पड़ा। उनके पुनर्वास की कोई ठोस योजना अब तक नहीं बन पायी है। घाटी में रह रहे लोगों में भारत को लेकर संशय दूर नहीं हो पाया है। क्या किसी हिंसा के रास्ते इस संशय को दूर किया जा सकता है? शायद नहीं।

लेकिन हो क्या रहा है। पूरी घाटी हिंसा की चपेट में है। एक जंग छिड़ी हुई है। कुछ संगठन हैं, जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन किसी भी तरह की हिंसा को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? चाहे वो स्टेट की हो या फिर कथित आंतकी संगठनों की हिंसा हो, अंततः शिकार नौजवान हो रहे हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, कि लोगों के मन में बैठ गया है हिन्सा ही एकमात्र रास्ता। बच्चों तक का इस्तेमाल किया जा रहा है। कोई उनके हाथों में पत्थर थमा रहा है तो कोई उन्हें अँधा बना रहा है। जबकि यह वक्त था जब वे स्कूल में होते, हाथों में कलम होती, पेंट करने का ब्रश होता, कंप्यूटर का माउस होता। वे खुद को गढ़ रहे होते, कविताएँ लिख रहे होते, अपने गाँव की खूबसूरत वादियों में कंचा खेल रहे होते, पहले प्रेम में पड़ रहे होते। लेकिन वे कुछ नहीं कर रहे, सिर्फ डरे हुए हैं, नफऱत से भरे हुए हैं।

इस नफरत को पैदा करने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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