क्यों मुझे लगता है कि पत्नियों पर बने जोक्स पुरुषवादी मानसिकता का नतीजा है

Posted on August 28, 2016 in Hindi, Society

हंसना किसे बुरा लगता है? इस दौर में हंसने के साधन भी कई हैं। ट्रेन, मेट्रो, एयरपोर्ट और पता नही कहां-कहां जब समय नहीं कट रहा होता तो अपने फेसबुक या व्हाट्सएप्प ग्रुप्स पर जोक्स पढ़ लेता हूं। थोड़ा हंस लेता हूं, तो थोड़ा सोच भी लेता हूं।

ऐसे ही लतीफे पढ़ते-पढ़ते एक चीज़ कचोटने लगती है। वह है एक खास तरह के चुटकुले, वह चुटकुले जो एक खास रिश्ते के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। पत्नियों पर बनने वाले जोक्स।  

मैं करीब सात आठ व्हाट्सएप्प समूहों का सदस्य हूं। इन समूहों में अलग-अलग आयु वर्ग और अलग-अलग प्रोफेशन से जुड़े लोग हैं। इनमें जितने भी लतीफे, जुमले या चुटकुले साझा किये जाते हैं, उन सभी में पत्नियों या शादी पर बनने वाले जोक्स सबसे ज्यादा कॉमन हैं।

वह ज़्यादा बोलती हैं…वह हमेशा पति से काम करवाती हैं….वह बुद्धू हैं…उन्हें विवाद करने की आदत है…वह मेकअप का ज़्यादा ख्याल रखती हैं…वह बाहर जाने के लिए तैयार होने में समय लगाती हैं। पत्नियों पर बने यह सेक्सिस्ट जोक्स उनके बारे में यही राय बनवाते हैं या कम से कम बनवाने की कोशिश करते हैं।

यह उन ही स्टीरियोटाइप्स का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें हम जाने अनजाने अपने मन में पलने देते आये हैं।

वह पति को बोलने तक नहीं देतीं… उनसे बेहतर टीवी है …मोबाइल भी उनसे कम बोलता है…शादी के बाद पति की हालत खराब हो जाती है …मेरी मति मारी गयी थी जो तुमसे शादी की… पत्नी मायके चली गयी है तो शान्ति है … पत्नी मर क्यों नहीं जाती … वगैरह-वगैरह। ऐसी ही कितनी पक्तियां उनमें कॉमन होती हैं। कॉमन जोक्स की कॉमन सेक्सिस्ट लाइन्स।

कल ही एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में मेरे एक दोस्त का मैसेज था- दीप्ती, सिन्धु और साक्षी को समर्पित। लड़कियों से जुड़े स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने की बात करता हुआ। कुछ घंटे बाद उसने ही उस ग्रुप में एक जोक साझा किया जो बोलता था कि शादी के बाद घर में रेडियो की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि पत्नी ही घर का रेडियों है जो लगातार बोलती रहती है।   

जो लोग लतीफे तैयार करते हैं, वह बताते हैं कि ह्यूमर में किसी खास प्रवृत्ति का ही मज़ाक उड़ाया जाता है। पत्नियों की ज़्यादा बात करने की आदत पर जोक्स बनाने की परंपरा पहले से चली आ रही है, और जोक्स की दुनिया में मान्य भी हो गयी है इसलिए अब उसे चुनौती देना आसान नहीं है।

एक दोस्त बताता है कि कमज़ोर पक्ष पर ही हंसा जा सकता है और अगर सभी चीज़ें  नैतिकता के नज़रिये से देखने लग जाएं, तो हंसना ही बंद करना पड़ेगा। पर मेरा मानना है कि ह्यूमर का भी एक संस्कार होना चाहिए।

वहीं एक पक्ष पर हंसने की घिसी-पिटी परंपरा को तोड़ने का दौर है। मैं यह बोलने में नहीं हिचकिचाऊंगा कि जो भी यह पत्नी सेंट्रिक जोक्स रच रहा है उसके ह्यूमर में उसके अन्दर का पुरुष बोल रहा होता है।  

यह उस सोच वाले समाज का नुमाइंदा है जो यह मानता, बोलता और समझता आया है कि महिलायें ज़्यादा बोलती हैं, उनके जाने से घर में आज़ादी और शान्ति रहती है, वह अमेजन को अम्मा जान बुलाती हैं और दुनिया का हर पति अपनी पत्नी को छोड़ना चाहता है।     

संता-बंता का मामला पहले से ही कानून के दरवाज़ों तक पहुंच गया है। ऐसे में इस तरह के सेक्सिस्ट चुटकुलों पर भी बात की जाने की आवश्यकता है।  

वरना मुझे उस दिन का इन्तज़ार करना पड़ेगा जब पत्नियों द्वारा पतियों की कुछ खास आदतों पर भी जोक बनने लगेंगे। शायद पत्नियां ऐसे ही अपने खिलाफ सेक्सिस्ट जोक्स का बदला ले सकेंगी।  

 

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