फिल्मों में रोमांस के नाम पर महिलाओं का पीछा करना दिखाना बंद होना चाहिए

Posted on August 3, 2016 in Culture-Vulture, Hindi

 

लगभग एक महीने से ऊपर हो गया है, जब चेन्नई में 24 साल की स्वाती की निर्दयता से हत्या कर दी गयी। इनफ़ोसिस की कर्मचारी स्वाति के हत्यारे के बारे में कहा जा रहा है कि स्वाती की सरेआम हत्या करने से पूर्व वह उसका महीनों से पीछा कर रहा था। आमतौर पर उदासीन रहने वाले तमिलनाडू के मध्यम वर्ग में भी इस बेरहम हत्याकाण्ड को लेकर काफी गुस्सा दिखा। इस घटनाक्रम के बाद महिलाओं में डर साफ़ देखने को मिलता है, साथ ही साथ इससे चेन्नई के एक सुरक्षित शहर की छवि भी टूटती हुई दिखती है।

जल्द ही घरों में और टी.वी. चैनलों पर यह बहस शुरू हो गयी कि किस तरह तमिल फिल्में महिलाओं खिलाफ बढती हिंसा की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। इसके तुरंत बाद ही इस तरह के कई लेख भी सामने आने लगे, जो सिनेमा को दोषमुक्त बताकर इस हिंसा की जड़ माने जाने का कड़ा विरोध कर रहे थे। फिल्मों के बचाव में कही जा रही बातें काफी हद तक काल्पनिक लगती हैं, क्यूंकि ये सब बातें कुछ और ही कहने का प्रयास है: कि पारंपरिक तमिल सिनेमा में दिखाई जाने वाली महिला विरोधी बातें केवल सिनेमा तक ही सीमित हैं।

सिनेमा उस समाज और संस्कृति से ही जन्म लेता है, जिससे फिल्म बनाने वाले और देखने वाले दोनों ही आते हैं। इनके बिना सिनेमा का अस्तित्व संभव नहीं है। सिनेमा समाज से ही प्रेरणा लेता है और इसके समाज और संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव को भी नकारा नहीं जा सकता। खासकर तमिलनाडु राज्य में सिनेमा को लेकर काफी जूनून रहा है। अगर इतिहास पर एक नजर डालें तो साफ़ हो जाता है, कि पिछले 50 वर्षों में राज्य के विभिन्न मुख्यमंत्री, किसी न किसी तरह सिनेमा से जुड़े रहने का बाद ही सत्ता तक पहुंचे हैं। यह साफ़ है कि तमिल सिनेमा ने राज्य में द्रविड़ियन राजनीति के विस्तार और तर्कपूर्ण विचारधारा को लेकर लोगों के विचारों को ढालने में ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महिलाओं को लेकर तमिल सिनेमा का रुख काफी निराशाजनक रहा है। एम.जी.आर. के समय से लेकर रजनीकांत के दौर तक जहाँ वो फिल्म में महिलाओं को उनकी जगह ना भूलने (तमिल में “पोम्बलाई पोम्बलैया इरुक्कानुम”) की महान सलाह देते नजर आते हैं। पुरुषों का घूरना और महिला विरोधी बातें तमिल सिनेमा का आम चलन रहा है। महिलाओं के शरीर को एक इस्तेमाल की जाने वाली चीज को दिखाना और इस हद तक दिखाया जाना, जब फिल्म डायरेक्टर सोच रहे होते हैं कि महिलाओं की नाभि के साथ क्या-क्या ‘क्रिएटिव’ चीजें (लट्टू घुमाने से लेकर आमलेट बनाना और ना जाने क्या-क्या) की जा सकती हैं।

आज भी महिलाओं के किरदार फिल्मों में बेहद कमजोर लिखे जाते हैं। ज्यादातर उन्हें या तो फिल्म के ‘असली मर्द’ हीरो की बाहों में एक सजावट की चीज की तरह या एक बिगड़े हुए बेटे की माँ के तौर पर दिखाया जाता है। महिला फिल्मकारों की संख्या बेहद कम है और अगर उनकी फिल्मे कभी आती भी हैं, तो उस बॉक्स ऑफिस पर उन्हें कोई ज्यादा पूछता नहीं है, जहाँ अधिकांश दर्शकों की संख्या 15 से 25 साल के पुरुषों की होती है। इस ख़ास दर्शकों के वर्ग से कुछ ख़ास तरह के निराशाजनक बातों का प्रसार हो रहा है। जिनमें हीरो का हमेशा सबसे ताकतवर होना और उसके लगातार हिरोइन के पीछे घूमते रहने को लड़की का दिल जीतने के पक्के तरीके की तरह दिखाया जाना है।

फिल्मों को इस बात का तो श्रेय दिया ही जा सकता है कि, हमारी फिल्में नशीली दवाओं के सेवन, और बलात्कार जैसी चीजों को बेहद सावधानी से गलत बताती आयी हैं, और दिखाती हैं कि केवल बुरे लोग ही ये सब करते हैं। लेकिन अन्य अपराध जैसे हत्या या लूटपाट आदि के लिए ऐसा नजरिया नहीं अपनाया जाता है, जिसके किसी पर बुरे प्रभाव हो सकते हैं (जहाँ फिल्म का हीरो भी ये सब अपराध करता नजर आ जाता है)।

यह सीमित नैतिकता (मोरालिटी), महिलाओं का पीछा करने की सोच का ही एक हिस्सा है जो इसे और भी खतरनाक बना देता है। निश्चित रूप से बलात्कार और क़त्ल ऐसी चीजें हैं जो केवल फिल्म का विलेन ही करता है और उसे इन अपराधों की सजा भी मिलती है। लेकिन महिला की इच्छा के खिलाफ उसका पीछा करना ताकि उसके विरोध को ख़त्म किया जा सके में कोई बुराई नहीं है? आखिर वो महिला जो शुरू में ‘ना’ कहती है, हीरो के लगातार पीछा करने पर उसे ‘हाँ’ बोल ही देती है- और पक्के तौर पर असल जिंदगी में भी तो ऐसे ही होता होगा। कम उम्र के युवा जिनकी विपरीत सेक्स के अन्य युवाओं साथ ज्यादा बातें नहीं होती, को लगता है कि महिलाओं को भी यही पसंद होता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भारत के कानून के अनुसार केवल स्टाकिंग (पीछा करना) भी, (चाहे इससे पीड़ित को कोई शारीरिक नुकसान ना पहुंचा हो) एक जुर्म है। यह कानून भी 2013 के बाद ही अस्तित्व में आ सका जब निर्भया काण्ड के बाद लोगों का गुस्सा, महिलाओं के खिलाफ होने वाले जुर्मों को लेकर चरम पर पहुँच गया था।

उन कॉमेडी फिल्मों, जिनमें एक लोफर हीरो को एक महिला की इच्छा के खिलाफ उसके पीछे घूमते हुए और उसका दिल जीतते हुए दिखाया जाता है के अलावा ऐसी एक्शन फिल्मों की भी भरमार है, जिनका हीरो भी यही सब हरकते करता दिखता है। एक और उसे इन्साफ और मानवता के सच्चे दूत के रूप में दिखाया जाता है। वहीं उसका महिला विरोधी नजरिया और उसकी ऐसी कल्पनाओं जिनमे वो यही  सोचता रहता है कि एक महिला उसके प्रेम में कैसे पड़ेगी, को भी बेहिचक दिखाया जाता है। जहाँ एक दर्शक वर्ग इस दोगली सोच से सहमत नहीं होता, वहीं युवा दर्शकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो फिल्म के हीरो से ‘दुनिया को बचाने’ के साथ-साथ ‘लड़की को रिझाने’ का सन्देश भी साथ लेकर जाता है। यह ध्यान में रखना बेहद जरुरी है कि इस तरह की फ़िल्में ज्यादातर ‘यू’ सर्टिफिकेट वाली फिल्मे होती हैं, और यह फ़िल्में बच्चों और नाबालिग युवाओं द्वारा भी देखी जाती हैं, जिनके मन पर इनका प्रभाव पड़ने की प्रबल संभावनाएं होती हैं।

इस सोच की समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं और शायद इसके नुकसान की भरपाई में सालों लग जाएंगे। लेकिन निश्चित तौर पर यह ऐसा समय है जब फिल्मकारों को एक आत्मविश्लेषण करने की जरुरत है ताकि यह तय किया जा सके कि, कैसे समाज और संस्कृति की छवि वो सिनेमा के द्वारा दर्शकों के सामने रखना चाहते हैं। अगर आपको भी मेरी तरह यह विश्वास है कि फिल्मकारों और फ़िल्मी सितारों पर एक सामाजिक दबाव बनाकर, महिलाओं का पीछा करने को रोमांस की तरह दिखाए जाने की गलत सोच को बदला जा सकता है, तो मेरी याचिका (पेटीशन) पर जरुर दस्तखत करें।

यह जानकर काफी ख़ुशी हुई कि तमिल फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से भी इस पेटीशन को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। कुछ समय पहले तमिल फिल्म स्टार सिद्धार्थ के ट्वीट और फिल्ममेकर लक्ष्मी रामकृष्णन ने भी इस पेटीशन का जोरदार समर्थन किया। उम्मीद है कि हम फिल्मकारों पर एक जिम्मेदार और संवेदनशील सिनेमा बनाने को लेकर सामाजिक दबाव को कायम रख पाएंगे और महिलाओं का पीछा करने को रोमांस की तरह दिखाया जाने को फिल्मों से पूरी तरह से हटाया जा सकेगा।

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