कास्ट पॉलिटिक्स में उलझे उत्तर प्रदेश के सियासी सूरमा

Posted on September 27, 2016 in Hindi, Politics

के.पी. सिंह:

उत्तर प्रदेश में विधान सभा के नए चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग और सारी राजनीतिक पार्टियां पूरे फार्म पर आ गई हैं। भारतीय लोकतंत्र दुनियां के दूसरे विकसित लोकतंत्र वाले देशों की हालत से अलग है। यहां चाहे देश का चुनाव हो या प्रदेश का चुनाव सार्वभौम मुद्दों पर ज़ोर देने के बजाय राजनैतिक पार्टियां अलग-अलग जाति, धार्मिक समूहों के तुष्टीकरण की चर्चा अपनी कामयाबी के लिए करती हैं। मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू होने और बाबा साहब अम्बेडकर को मरणोपरान्त भारत रत्न से नवाज़ कर राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में लाए जाने के बाद सवर्णशाही पर प्रहार राजनीतिक एजेण्डे का केन्द्र बिन्दु बन गया था। लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में राजनैतिक खेमा कोई भी हो, पर हर खेमा बेहतर तरीके से ब्राह्मण कार्ड खेलनेे की तैयारी में जुटा है।

शुरुआत कांग्रेस से हुई जब प्रशांत किशोर गोस्वामी की सलाह को शिरोधार्य करते हुए कांग्रेस ने राज्य में मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने के लिए ब्राह्मण चेहरे की तलाश की कवायद शुरू की। यह तलाश शीला दीक्षित पर जाकर रुकी जिनमें प्रदेश के एक शक्तिशाली ब्राह्मण परिवार की बहू होने के अलावा कई और खूबियां भी देखी गई। यह सुशासन और विकास के नारे का युग है। यह दूसरी बात है कि उत्तर प्रदेश को यूं ही उल्टा प्रदेश नहीं कहा जाता। यहां सुशासन और विकास के दावे को प्रमाणिक बनाते हुए आगामी चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अपने पिताश्री जनाब नेताजी की डपट झेलनी पड़ गई, इसके बाद भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए गए गायत्री प्रसाद प्रजापति को फिर ससम्मान मंत्रिमण्डल में समायोजित करके अखिलेश ने सुशासन महोदय को कहीं तेल लेने भेज दिया है।

खैर दिल्ली में मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी होने के बावजूद शीला दीक्षित ने कुल जमा जो इमेज बनाई है, उससे उन्हें सुशासन कौशल के धनी नेता का खिताब हासिल है। जब शीला दीक्षित को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में प्रोजेक्ट करने का फैसला लिया था, उस समय सुशासन बाबू नीतीश कुमार को रोल मॉडल के रूप में पहचाना जा रहा था। ऐसे पर्यावरण में कांग्रेस की निगाह शीला दीक्षित पर ही जा टिकना स्वाभाविक भी था। शीला दीक्षित की घोषणा के समय सपा की अमर कथा बांची नहीं गई थी, जिसने उत्तर प्रदेश में प्रासंगिकता के मानक काफ़ी हद तक बदल दिए हैं। इसलिए अगर अमर कथा का पाठ पहले हो जाता तो शायद कांग्रेस का दिमाग भी बदल जाता।

शीला दीक्षित की ताजपोशी के बाद सोनियां गांधी के वाराणसी रोड शो में कहा जाता है कि घर बैठ चुके पार्टी के तमाम ब्राह्मण नेताओं और कार्यकर्ताओं को फिर से उत्साह पूर्वक सक्रिय होते देखा गया था। इससे कांग्रेस को लगा कि वह सही दिशा में जा रही है। लेकिन, शीला दीक्षित के अपनी यात्राओं में बार-बार बीच में ही बीमार पड़ने से लोगों को उनकी उम्र के पहलू पर गौर करना पड़ गया। जिससे कांग्रेस को ऐसा झटका लगा कि खुद पार्टी के युवराज राहुल गांधी को हालात संभालने के लिए गली-गली घूमने की ज़रूरत पड़ गई।

बहरहाल, कांग्रेस को ब्राह्मण चेहरा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव की वजह से कुछ सन्दर्भों में भले ही सूट न कर रहा हो, लेकिन दूसरी पार्टियों में ब्राह्मण फार्मूले को देखादेखी इस्तेमाल करने की होड़ ज़रूर इस वजह से पैदा हो गई। बहुजन समाज पार्टी ने सतीश मिश्रा और रामवीर उपाध्याय को स्टार प्रचारक के रूप में ब्राह्मणों को लुभाने के लिए अपने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बनाकर दौड़ा दिया। एक दिन पहले गोरखपुर पहुॅंचे सतीश मिश्रा ने समाजवादी पार्टी को, दो ब्राह्मण नेताओं मनोज पाण्डेय और शिवाकांत ओझा को अखिलेश मंत्रिमण्डल से निकालने पर उलाहना दी।

समाजवादी पार्टी वैसे तो बहुजन समाज पार्टी की कोई बात नहीं मानती है, लेकिन इस मामले में उसने अगले ही दिन सतीश मिश्रा की शिकायत दूर करने का इन्तजाम मनोज पाण्डेय और शिवाकांत ओझा को मंत्रिमण्डल में वापस लेकर किया। यही नहीं उसने अखिलेश मंत्रिमण्डल में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को और बढ़ाने के लिए अभिषेक मिश्रा को कैबिनेट का दर्जा दिला दिया। मज़ेदार बात यह है कि ब्राह्मणों के लिए यह शुभ कार्य समाजवादी पार्टी में पितृ पक्ष के कड़वे दिनों में किया गया है। अब बारी भारतीय जनता पार्टी की है जिसने पहले ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष को हटाकर उनकी जगह पिछड़े वर्ग के केशव प्रसाद मौर्य की ताजपोशी के जरिए उल्टा संदेश देने की कोशिश की थी। लेकिन अब प्रतिद्वंदी पार्टियों की पैतरेबाज़ी से उसका अपना दिमाग उल्टा हो जाने की नौबत आ गई है।

वंचितों को व्यवस्था में उचित भागीदारी के पीछे एक सिद्धान्त था इसलिए राजीव गांधी ने मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के काफी पहले पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों में दलितों पिछड़ों व महिलाओं को रिज़र्वेशन दिलाने का कदम उठाया था। उनकी इस कार्यवाही को ऐतिहासिक फैसले की मान्यता दी गई है। जिसने सामाजिक न्याय को जड़ों तक पहुंचाया। इस तरह की कार्यवाहियों के एक अंजाम तक पहुंचने के बाद उम्मीद यह की जा रही थी कि राजनैतिक पार्टियां अब नागरिक पहचान को लोगों में मज़बूती देने का कार्य करेंगी। जिसके तहत सार्वजनिक मुद्दों पर जनमत को संगठित करने की परम्परा शुरू होगी, लेकिन ब्राह्मण कार्ड और ठाकुर कार्ड खेलने के बेतुके प्रयोगों को नई ज़िन्दगी देकर ये पार्टियां इस बात को साबित कर रहीं हैं कि सार्थक बदलाव का उपकरण बनने की कोई अर्हता उनमें नहीं है।

हालांकि इस मामले में भाजपा को इस बात के लिए सराहना होगा कि मोदी मंत्रिमण्डल में लगभग सभी महत्वपूर्ण पद ब्राह्मण चेहरों के पास हैं। लेकिन इसका इस्तेमाल पार्टी ने ब्राह्मण कार्ड खेलने के हुनर के रूप में नहीं होने दिया। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के ज़्यादातर ब्राह्मण चेहरे अपनी योग्यता की वजह से अपने पदों पर हैं और ऐसा होना भी चाहिए। योग्यता को वरीयता की नीति अपनाकर कोई पार्टी एक जाति के लोगों को ही सारे पद देकर भी आक्षेपों की शिकार नहीं हो सकती। यह भाजपा ने कर दिखाया है तो दूसरी पार्टियां भी ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं। इस विमर्श में यह पहलू सबसे महत्वपूर्ण है।

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