क्या विकास बस उच्च वर्ग के लिए है और दलितों-पिछड़ों का विकास देश के विकास में घातक है?

Posted on September 19, 2016 in Hindi, Society

शुभम कमल:

मैं दलित हूं, पर मैं किस लिए दलित हूं मुझे नहीं पता? मुझे भगवान ने तो ये दर्ज़ा नहीं दिया होगा, फिर इंसान ने मुझे दलित क्यों बनाया? मैं नहीं जानता, मैं हिन्दू हूं और हिन्दू धर्म में मुझे सबसे निचला दर्जा मिला है। मुझे छुआ-छूत का सामना क्यों करना पड़ता है? क्या मैं एक आम इंसान नहीं हूं? आखिर मैं हज़ारों वर्षो से एक शोषित का जीवन जीने के लिए क्यूँ मजबूर हूं?

समाज में जिस बराबरी को लेकर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने जीवन भर लड़ाई लड़ी, वो बराबरी मुझे आज तक मिली क्यूँ नहीं? जिस संविधान ने हमारे समाज को बराबरी का एहसास कराने के लिए सीमित आरक्षण की व्यवस्था की, वह व्यवस्था आज देश की प्रगति के लिए खतरा कैसा बन गयी? हज़ारो सालों से बिना आरक्षण के उच्च पदों पर राज करने वाले व्यक्ति आज राष्ट्रहित में आरक्षण को खतरा क्यूँ मान रहे हैं जबकि आरक्षण को लागू हुए कुछ ही दशक हुए हैं? क्या विकास केवल उच्च वर्ग का हो जिसके पास पहले से ही अच्छी शिक्षा और पर्याप्त संसाधन है और क्या अशिक्षित दलितों  का विकास, देश के विकास में घातक है?

हम बाबा साहब को अपना भगवान मानते हैं क्यूंकि उन्होंने केवल दलितों के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक शोषित, पीड़ित, और पिछड़े वर्ग के लिए बहुत कुछ किया है। आज सालों बीत गए और बाबा साहब के जन्मदिवस पर सारी राजनीतिक पार्टियों में उनकी प्रतिमा के साथ फोटो खिचवाने की होड़ मच जाती है। आज दशकों बाद भी ना तो हमारी तस्वीर बदली ना तकदीर, कुछ बदला है तो वो है सरकारें। हमारी याद किसी पार्टी को तब क्यूँ नहीं आती जब दलितों पर आत्याचार की कोई घटना सामने आती है या तब ही क्यूँ आती है जब चुनाव आते हैं?

देश की 16.6% आबादी दलित है, हमारी आय बहुत कम है, हम ज़्यादातर मजदूरी, कृषि और छोटे व्यापार पर निर्भर हैं। यहां तक कि केवल 4% दलित सरकारी नौकरियों में है। एक दलित छात्र रोहित वेमुला को आत्महत्या इसलिए करनी पड़ती है क्यूंकि वह दलित है, केरल में एक युवा दलित लड़की जीसा के साथ इसीलिए बलात्कार होता है क्यूंकि वह भेदभाव से लड़ना चाहती थी। गुजरात में 7 दलितों को सरेआम नग्नावस्था में इसीलिए पीटा जाता है क्यूंकि वह रोज़गार के लिए मरी हुए गाय की खाल उतारने का काम करते हैं। इस तरह की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं, पर क्यूँ?

कई मंदिरों में हमारा प्रवेश वर्जित क्यूँ है, क्या मंदिर किसी की निजी सम्पति हो सकते हैं? हमारी साक्षरता दर 2001 में 34.76% थी जो 2011 में बढकर 66.10% हो गई। क्या हमारी 10 वर्षो में बढ़ी 90% साक्षरता दर के कारण उच्च वर्गों का आक्रोश हम पर ज्यादा है? क्या हमने किसी के अधिकारों का हनन किया है?

पिछले कुछ दशको को देखें तो दलितों के खिलाफ हिंसा की तक़रीबन सभी घटनाएँ बताती हैं कि यह तब घटी जब दलितों ने गैर-दलितों के साथ किसी तरह की बराबरी को दर्शाया है पर क्यूँ? यहाँ तक कि एक दलित किसी सवर्ण से प्रेम करने का सपना तक नहीं देख सकता। सवर्णों की प्रतिष्ठा को हलकी सी भी चोट महसूस होने पर बदला लेने का सबसे प्रचलित तरीका दलित महिला का बलात्कार क्यूँ बन जाता है? क्या ऊंची जातियों में दलितों के प्रति एक व्यवस्थागत नफरत भरी रहती है और मौका पाते ही वह फटकर बाहर आ जाती है?

हज़ारो सालों से पूजा स्थलों पर ऊंची जाति के पुरोहितों का कब्ज़ा रहा है और लिखने-पढने और जमीन-जायदाद के तमाम अधिकार ऊंची जाति के लोगों को ही हासिल रहे हैं। निचली जातियां बिना किसी अधिकार के सिर्फ निचले दर्जे के काम करती रही हैं और जब कोई इस सवाल को उठाता है तो उसे भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है ऐसा क्यूँ? दलित उत्पीड़न रोकने के लिए इस देश में कड़े कानूनों का प्रावधान है और कानून का पालन कराना राज्य और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है। कड़े कानूनों को समाज में लागू ना कर पाना, कहीं प्रशासन में मौजूद ऊंची जातियों के लोगों की भेदभाव की प्रवृत्ति को तो नहीं दर्शाता?

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