हर बेघर आर्टिस्ट्स को ठिकाना दे रही हैं नीमिशा

Posted on September 8, 2016 in Hindi, Interviews, Staff Picks

‘एक बंगला बने न्यारा’ फिल्म प्रेसिडेंट के गाने के ये बोल शायद एक इंसान के बुनियादी ज़रूरत का निचोड़ है और शायद अपने पसंद का आशियाना बनाना हर इंसान के सपनों से जुड़ा होता है। लेकिन सोचिए कि क्या कोई इंसान ये सपना भी देख सकता है क्या कि एक ऐसा घर बनाया जाए जो हर ज़रूरतमंद को छत दे सके। मिलिए ऐसी ही अद्भूत सोच रखने वाली जयपुर की नीमिशा वर्मा से, जो बना रही हैं ‘होम फॉर आर्टिस्ट’।

जिंदगी अपनी शर्तों पर जीनी थी, करियर अपने पसंद का चुनना था विज़ुअल आर्ट पढ़ना था, लिखना था और मॉडलिंग करनी थी और शायद इतनी वजह काफी थी अपने पेरेंट्स को नाराज़ करने के लिए। हुआ भी वही, और नीमिशा के सामने एक ही रास्ता था अपने पसंद का करियर चुनने के लिए, मॉं-बाप का घर छोड़ अपनी पहचान बनाना। नीमिशा ने महज़ 19 साल की उम्र में अपने भाई सुधांशु के साथ ख्वाबों को हकीक़त में बदलने के लिए घर छोड़ दिया और यहीं रखी गई ‘होम फॉर आर्टिस्ट’ की पहली ईंट।

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फोटो साभार- नीमिशा वर्मा

Youth Ki Awaaz ने नीमिशा से होम फॉर आर्टिस्ट के पीछे की सराहनीय सोच और उसे हकीकत में बदलने की कहानी पर बात की।

प्रशांत झाहोम फॉर आर्टिस्ट का आईडिया कैसे आया? क्या ये बहुत हद तक आपके अनुभव का ही हिस्सा रहा है?

नीमिशा वर्मा – जब मैंने सुधांशु के साथ पिछले साल अपना घर छोड़ा तो सबकुछ इतना आसान नहीं था। सबसे बड़ी समस्या थी कि हम जाएं कहां? चार दिनों तक हमारे सर पर छत नहीं था, हम दोनों एक घर की तलाश में बहुत भटके। हमसे हर तरह के सवाल पूछे गए, जैसे कि घर छोड़ के इसी शहर में रहने का क्या मतलब है? क्या तुम दोनों वाकई भाई-बहन हो? तुम फोटो क्लीक करके किराए का पैसा कैसे दोगे? और उसके बाद कहीं भी सेक्योरिटी डिपोज़िट इतना ज्यादा था कि हमदोनों के लिए दे पाना मुमकिन नहीं था। फिर किसी तरह लोगों की मदद से हम एक रूम ले पाए। मैं वो चार दिन अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकती। मैंने तभी तय कर लिया था कि एक ऐसी जगह बनाउंगी जिसे मेरे जैसी परिस्थितियों से गुज़रा हर आर्टिस्ट अपना घर कह सके। ताकि अगली बार जब भी कोई आर्टिस्ट अपने सपनों को  पूरा करने अपने घर से बाहर निकले तो उसका ध्यान अपने आर्ट पर हो बजाए इसके कि आज रात कहां गुज़रेगी।

प्रशांतइसके बाद आपने सबकुछ प्लान कैसे किया? इतने अलग आइडिया को आगे बढ़ाना आसान तो नहीं रहा होगा।

निमिशा– मैं ये आईडिया लेकर बहुत जगहों पर गयी, अलग-अलग शहर गयी, वहां बहुत सारे आर्टिस्ट्स के साथ मिलकर उनको इसके बारे में बताया। होम फॉर आर्टिस्ट धीरे-धीरे एक सपने से ज्यादा जुनून में बदल गया। जब आप किसी चीज़ को लेकर डेडिकेटेड होते हैं तो बहुत हिम्मत करके, बहुत सारी मुश्किलें सह कर उसको हासिल करने के लिए पूरी भावनाओं के साथ जुड़ जाते हैं। इसलिए अगर अब मुझसे कोई पूछे कि मैं क्या करती हूं तो मेरे पास इसका जवाब दे पाऊंगी।

प्रशांतनीमिशा क्या करती हैं आप?

नीमिशा– मैं अपनी और दूसरे इंसानों की मदद करती हूं अगर आप पूछें की क्यूं तो जवाब है कि किसी को तो करनी पड़ेगी ना इसलिए मैं करती हूं।

प्रशांतआज चीज़ें बात करने में जितनी आसान लग रही है, शुरुआती दौर उतना ही मुश्किल रहा होगा ?

नीमिशा– जब सबकुछ आसानी से मिल रहा होता है तो हमें चीज़ों की अहमीयत नहीं पता लगती, इस दौरान जो सबसे बड़ी बात हुई वो ये कि मुझे हर वो चीज़ जिसकी ज़रूरत हर दिन होती है उसकी कद्र समझ में आयी। जैसे खाना, आस-पास के लोग, कपड़े और भी बहुत कुछ।

मेरे लिए सबसे बड़ा चैलेंज था अपने परिवार वालों को समझाना, वो मेरे कुछ भी नया और अलग करने के खिलाफ थे। वजह भी बहुत साफ थी, वो भी और पैरेन्टस की तरह मेरी नाकामयाबी से डरते थे।

मैं अकेले रहने का, अकेले खाने का और कभी-कभी बिल्कुल नहीं खाने का दर्द जानती हूं। मुझे ये बात बहुत चुभती है कि कैसे अक्सर हम आर्टिस्टस को गलत समझते हैं। हमारे यहां आज भी किसी खास आर्ट की पढ़ाई करने वाले बच्चों को बहुत इनकरेज नहीं किया जाता है। मैं भी उन्हीं में से एक थी। इसके बाद ही मैंने ठान लिया था कि खुद ही अपने लिए कुछ करूंगी। हालांकि अभी भी हर वक्त सबकुछ ठीक नहीं रहता, कई बार खाने की कमी हो जाती है, या एक जगह पर ज़्यादा दिन रूकना नहीं हो पाता, लेकिन इस बात की खुशी रहती है कि हमसब वो कर रहे होते हैं, जो हम करना चाहते हैं और जो हमे खुशी देती है।

फोटो साभार- नीमिशा वर्मा
फोटो साभार- नीमिशा वर्मा

प्रशांतअब जब चीज़ें सुलझ रही हैं तो अब ये पूरा अनुभव कैसा लगता है?

नीमिशा– होम फॉर आर्टिस्ट में हम स्टूडेंट भी हैं और टीचर भी। यहां हर आर्टिस्ट अपने हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र है। यहां हर वक्त हर चीज़ करने की आज़ादी है, आर्टिस्ट्स यहां रहते हैं, पेंटिंग करते हैं, खाना बनाते हैं, लिखते हैं, डांस करते हैं गाना गाते हैं और ऐसा करने के लिए वो हर वक्त फ्री हैं। यहां हम एक दूसरे की आर्ट से भी बहुत कुछ सीखते हैं। अक्सर हम कई आर्टिस्ट् एक साथ अलग-अलग जगह जाते हैं और दूसरे आर्टिस्ट्स से बाते करते हैं। तो सबसे बड़ी बात ये है कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम अपने आर्ट से कितने पैसे कमा रहे हैं, ज़रूरी ये है कि हम उस आर्ट को जी रहे हैं।

प्रशांतजब हम तय रास्तों से अलग कुछ करने की कोशिश करते हैं तो ये कितना आसान या मुश्किल होता है?

नीमिशा– हमारे यहां आप जिस वक़्त आर्ट को अपना करियर चुनते हैं, उसी वक़्त से आप समाज में एक्सेपटेन्स के स्तर पर इक्वॉलिटी के लिए लड़ते रहते हैं। इतनी विविधता है अपने देश में, इतना कुछ करने के लिए है, फिर भी अपने पसंद या च्वॉइस के लिए हम पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। आप ये देखिए की कितनी महिलाएं अपने हाथ पर अपने पति का नाम गुदवाती हैं और उसे काफ़ी वेलकम किया जाता है, लेकिन जब कोई अंजान इंसान मुझे इतने सारे टैटू के साथ देखता है तो सीधा मेरे चरित्र पर सवाल भरी नज़र से देखता है।

हम सब टीवी पर या सिनेमा हॉल में किसी बड़े स्टार को देखते हैं तो तालियां बजाते हैं और बहुत इंज्वाइ करते हैं, लेकिन जैसे ही हमारे बच्चे थियेटर या डांस को अपना करियर बनाना चाहते हैं तो हमारा रिएक्शन बिल्कुल अलग हो जाता है।

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फोटो साभार- नीमिशा वर्मा

प्रशांतएक आखिरी सवाल, कि होम फॉर आर्टिस्ट कैसे काम करता है, मतलब एक तरह से रूटीन क्या है?

नीमिशाहम उम्र और समय से परे एक परिवार की तरह रहते हैं। हम हर सुबह मेडिटेट करते हैं, फिर खाना बनाते हैं। खाने के बाद सभी अपनी अपनी प्रैक्टिस करते हैं। हम हर रोज़ नए आर्टिस्ट्स और ट्रैवलर्स का स्वागत करते हैं, जो हमारे साथ अपनी कहानी और अपने अनुभव शेयर करते हैं।

(नीमिशा के मिशन से जुड़ने और सहयोग देने के लिए यहां जाएं होम फॉर आर्टिस्ट)

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