‘सुनो मेरी जूनियर्स, कॉलेज जाते हुए कोई तुम्हें भी सड़क पर छेड़े, गाली दे तो It’s not OK’

Posted on September 18, 2016 in Hindi, My Story, Specials

ज्योति यादव:

मैंने दौलत राम कॉलेज से पढ़ाई की है, एक साल कमला नगर पीजी में रही। पहला लेक्चर 8:30 पर होता था। कभी मिस कर दिया कभी अटेंड। कॉलेज ज़्यादातर पैदल ही जाती थी। एक तो मुझे पैदल चलना अच्छा लगता है,  दूसरा मेरे पास गिनती के ही पैसे होते थे। एक साल जो मैं कमला नगर से कॉलेज गई, उसमें बहुत सी चीज़ें हुई। वो चीज़ें जो आप कह देते हैं कि होती ही नहीं हैं। लड़कियों की मनगढ़ंत बातें हैं।

मैं जिस रास्ते से जाती थी ,उस रास्ते सुबह-सुबह काम करने वाले अंकल साइकिल और मोटर साइकिल पर जा रहे होते। जो ये साइकिल और बाइक वाले जो लोग थे ना एक दम पास से निकलते थे। और जब निकलते थे तब इतनी अच्छी बातें बोलकर निकलते थे:

*तेरी **** बड़ी मस्तानी * आँख मारी*
*बहन की *** साइकिल ज़बरदस्ती मेरी तरफ घुमाना *
मेरा ये ***, मेरा वो *****
मेरे से *****
तेरी ***

गाली देने वाले मेरी दादा की उम्र से लेकर मेरे भाई की उम्र तक के लोग ही होते थे। हमारे यहाँ काम करने वाले लोगों जैसे ही। बसों में चढ़ने वाले लोगों जैसे। सब देखे-भले लगते थे। कोई एलियन नहीं था।

अपने एक दोस्त को यह बात बताई। उसने कहा कॉलेज जाते टाइम मेरे से बात कर लिया कर, फिर मैंने उससे बात करनी शुरू कर दी। जब उससे बात नहीं करती तो गाने सुनती। गानों की तेज़ वॉल्युम से गालियां तो कम सुनाई देने लगी, अब बस गंदे इशारे देख पाती थी। कभी-कभी मन करता था साइकिल गिरा के यहीं मारू इन बूढों को।

कभी पुलिस कंप्मलेंट करने की सोची नहीं, दोस्तों को बताती तो पता चलता सबके साथ भी ऐसा होता है या हो चुका था।
लगा नॉर्मल सी बात है। गालियों से बचने के लिए मैंने सड़क के इस तरफ चलना शुरू कर दिया। साइकिल वाले जाते तो, लेकिन मेरे चलने की दिशा में ही। इसलिए उन्हें मेरी शक्ल नहीं दिखती थी।

मुझे तब समझ नहीं आता था, ये आदमी गाली देते हुए क्यूं जाते हैं? मैं सिर्फ इस सड़क से ही तो जा रही हूं। अठारह साल की थी ,और ये साइकॉलोजी और किसी ‘ism’ की थ्योरी भी नहीं जानती थी। मुझे उस रस्ते से घिन्न आने लगी, अगले साल पीजी चेंज कर लिया।

अब जब मैं इन सब के बारे सुनती हूं, इस लड़की को छेड़ा, इस लड़की को गाली दी, तो उन साइकिल वालों का वो एक साल का गुस्सा मेरे लिखने में निकलता है। मुझे तब बताया गया था ‘कि ये तो ऐसे ही होता है’। लेकिन लेकिन मैं इन कालेज वाली लड़कियों के नहीं बताउंगी कि ‘ये सब तो होता ही है’ ‘इट्स ओके’।

इन लड़कियों के लिए आवाज उठाने के साथ-साथ अपने लिए भी बोल लेती हूं। And this empowers me.

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