क्या बलूचिस्तान पर पी.एम. मोदी का बयान भारत की विदेश नीति में बदलाव की ओर इशारा है?

Posted on September 3, 2016 in Hindi, Politics

विकास कुमार:

पिछले महीने भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नें कश्मीर, गिलगिट-बाल्टिस्तान, बलूचिस्तान आदि पर हो रहे मानवीय अत्याचारों तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए। साथ ही भारत की विदेश नीति जो पाकिस्तान के प्रति थी उसमें भी लगे हाथों परिवर्तन की और इशारा भी कर दिया बलूचिस्तान के बारे में बात करने से पहले हमे यह जान लेना चाहिए आखिर बलूचिस्तान का मसला क्या है? 

बलूचिस्तान पाकिस्तान का एक दक्षिण पश्चिमी प्रांत है, इसके पूर्वी किनारे पर सिन्धु घाटी सभ्यता का उद्भव हुआ था। माना जाता है कि 11 अगस्त 1947 में पाकिस्तान-बलूचिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था। इसमें तय हुआ था कि, पाकिस्तान व वर्तमान बलूचिस्तान का हिस्सा रहे कलात स्टेट के शासक मीर अहमद यार खान के बीच रक्षा, विदेश मामले व संचार मामलों में सहमती बनाने के लिए चर्चा की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना 26 मार्च 1948 को बलूचिस्तान में घुस गई और तब से यह प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा बन गया दूसरी बात यह कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है यहाँ की प्रमुख भाषाएँ पश्तो तथा बलूची हैं 1970 के दशक में यहाँ बलूच राष्ट्रवाद का उदय हुआ, जिसमें बलूची लोगो नें पाकिस्तान से आजाद होने की माँग की थी      

अभी हाल ही में एक बलूच स्वतंत्रता कार्यकर्ता मीर मजदाक दिलशाद बलूच का भारत आना हुआ और इसी दौरान उनका जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भी आना हुआ। इस अवसर पर यहाँ दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान द्वारा ‘जेनोसाइड इन बलूचिस्तान’  के मुद्दे पर एक सेमीनार आयोजित किया गया। इस सेमीनार में डॉ. राजेश खरात, प्रो. एस.डी मुनि, डॉ. सविता पांडे और कई अन्य शोधार्थी भी मौजूद थे। जे.एन.यू. आने से पहले भारत में दिलशाद बलूच ने कहा था कि बलूच आबादी के सामने पहचान का संकट खड़ा हो गया है। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान उनके बुद्धिजीवियों की हत्या कर रहा है और सोची समझी रणनीति के तहत उनके इतिहास को दबा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि हम पाकिस्तान को हमारी सांस्कृतिक पहचान नहीं छीनने देंगे और यही बात उन्होंने जे.एन.यू में भी दोहराई। भारतीय  व बलूचों का समर्थन जुटाने के लिए वे भारत आये हुए थे।

जे.एन.यू  में उन्होंने कहा कि आये दिन हजारों की संख्या में बलूचों की हत्या की जा रही है। उनके पास कई रोजमर्रा की जरुरत की चीजें तक नहीं पहुँच पाती। न उनके पास कोई हेल्थ सर्विस है, न ही खाने की अच्छी सुविधा और शिक्षा का स्तर तो बेहद खराब है। इसके ऊपर हेलीकॉप्टरों से बेक़सूर लोगों पर गोलियां बरसाई जाती है। सेना जनता को बोलने नही देती तथा बलपूर्वक उनकी आवाज को दबाती है। इस बीच उनके पास केवल एक ही रास्ता बचा है और वह है बलूचिस्तान की आजादी। वह आगे कहते हैं कि अगर पाकिस्तान के इतिहास की किताबें देखें तो बलूचों का उनमें जो इतिहास बताया गया है, उसे केवल एक पेज में ही सिमेट दिया गया है। दूसरी बात इस एक पेज में बस बलूचिस्तान क्षेत्र की घाटी, रेगिस्तान और अन्य भौगोलिक जानकारियाँ ही मुहैया कराई गई हैं।

दिलशाद बलूच का कहना है – “ऐसा नहीं है हमारी कोई संस्कृति ही नही है, हमने तो अफगानियों, अंग्रेजों आदि से भी युद्ध किये हैं। हमारी अपनी सभ्यता तथा संस्कृति है तो पाकिस्तान उसको कैसे झुठला सकता है? बलूची लोग पाकिस्तान में ही नही बल्कि ईरान तथा अफगानिस्तान में भी बहुत मात्रा में मौजूद हैं। इस क्षेत्र में लापता लोगों की संख्या 25000 के पार चली गई है और करीब 25 बलूच पत्रकार मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान द्वारा जानबूझकर यहाँ मीडिया को पनपने नहीं दिया जाता।”

बलूचों पर कभी भी विश्व का ध्यान ही नही गया, 1947-48 से ही यहाँ कहर ढाया जा रहा है। महिलाओं का बलात्कार, बच्चों की हत्या और लोगों को सरेआम मार दिया जाना आम होता जा रहा है, खुलेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। आज बलूचिस्तान पाकिस्तान का एक उपनिवेश सा बन कर रह गया है, जहां से हर दिन प्राकृतिक संसाधनों का पाकिस्तान द्वारा दोहन किया जाता है। दिलशाद बलूच नें बताया कि, “हमारे यहाँ न तो कोई मानवाधिकार संगठन गया है और न ही अभी तक उनके लोगों की दशा के बारे में विश्व के लोगों तक कोई खबर पहुंचती है कि वे किस हालात में जी रहे है।”

अभी तक चीन की तरफ से भी बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन पर कुछ नहीं कहा गया है। इस बात की दिलशाद ने भी तसदीक की। चीन का अपना इसमें मुख्य आर्थिक कारण हो सकता है। यह बात तब जाहिर हो गयी जब, चीन नें बलूचिस्तान के मुद्दे को लेकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सी.पी.ई.सी.) की 46 बिलियन डालर की परियोजना को किसी भी तरह का नुकसान होने पर भारत को नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहने की बात कही। यह कोई मामूली बात नही है, अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से आजाद होने की स्थिती में आता है तो इसका सीधा नुकसान चीन को भी होगा। यह परियोजना बलूचिस्तान से ही होकर गई है, इसलिए चीन इस मसले पर पाकिस्तान को पूरा सहयोग दे सकता है।

अब भारत को सोच-समझ कर कदम रखना होगा। 9 और 10 नवम्बर को सार्क देशों का सम्मेलन भी हो रहा है और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी की इस बीच क्या भूमिका होगी यह तो समय ही बतायेगा। अमेरिका, रूस, ईरान, अफगानिस्तान तथा अन्य कई देश इस मुद्दे पर भारत के साथ हैं, लेकिन देखना यह होगा की भारत इस मसले को किस अंजाम तक लेकर जाता है। 

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, बलूचिस्तान की आजादी अब नया सिन्धुस्तान- इन सभी मसलों से साफ़ है कि पाकिस्तान कितना अलग-थलग पड़ गया है। भारत हमेशा से ही अंतर्राष्ट्रीय शान्ति का पक्षधर रहा है तथा भारत वही कर रहा है जो संयुक्त राष्ट्र की सूची के अनुसार मानवाधिकार उल्लंघन तथा अत्याचार होने की स्थिति में करना चाहिए इसलिए भारत को वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका को दिखाते हुए यह साबित करना चाहिए कि वह मानवाधिकारों और शान्ति आदि मुद्दों पर विश्व के देशों को एक मंच पर लाने को लेकर कितना सजग है।              

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