एक ही ट्रेन में, अलग-अलग समय में यात्रा करता है ‘अनेक भारत’

Posted on September 9, 2016 in Hindi, Society

ट्रेन के डब्बों में लोग साथ में सफर करने के बावजूद अलग-अलग समय में यात्रा करते हैं। खुद के व्यक्तिगत अनुभव से बता सकता हूं कि, ज़्यादातर लम्बी दूरी की ट्रेन में जनरल वर्ग के डिब्बों की संख्या कम होती है पर भीड़ इन्ही में सबसे ज़्यादा होती है। स्लीपर बोगियों की संख्या सबसे ज़्यादा होती है और इनमें वेट लिस्टेड यात्रियों की संख्या मिला दें तो ये बोगियां अक्सर अपनी क्षमता से दोगुने यात्रियों को साथ लेकर चलती हैं।

कभी आप मुश्किल से टिकट पा लेते हैं और अपनी कन्फर्म्ड टिकट की कहानी शेयर करने के दौरान जब आप सह-यात्रियों से पूछते हैं, “आपने टिकट कैसे कराया?” तो अलग-अलग तरह के जवाब मिलते हैं। कुछ कहेंगे कि महीनों पहले जब बुकिंग खुली थी तब कराया था, कुछ कहेंगे एजेंट से कराया था, कुछ कहेंगे कि चार दिन तक ऑनलाइन नहीं हो पाया तो एक दूर के सम्बन्धी से कराया है। कुछ ऐसे भी होंगे जो बोलेंगे ही नहीं, बस उनका टिकट हो जाता है; उनको चिंता नहीं रहती।

सब सुनकर यही लगता है कि पैसे खर्च करने की औकात और आपकी समाज में पहुंच, ये तय करता है कि आप ट्रेन के किस डिब्बे में बैठे हैं, वरना कायदे से टिकट तो आपको बुकिंग शुरू होने के कुछ दिनों के अंदर ही मिल पाती है। साथ ही यह भी याद रखिये कि टिकट कुछ लोगों को ही मिल पाती है।

इसका जीता जागता उदहारण अब रेलवे के नए नियमों में भी साफ दिख रहा है। सर्ज प्राइसिंग के ज़माने में अब नियमानुसार सिर्फ 10% लोगों को ही पहले से निर्धारित कीमत पर टिकट मिल पाएगी, क्योंकि हर 10% टिकट की बिक्री के बाद दाम भी 10% बढ़ जायेंगे। फिलहाल यह नियम सिर्फ राजधानी, दुरंतो और शताब्दी ट्रेनों के लिए है। लेकिन सोचिये अगर सभी ट्रेनों में ये लागू होने लगे तो क्या होगा।

वैसे पिछले कुछ सालों के नियम भी कमतर नहीं रहे हैं। प्रीमियम ट्रेन, सुविधा ट्रेन, ओनली तत्काल बुकिंग ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफा कमाने की दिशा में उठाये गए कदम हैं। दलाल और बुकिंग एजेंट मुनाफा कमाने की प्रक्रिया में शामिल रहते हैं और टिकट के दाम और बढ़ जाते हैं। रेलवे पहले से पब्लिक सर्विस या सरकारी सेवा का ‘क्लास डिवीज़न’ ( फर्स्ट, सेकंड, थर्ड ए.सी., स्लीपर और सामान्य) तो कर ही रहा था, पर अब उनकी बदलती पॉलिसी और दलाली करने वालों के धंधे को बढ़ावा देने से यह डिवीज़न, और गहराया है। डब्बों के अंदर की तस्वीर, डब्बों के बाहर की तस्वीर से ज़्यादा अलग नहीं है।

हालांकि जब ट्रेन में मैं सफर करता हूं तो सारी चीज़ें सिर्फ नकारात्मक नहीं दिखती। मेरे अनुभव में स्लीपर बोगी में जिस तरह से लोग ठसा ठस भरी ट्रेनों में छोटी से छोटी जगह शेयर करते नज़र आते हैं, उससे रिज़र्व का कॉन्सेप्ट गड़बड़ाता हुआ दिखता है। कभी-कभी सुनने को मिल जाता है ‘ये तेरा मेरा क्या है, सबको चलना है कैसे भी साथ में चलेंगे’ पर ऐसा नहीं कि सबकी यही चाहत होती है। आखिर कौन चाहेगा कि एक कम्पार्टमेंट में 8 की जगह 25 लोग बैठ कर जाएं। रात को टॉयलेट के दरवाजे के नीचे आँख मूंदने की कोशिश करें। पर क्या करें बहुत लोगों के पास चॉइस नहीं है और बदलते नियम तथा आर्थिक माहौल उन्हें ज़्यादा चॉइस देते भी नहीं हैं।

किसी ट्रेन को करीब से झांककर देखें तो कभी पता चलेगा कि इनमें कई लोग अपने गाँव छोड़कर जा रहे होते हैं, उनके घरों में काम करने जो शायद बाजू वाली ए.सी. बोगी में बैठे होते हैं। दोनों कितने पास होते हैं पर उनके बीच की दूरी कितनी ज़्यादा प्रतीत होती है। एक यात्रा और एक ही समय, दोनों डिब्बे पर ही इंडियन रेलवे लिखा है। फर्क यह है कि एक के अंदर आप झाँक नहीं सकते और एक के अंदर झांकने की जगह नहीं होती है।

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