“जात ना पूछो भगत की, उसकी पगड़ी का कोई रंग नहीं है”

Posted on September 28, 2016 in Hindi

शाह आलम:

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से 23 मार्च 2015 को शहीदी दिवस पर अखबारों में एक विज्ञापन छपा था जिसमें शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की साझा तस्वीर है। इस तस्वीर में भगत सिंह को पगड़ी पहना कर क्रांतिकारी चेतना को कम करने की साज़िश रची गई। यही साज़िश 27 सितंबर 2016 को आम आदमी पार्टी द्वारा तालकटोरा स्टेडियम में भी रची गई और वहां भी भगत सिंह को पगड़ी पहना कर तस्वीर लगाई गई। ये क्रांतिवीर का अपमान है क्योंकि भगत सिंह पूरे देश के शहीद हैं।

भगत और बटुक: शामलाल की खीची तस्वीर
भगत और बटुक: शामलाल की खीची तस्वीर

क्रांतिकारियों के दल हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के खुफिया हेडक्वार्टर आगरा में, गोरी हुकूमत के बहरे कानों को खोलने के मंथन के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह मौत से खेलने दिल्ली आ धमके थे। महीने भर यह जोड़ी दिल्ली में जमी रही। दोनों क्रांतिकारियों ने कई शाम बम को अखबार में लपेटे कपड़ों में छिपाते हुए संसद भवन की रेकी की। सर्वाधिक विचार सम्पन्‍न भगत सिंह ने अंतिम दौर में अपने बाल कटवा लिए थे। केन्द्रीय असेम्बली में धमाका करने के चार दिन पहले भगत सिंह ने बटुक से कहा, ”चलो, फोटो खिंचवाएं।” बटुक ने इसे टालना चाहा, लेकिन भगत सिंह जि़द पर अड़े रहे।

आखिरकार 3 अप्रैल, 1929 को कश्मीरी गेट पर इन्‍होंने फोटो खिंचवाई। शामलाल की खींची हुई यह बहुप्रचलित तस्वीर आखिरी यादगार है। फ्लैट हैट में भगत सिंह की यह तस्वीर आज तक लोगों के ज़हन में मौजूद है जिसके लिए वह अवाम में जाने-पहचाने जाते हैं। ऐसे में सरकारें शुरू से ही उन्हें क्रांतिकारी विचारधारा से अलग-थलग कर सिक्ख बनाने पर क्‍यों तुली हैं जबकि क्रांतिवीर के सारे अदालती दस्तावेज़, पर्चे, बयान, पत्र-व्यवहार, आलेख, उनके पत्रकार जीवन में लिखी गई टिप्पणियां, जेल डायरी आदि सब कुछ हमारे सामने है? फांसी के फंदे के साये में 5-6 अक्टूबर को लिखा गया उनका लेख ‘मैं नास्तिक क्यो हूं?’ इसका सबसे चर्चित सबूत है।

नए-नए मुखौटे: हुसैनीवाला में नरेंद्र मोदी
नए-नए मुखौटे: हुसैनीवाला में नरेंद्र मोदी

बड़ा सवाल यह है कि जाति, धर्म के नाम पर इन शहीदों को बांटने का काम अंग्रेज़ों ने एक गिरी हुई साज़िश के तहत उस दौर में किया था। आज वही काम हुक्मरानों की तरफ से किया जा रहा है। वोट बैंक की सियासत के मोह में प्रधानमंत्री का 23 मार्च को हुसैनीवाला में शहीदों के स्मारक पर किया नाटक इसी कड़ी का नतीजा था। वहीं जेएनयू से रिटायर्ड प्रोफेसर चमनलाल 29 मार्च, 2015 को बीबीसी हिंदी डॉट काम पर लिखकर सवाल उठाते हैं, ”भगत सिंह को पीली पगड़ी किसने पहनाई?”

सवाल पीली, हरी या भगवा रंग की पगड़ी का नहीं है बल्कि पगड़ी पहनाने का है। प्रो. चमनलाल की ”भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत”  नाम की उद्भावना से प्रकाशित (मई 2007, कीमत 8 रुपये) पुस्तिका जो हमारे पास मौजूद है, उसके कवर पेज पर भगत सिंह लाल पगड़ी पहने हुए हैं। हम प्रो. चमनलालजी से जानना चाहते है कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे बड़े प्रवक्ता भगत सिंह को लालपगड़ी किसने पहनाई?

तालकटोरा स्टेडियम में अरविंद केजरीवाल
तालकटोरा स्टेडियम में अरविंद केजरीवाल

दरअसल, साझी शहादत, साझी विरासत को विभाजित करने का षडयंत्र क्रांतिकारी चेतना का अपमान है। क्रांतिकारियों की बहादुराना शहादत को कम आंकना इसे टुकड़ों-टुकड़ों में देखने की साज़िश है।आज से सत्तासी साल पहले आज की संसद मे बैठने वाले बहरों के कानो को खोलने के लिए बम का धमाका किया गया था। ऐसा कर के असल में दुनिया में साम्राज्यशाही के खिलाफ सबसे बड़ी इबारत लिख दी थी इन दोनों क्रांतिवीरों ने, जब पार्टी के लाल रंग के पर्चे संसद हॉल में चारों तरफ बिखरा दिए गए थे।

पर्चे पर लिखी पंक्तियां कुछ यूं थीं:

राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे, परन्तु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है। जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेंट के पाखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार करें।” 

बम कांड के बाद सेंट्रल असेंबली, 8 अप्रैल 1929
बम कांड के बाद सेंट्रल असेंबली, 8 अप्रैल 1929

दल की पूर्व योजना के तहत इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे के साथ इन्‍होंने अपनी गिरफ्तारी दे दी। अफसोसनाक है कि आज तक भारतीय संसद में इन दोनों क्रांतिकारियों के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव दर्ज है। इतने दिनों बाद भी इनके चरित्र में कोई परिवर्तन नही आया है।

बम कांड के 87 साल बाद आज भी जनता के प्रतिनिधियों की कथित संवेदनशीलता असेंबली शहादतों के प्रति बहरी बनी हुई है जबकि इस देश के बुद्धिजीवी पगड़ी का रंग गिनवाने में ही अपनी ऊर्जा नष्‍ट कर रहे हैं। आज जब इस देश के किसानों की ज़मीनें उनकी सहमति के बगैर हड़पने का फ़रमान जारी कर दिया गया है, तो ऐसे में क्रांतिवीरों के सच्‍चे वारिसों को एक बार फिर देश की जनता को अपनी महान शहादतें और उनकी सच्‍चाइयां याद दिलाने का वक्‍त है ताकि नकली चेहरों के पर्दाफाश के लिए उनके नकाब को नोच कर फेंका जा सके और लोगों की ज़मीन को उनके पैरों तले खिसकने से बचाया जा सके। असेंबली बम कांड के भुला दिए गए नायक बटुकेश्‍वर दत्‍त और हुक्‍मरानों के पसंदीदा रंगों में कैद किए जा चुके कम्‍युनिस्‍ट क्रांतिवीर भगत सिंह को आज के दिन याद करने का असली मतलब यही है।

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