‘स्वांग’ तरीका है हमारे विरोध को दर्ज कराने का

Posted on September 7, 2016 in Culture-Vulture, Hindi, Staff Picks
रविन्द्र रंधावा

इतिहास उठाकर देखें तो समाज में बदलाव लाने में या कहें कि बदलाव को आवाज़ देने में संगीत की हमेशा ही अहम भूमिका रही है। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने मिलकर ‘स्वांग’ नाम का एक ऐसा ग्रुप बनाया, जो संगीत और थिएटर के ज़रिये सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने विचारों को सामने रख रहा है। 2012 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय अवार्ड जीत चुकी फिल्म, ‘फिल्मिस्तान’ के गीत लिख चुके रविन्दर रंधावा और अभिनेत्री स्वरा भास्कर जैसे कलाकार इस ग्रुप का हिस्सा हैं। Youth Ki Awaaz को इसी बीच रविंदर रंधावा से बात करने का मौका मिला, और उनसे हुई रोचक बातचीत में हमें स्वांग के बारे में जानने का मौका मिला।


सिद्धार्थ:
स्वांग की शुरुआत कैसे हुई?

रविंदर रंधावा: स्वांग की शुरुआत काफी दिलचस्प परिस्थिति में हुई, स्वांग से जुड़े हुए हम ज़्यादातर लोग बॉलीवुड में काम करते हैं। जैसे मैं लिखता हूँ और डायरेक्ट भी करता हूँ, इसी तरह रोहित शर्मा जो स्वांग के लिए म्यूज़िक बनाते हैं वो फुल टाइम म्यूज़िक कंपोज़ करते हैं। ऐसे ही पंकज भद्रा एक्टर भी हैं और सिंगर भी हैं। हम तीनों ही बम्बई में काफी सालों से थे लेकिन हमारा एक दूसरे से कभी मिलना नहीं हुआ था। मैं और स्वरा भास्कर दोनों ही जे.एन.यू. से पढ़े हैं तो वहीं से हमारी पुरानी जान पहचान थी, स्वरा जो कि एक एक्ट्रेस हैं उन्होंने ही हमें एक फ़िल्मी पार्टी में मिलवाया था।

फ़िल्मी पार्टियों में लोग अक्सर गाने गाते हैं, वहीं मैंने गौर किया कि रोहित और पंकज के गाने बिल्कुल अलग थे, उन गानों के संगीत से लेकर बोल तक सभी चीजें, आम फ़िल्मी गानों से काफी अलग थी। फिर हम लोगों ने भी गाना शुरू किया तो उन्हें भी हमारे गाने काफी अलग लगे, ज़ाहिर तौर पर हमारी जे.एन.यू. की पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति में हमारी भागीदारी हमारे गानों में भी दिखती थी। यहीं से हमारे बीच बात-चीत शुरू हुई और हमने एक दूसरे के मोबाइल नंबर लिए। तो हमारी पहली मुलाक़ात एक फ़िल्मी पार्टी में हुई। 2008 के आस-पास हमने मिलना शुरू किया, और सोचा कि साथ मिलकर कुछ किया जाए, और हमने गाने बनाने शुरू किये।

सिद्धार्थ: स्वांग का संगीत मुख्यधारा के संगीत जैसा नहीं है, क्या इसके पीछे कोई खास वजह थी?

रविन्दर: हमारा इरादा पीपल्स म्यूज़िक यानी कि लोगों के लिए ऐसा संगीत बनाने का था कि, जो आज के समय में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात करता हो। देखिये मस्ती के, रोमांस के या डांस के लिए तो काफी गाने बन रहे हैं। इन सभी पर काफी सारा काम हो रहा है, अगर बहुत बुरा काम हो रहा है तो काफी सारा अच्छा काम भी हो रहा है। लेकिन प्रोटेस्ट म्यूज़िक (किसी मुद्दे पर विरोध जताने के लिए बनाया जाने वाला संगीत) को लेकर मुख्यधारा के बॉलीवुड संगीत में कुछ ख़ास नहीं किया गया है। भारत में जहाँ-जहाँ आंदोलन हो रहे हैं वहां इस तरह का संगीत बन रहा है। मुझे पूरा यकीन है कि छत्तीसगढ़ में इस तरह के गाने बन रहे हैं या नर्मदा बचाओ आंदोलन में इस तरह के गाने बन रहे हैं।

हर आंदोलन का अपना एक सांस्कृतिक पहलू होता है, उसका अपना संगीत होता है। लेकिन जो लोग उन आंदोलनों से जुड़ नहीं पा रहे हैं उनकी कला में, राजनीति को लेकर उनके विचार कैसे सामने आएँगे? मेनस्ट्रीम यानि कि मुख्यधारा के सिनेमा या संगीत की बात करें तो वहां ये बिल्कुल भी नहीं है। कम से कम तब तो नहीं था जब हम लोगों ने शुरुआत की थी, अब तो फिर भी जेंडर को लेकर या कुछ और मुद्दों पर भी गाने बन रहे हैं। इसीलिए हमने तय किया कि हम हमारे संगीत को आज के सामाजिक और राजनीतिक हालातों के आस-पास ही बनाएंगे। हमने शुरुआत में उर्दू और हिन्दी के कुछ नामी शायरों और गीतकारों जैसे फैज़ अहमद फैज़ और गोरख पांडे की नज़्मे और गानों पर काम करना शुरू किया साथ ही हम लोग अपने भी कुछ गाने लिखते रहे।

सिद्धार्थ: आपका पहला गाना ‘माई मैं नहीं डरना’ 2012 में आया, इसमें इतना वक़्त कैसे लग गया?

रविन्दर: हम स्वांग के साथ काम काफी समय से कर रहे थे और ये काफी छोटे स्तर पर था, लेकिन हमने कोई गाना रिकॉर्ड नहीं किया था। असल में हमारा इरादा एक म्यूज़िक बैंड बनाने का नहीं था, हम लाइव शो कर रहे थे और वहीं अपने गाने सभी के सामने रखते थे। हमारा इरादा संगीत के साथ हर तरीके से एक्सपेरिमेंट करने का था। ये कुछ ऐसी चीज़ें थी जिन्हें लेकर हम सभी सहमत थे और हमें एहसास था कि इसमें कुछ समय लगेगा। ये हम सभी का एक सोच-समझ कर लिया गया फैसला था।

इसी बीच दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भया केस सामने आया, हम पहले से ही अलग-अलग मुद्दों पर गाने बना रहे थे, लेकिन इस घटना ने हम सभी को काफी हिला दिया था। लेकिन हमने इस पर कोई गाना बनाने के बारे में नहीं सोचा था, फिर एक दिन रात के करीब 2 बजे मुझे रोहित का फोन आया, और उनकी आवाज़ से मैं समझ सकता था कि वो इस बात को लेकर काफी परेशान थे। उनकी एक बेटी है जिसे हम सभी ‘चीकू’ नाम से पुकारते हैं, रोहित ने मुझसे कहा कि वो चीकू से नज़र नहीं मिला पा रहे हैं, उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे उन 6 लोगों (जिन्होंने बलात्कार किया था)  में वो भी शामिल थे। रोहित ने कहा कि हमें कुछ करना चहिये। ये बात मेरे दिमाग में काफी समय तक घूमती रही और वहीं से इस गाने की लाइन आई कि ‘इन 6 में शामिल तुम भी थे’। इसके बाद हमने काफी लोगों से बात की, काफी कुछ पढ़ा और हमारा पहला गाना रिकॉर्ड हुआ। मूल रूप से ये गाना महिलाओं पर हमले को लेकर नहीं बल्कि, परवरिश को एक संस्थागत ढाँचे की तरह देखे जाने को लेकर है। कुछ लोगों ने इस पर नाराज़गी भी ज़ाहिर की।

सिद्धार्थ: जैसा कि आपने कहा कि आप गाने रिकॉर्ड नहीं कर रहे थे, तो आपके इस पहले रिकॉर्ड किए गए गाने को लेकर लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही?

रविन्दर: इस गाने की हमें बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली, हमें कई जगह से शो करने के ऑफर आने लगे। एक और अच्छी चीज़ ये हुई कि हमें वहीं बुलाया जा रहा था जहाँ हम भी गाना चाहते थे, बच्चों के बीच, स्टूडेंट्स के बीच और ऐसे लोगों के बीच जो जेंडर के मुद्दे पर काम कर रहे थे। इसके बाद ही हमने तय किया कि हम नियमित रूप से लाइव परफॉर्म करते रहेंगे। इस गाने को बनाने के पीछे हमारा असल मकसद उन चीज़ों पर सवाल उठाना था जिन पर अक्सर बात नहीं की जाती है। इस गाने के आने के बाद हमें काफी सारे ईमेल आए, मेसेज आए और लोगों ने इसकी तारीफ भी की लेकिन इससे बढ़ कर हमें काफी सारी महिलाओं ने जिनमे हर उम्र की महिलाएं थी, हमें उनकी प्रतिक्रियाएं भेजी।

एक किस्सा बताना चाहूँगा, मध्य प्रदेश से एक बुजुर्ग का मुझे फोन आया और उन्होंने मुझे बताया कि निर्भया केस के बाद वो अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए दिल्ली नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन इस गाने को सुनने के बाद मुझे लगता है कि मेरी बेटी को दिल्ली जाना चाहिए। इसी तरह एक दिन मेरी एक फोटोग्राफर दोस्त जो बम्बई में ही रहती हैं, उनका मुझे फोन आया और उन्होंने बताया कि दिल्ली में उनकी छोटी बहन रहती है, जिसे वो हर शाम कॉल करके जल्दी घर जाने को कहती हैं। लेकिन ये गाना सुनने के बाद अब उन्होंने भी अपनी बहन को इस तरह से कॉल करना बंद कर दिया है। इस तरह की प्रतिक्रियाओं की हम उम्मीद नहीं कर रहे थे, लेकिन हमारे इस गाने को बनाने का मकसद यही था।

हमारा मकसद यही था कि जिस तरह से हमारे आस-पास ये जो लड़कियों की ‘रक्षा’ करने की सोच है, जैसे रात होने से पहले घर आ जाओ, कहीं अकेले मत जाओ आदि, हम चाहते हैं कि उसे लड़कियां ही चुनौती दें। हमें लगता है कि डर और संवेदनशीलता दो अलग मुद्दे हैं, जिन पर अलग-अलग काम किया जाना जरूरी है। और इसकी शुरुआत घर से ही होगी।

स्वांग टीम, ‘सुरसुरी सी चाय है’ की शूटिंग के दौरान।

सिद्धार्थ: ‘सुरसुरी ये चाय है’ इस गाने के बोल, संगीत और विडियो चर्चित रहे और लोगों ने भी इसे काफी पसंद किया, इसके बारे में आप कुछ बताना चाहेंगे?

रविंदर: देखिये इसमें दो तीन चीज़ें हैं, एक तो सबसे पहले हम सभी कलाकार हैं और जब भी कोई मुझसे ये सवाल पूछता है तो मुझे टैगोर की एक बात याद आती है। उन्होंने कहा था कि कला का सुन्दर होना जरुरी है, लेकिन इससे लोगों को जुड़ाव महसूस होना चाहिए। अगर कला का कोई भी रूप किसी भी बड़े से बड़े मुद्दे के बारे में है लेकिन यह उसे ठीक से नहीं कह पा रही है तो यह लोगों को खुद से जोड़ नहीं पाती। ‘सुरसुरी’ हमारी ऐसी ही एक कोशिश है, जिसमे हमने कला के हर पहलु को अपनी बात कहने के लिए इस्तेमाल किया है। अगर इसके संगीत की बात करें तो इसमें आपको जैज़ की झलक दिखेगी, इसमें आपको ब्लूज़ संगीत की भी झलक दिखेगी वहीं आपको इसमें इंडियन फोक की भी झलक दिखाई देगी। इसका विडियो भी थिएटर की तरह एक ही सीक्वेंस में शूट किया गया है, जहाँ हमने पूरे घर का इस्तेमाल एक सेट की तरह किया है।

अब बात गाने की लिरिक्स की करें तो ये हमारे विचारों की अभिव्यक्ति है। इस गाने में हमारी कोशिश ये है कि, जो लोग राजनीतिक या सामाजिक मुद्दों पर बने गाने नहीं सुनते हैं, उन्हें भी कुछ ऐसा मुहैय्या कराया जाए जिसे वो सुन सकें। इस गाने के बोल हमारी सोच के साथ हमारे व्यक्तिगत अनुभवों का भी एक मिला-जुला रूप है। हम इसमें ख़ास तौर पर उस मध्यम वर्ग की बात करते हैं जो कॉलेज तक राजनीति में बड़ा सक्रिय होता है, लेकिन उसके बाद क्रांति महज़ बातों तक ही सीमित रह जाती है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि सभी ऐसे ही हैं, काफी सारे लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन केवल फेसबुक से क्रांति लाने का इरादा रखने वालों की भी तादाद कम नहीं है।

सिद्धार्थ: ‘सुरसुरी’ को आये हुए भी काफी वक़्त हो चुका है, अब आगे क्या करने का इरादा है? क्या किसी नए गाने पर स्वांग काम कर रहा है?

रविंदर: हाँ कुछ काम की व्यस्तताओं के चलते अभी हमें थोड़ा वक़्त हो चुका है, लेकिन अब हम कहानियों को लेकर कुछ करने का सोच रहे हैं। अब उसका क्या रंग-रूप होगा उसे तय करने में हमें थोड़ा समय लगेगा, साथ ही हम लोग खुद को और निखारने की और विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। एक नए गाने पर भी काम चल रहा है, उम्मीद है कि हम इसे जल्द ही रिलीज़ करेंगे।

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