चंबल ज़मीन संघर्ष-आदिवासी कस्तूरी से पहले ज़मीन छीनी गई और फिर जान

Posted on September 10, 2016 in Hindi, Society

अंकित झा:

मध्यप्रदेश के चम्बल में स्थित जिला श्योपुर, ग्वालियर-मुरैना से कोई 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा, प्रदेश के सबसे पिछड़े तथा अस्तित्वहीन जिलों में से एक। इसी जिले का एक गाँव, वर्धा बुजुर्ग लगभग 3 सहराने होंगे इस गाँव में। किसी भी गाँव में जहाँ सहरिया आदिवासी एक साथ रहते हैं उसे सहराना कहते हैं। शहर के पढ़े-लिखे लोग इसे ग्रामीण भारत या वन ग्रामों का ‘घेटो’ कह सकते हैं। इन्हीं घेटो में पनपता है श्योपुर की जनसंख्या का करीब एक तिहाई हिस्सा। जिले के 535 गाँवों में 600 से भी अधिक सहराने हैं और सभी सहरानों का हाल लगभग एक जैसा ही है।

गाँव वर्धा बुजुर्ग जिला मुख्यालय से कोई 7-8 किलोमीटर दूर एक प्राचीन और महत्वपूर्ण गाँव है। मई के महीने में इसी गाँव की एक आदिवासी महिला को गुर्जर जाति के कुछ दबंगों ने उसी के खेत में उसे बेरहमी से पीटा। लगभग 2 हफ़्ते संघर्ष करने के बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गयी। घटनाक्रम इस प्रकार है कि कस्तूरी बाई के पिता के नाम की भूमि पर उसी गाँव के लक्ष्मीनारायण गुर्जर ने कब्ज़ा कर रखा था। कस्तूरी बाई के पिता ने मामले की रिपोर्ट की थी। न्यायालय द्वारा दिए गये निर्णय में ज़मीन का अधिकार पुनः कस्तूरी बाई के पिता धन्ना को मिलना था, राजस्व निरीक्षक व पटवारी ने ज़मीन की सही नापी कर उसे कब्ज़ा दिलवा दिया। इसके बावजूद उसे, उसकी ही ज़मीन पर जुताई नहीं करने दी गयी।

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कस्तूरी के पिता को यह ज़मीन 1974 के अंत में मिली थी, जिस पर कि वह खेती भी किया करता था। लेकिन प्रशासन से सांठ-गांठ कर हरचंदा गुर्जर (लक्ष्मीनारायण के पिता) ने ज़मीन का पट्टा अपने नाम करवा लिया और कस्तूरी बाई के पिता को उसी की ज़मीन से बेदखल कर दिया गया। अपने स्वभाव के विपरीत कस्तूरी के पिता ने संघर्ष जारी रखा और कभी थाने तो कभी अनुविभागीय अधिकारी और कभी तहसीलदार से शिकायत करता रहा, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। यहाँ तक कि जिला कलेक्टर से भी शिकायत की गयी। उस समय जिले का कलेक्ट्रेट मुरैना में हुआ करता था जो गाँव से 200 किलोमीटर दूर था।

इतनी तकलीफ के बावज़ूद और प्रशासन से लगातार मिलते आश्वासन के बाद भी कोई फल मिलता नहीं दिखा। दिन, महीने, साल बीत गये लेकिन ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं मिल पाया। इस बीच कस्तूरी के पिता धन्ना तथा उसके चाचा की मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद भी कस्तूरी विचलित नहीं हुई और उसने संघर्ष जारी रखा। उसने कोर्ट में केस दर्ज करवाया। न्यायालय ने उसका पक्ष सही मानते हुए उसके नाम ज़मीन ट्रांसफर करने का आदेश दिया, इसके बाद भी गाँव के प्रभावशाली व्यक्ति होने के कारण लक्ष्मीनारायण ने ज़मीन पर अपना कब्ज़ा नहीं छोड़ा। इसकी शिकायत भी हुई। लेकिन अफ़सरशाही से परेशान होकर कस्तूरी ने अपने खेत में एक कच्ची टपरी बना ली। लक्ष्मीनारायण ने कई बार उसे इस टपरी को हटाने की धमकी दी, लेकिन कस्तूरी बाई ने झुकने से इनकार कर दिया। उसने पुलिस में शिकायत भी की, पर पुलिस ख़ामोश रही।

24 अप्रैल 2016 को दिन में करीब 11 बजे जब कस्तूरी अपनी कच्ची टापरी में आराम कर रही थी, उसी समय लक्ष्मीनारायण तथा उसके साथ आये दबंगों ने टपरी में आग लगा दी और उस पर लाठी से हमला कर दिया। हमले में कस्तूरी बुरी तरह घायल हो गयी। उसे उसके बेटों ने अस्पताल तक पहुँचाया। पूरी घटना की शिकायत अजाक थाने में हुई। यहाँ भी पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा। पुलिस ने धारा एस.सी./ एस.टी. एक्ट तथा अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया। कस्तूरी को बड़े अस्पताल रेफर करने में भी देर की गयी। नतीजतन कस्तूरी की एक लम्बे संघर्ष के बाद 07 मई 2016 को मौत हो गयी। ज़मीन के संघर्ष में ये जिले की चौथी क्षति थी।

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प्रशासन ने यदि समय पर ज़मीन पर पहुंचकर नापी में दखल दिया होता तो हो सकता है कस्तूरी आज ज़िंदा होती और जबरन  ज़मीन पर कब्ज़ा करने के जुर्म में लक्ष्मीनारायण जेल में। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वन संरक्षण अधिनियम 2007 तथा मध्य प्रदेश भू राजस्व अधिनियम को ताक पर रख कर प्रशासन ने पूरे मामले को अनदेखा किया। यह अकेला किस्सा नहीं है, ऐसे कई किस्से जिले के अलग-अलग गाँवों में दर्ज होते रहते हैं। मायापुर, लहरौनी, अधवारा, साबरी, अजपुर आदि गाँव ऐसे प्रकरणों से भरे पड़े हैं।

चम्बल के संघर्ष की जड़ ज़मीन विवाद के अंतस में छुपी हुई है, लेकिन यह संघर्ष कोई विवाद नहीं बल्कि वर्षों से चले आ रहे शोषण का एक और चेहरा है। यह शोषण समय के साथ ना बदला और ना ही आगे बढ़ा। ये जस का तस बना हुआ है, उतना ही भयावह है। तब राजा हुआ करते थे, आज ऊंची जाति के शक्तिशाली लोग हैं। यह बहुमुखी संघर्ष विवाद, प्रतिवाद, समस्या, समाधान तथा सहायता सभी रूपों में निहित है।

चम्बल के आदिवासियों को उनके जंगल से बेदखल कर खेतिहर बनाने का प्रयास शोषण का पहला रूप, उनके जंगलों को खेतों में बदलना दूसरा, उच्च जातियों द्वारा उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा तीसरा और प्रशासन की अनदेखी चौथा रूप है। और इस तरह स्थानीय आदिवासी मजबूर हैं। वो मजबूर हैं अपने जंगल छोड़ने के लिए, वो मजबूर हैं अपने ही नाम के पट्टे वाले खेतों में मजदूरी करने को, वो मजबूर हैं उनकी पहचान को खोने के लिए। हालाँकि अब आदिवासी को जंगल में छोड़ने की खुशफहमी से आगे बढ़कर, उनके कल्याण की बात सोचना जरूरी है। लेकिन ये आवश्यकता केवल एकतरफा नहीं होनी चाहिए। सहरिया आदिवासियों का इन सब में दखल बराबर का होना चाहिए।

आज प्रशासन कस्तूरी बाई के घर मुआवज़ा तथा आश्वासन ले कर पहुँचने लगा है। मुख्य सचिव के दखल के बाद ज़मीन वापस दिलाने के कार्य में भी खूब फूर्ती आई है। काश! ये सब कुछ पहले हो गया होता। भले ही करीब 500 किसानों को उनकी ज़मीनें वापस मिल गयी हों लेकिन कस्तूरी बाई तथा उसके परिवार द्वारा किये गये 3 दशक के असफल संघर्ष की भरपाई कौन करेगा?

बैनर फोटो आभार: मनोज भट्ट  

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