सुनो, कल से तुम्हारी नाईट शिफ्ट लगाई गई है, टाईम से आना, “जी सर”

Posted on September 20, 2016 in Hindi, My Story

रिज़वान शाहिद:

“हैल्लो जी”
हैलो सर कैसे हैं आप, “लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही सेठ साहब की इस हैल्लो में ग्रीटिंग कम इनक्वाइरी ज़्यादा थी कि भैया इतनी रात को कहाँ?” ज़ाहिर है रात 11.30 बजे कौन ऑफिस जाता है, अब कौन समझाए सेठ साहब को कि मैं नार्मल आदमी नहीं हूं, मेरा मतलब मैं नार्मल जॉब नहीं करता हूं, भैय्या मैं “मीडिया” में हूं।

इसी तरह गाड़ी साफ़ करने वाला बपुन भी आज कह रहा था ” साहब तीन दिन से गाड़ी नहीं दिखा आपका”, “अरे वो मैं सुबह 10 बजे आता हूं, तभी साफ़ कर दिया करो।” इस सवाल के बाद उसने कुछ कहा तो नहीं लेकिन मुझे उसके ज़हन में कौंध रहे कई सवाल साफ़ नज़र आ रहे थे कि, “पूरी रात के बाद सुबह 10 बजे कहाँ से आता है ये, ऐसी कोई नौकरी तो होती नहीं, और जहाँ तक मैं जानता हूं, चौकीदार ये हैं नहीं।” वग़ैरा वग़ैरा।

बहरहाल उसके ज़हनी सवालों को इग्नोर करता हुआ मैं आगे बढ़ जाता हूं, लेकिन कहाँ तक बचेंगे आप?  बीवी की सहेली, प्रेस वाला, अखबार वाला, बग़ल में रहने वाला बंगाली, दूध वाले मिश्रा जी और यहाँ तक की वॉचमैन भी गेट ऐसे खोलता है जैसे कोर्ट से मेरी गुनाह साबित होने का लाईव प्रसारण किया गया हो। लेकिन मैं नार्मल नौकरी करने वाला इंसान नहीं हूं भाई, ये किस किस को बताऊँ !

दोस्तों से भी अब मिलना जुलना ख़त्म सा ही हो गया है, एक ही तरह की नौकरी को मैं तीन महीनों में तीन तीन अलग अलग वक़्त में जो करता हूं, बाक़ी सब तो नॉर्मल हैं भाई मेरी तरह थोड़ी हैं, वो तो मिलने के लिए संडे को ही कहते हैं, और मैं कभी सोमवार तो कभी गुरुवार को घर पर अकेला पड़ा रहता हूं, क्योंकि मैं स्वीकार कर चुका हूं कि मैं नार्मल नौकरी करने वाला इंसान नहीं हूं। सुनने में तो बड़ा अच्छा लगता है “अच्छा आप न्यूज़ चैनल में काम करते हैं।”

अब तो बीवी बच्चे माँ बाप सब मुझे इसी अवतार में स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन इस अवतार को मैं स्वीकार कर पाया हूं कि नहीं, ये फैसला मैं नहीं कर पाया हूं अभी तक। कभी कभी लगता है यही नियती है, कभी लगता है काहे की नियती, कीड़ा तो मेरे अंदर ही था ना पत्रकारिता का, अपनी बात जनता तक पहुंचाने का, अपनी बात रखने का, अपने नज़रिये से चीज़ों को देखने का,पत्रकार बनने का, लेकिन वो तो नहीं बन सका, हाँ, बेवक़्त काम करने वाला मज़दूर ज़रूर बन गया।

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दिन-रात, मौसम-बेमौसम, वक्त-बेवक्त बिना सोचे समझे काम करते रहने वाले सभी टीवी पत्रकारों को समर्पित।

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