2 साल में जनता नरेंद्र मोदी से पूछ रही है- क्या हुआ रे तेरा वादा

Posted on October 17, 2016 in Hindi, Politics

हरबंस सिंह:

2014 के चुनावों में भाजपा की रैलियों ने चुनाव प्रचार को एक नए तरीके से परिभाषित किया जो कि हमारे पारंपरिक चुनाव प्रचार से बिलकुल अलग था। पार्टी कार्यकर्ताओं के द्वारा जोड़ी गयी हज़ारों की भीड़, नरेंद्र मोदी के भाषण और किसी इंडिया-पाकिस्तान के मैच की तरह इसे कवर करते हुए हमारे देश के नामी-गिरामी न्यूज़ चैनल्स। हर बात जनता के दिलो-दिमाग पर असर कर रही थी, कई शब्दों के कई अर्थ निकल रहे थे। इस बार ‘मोदी सरकार’, संपन्न भारत और खुशी के अच्छे दिन, लेकिन किस के? शायद जनता उस समय समझ नहीं पा रही थी।

नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में विकास का पूरा ज़ोर दे रहे थे। विकास कई अर्थो में परिभाषित होता है। एक गरीब के लिए रोटी, एक बेरोज़गार के लिए रोज़गार, एक छोटे उद्यमी के लिए उद्योग के अवसर, सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन में बढोतरी, और आम आदमी के लिए सुरक्षा। इन्ही सब उम्मीदों के साथ जनता ने अपना मत, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को दिया। चुनावी परिणाम कुछ इस तरह आये थे कि पहली बार कोई गैर-कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत से केंद्र में सरकार बनाने जा रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस 44 सीटो पे सिमट गयी जिसे विरोधी दल होने का सम्मान भी नहीं मिला। एक भव्य समारोह में नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।

नरेंद्र मोदी ने इन 2 सालों के दौरान विदेश नीती को ख़ास महत्व दिया और सबसे पहले पड़ोसी देश भूटान का दौरा किया और फिर विश्व के अलग-अलग देशों की यात्रा ये सिलसिला अभी भी जारी है। जहां भी नरेद्र मोदी जाते उसका सीधा कवरेज न्यूज़ चैनल भारत देश में दिखाते और हर भारतीय के लिए ‘विकास’ का दायरा बढ़ता जा रहा था। मोदी जी ने देश की जनता से जुड़ने के लिए ‘मन की बात’ नाम का कार्यक्रम शरू कर दिया। मोदी जी एक तरह से देश को हर मसले पर अपनी संजदगी पेश कर रहे थे। इस समय, मोदी जी अपने शिखर पर थे।

लेकिन इसी बीच कई विवादों ने जन्म लिया जिन्हें मोदी सरकार से जोड़ कर देखा गया। इन विवादों पर भारतीय मीडिया बंटा हुआ नज़र आ रहा था। सबसे पहले जो घटना घटी वह उत्तर प्रदेश की थी जहां कुछ मुस्लिम परिवारों का हिन्दू धर्म में विलय होते हुये दिखाया गया। कुछ न्यूज़ चैनल्स ने बाद में ये दावा किया कि इन्हे राशन कार्ड और कई ज़रूरी चीज़ों का लालच दिया गया था। भाजपा के एक नेता साक्षी महाराज ने हिन्दू परिवारों से ज़्यादा बच्चे पैदा करने की बात कही। उन्होंने ये भी कहा की मदरसों में आतंकवादी पैदा होते हैं। इन सब विवादों में अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा था।

इसी बीच दादरी में अख़लाक़ का मामला सामने आया। अचानक से बीफ एक मुद्दा बन गया और रातों-रात कई गोरक्षक संगठन उभर आये। इन गौरक्षक संगठनों  का शिकार दलित भी हुआ, देश भर से ख़बरें आई कि गोरक्षा के नाम पर कई जगह दलितों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। फिर जेनयू के कुछ विद्यार्थियों को आज़ादी के नारे लगाते हुआ दिखाया गया, लेकिन आज़ाद देश में आज़ादी किस से? एक आम भारतीय समझ नहीं पा रहा था, उसे नहीं पता कि मनुवाद और पूंजीवाद क्या होता है और एक आज़ाद देश में हम इसके गुलाम कैसे बन जाते है। हैदराबाद में एक दलित छात्र खुदकुशी कर लेता है और जिस तरह से स्मृति इरानी अपना बयान लोकसभा में देती है वह कई और विवादों को जन्म देता है।

इस कार्यकाल में पंजाब में गुरु ग्रन्थ साहब की बेअदबी होना, सिख समुदाय को ये अपनी धार्मिक आज़ादी में हनन लग रहा था और धार्मिक दृष्टी से ये एक घोर अपराध था, जिसका कसूरवार अभी भी पकड़ा नहीं गया। इस 2 साल के कार्यकाल में अल्पसंख्यक और दलित तो चिंता की मुद्रा में है ही, लेकिन वो मतदाता भी कहीं न कहीं ठगा हुआ महसूस कर रहा है, जिसने अपना कीमती मत मोदी जी को विकास के नाम पर दिया था। भारत का एक्सपोर्ट रेट पिछले 20 महीनों से लगातार गिर रहा है, उत्पादन में कमी आयी है, बैंकिग सैक्टर भी बाज़ार की मार झेल रहा है।

शायद मोदी जी को और इस देश की जनता को ये आभास हो गया है कि अच्छे दिन किसी-किसी के ही आ सकते हैं, सभी के नहीं। 2014 में जो मोदी जी आसमान पर थे, मुझे कहना होगा कि वो अब 2016 में ज़मीन पर आ चुके हैं और 2019 तक कहां-कहां और पहुंचते हैं ये भी देखना होगा। कही ऐसा ना हो कि मोदी जी के ‘अच्छे-दिन’ और हमारे देश का मतदाता एक अज्ञात परछाई बन कर रह जाए।

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.