यूपी पॉलिटिक्स में लाईट कैमरा एंड ‘यादव फैमली’

Posted on October 23, 2016 in Hindi, News, Politics, Specials

विवेकानंद सिंह:

टीवी सीरियल निर्माताओं को अगर कोई पॉलिटिकल फैमिली ड्रामा बनाना हो, तो यूपी के मुलायम सिंह यादव परिवार की जारी नौटंकी काफी सुपरहीट रहेगी। इस फिल्म में इमोशन है, ड्रामा है, थ्रील है बस थोड़ा-सा रोमांस और थोड़े-से एक्शन का तड़का डालने की जरूरत है।

आप सभी समझ रहे होंगे कि इस पारिवारिक द्रोह-विद्रोह की असल वजह सत्ता की चाबी है। हां, कमोबेश आप सही हैं, लेकिन यह लड़ाई उससे भी आगे के लिए है। फिर भी, क्या चाचा-भतीजे के बीच चल रहे महाभारत के लिए यह समय ठीक है? इसका उत्तर किसी से भी पूछिएगा, तो वह हँसता हुआ कहेगा कि समाजवादी पार्टी का ख़राब दिन चल रहा है।

दरअसल, समाजवादी (परिवार) पार्टी के नेताओं को पता चल चुका है कि समय, तो किसी का भी ठीक नहीं है। ऐसे में आनेवाले समय में पार्टी पर नियंत्रण हासिल करने की लड़ाई है। इतिहास गवाह है आज तक वही नेता सफल और मजबूत हुआ है, जिसको या तो मजबूत लठैत (मजबूत हाथ) या फिर बुद्धिमान चाणक्य का साथ मिला।

शिवपाल सिंह यादव भी मुलायम सिंह यादव की मजबूत हाथ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के लोग, तो उनके ऐसे कारनामों से वाकिफ होंगे, जो ख़बर नहीं, सिर्फ गॉसिप बन कर रह गयीं।

चलिए, छोड़िए बीत गयी, सो बात गयी। लेकिन, नेता जी की सफलता में शिवपाल यादव की अपनी भूमिका रही है। मुलायम भी अपने भाई से प्रेम करते हैं, लेकिन बेटे का मोह भी अपनी जगह था और 2012 में यही वजह रही कि नेता जी ने अपने 38 वर्षीय इंजीनियर बेटे को यूपी का सीएम बना दिया। आपको बता दूं कि 2007 से 2012 तक शिवपाल सिंह विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। यहीं, मुलायम ने युवा होने के नाम पर समाजवादी पार्टी की आंखों को अखिलेश नाम का सुरमा पहना दिया।

इसके बाद से ही 61 वर्षीय शिवपाल यादव को अपने बेटे आदित्य यादव के राजनीतिक करियर की चिंता सताने लगी। यह तो आपने भी बीते चार वर्षों में महसूस किया होगा कि अखिलेश मुख्यमंत्री के तौर पर जो सोचते रहे, उसे कार्यान्वित करने में उतने सफल नहीं हो सके। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह सत्ता पर नियंत्रण की खींचतान रही।

शिवपाल सिंह यादव ने जो अपनी वेबसाइट बनाई है, उसमें उनका परिचय शानदार है – “कब किसने जन्म लिया, कहाँ जन्म लिया यह ज़रूरी नहीं है, बल्कि अपनी ज़िंदगी में क्या किया यह जरूरी है और यही जन्म-जन्मांतर तक याद रहता है.” यानी शिवपाल सिंह यादव गीता से काफी प्रेरित लगते हैं। फिर, आनेवाले दिनों में यादव परिवार की लड़ाई का रौद्र रूप भी देखने को मिल सकता है। इस लड़ाई में अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराने वालों को बताता चलूँ कि वे असल में चाचा-भतीजे में सुलह करवाने की फ़िराक में थे और अखिलेश किसी भी सूरत में सुलह के मूड में नहीं दिख रहे हैं।

आज अखिलेश यादव ने बहादुरी दिखाते हुए, अपनी कैबिनेट से कुछ लोगों को बर्खास्त कर दिया, जिनमें चाचा शिवपाल भी एक हैं। अखिलेश में यह हौसला दिखाने की ताकत, तो दिखती है, लेकिन उसके आस-पास न कोई भरोसेमंद चाणक्य हैं और न ही कोई लठैत। उत्तर प्रदेश की जनता समेत पूरा देश इस पॉलिटिकल फैमिली ड्रामे का आनंद ले रहा है।

ऐसी स्थिति में भी, अगर विरोधी दल बसपा, भाजपा आदि पॉलिटिकल माइलेज नहीं ले पाती है, तो समझियेगा कि जनता ने इंजीनियर अखिलेश को नकारा नहीं है। आनेवाला समय, मुलायम और अखिलेश के लिए परीक्षा की कठिन घडी होगी। सपा के चहेते कार्यकर्ताओं को सोच-समझ कर फैसला लेने की घडी है।

बाकी, तो समाजवाद को परिवारवाद में बदल चुके इन नेताओं का भविष्य जनता को ही तय करना है। जानें जनता-जनार्दन।

 

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