खास किराए के लिए बने मकान: डिज़ाइन फॉर डिसकम्फर्ट

Posted on October 7, 2016 in Hindi, Society

शिवांगी भारत:

कुछ समय पहले एक मित्र से हुई बातचीत में उसने बताया था कि, एक बुज़ुर्ग रुसी से बात करने का मौका मिला था जो कम्युनिस्ट और लिबरल होते, दोनों ही रूस में रह चुके थे। तो उसने उनसे पूछा, आपको दोनों व्यवस्थाओं में क्या भला और क्या बुरा लगा?

मेरे मित्र अनुसार उन रुसी सज्जन ने बताया था कि, “साम्यवाद या कम्युनिज्म की ख़ासियत यह थी कि सभी की कुछ बेसिक ज़रूरतें बिन मांगे पूरी की जाती थी जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, हर आदमी के हिस्से का कुछ राशन और एक छत। लेकिन कमी यह थी कि व्यक्तिगत आज़ादी नहीं थी। जैसे सभी एक से घरों में रहते थे, कोई अपने हिसाब से नक्शा नहीं बना सकता था जिसके कारण जीवन से विविधता खात्मे की कगार पर थी। वहीं पर उदारवादी व्यवस्था का फायदा है कि इसमें एक रचनात्मक आज़ादी है। आप कम से कम यह तो तय कर सकते हैं कि आपको कैसे अपना जीवन जीना है और नुकसान यह है कि रोज़मर्रा के इन्तेज़ामात जुटाना भी कभी-कभी और कहीं-कहीं पर बहुत महंगा है।”

उस पल मैं और मेरा मित्र कुछ देर मूक सोचते रहे…हाँ बात तो सही है! यह तो सिक्के के दो पहलुओं को साबित करती बात है। हम उस समय अपने छोटे से शहर के बड़े घरों में थे और यह मूकता दिल्ली आने तक स्थाई रही लेकिन यहां कुछ समय में ही यह अनुभव हुआ कि उस तर्क का वह सिक्का खोटा है। ख़ास कर भारत जैसे देशों में जहाँ जनसंख्या विस्फोट और बाज़ारवाद हाथ में हाथ डाले बढ़ रहे हैं।

मुझे समझ नहीं आता, कौन सी विविधता की बात करती है यह उदारता? यहां हालत यह है कि कमरों की स्थिति बदलेगी केवल, नक्शे नहीं। आंखिर 50 गज के 2BHK और 25 गज के 1 रूम सेट में रचना कहां समाएगी? उल्टा आप हज़ारों में मासिक भाड़ा भरेंगे। सभी फ्लैट्स कॉपी पेस्ट होंगे और आप समझौता कर के बस आउटर या पार्क फेसिंग के एक्स्ट्रा चार्जेज़ देंगे। हां जितनी ज़्यादा सीढियां चढ़ सकते हैं उसी अनुपात पर कुछ 100-500 रुपयों की रहत मिलेगी किराये में।

लेकिन क्या यह काफी होगा मन बहलाने को? शायद है! कि विरोध तो कहीं सुनाई ही नहीं पड़ता। बाज़ारवाद की इस अंधेर नगरी में कोई विचलित नहीं। मन मानी कीमतों पर भाड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है और कई चूल्हें केवल दलाली पर जल रहे है। क्या यही वो आवाज़ें होती हैं जो मुफ्त मिले कबूतरखानों में आज़ादी के नाम पर फड़फड़ाती हैं और उदारता में आधा किराया कमीशन के तौर पर खा कर शांत हो जाती हैं… उन्हीं कबूतरखानों में।

मैंने हाल ही में शिफ्टिंग के दौरान यह प्रश्न किया था कि, जब सबको मालूम है कि दिल्ली में गर्मी और मच्छर दोनों की ही समस्या है तो दरवाज़ों व खिड़कियों में जाली का प्रयोग क्यों नहीं है किसी भी फ्लैट में? उत्तर था यह फ्लैट किराये के लिए ही बनाये हैं। यह जवाब इस व्यवस्था की पोल खोलता है। क्या करायेदार इंसान नहीं होगा? उसे हवा-धूप की आवश्यकता नहीं होगी या उसे मच्छर नहीं काटेंगे?

इस इलाके में ज़्यादातर विद्यार्थी रहते हैं और विद्यार्थियों की जेब में इतना होता भी नहीं कि वे खुदसे जाली लगवाएं, तो बेशक उन्हें बताया जायेगा कि, इस घुटन और मच्छरों से जूझना संघर्ष का हिस्सा है। आंखिर वे दम भरते हैं उन तथ्यहीन सी कहानियों से कि फलां-फलां कई किलोमीटर तैरते थे फिर लैम्पपोस्ट के नीचे पढ़ते थे।

सुनने में आता है कि उन युगपुरुषों के गांव में आज भी राजनीतिक दौरों में ही लैम्पपोस्ट जलते हैं या वो नदी कम से कम तैर कर नहीं पाटी जा सकती। लेकिन क्या करें यह बाज़ारवाद इतने तर्कों को पनपने ही कहां देता है? हां! बस यही मूलमंत्र है कि कमियों को संघर्ष मान कर, बाज़ारवाद का हिस्सा बना जाये और सुविधा की पोशाक में अपने मौलिक अधिकार खरीदे जायें। वैसे मुझे नहीं पता कि मौलिक कहना कितना सटीक होगा क्योंकि मौलिक के नाम पर कुछ गिने-चुने अति प्राकृतिक अधिकारों जैसे- चीखने-चिल्लाने की ही आज़ादी मांगते नज़र आ रहे हैं लोग।

क्या एक ढंग का कमरा, बाथरूम, किचन जिनमें हवा व रौशनी का आना-जाना हो हमारे अधिकारों का हिस्सा नहीं हैं? बेशक हैं, लेकिन इस मुददे को उठाने वाली आवाज़ें कमज़ोर हैं, संघर्षरत हैं, अकेली हैं। यह उस तबके की दुविधा है जिनकी जेब हल्की है, उन युवाओं की है जो आजीविका के लिए छटपटा रहे हैं। उन माँ-बाप की है जो मिडिल क्लास रह गए, मगर चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी ज़िन्दगी अपने अनुसार जी सकें। क्योंकि उदार व्यवस्था में ऐसा नहीं कि रचनात्मकता है ही नहीं, बिलकुल है… अगर आप कैनवास खरीदने योग्य हैं तो, मगर यह कैनवास एक आम आदमी के लिए तारे तोड़ने जैसा है।

अपने-अपने गांवों में एकड़ों फैली ज़मीनें, गाय, बछड़े याद करते कुछ परिवार बिना खिड़की के एक कमरे में घुटते हैं और जो रोकड़े का दम रखते हैं उनका एक बंगला जूहू बीच, एक फार्महाउस कौसानी तो मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में कई फ्लैट होते हैं। और हों भी क्यों ना? नहीं तो विविधता ख़त्म हो जाएगी! रचनात्मकता मिट जाएगी! आखिर व्यक्तिगत आज़ादी को अब विचारों से नहीं व्यापार से ही बचाया जा सकता है। उदार व्यवस्था में, अरमान कॉलेजों में नहीं जेबों में जन्म लेते हैं और हमारा पाठ्यक्रम हमें परिश्रम की दुहाई देता है..!! वाह रे उदारवाद तेरी मेहरबानी!

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