भोजपुरी का मतलब बस अश्लील गाने और फूहड़ता नहीं है

Posted on October 26, 2016 in Hindi, Media, Specials

गौरव गुप्ता:

बिते दिनों वीर कुँवर सिंह महाविधालय में भोजपुरी की पढ़ाई बन्द करवा दी गयी। पूरे बिहार में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। भोजपुर और आरा  में चक्का जाम, और रेल जाम तक किया गया। “अश्लिलता मुक्त भोजपुरी एसोसिएशन” के मेम्बर्स ने भोजपुरी को माँ बताते हुए वीडियो बनाया। इसे “आईं डेग बढ़ाई” के नाम से सोशल मीडिया में शेयर किया गया।

फेसबुक पर भी यह बहस छाया रहा। एनडीटीवी के वरिष्ट पत्रकार “रवीश कुमार” ने अपने ब्लॉग क़स्बा में भोजपुरी के समर्थन में लिखा, “भोजपुरी बिहारी अस्मिता की आत्मा है“।

इसके जबाब में जानकीपुल ब्लॉगर और कथाकार “प्रभात रंजन” ने  फेसबुक पर यह कहकर नया बहस छेड़ दिया कि “सबसे अधिक द्विअर्थी गाने भोजपुरी में लिखे गए हैं, और इस भाषा के लोग भाषाई अस्मिता और संस्कार की बात करते है”।

अजित दुबे “इंडिका इंफोमेडिया” से प्रकाशित पुस्तक “तलाश भोजपुरी भाषायी अस्मिता की” में लिखते है की भोजपुरी का इतिहास करीब हज़ार वर्षों का है और यह दुनियाभर में 16 देशो में 20 करोड़ से भी ज़्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। ऐसे में भोजपुरी के “संस्कार” पर सवाल उठाना हास्यास्पद लगता है।

भोजपुरी साहित्यकार रामनाथ पाण्डेय द्वारा  भोजपुरी भाषा का पहला उपन्यास “बिंदिया” प्रकाशित हुई ,तो उसकी स्वीकृति एक ऐतिहासिक घटना के रूप में हुई। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने सोल्लास अपने पत्र में लिखा था- भोजपुरी में उपन्यास लिखकर आपने बहुत उपयोगी काम किया है। भाषा की शुद्धता का आपने जितना ख्याल रखा है, वह भी स्तुत्य है। पाण्डेय जी की भोजपुरी के प्रथम उपन्यास बिंदिया पर ” जग्गनाथ सिंह पुरस्कार”, इमरीतिया काकी के लिये “अभयानंद पुरस्कार” महेंदर मिसिर के लिये “राजमंगल सिंह” के अलावा भास्कर सम्मोपाधि भी प्राप्त हुई थी।

महादेवी वर्मा ने कहा भी है- “भोजपुरी सशक्त लोकभाषा है, तथा उसमे भारत की धरती की उर्वरता और उसके आकाश की व्यापकता एक साथ मिल जाती है।”

भोजपुरी लोकगीतों में राष्ट्रीय चेतना , जनजीवन की अभिव्यक्ति , नारी चित्रण का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

“अपने देश के करनवा जे कि जूझी गइले ना
केतने माई के ललनवा हाय, मरि गइले ना”

दलितों के दुःख और करुण को लोकगीतों के माध्यम से बखूब स्वर दिया गया है-

“हमनी के रीति दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के साहिबे से मिनती सुनाइबि”

वही प्रेम दर्शन भी भोजपुरी लोकगीतों में मधुरता से देखने को मिलता है।

“चिड़ियां चली चल बगइचा
देखत सावन की बहार
देखत फूली को बहार
सावन में फुले बेईला चमेली
भादो में कचनार
चिड़ियां चली चल बगइचा”

इसमें दो राय नही है कि वर्तमान भोजपुरी फ़िल्म फूहड़ता की ओर उन्मुख हुई है, जैसी की अन्य भाषा भी हुई है। अश्लीलता और फूहड़ता को किसी एक भाषा से जोड़ना गलत है। क्योकि फूहड़ता भाषा की नही समाज की उपज है, जो भोजपुरी, बंगाली, मराठी, हरयाणवी, पंजाबी, कन्नड़ किसी भी भाषा में हो सकता है।

भोजपुरी फिल्में भोजपुरी की दशा और दिशा बनाने में सहायक है, न की वही सबकुछ है। ऐसे में भोजपुरी के भाषाई बहस में क्या “भिखारी ठाकुर” की बिदेसिया को भूला जा सकता है? क्या नदिया के पार और गंगा माँ तोहे पियरी चढ़इबो की लोकप्रियता को अनदेखा किया जा सकता है? मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी कई ऐसे भोजपुरी नाम हैं जो देश बिदेस में बिहार का सर गर्व से ऊँचा कर रहे हैं। इन सब में ” निल नितिन चन्द्रा” की भोजपुरी फ़िल्म “देसवा” को कैसे नाकारा जा सकता है। भोजपुरी वृहत साहित्य को संकीर्णता से समझना हमारी भूल है।

जब जिय हो बिहार के लाला गाना गूंजता है, तो एक अलग अनुभव होता है जो की भोजपुरी भाषा में लिखा गया है, ऐसे में रवीश का कहना की ” भोजपुरी का सम्मान , इतिहास का सम्मान है, गलत नहीं है। भोजपुरी भारत के इतिहास का पसीना है, बिल्कुल सही है। भोजपुरी भाषा बिहारी अस्मिता की आत्मा है।

(फोटो आभार- फेसबुक)

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