तरुण विजय जी ‘मर्डर इन दादरी’ को ‘डेथ इन दादरी’ मत कहिए

Posted on October 24, 2016 in Hindi, News, Politics, Specials

बीरेंद्र सिंह रावत:

यदि किसी को इस बात का सबूत खोजना हो कि हमारे देश के कई सांसद कैसे किसी हत्या को जायज़ ठहराते हैं तो उन्हें 2 अक्टूबर, 2015 के इंडियन एक्सप्रेस में तरुण विजय के लेख को पढ़ना चाहिए। हालांकि उनके लेख को पढ़कर तो नहीं लगता कि वे सम्मान के योग्य हैं, लेकिन क्योंकि वे भारतीय राष्ट्र के सांसद हैं इसलिए मैं उनके लिए, उसके की जगह उनके शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।

उनके लेख का शीर्षक है “डेथ इन दादरी” ।इस लेख में भाषा का शर्मनाक प्रयोग देखिए | एक हत्या को मौत कहा जा रहा है। शीर्षक ही बता रहा है की किसी-ने-किसी को नहीं मारा, बल्कि कोई अपने आप मर गया। क्योंकि हत्या हुई ही नहीं इसलिए जांच का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। अपने लेख में वे चिंता तो इस बात की जता रहे हैं कि इस तरह की घटनाओं के कारण मोदी जी की “विकास” की रेल अपनी पटरी से उतर सकती है। लेकिन फिलहाल वे अख़लाक़ की हत्या की जांच को पटरी से उतारने के लिए एक ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जिसमें हत्यारे दृश्य से ओझल कर दिए जाएं। भाषा के शर्मनाक प्रयोग को जारी रखते हुए वे लिखते हैं कि मोहम्मद अख़लाक़ को मरना नहीं चाहिए था (“Mohammad Akhlaq shouldn’t be dead”) उनके अनुसार अख़लाक़ को मरना नहीं चाहिए था। जाने वह क्यों मर गया। वे यह नहीं कह रहे कि अख़लाक़ को मारा नहीं जाना चाहिए था। उन्हें लिखना चाहिए था कि मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या नहीं की जानी चाहिए थी यानि “Mohammad Akhlaq shouldn’t be murdered”

तरुण विजय लिखते हैं कि शक के आधार पर किसी व्यक्ति की जान ले लेना बिलकुल गलत है (“Lynching a person merely on suspicion is absolutely wrong”) यानि संदेह के आधार पर किसी की हत्या करना एकदम गलत है | इसका मतलब यह निकलता है कि जहाँ संदेह की गुंजाइश बाकी न रह गई हो वहाँ किसी के द्वारा, किसी की भी हत्या की जा सकती है। वे बताते हैं कि “हिंदुत्व” (“Hinduism”) भी यही सन्देश देता है।

वे लिखते हैं कि यह एक हिंसक प्रतिक्रिया (“violent reaction”) थी। एक बार फिर से भाषा का शर्मनाक प्रयोग देखिए। जो किया गया वह अपराध नहीं है। वह तो प्रतिक्रिया है। आपको ध्यान होगा कि गुजरात में हुए कत्लेआम में ठीक यही भाषा प्रयोग में लाई गई थी। यही भाषा सन 84 में हुए कत्लेआम को जायज़ ठहराने के लिए उपयोग में लाई गई थी जब स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ़ की गई हिंसा को स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी ने यह कहकर सही ठहराया था कि “… हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।” यह वह भाषा है जो हत्या को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल की जाती रही है। यही भाषा इराक में लाखों बेकसूरों के क़त्ल को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल की गई थी। यह नरसंहार की भाषा है | ऐसी भाषा, हिंसक दिलोदिमाग में ही उपज सकती है।

तरुण विजय अपने लेख में एक और खतरनाक तरीके से अखलाक की हत्या को सही ठहरा रहे हैं। वे लिखते हैं कि बांग्लादेश में हर रोज़ हज़ारो गाएं बूचड़खाने में धकेल दी जाती हैं। गाएं उड़ नहीं सकतीं। (“Thousands of cows are pushed into the slaughterhouses of Bangladesh every day. Cows can’t fly”)। हत्या हुई है अखलाक की, उसमें बांग्लादेश में घटने वाली (ये उनकी कल्पना भी हो सकती है) घटना का ज़िक्र धर्म को आधार बनाने के लिए किया जा रहा है। उनकी नासमझ समझ से बांग्लादेश में सिर्फ़ मुसलमान रहते हैं। वे मुसलमान गायों को मार रहे हैं। हम उनका तो कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसलिए अखलाक जैसों को तो मरना ही होगा। इस तरह तरुण विजय अतार्किक और उन्मादी बना दिए गए हिन्दू युवकों को, दुनिया के किसी कोने में घटने वाली घटना को आधार बनाकर, हिंसा करने के लिए उकसा रहे हैं।

तरुण विजय ने बड़ा ही भावात्मक खेल खेलते हुए लिखा कि गाएँ उड़ नहीं सकतीं। यदि वे उड़ सकतीं तो वे बांग्लादेश से उड़कर भारत के “हिंदुत्व” प्रेमियों की गोद में आ बैठती। और ये उनकी सेवा उसी प्रकार से करते जैसी “सेवा” ये देश के सूखाग्रस्त इलाकों में पानी और चारे के बिना मरती हुई गायों की कर रहे हैं।

यदि तरुण विजय की तरह से सारी दुनिया सोचती होती तो अब तक दुनिया के अनेक हिस्सों से “प्रतिक्रिया” का भयानक शोर सुनाई दे चुका होता। लेकिन यह दुनिया के लिए अच्छा है कि इसमें तरुण विजय जैसे लोग कम हैं।

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