चाईनीज़ प्रॉडक्ट्स का बहिष्कार और राष्ट्रवाद का नाटक

Posted on October 4, 2016 in Hindi

शशि भूषण सिंह:

इस दीवाली चीनी पटाखों और झालरों का बहिष्कार कर चीनी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देने जैसी समझ की राष्ट्रवादी मुहिम पर तरस आता है। विडंबना यह कि जिस तरह से बहिष्कार और राष्ट्रवाद को समझा व समझाया जा रहा है वह बिना किसी इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र की जानकारी के सतही रूप से सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है।

क्या है बहिष्कार की आर्थिक रणनीति और इसके राजनीतिक  लाभ – हानि क्या हैं,समझे बिना इसके प्रयोग की बात करना ‘शेर की सवारी’ साधने जैसा है। हम चाहें तो दो उदाहरणों से ही इसे समझ सकते हैं।

पहली है, नेपोलियन की “महाद्वीपीय व्यवस्था”। मॉस्को से मेड्रिड तक नेपोलियन की तूती बोलती थी,लेकिन इंग्लैंड उसके सामने झुकने को तैयार नहीं था। अतः नेपोलियन ने इंग्लैंड के पेट पर लात मारकर झुकाने की रणनीति अपनायी। परिणाम क्या हुअा। पूरा यूरोप इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति से पैदा हुए उत्पादों पर निर्भर था। स्वयं नेपोलियन की फौज के लिए भी जूते तक इंग्लैंड की फैक्ट्रियों से आते थे। अर्थात् “महाद्वीपीय व्यवस्था” को फेल होना पड़ा। उल्टे यूरोप के वे राज्य जो अन्यथा उसके मित्र हो सकते थे, शत्रु बन गये। अंततः नेपोलियन के पतन के कारणों के रूप में एक शीर्षक “महाद्वीपीय व्यवस्था” को भी माना गया।

जाने दीजिए, नेपोलियन का फ्रांस दूर है,हम दूसरा उदाहरण भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से ले लेते हैं। कर्जन के बंग-भंग निर्णय के विरुद्ध देशी नेतृत्व ने “स्वदेशी और बहिष्कार” की रणनीति अपनाई। उदेश्य था कि इंग्लैंड के उत्पादों का बहिष्कार कर हम इंग्लैंड के आर्थिक हितों पर जब दबाव डालेंगे तो इंग्लैड का पूँजीपति वर्ग ‘ब्रिटिश भारत सरकार’ पर भारतीयों की राजनीतिक मांग मानने के लिए दबाव बनायेगा।
ठीक वह हुआ और सरकार को बंगाल का मनमाना विभाजन रद्द करना पड़ा। आगे के वर्षों में भी असहयोग और सविनय अवज्ञा अांदोलनों के दौर में इस ‘बहिष्कार’ रणनीति का सफल उपयोग हुआ।

अब इसके बाद आप विश्लेषण करें कि दीवाली पर चीन निर्मित बिजली के झालरों और पटाखों का बहिष्कार करके हम उसकी अर्थव्यवस्था को कितनी बड़ी क्षति पहुँचा सकते हैं? क्या चीन से हम सिर्फ पटाखों और झालरों का आयात करते हैं? या क्या चीन का पटाखा और झालर लघु उद्योग सिर्फ भारत को निर्यात के भरोसे ज़िन्दा है?

भारत में कौन खरीदता है इन सस्ते चीनी उत्पादों को?  भारत के मध्य वर्ग का सक्षम तबका क्वालिटी से कम्प्रोमाइज़ नहीं करता है। वह नामी गिरामी ब्रान्ड की वस्तुएँ खरीदता है, चीप चीनी उत्पाद नहीं। यह बीस रूपये पीस का झालर और सस्ते चीनी पटाखे देश का वह गरीब मज़दूर किसान परिवार खरीदता है जिसका दीवाली बजट सौ दो सौ पांच सौ में सिमटना मजबूरी है। वह इतना सक्षम नहीं की घी में बने मोदक से गणेश पूजा करे। वह बताशे से काम चलाता है। वह दो सौ रूपये सैकड़ा मिट्टी का दीया, सवा सौ रुपये लीटर सरसों तेल या चार सौ रुपये किलो घी के दीए जलाना अफोर्ड नहीं कर सकता। वह ब्रांडेड कम्पनियों के बल्ब, सीएफएल या एलईडी से अपने घर को रोशन करना अफोर्ड नहीं कर सकता। वह मुर्गा छाप पटाखे नहीं खरीद सकता। यह उस गरीब की मजबूरी है। प्लीज़ आप उसकी मजबूरी पर अपने छद्म राष्ट्रवाद की सवारी बन्द कीजिए।

आप इस बहिष्कार के बहाने जिस राष्ट्रीय आर्थिक नीति की बात कर रहे हैं, विश्व व्यापार संगठन और ग्लोबल विलेज के इक्कीसवीं सदी में नहीं चल पायेगा। चल ही नहीं सकता। फेल होना इसकी नीयति है। क्या आपको पता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत की भागीदारी डब्ल्यूटीओ से पहले कितनी थी और अब कितनी है? क्या भारत विश्व व्यापार संगठन से अलग होने का निर्णय ले सकता है,इतनी तैयारी है हमारी? बिना तैयारी के यह रिस्क लेना नेपोलियन की गति को पहुँचा देगा।

तो चलिए करते हैं तैयारी आत्मनिर्भर बनने की । वर्तमान दौर में एक लगभग असंभव से लक्ष्य को पाने की तैयारी। बिस्मार्क के ‘लौह नीति’ की तरह आत्मनिर्भरता की तैयारी शुरू करते है। “मेक इन इंडिया” के जुमले को धरती पर उतारते हैं। “इज आॅफ डुईंग बिजनेस” को ठीक करते हैं। जिस तरह आनन फानन में फर्जी लूटेरी फर्म बनती हैं,उसी गति से असली फर्म बनने लायक माहौल बनाते हैं। कर पायेंगे…सुधार पायेंगे व्यवस्था? फैक्ट्री के शिलान्यास से लेकर उसके उत्पाद की बिक्री तक फैले भ्रष्टाचार को समाप्त कर पायेंगे।

नहीं कर पायेंगे । कोई बात नहीं। चलिए हम भी मानते हैं देश बड़ा है। आपके इस बहिष्कार को हम भी अपना पूरा समर्थन देते हैं। शुरुआत करते हैं। देश इम्पोर्टेंट है बहुत महत्वपूर्ण है, भारत सरकार भी कोई इम्पोटेंट नहीं है अतः वह पहले अपने द्वारा पटेल की मूर्ति निर्माण का चीन की कंपनी को दिया गया ठेका रद्द करे। आसान है यह । फिर बड़े अंबानी पर दबाव बनाकर चीन की zte द्वारा बनाये जा रहे Lyf का कान्ट्रेक्ट रद्द कराते हैं। मोदी जी के “डीजीटल इंडिया” के जुमले और रिलायंस jio का गर्भपात करा देते हैं। कर पायेंगे?

नहीं कर पायेंगे तो बन्द कीजिए यह चुनावी राजनीति से प्रेरित “राष्ट्रवाद” का नाटक । गरीब भारतीयों को अपने छद्म राष्ट्रवादी बुखार का चारा मत बनाईए। राष्ट्रवाद के शेर की सवारी घातक है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।