हम दलितों के साथ कोई नहीं खेलता इसलिए ज़्यादा बच्चों को देते हैं जन्म

Posted on October 22, 2016 in Hindi, Society

बात उस समय की है जब मैं नया-नया विद्वान बना था। ग्यारहवीं या बारहवीं की परीक्षा देने के बाद में गांव गया हुआ था। उत्तराखंड के अधिकांश गांवों की ही तरह मेरे गांव में भी एक दलित परिवार है, जिन्हें मेरे यहां के ठाकुर और ब्राह्मण हिकारत और अभिमान के साथ डूम कहते हैं। यह परिवार गांव की परिधि पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है।

हां तो, मैं कह रहा था कि मैं नया-नया विद्वान बना था। मैं विद्वता के पंखों पर सवार हो, गांव की पगडंडियों पर उड़ता फिरता। ऐसे ही एक दिन जब मैं उड़ रहा था तो मुझे मेरे गांव के पड़ोसी गांव के दलित परिवार की एक स्त्री रास्ते में मिल गयी। मैं कुछ-कुछ लिबरल थौट से भरा हुआ, उनके पास जा पहुंचा। लिबरल इस मायने में कि आम तौर पर लोग उनसे सहज में बात करने से बचते हैं। मैं पहुंचा तो था यह सोचकर कि उन्हें अपने ज्ञान की लाठी से ठेलकर कहीं “नीचे” गिरा दूंगा, लेकिन उनके साथ हुई उस बातचीच को मैं आज तक भूल नहीं पाया हूं।

उस बातचीत की याद पिछले दिनों कुछ और तीखी हो गयी। मौका था मुंबई उच्च-न्यायालय के उस फैसले से गुजरने का जिसमें किसी स्त्री के अपनी इच्छा से जीवन को चुनने के अधिकार के एक और पक्ष की व्याख्या की गयी है। न्यायालय के अनुसार किसी स्त्री के पास यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वह गर्भ को धारण करे या नहीं। यदि पति या पार्टनर ने उसके शरीर में गर्भ स्थापित कर भी दिया तब भी, बिना कोई कारण बताए वह स्वयं को उस गर्भ से मुक्त कर सकती है।

उन स्त्री से बात की शुरुआत मैंने एक सवाल से की । मैंने पूछा- “आपके कितने बच्चे हैं?” यह सवाल “हम दो हमारे दो” के नारे से पैदा हुआ था। उन्होंने कुछ संख्या बताई, उस संख्या को सुनकर मुझे तस्सली हुई कि अब तो मैं ज़रूर ही अपने ज्ञान की लाठी से इन्हें ठेल दूंगा। क्योंकि जो संख्या उन्होंने बतायी थी वह “हम दो हमारे दो” के नारे पर बुरी तरह से चोट कर रही थी। उस समय, सरकार के नारे का पैरोकार बना मैं ताव खा गया और दूसरा सवाल पूछ बैठा कि-“ भाई साहब क्या करते हैं?” उन्होंने बताया कि अपनी ही खेती करते हैं। “खेती कितनी बड़ी है?” मैंने चौथा सवाल दागा। इस सवाल के जवाब में उन्होंने अपने खेत की जमीन का जो विवरण पेश किया उससे मेरा विश्वास और बढ़ गया। इसी प्रकार की विजय-भावना से भरकर मैंने पांचवा सवाल भी दाग दिया। “इतनी कम कमाई है, तो इतने सारे बच्चे क्यों पैदा कर लिए?” मेरे हिसाब से यह सवाल मेरा मास्टर स्ट्रोक था। लेकिन इस सवाल के जवाब में उन्होंने जो कहा उसने मेरे छक्के छुड़ा दिये। उन्होंने बहुत ही उदास आवाज में जो कहा उसका मतलब था कि “हे! पगले, हमारे बच्चों के साथ कोई खेलता नहीं।”

उन्होंने यह बात जिस दर्द के साथ कही, उसकी टीस से मैं, कभी-कभी अब भी बैचेन हो जाता हूं।

मुंबई उच्च-न्यायालय के फैसले के संदर्भ में उपर्युक्त बातचीत इसलिए याद आयी कि जाति व्यवस्था ने उन और उन जैसी अन्य स्त्रियों के राइट टू प्रेगनेंसी के रास्ते में बाधाएं खड़ी कर रखी हैं। इस मामले में जाति है जिसके कारण उन्हें बार-बार गर्भ धारण की पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यदि जाति के आधार पर उनके बच्चे और बच्चियों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता तो वे अपने पति के साथ मिलकर ज्यादा बच्चे या बच्चियाँ पैदा न करने का फैसला लेतीं और इस प्रकार उनके गर्भ धारण करने और न करने के अधिकार की रक्षा हो जाती।

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.